अतिथि-71

अतिथि -71

भारी झमाझम का माहौल हो चला था.. सब तरफ सभी लोग भाग रहे थे, किस लिए क्यों ये किसी को मालूम न था..।

हिंदुस्तानी शादियों के घर ऐसे ही हो जाते हैं।
जितना काम होता है उससे ज्यादा उसका फैलाव हो जाता है। पंडित जी कभी एक बार में एक चीज नहीं मांगते, कभी कुछ कभी कुछ, इसीलिए लाने वाले को भी बार-बार भागना पड़ता है।

     एक आदमी एक काम करता होता है कि तभी उसे किसी दूसरे काम के लिए बुला लिया जाता है, और उसका वह पहले वाला काम भी अधूरा रह जाता है। इसी सब भाग दौड़ में दोनों परिवार लगे हुए थे।

डिंकी के मन में जहां नए परिवार से जुड़ने की खुशियां थी, वहीं अपने परिवार को छोड़ने का गम भी था। कुछ अद्भुत संगम की हिलोरें उसके दिल में उठ रही थी।
उसी समय कमरे में वर पक्ष से एक महिला चली आई उसने इधर-उधर देखा और धीरे से डिंकी के पास बढ़ गई ।

“चलो तुम्हें दादी जी ने बुलाया है।”

डिंकीने अपनी मां की तरफ देखा, वह वही संदूक से कुछ जरूरी सामान निकाल रही थी। उन्होंने इशारे से डिंकी को जाने के लिए कह दिया।

डिंकी उस औरत के साथ कमरे से बाहर निकाल गई। आमने-सामने की अलग-अलग बिल्डिंग में वर और वधु पक्ष के ठहरने का इंतजाम था। उन दोनों बिल्डिंग के बीच में एक बड़ा सा मैदान था, जहां पर रिसेप्शन होना था। बिल्डिंग एक तरफ से जुड़ी हुई थी। उसी रास्ते से लेकर वह औरत डिंकी को अपने साथ लिए आगे बढ़ गई। डिंकी की आंखें माधव को तलाश रही थी। आज उसका मन ही नहीं भर रहा था, आज उसकी मेहंदी होनी थी..।

मन पुलकित था, तन स्फुरित था और आंखे चंचल हो रही थी..।
कुछ ही देर में वो दादी के कमरे में थी.. ।

दादी ने डिंकी को देखा और अपने पास रखे बटुए से एक सुंदर सा डिब्बा निकाल लिया..
उसे खोल कर उन्होंने अंदर से एक कंगन निकाला और डिंकी की तरफ बढ़ा दिया।

“ये क्या है दादी माँ?”

“कंगन है बेटा, ये माधव के दादा जी ने बनवाये थे हमारे लिए..।
पहले सोचा था माधव की माँ को देकर जायेंगे, लेकिन वो हमसे पहले चली गयी। फिर सोचा सुलक्षणा को दे देंगे। लेकिन उसके लक्षण देख देख कर जी भर गया, और उसे देने का मन ही नहीं किया।
अभी जब पिछली मर्तबा माधव तुम्हे साथ लेकर आया तब लगा कि इन कंगनों को सही कलाईयाँ मिल गयी..।”

“इन्हे आप पहनिए न दादी माँ।”

“हमने तो जिंदगी भर पहने बेटा, अब ये बूढी कलाईयाँ इतना बोझ नहीं सह पाएंगी। अब तुम पहनो इन्हे।
कही तुम ये तो नहीं सोच रही कि बूढी दादी ने अपना उतारा जेवर तुम्हे दे दिया।”

“अरे नहीं दादी माँ, बिलकुल ऐसा नहीं सोच रही मैं।”

डिंकी ने कंगन के लिए हाथ बढ़ा दिया, और दादी ने कंगन उसे पहना दिए…।

कुछ देर दादी के साथ बैठने के बाद मेहंदी का समय हो रहा था इसलिए डिंकी लौट गयी…।

डिंकी के साथ सुषमा थी, वो दोनों अभी कॉरिडोर में थी कि चिंटू भागता हुआ उनके पास पहुँच गया।

“ए डिंकी, चलो वहाँ बड़े वाले हॉल में सबको बुला रहे है।”

“काहे ?”

“हमे नहीं पता, मम्मी ने तुम्हे बुलाने भेजा है..।”

डिंकी और सुषमा भी तेज़ कदमो से उस तरफ बढ़ गए..

दोपहर का वक्त हो चला था, खाने के बाद मेहंदी होनी थी, सुबह की पूजा सम्पन्न हो चुकी थी !

डिंकी और सुषमा उस हाल में पहुंच गए। वहां उनके बाकी रिश्तेदार भी मौजूद थे। ठीक बीचों बीच एक लंबी चौड़ी सी टेबल पर लोग कुछ खाने के व्यंजन ला लाकर रखते जा रहे थे। हाॅल के चारों तरफ दीवार से लगकर टेबल सजी हुई थी। और उनके ठीक पीछे बैठने के लिए कुर्सियां लगी हुई थी। डिंकी और सुषमा को समझ में आ गया कि आज का दोपहर का भोजन यही होना है।

कुछ नवयुवक दौड़ दौड़ कर बीच में लगी टेबल पर खाने की वस्तुओं के डोंगे धरते जा रहे थे। डिंकी इधर-उधर देख रही थी कि तभी उसकी नजर एक तरफ बैठी उसकी मां पर पड़ गई। सुषमा का हाथ खींचते हुए वह सुलोचना की तरफ बढ़ गई। सुलोचना ने उसे इशारे से बुला लिया।

” यहां क्या हो रहा है मम्मी?”

” आज दोनों पक्ष का भोजन एक साथ है। माधव जी के परिवार वालों ने ही हम सबको यहां बुलवाया है। तुम लोग भी खाली जगह देखकर बैठ जाओ। अभी खाना परोसने का कार्यक्रम शुरू होगा।”

” अच्छा, तो क्या बुफे नहीं है?”

” नहीं, आज यह लोग अपने हाथों से खाना परोस कर खिलाएंगे।”

” तो यह सब माधव जी के घर वाले कर रहे हैं?”

डिंकी की आंखों में सवाल तैर गया।

” हां उन्होंने ही तो हमें बुलाया है। “

अपनी मां का जवाब सुनकर डिंकी ने हल्के से हामी भरी और इधर-उधर अपने बैठने के लिए जगह देखने लगी। तभी उसकी नजर दूर एक कुर्सी पर बैठे माधव पर पड़ी।
वह सुषमा का हाथ थामे माधव की तरफ बढ़ गई।

माधव की एक तरफ उसके दोस्त बैठे थे। माधव ने शायद अपने दूसरे तरफ की कुर्सी डिंकी के लिए खाली रखी थी।

” यहां हमारे लिए तो जगह ही नहीं है। हम कहीं और चले जाते हैं।”

सुषमा ने मुंह बनाकर कहा और माधव मुस्कुरा कर खड़ा हो गया।

” आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं, आपके लिए जगह यही बन जाएगी।”

एक छलांग लगाकर माधव के साथ बैठा उसका दोस्त अपनी जगह से उठा और दूसरी तरफ की कुर्सी उठाकर डिंकी के बैठने वाली कुर्सी के बगल में लगा दिया। डिंकी माधव के बगल में बैठ गई और उसके ठीक बाजू में डिंकी की सहेली सुषमा।
    दूर से गरिमा भी दौड़ती हुई चली आई। सुषमा के बगल में उसने भी अपनी कुर्सी लगा ली।

” तो आज आप लोग हमें अपने हाथों से परोस के खिलाने वाले हैं ?”

माधव ने आश्चर्य से डिंकी की तरफ देखा।

” यह प्लान तो तुम्हारी तरफ से है ना?”

डिंकी को माधव की बात समझ में नहीं आई। उसने माधव की तरफ देखा।

” मतलब?”

” मतलब हम सब तो अपने कमरों में थे, शाम की कुछ तैयारी कर रहे थे कि तभी वधू पक्ष की तरफ के लड़के आए और कहने लगे कि आज दोपहर का भोजन सभी का एक साथ होगा। वह भी शुद्ध पारंपरिक भारतीय भोजन।”

डिंकी की आंखें जरा और खुल गई।

” लेकिन मम्मी ने तो अभी-अभी कहा कि आप लोगों ने इनवाइट भेजा था।”

” चलो जिसने भी भेजा, लेकिन यह किया तो अच्छा ही है।”

वह दोनों आपस में बातें कर रहे थे, तभी कुछ लड़के तेजी से उनके सामने से गुजरते हुए थालियां परोसते चले गए। बड़ी-बड़ी गोल स्टील की थालियों में उनके बाद आने वाले लड़के खाली कटोरियाँ लगाकर निकल गये। डिंकी और माधव दोनों ही उन अनजान नवयुवकों को देख रहे थे। दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और कंधे उचका दिए।
वह दोनों ही इन नवयुवकों से अपरिचित थे। लेकिन खाने की खुशबू ऐसी उठ रही थी कि सबके पेट में अब चूहे दौड़ने लगे थे। उसी वक्त हॉल का बंद दरवाजा खुला और माइक थामे एक सजीला सा लड़का अंदर चला आया..।

“हेलो एवरीवन..मैं पार्थ हूँ ! अपनी छुटकी डिंकी जो अब दुल्हन बनाने वाली है का बड़का भैया !
और ये सारे मेरे दोस्त है, मेरी आर्मी !
हम सब स्कूल के समय से साथ है, और गणेश आशीर्वाद से आज तक साथ है..।
जैसे ही पता चला हमारे घर की लाड़ली की शादी होने जा रही है, मैंने सोचा, तुरंत उड़ कर आ जाऊं, और सब से मिल लूँ। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और फिर सीधे समय तब मिला जब शादी का मुहूर्त तय हो गया।

अपने होने वाले जीजा से मिलना था तो उनकी फैमिली को भी देखना था, इसके अलावा अपनी खुद की फैमिली से साल भर से मिलना नहीं हुआ था। इसलिए सोचा सबसे एक साथ मिलने का कोई उपाय करना होगा। और बस इसीलिए मैंने और मेरी आर्मी ने वर पक्ष और वधु पक्ष को एक साथ बैठा कर अपने हाथों से खिलाने की सोची और आप सबको यहाँ बुला लिया..

अब अगले घंटे भर तक यहाँ किसी का मोबाइल शोर नहीं करेगा और हर कोई बिना मुंह में ताला लगाए खाना खाएंगे यानी खाते भी जायेंगे और बातें भी करते जायेंगे..।

और एक बात बता दूँ, आज का सारा खाना मैंने और मेरे दोस्तोँ ने बनाया है..। तो अब आप लोग खाना शुरू कीजिये, लेकिन खाना शुरू करने की एक शर्त है, पहला निवाला आप अपने बाजु में बैठे व्यक्ति को खिलाएंगे !”

पार्थ ने अपना परिचय दिया और वहाँ बैठे सभी लोग एक साथ ताली बजाने लगे..
माधव ने डिंकी की तरफ देखा..

“तुम्हारे पार्थ भैया तो बड़े कमाल के निकले !”

“हाँ फिर.. हमारे यहाँ सब ऐसे ही हैं !”

डिंकी मुस्कुरा उठी.. खाना परोसा जा चुका था, माधव डिंकी के साथ साथ वहाँ बैठे सभी लोगो ने अपने साथ बैठे व्यक्ति को पहला निवाला खिलाया और इस तरह वहाँ लोगो का भोजन हँसते बात करते पूरा हुआ..

क्रमशः
 

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Gouri sarwa
Gouri sarwa
1 year ago

Badhiya 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Geeta Prasad
Geeta Prasad
1 year ago

Are wah! Paath ke entry to Badi mast Rahi. Bhai ho to Aisa var paksh per apna Jadu Chala Diya…

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

अरे वाह पार्थ की जबरदस्त एंट्री हुई और आते ही सबका दिल भी जीत लिया 😊दूसरी तरफ दादी ने भावुक कर दिया बहु को बेटी समझना भी बहुत सुखद अनुभव है डिंकी के लिए शायद ही ये प्यार कभी सुलक्षणा से मिले डिंकी को।
शादी व्याह मे जितने भी लोग हो काम करने के लिए कम ही होते डॉक्टर साहिबा.. सुलोचना को पूछना कुछ हमारे लायक काम हो तो बताना हमे 😊🙏🏻।
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

Poonam Aggarwal
Poonam Aggarwal
1 year ago

😃😃😃😃🧡🧡🧡👏👏👏👏

Nisha
Nisha
1 year ago

Waah parth ne kya mast kaam kiya hai.sabke sath khane aur milne ka alag hi maza hai 🥰🥰🥰🥰🥰🥰

Manjeet kaur
Manjeet kaur
1 year ago

Awesome 👌👌👌👌👌👌👌👌

Jagriti
Jagriti
1 year ago

Mind blowing क्या बात है कितना सुंदर उपाय सोच लिया पार्थ ने भोजन भी कराओ और प्रेम भी बांटो

Deepshikha Manu
Deepshikha Manu
1 year ago

Beautiful part

Jyoti
Jyoti
1 year ago

Very nyc part 👌
Waiting for next part

Aruna
Aruna
1 year ago

👌👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏👏