गली बनारस की -3

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-3

हर सन्डे में संगम टॉकीज में
तुझे फिल्म दिखाऊं नाईट शो
फिल्मों की तरह इक दिन यूँ हो
बन जाऊं मैं तेरा हीरो

तेरा दिल बहलाऊं डांस करूँ
मैं यूँ ही तुझे रोमांस करूँ
तेरे दिल में रहूँ खुशियों की तरह
तू हसे तो मैं झलकुं तुझमे

तू बन जा गली बनारस की
मैं शाम तलक भटकू तुझमे…..

    कानो में ईयर प्लग ठूँस कर अपना गाना सुनते हुए जॉगिंग करना हमें सबसे ज्यादा पसंद है और फिर कहीं जॉगिंग ट्रैक पर से उसका घर दिख रहा हो तो कहना ही क्या ?

  हम खुद में मगन दौड़ रहे थे कि अचानक उसकी पिछली तरफ़ की बालकनी का दरवाजा खुला और अपने ताजा धुले बालों को झटक कर सुखाती वो बालकनी में निकल आईं …
    सफेद लखनवी कुर्ती में वो कसम से कमाल लग रही थी लेकिन इतनी सुबह सुबह वो नहा चुकी थी ..कहीं नौकरी करने लगी थी क्या धानी…
वैसे हो सकता है , करने लगी हो , तभी तो इतने बड़े और महंगे फ्लैट में रह रही थी ।
   उसे देखते हुए हम अपनी गाने की पंक्तियों में अटक कर रह गए थे …

     तेरा दिल बहलाऊं डांस करूँ
     मैं यूँ ही तुझे रोमांस करूँ….

आखिरी पंक्ति के साथ ही हमारे गाल गुलाबी हो चले थे कि वो बालकनी में कपड़ों की बाल्टी उठा लायी और वहीं रखे रॉड रेक पर कपड़े सुखाने लगी , एक के बाद एक जींस शर्ट रुमाल टाई लोवर टी शर्ट सुखाती हुई धानी को देख हम सोच में पड़ गए थे ,
   इतनी कोमल सी लड़की ने कैसे ये भारी भरकम कपड़े धोए होंगे,  हमारी अक्ल की तो लोग दाद देंगे क्योंकि उस वक्त भी हमारा ध्यान इस बात पर नहीं गया कि ये तो किसी आदमी के कपड़े थे और वो इन कपड़ों को सूखा रही मतलब उसका इन कपड़ों के मालिक से कोई रिश्ता तो जरूर होगा …
    दुनियादारी की बातेँ सोचने में तो हम शुरू से ही जीरो रहे है..
  .. आज भी रह गए ..

  गाने की इन पंक्तियों के साथ एक पुरानी याद वापस चली आईं थी….
    एक पुरानी जासूसी फिल्म दुबारा संगम मे लगी थी और सभी क्लास वालों का देखने जाने का प्लान बन रहा था .. क्लास में कुछ लोगों ने यूँ ही कन्नी काट ली थी , कुछ लोगों ने पढ़ने का बहाना लगा कर मना कर दिया , लेकिन फिर भी पांच सात लोग मूवी के लिए तैयार हो ही गए थे ..
  हमसे तो पूछने का सवाल ही नहीं था , लेकिन वो अपनी सहेलियों के साथ जा रही थी इसलिए हमारा भी बहुत मन था , एक तरफ़ खड़े हम बड़ी उम्मीद से विक्की की तरफ़ देख रहे थे, उसी का प्लान था ये…
    पर उसने हमसे नहीं पूछा,  हम मन ही मन विश्वनाथ बाबा को जप रहे थे कि क्लास के दरवाजे तक जाते हुए वो एकाएक रुका और हमारी तरफ़ मुड़ गया…

” क्यों बे फेयर एंड लवली चलेगा तू भी..पर सुन बे चंपू एक शर्त है , तुझे सबको समोसे खिलाने होंगे “

हमने धीमे से सर हिला दिया …
   खुशी तो ऐसे मिली की लगा जाकर विक्की के ही गाल चूम लें ..लेकिन सब्र बहुत था हममे..और आज भी है ..
   उस वक़्त दिल फूल सा हल्का हो उड़ रहा था , और हम भी उसके साथ कदम ताल मिलाते उड़े चले जा रहे थे …

  दो ऑटो रिक्शा में भर कर हम सब संगम पहुंचे थे..फिल्म का नाम था अजनबी  …

फिल्म अपनी रिलीज से नौ साल बाद दुबारा रिलीज हुई थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि  हमारे ग्रुप में उसके अलावा किसी ने नहीं देखी थी , उस दिन हमें पहली बार ये पता चला था कि वो फ़िल्मों की गज़ब शौकीन थी …
   हम सभी को टिकट एक साथ ही मिली थी लेकिन फिल्म उतरने के सालों बाद दुबारा लगी थी इसलिए भीड़ काफी कम थी ..
  हम उसके ठीक सामने तरफ़ की पंक्ति में उसके तिर्यक कोण पर बैठे थे , हमारे आसपास ही बालू,  विक्की सुरिंदर बैठे थे , वो हमारे पीछे अपनी सहेली जया के साथ बैठी थी..

    पूरी फिल्म में उसने जया को क्या किसी को भी शांति से फिल्म नहीं देखने दी थी .. हर सस्पेंस के पहले देखना जया अब ये होगा , अब वो होगा कह कर सस्पेंस का भंडाफोड़ करती वो इंटरवल तक ही सबको पूरी कहानी सुना चुकी थी , विक्की ने तो अपना सर पीट लिया था ..

” अरे यार धानी,  तू भी ना पूरी कमाल हो !”

” अबे ये कमाल पूरी, नही कमाल अमरोही है! पूरे मूड का सत्यानाश कर दिया !”

  उन सभी का मूड ऑफ हो गया था ,वाजिब था वो लोग मूवी जो देखने आये थे ..हम तो जो देखने आये थे वो हमें बड़ी आसानी से दिख रहा था इसलिए हमें तो तुम्हारे कहानी सुना देने से कोई दिक्कत नहीं थीं …

  बल्कि हम तो सीट पर थोड़ा और झुक कर पीछे की तरफ मुड़े तुम्हें ही देख रहे थे.. इंटर में सभी उठकर घर जाने को तैयार हो गए थे और हमने पहली बार विक्की से गुजारिश की थी कि पैसे जब दिए ही है तो वसूल कर लो, पूरी फिल्म देख लो! जैसे-तैसे तो सब ने पूरी फिल्म देखी थी, तुम भी तो जिद पर अड़ी बैठी थी कि तुम्हें महबूबा देख कर ही जाना है और वो गाना देखे बिना तुम टस से मस नहीं होगी ..
   और आखिर इतने इन्तजार के बाद तुम्हारा वो मस्त गाना भी चला आया …

     मैं सिर्फ तेरा महबूब, तू मेरी महबूबा
    मुझे चाहेगी बड़ा खूब मेरी महबूबा
      महबूबा महबूबा…

  कितनी खूबसूरत शाम गुज़री थी वो …जब तक हम थियेटर में बैठे मूवी देखते रहे , और साथ ही तुम्हें भी ..

लेकिन हमें तब कहाँ पता था कि घर पर हमारे पापा हमारा इंतजार कर रहे कि चप्पल से हमारी आरती उतार सकें …

हम भी खुद में मगन मस्त हाथ कीं चाल चलते घर पहुंचे थे लेकिन पापा ने हम पर हमला करने के चाहे जितने मंसूबे बनाते हों, हमें देखते ही उन्हें भी शायद हममें दुनिया का सबसे नकारा नजर आ गया और उन्होंने हथियार युद्घ से पहले ही डाल दिए ….

बुरा तो हमें भी लगा था क्योंकि इसके पहले हमने कभी घर पर झूठ बोल कर कुछ नहीं किया था , लेकिन हर झूठ पर तुम भारी थी … रात में जब दादी के कमरे में रोज की तरह उनके पैर दाब रहे थे तब दादी से सुनते किस्सों के बीच बीच में रह रह कर तुम्हारे बोले हुए शब्द घुलमिल कर सुनाई पड़ ही जा रहे थे ..

” अरे नहीं जया , बिपाशा तो मरी ही नहीं है ..!

” अरे क्या ग़ज़ब का सस्पेंस है कि क्या बताऊँ,  अक्षय कुमार ही इस सब के पीछे है…
  ” देख लेना पासवर्ड तो इत्तेफाक ही होगा “

हर वो सीन जिसे देखते हुए सभी की साँस थमने को होती वहीं वो उस सीन का सस्पेंस खोल जाती …

उस दिन तो उसके बारे में सोचते हुए दादी के पैरों के पास ही सो गए थे हम।
   और सुबह अम्मा की मीठी झिड़की से उठे थे…

जॉगिंग ट्रैक पर खड़े खड़े ही हम बनारस के अपने स्कूल, संगम और फिर अपने घर पहुंच चुके थे … सिर्फ उसके कारण ..और वो कपड़े सुखा कर अंदर जा चुकी थी …

   हम भी अपने फ्लैट की तरफ़ बढ़ने लगे कि फोन की घंटी बजने लगी , फोन हमारे ऑफ़िस कॉलीग का था , अनुराग का ….

” अबे सो रहे क्या अब तक ?”

” नहीं ! सुबह के सात बज गए है अब तक सोते रहेंगे क्या ? तुम बोलो क्या काम था ?”

” चौधरी की फ़ाइल तुम ही तैयार कर रहे ना ?”

” हाँ! काहे, क्या हुआ ?”

” अबे यार ये मैक्स वाले भी ना …अब क्या बताएं तुम्हें ? चलो जब ऑफ़िस आओगे तभी बतायेंगे !”

” ये सस्पेंस में छोड़ देने की तुम्हारी बड़ी गंदी आदत है , जब बताना ही नहीं था तो बात शुरू काहे  किए..

” कोई खास बड़ी बात नहीं है , तुमसे उनके लीगल पेपर्स तैयार करवा रहे थे तो हमें लगा चौधरी कंस्ट्रक्शन इनके रूटीन कस्टमर्स में से हैं पर ऐसा नहीं है साजन बाबु !”

” फिर ?”

” चौधरीयों से हमारे मालिक की कुछ खास जमती नहीं है ..पर वहीं बात है कि तालाब में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं पाला जाता ..
   चौधरी बहुत बड़ा नाम है उससे एकाएक पंगा नहीं ले सकते इसलिए किसी बहाने से बीच बीच में हमारी फर्म उनका छोटा मोटा काम देखने के बहाने असल में उन पर नजर रखे रहती है …
वैसे उनके लीगल पेपर्स देखने के अलावा अब तक कोई ढंग का काम मिला या नहीं ?”

” अरे कहां? अब तक किसी केस का हिस्सा बनने का मौका नहीं मिला है ..अब देखो कब महादेव कृपा करते हैं , चलो अब रखते हैं बाकी बातेँ ऑफ़िस पहुंच कर करेंगे ..”

   अनुराग बातूनी भी तो बहुत था ..उसे न टोकों तो वो बात करता ही चला जाता ..फोन एक तरफ़ रख हम नहाने घुस गए ..

  तैयार होकर हम घर से निकले , एक नजर उसके दरवाजे पर डाली और अपने दरवाजे को जोर से खिंच लिया , सिर्फ इतने में ही ये लॉक हो जाता था , अलग से ताला डाले बिना ही …
   अपना बैग और कोट हाथ में लिए ही हम लिफ्ट की तरफ़ बढ़ गए कि यूँ लगा उसका दरवाजा खुला और एक मखमली आवाज हमारे कानों में पडी…

  ” सुनिए!”

  हमारा दिल धक से रह गया , उसने ये ‘सुनिए ‘ हमारे लिए ही कहा था ना ..हाय!! जैसे उसने पुकारा ऐसे में तो हम अपनी कब्र से भी उठ कर उसकी आवाज सुनने चले आते,  लेकिन एकदम से मुड़ने की हिम्मत नहीं थी ..

” आप ही से कह रहे हैं !”

हाँ अब पक्का था , वो हमें ही बुला रही थी , हम पीछे मूड कर खड़े हो गए …
  सामने अपने दरवाजे पर वो ही खड़ी थी… सफेद चिकन के कुर्ते पर पीला दुपट्टा लहरा रहा था , बालों को कैसे भी गोल मोल घुमा कर ऊपर उसने क्लच किया था ..

” जरा आपका पांच मिनट मिल सकता है ?”

हाय ये क्या पूछ लिया पगली !! हम तो सारा जीवन वार दें तुम पर,  कह कर तो देखो..

हम धीमे से उसकी तरफ़ बढ़ गए , वो धीमे से मुस्कराई और अपना दरवाजा बाहर की तरफ़ खींच कर अपने घर की दहलीज से थोड़ा बाहर की तरफ़ आ गई ..

” आप वकील हैं ना !” हाँ में सर घुमाने के अलावा हम कुछ और कहने की हालत में नहीं थे क्योंकि अभी हमारे शरीर का पोर पोर उसे देखने में और सुनने में व्यस्त था,  जितनी कोमलता उसके रूप में थी उतनी आवाज में नहीं थी… आवाज थोड़ी गहरी और भारी थी ..पर उसके चेहरे पर जम रही थी ..

” आपका पांच मिनट मिल सकता है ?”

फिर से वहीं सवाल ! और इस बार भी सिर को घुमा कर ही रह गए ..और वो अपनी दहलीज से बाहर चली आईं , उसने हमारे दरवाजे की तरफ़ इशारा किया ..

” क्या हम बैठ कर बात कर सकते हैं ?”

ऐसा क्या है जो अपने घर में ले जाने की जगह वो हमारे घर पर बैठकर बात करना चाहती है ..खैर जो भी हो हमने तुरंत चाबी निकाली और दरवाजा खोल दिया , उसने धीमे से हमें देखा और हमारे घर में अंदर चली आईं…
  उसके पीछे हम अपने घर की खुशकिस्मती पर इतराते खड़े थे, कि वो एक तरफ़ सोफ़े पर जा बैठी, हमे इशारे से उसने ही बैठने को कहा तब जरा सा होश आया ..
  और हम उसके सामने बैठ गए …

” हमारे लिए एक केस लड़ सकते हैं..?

  हाय! इत्ता भोला सा सवाल ? अरे हम तो तुम्हारे लिए पूरी दुनिया से लड़ सकते हैं कह के तो देखो , ये केस क्या चीज़ है.. ..

” दम लगा देंगे पूरा ! वैसे किसका केस है , किसके खिलाफ ?”

” हमारे एक जान पहचान वाले हैं, उनका केस है …”

” ठीक है आप उनसे कह दीजिए …

हमारी बात पूरी होने से पहले ही उसने काट दी..

” वो खुद नहीं आ सकते …

” आपको कैसे मालूम चला कि हम वकील है..”

” कर्नल अंकल ने बताया था ..”

” अच्छा,  केस क्या है ! और किसका है ..?”

” हमारे एक पहचान वाले हैं , उन पर केस किया हैं उनके घर वालों ने !”

” चार्जेस क्या हैं ?”

” मर्डर का …. खून किया है उन्होंने..”

  हमारे गले में कुछ अटक सा गया … ना कुछ पूछते बना ना कुछ कहते …

क्रमशः

aparna…



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