Bestseller-8

The Bestseller -8


                    ” सूरज का दिया

                  पुलिस स्टेशन में बड़ी सरगर्मी थी। शेखर ने ऋषिकेश राय सागर के पूरे परिवार को थाने पर बुलाया हुआ था।
   उसकी पहली पत्नी और बच्चे बॉडी जल्द से जल्द उनके हवाले कर देने के लिए हंगामा मचा रहे थे।  लेकिन जब तक बॉडी की फॉरेंसिक जांच हो कर पोस्टमार्टम नहीं हो जाता तब तक उसे परिवार के हवाले नहीं किया जा सकता था और शेखर यही बात उन सब को समझा रहा था।
   की उसी वक्त पुलिस थाने में कामिनी भी चली आई।
” इंस्पेक्टर साहब कहां हैं वो?”
” अच्छा तो आप भी चली आई आखिर? लेकिन ध्यान से सुन लो तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला है।” ऋषि की पहली पत्नी बीच में ही कूद पड़ी।
” तुम्हारे ऐसा सोचने या बोलने से मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। “कामिनी ने पलटवार किया
” तुम्हें फर्क पड़ता है या नहीं इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता?”
    शेखर के सामने बैठी ऋषिकेश की दोनों पत्नियां बिल्लियों की तरह एक दूसरे से उलझी पड़ी थी…. और उसे बचपन में उसकी मां के द्वारा सुनाया वह किस्सा याद आ गया जिसमें एक केक के टुकड़े के लिए दो बिल्लियां आपस में झगड़ती रहती हैं, और बंदर आकर उनका बराबर बंटवारा करते-करते पूरा केक ही खा जाता है।
  ” वेट लेडीज! अभी पोस्टमार्टम होकर बॉडी मिलने में थोड़ा वक्त लगेगा…. आप लोगों को तब तक थोड़ा धैर्य से काम लेना पड़ेगा!  मैं आप लोगों से कुछ सवाल करना चाहता हूं। क्योंकि अब तक भले ही यह उनकी गुमशुदगी का मामला था लेकिन अब यह मामला बदल चुका है और यह हत्या का मामला है।”
   शेखर की बात सुनकर जैसे अचानक कामिनी को होश आया कि वह यहां पर अपने पति की डेड बॉडी की मांग करने आई थी और वह अपने जज्बातों पर काबू नहीं कर सकी और रोने लगी।
” इंस्पेक्टर साहब कौन है वह जिसने उनका खून किया?”
” नाइस क्वेश्चन! लेकिन हम भी फिलहाल इसी सवाल के जवाब को ढूंढने में लगे हैं मैडम! और मैं चाहता हूं कि आप सभी हमारा सहयोग करें।”
    कामिनी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे उसे रोते देख ऋषिकेश की पहली पत्नी भी रोने बैठ गई। दोनों को पानी के गिलास थमा कर दो लेडी कॉन्स्टेबल चुप करवाने में लगी थी।
  ” जैसा कि आप लोग जानते हैं पिछले 5 दिन से ऋषिकेश जी का कोई अता पता नहीं था। अब यह तो फॉरेंसिक जांच के बाद ही पता चलेगा कि जिस दिन वह गायब हुए उसी दिन उनका मर्डर हो चुका था। या फिर बाद में हुआ। लेकिन अभी हमारे सामने जो सवाल खड़ा हो रहा है ,वह यह है कि उनके मर्डर का कारण क्या था और आखिर किस ने उन्हें मारा?
   उनके कातिल तक पहुंचने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम पहले उनके बैकग्राउंड को चेक करें। कहीं उनका कोई दुश्मन तो नहीं था। कोई बिजनेस राइवल्री तो नहीं थी, वगैरा-वगैरा । तो इस सब के लिए मुझे आप लोगों से पूछताछ करनी पड़ेगी और इसके लिए मैं आप में से एक एक सदस्य को अपने साथ अंदर कमरे में लेकर जाऊंगा।
   मैडम अगर आप अब ठीक महसूस कर रही है तो प्लीज ज़रा मेरे साथ अंदर आएंगी…?”
   शेखर ने ऋषिकेश की पहली पत्नी से पूछा और उसने आंसू पोंछकर हां में सर हिला दिया। वह अपनी जगह से उठी उसने एक बार कामिनी पर एक जलती हुई नजर डाली और शेखर के पीछे धीमे कदमों से आगे बढ़ गई…
    वह उम्र में लगभग ऋषिकेश से 5 साल छोटी होगी पर फिर भी अपनी उम्र के हिसाब से वो छोटी ही नज़र आ रही थी।
       गोरा लपटे मारता रंग और उस पर उसकी हीरों सी चमकती भूरी आँखे। रंग रूप और खूबसूरती में वो कहीं से भी कामिनी से कमतर नही थी।

      उस पर उसके क्लासी हीरे का पेंडेंट और हीरे के कर्णफूल उस पर बहुत जँच रहे थे। एकबारगी देखने पर वो खानदानी और बहुत क्लासी नज़र आने वाली महिला थी।
  ” मैडम बैठिये,  अब बताइए कि आपके पति के बारे में क्या कोई ऐसी बात है जिसे बताने से हम उनके कातिलों तक पहुंच सकते हैं। “
” जी वैसे तो उनका स्वभाव इतना अच्छा था वह इतने नरम दिल थे और सभी से इतनी सभ्यता से पेश आते थे कि उनकी किसी से दुश्मनी होने का सवाल ही नहीं उठता! लेकिन अभी कुछ दिनों से कुछ एक आध पब्लिशर से उनकी किताबों की रॉयल्टी को लेकर उनकी कुछ कहासुनी हुई थी। “
” इस बारे में कोई डिटेल्स बता सकती हैं आप?”

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” जी इनके पिता भी साहित्यकार थे और उनकी कई किताबें मार्केट में अब भी बेस्टसेलर किताबों का दर्जा रखती हैं। उनके किताबों की रॉयल्टी भी हमें समय-समय पर मिलती रहती है। एक प्रकाशक है “सूरज का दिया“! वही इनके पिता और इनकी किताबों का काम देखा करते थे अभी कुछ समय पहले इनके पिता की एक किताब का सीक्वल इन्होंने भी लिखा था। इस बात को लगभग 5 साल हो गए। इनकी वो किताब भी ठीक-ठाक ही चली थी। लेकिन इनके पिता की किताब के मुकाबले उसकी बिक्री काफी कम हुई थी। और इसीलिए यह प्रकाशक उस किताब की बिक्री से संतुष्ट नहीं था। इसलिए वह बार बार इन पर कुछ नया लिखने के लिए फोर्स कर रहा था। और आजकल अब इनका लिखना पढ़ना थोड़ा कम हो गया था।
   इसके बाद उस पब्लिशर ने पापा जी की किताबों की रॉयल्टी भी कम कर दी थी। एक बार की बात है एक मुशायरा था, जहां मैं भी उनके साथ गई हुई थी। वहां पर वह पब्लिशर भी था। वहीं डिनर के दौरान इनकी और उसकी कुछ बहस हो गई थी। हल्की फुल्की बातचीत से शुरू हुई वह बहस अचानक झगड़े में बदल गई और उन्होंने गुस्से में उसके चेहरे पर वाइन फेंक दी।। हालांकि यह ऐसा कभी करते नहीं है ,  लेकिन उम्र का तकाजा कह लीजिए या फिर अपना पतन सह नहीं पाना…. जो भी हो लेकिन यह उस समय बेहद गुस्से में आ गए थे। और इनके द्वारा उसके चेहरे पर वाइन फेंकते ही उस आदमी का भी गुस्सा बहुत भड़क गया था। उसने जाते-जाते इन्हें देख लेने की धमकी दी। तब इन्होंने भी पलट कर का कह दिया कि, हां देख लेना!! तब उसने कहा तुझे छोड़ूंगा नहीं ऋषिकेश राय सागर बहुत उड़ रहा है ना तू! कब्र में पैर लटकाए बैठा है….आखिर कितनी उम्र बची है तेरी?
   और बस यह धमकी देकर वह प्रकाशक वहां से चला गया।
” यह कब की बात है?
” यही कोई महीने भर पहले की बात होगी !
” और कोई ऐसा जिस पर आपको कोई शक है? “
” अब मैं अगर कुछ कहूंगी तो आपको लगेगा कि सौतिया डाह के मारे कह रही हूं… लेकिन वो जो बाहर बैठी है ना! वह डायन है… डायन !!!और मुझे लगता है कि असल में उसी ने……. अब मैं क्या कहूं आपसे?”
” लेकिन आपको ऐसा क्यों लगता है मिसेस रायसागर!”
” कोई एक बात हो तो बताउँ?  अब आप खुद ही सोचिए अपने बाप की उम्र के आदमी से भला कौन शादी करता है?
    शादी तो की अपने जाल में ऐसे फ़ांस के रखा था कि उस अकेली के लिए दो मंजिला घर बनवा दिया! दो-दो गाड़ियां दे कर रखी है…5-5 नौकर है उसके पास और किस चीज की जरूरत होती है एक औरत को बताइए आप?”
” जी बिल्कुल!! सही कहा आपने !! पर यही तो मैं जानना चाहता हूं कि, अगर ऋषिकेश सर अपनी सेकंड वाइफ के लिए इतना सब कर रहे थे, तो फिर उन्हें उनको अपने रास्ते से हटाने की जरूरत क्या थी?”
” जरूरत थी आजादी! ऋषिकेश शुरू से ही बहुत पजेसिव नेचर का रहा है । जब तक मेरे साथ था मेरे लिए भी वैसा ही था और अब उसके साथ भी वैसा ही था। तुम इससे बात नहीं कर सकती.. तुम उससे बात नहीं कर सकती… वग़ैरह वग़ैरह ।।
     अब भाई वह तो राइटर है, उसे तो कई तरह के लोगों से मिलना पड़ता है। कभी अपनी किताब के प्रकाशन के लिए, कभी अपनी किताब की एडिटिंग के लिए , तो कभी किताब के प्रमोशन के लिए । ऐसे में तरह तरह के लोग घर पर आते जाते हैं। और इन बातों पर उन दोनों के बीच अक्सर वाद विवाद हुआ करता था।”
” जी आपसे किसने कहा खुद कामिनी जी ने।”
” नहीं उसकी और मेरी बात नहीं हुआ करती और वह क्यों मुझसे कहेगी? मुझे जमना ने बताया।”

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” जमना…?
” हमारे घर की पुरानी नौकरानी थी! जब ऋषिकेश उस कामिनी को लेकर इस घर को छोड़कर चला गया और नए घर में उसने अपनी जिंदगी बसाई… तब मैंने जमना को उसका ध्यान रखने के लिए भेज दिया था। मुझे पता नहीं क्यों उस लड़की कामिनी पर शुरू से ही भरोसा नहीं था।
   ऋषिकेश को लिवर में इन्फेक्शन रहा करता था ।और इसलिए उसे बहुत सोच समझकर दवाइयां देनी पड़ती थी । यहां तक की बीपी और शुगर के लिए भी उसकी स्पेशल दवाइयां थी। शुगर के लिए तो वह इंसुलिन ही लिया करता था। और मुझे लगा यह लड़की अपने तामझाम में इन सब बातों का ध्यान नहीं रखेगी। इसलिए ऋषिकेश से लड़ झगड़ कर और उसे मना कर जमना को मैंने उन दोनों के साथ भेज दिया था। “
” कामिनी जी ने इस बात पर कोई ऑब्जेक्शन नहीं लिया?
” लिया भी होगा तो मुझे क्या? मैंने ऋषि को कसम दे दी थी और वह मेरी कसम तोड़ नहीं सका और वैसे भी जमना के रहने से ही इन लोगों का घर घर था । वरना यह लड़की घर को पूरा कबाड़ बना कर रखती। इसे कोई काम धाम तो आता नहीं… ना घर गृहस्थी संभालने की कोई अकल है। सारा टाइम बस अपनी कलम और कागज लिए बैठी रहती है। इसे कुछ आता जाता थोड़ी है?  एक कप चाय बनाने कह दीजिए वह तक ना बने इससे। “
     शेखर को समझ में आ गया था कि अपने दिल में पनपती सौतिया जलन को किसी भी हाल में श्रीमती रायसागर अपने आप से अलग नहीं कर पा रही थी। उनसे जितनी काम की बातें थी वह सब निकलवाने के बाद शेखर ने उनसे “सूरज का दिया”  पब्लिकेशन हाउस का नंबर भी ले लिया और उन्हें बाहर भेज दिया।

    *****

    कामिनी को जिस वक्त इंस्पेक्टर शेखर का फोन आया वह अपनी किताब पर कुछ काम कर रही थी, यानी कहानी का कोई हिस्सा लिख रही थी। इंस्पेक्टर का फोन आते हैं वह तुरंत अपना पर्स उठाएं वहां से पुलिस स्टेशन निकल गई ।
  उसके निकलने के बाद जमना ताई उसके कमरे को व्यवस्थित करने लगी… उन्होंने उस की सफेद पेन का ढक्कन लगाकर उसे पेन स्टैंड पर रखा और उत्सुकता में कामिनी की डायरी उठाकर पढ़ने लगी……

     आज तक कभी भी उन्होंने कामिनी की कोई कहानी नहीं पढ़ी थी। असल में उन्हें पढ़ने लिखने का कोई शौक था ही नहीं। उनकी पढ़ाई सिर्फ आठवीं जमात तक ही हुई थी। उनके घर वाले गरीब जरूर थे लेकिन उन्हें पढ़ाने की बेहद कोशिश की पर जमना को बचपन से ही पढ़ाई देखकर मौत आती थी। और इसलिए आठवीं जमात के बाद ही वह रायसागर हाउस में काम पर लग गई थी। इतनी छोटी उम्र से काम करने के कारण ही आज उनका एक अलग रुतबा था।
    खैर यह जानने के लिए कि कामिनी आखिर क्या लिखा करती है उन्होंने उसकी डायरी उठा ली और उसके पन्ने पलटने लगी…

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*****

      हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए जाने कब सुहास की आंख लग गई। खिड़की पर से पड़ने वाली रोशनी से उसकी आंखें चुंधियाने लगी और उसने आंखों को मल कर आंखें खोल दी।
   सुबह हो चुकी थी और यह देख कर उसके चेहरे पर थोड़ी सी राहत आ गई थी… उसने देखा उसकी कार में उस वक्त कोई नहीं था। वो अकेला ही बैठा था। उसने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया…. एक भरपूर अंगड़ाई लेकर उसने अपनी अकड़ी हुई कमर को सही करने के लिए थोड़ा सा इधर उधर झुक कर कसरत जैसा कुछ किया और एक दो बार अपनी जगह पर कूदने के बाद उसने दरवाजा खोलकर पानी की बोतल निकाली और चेहरे पर तेज पानी के छींटे मारने लगा।
    दो घूंट पानी पीने के बाद उसने बोतल वापस गाड़ी में डाली और अब अपने आसपास नजर दौड़ाई कि वह है कहां?
    उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था क्योंकि वह अपने ऑफिस के पार्किंग के पीछे वाले रास्ते पर ही अब तक खड़ा था।
   तो इसका मतलब वो जो कल रात इतना सब घूम रहा था वह सब क्या था? इसका मतलब कल रात से वह यही था!! या फिर वह सारी जगह घूम कर रात में यहां तक पहुंच कर अपनी गाड़ी में ही सो गया।
    सुहास की समझ से बाहर था कि कल की रात उसके साथ क्या हुआ था?
  क्योंकि अगर वह कल रात का पूरा किस्सा याद करता तो उसके हिसाब से तो वह चार-पांच घंटे लगातार गाड़ी चलाता रहा था….लेकिन कोई भी गढ़ नहीं पहुंच पाया था। और उस भूतिया कपल से मिलने के बाद हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए उसने गाड़ी एक तरफ ही खड़ी कर दी थी.. उसके बाद सीधा आज सुबह उसकी आंख खुली थी।
   
         इतना सब सोचने के बाद सुहास को एक बात समझ में आने लग गई थी कि, यह आत्माएं जो उसे नजर आती हैं और अपनी तकलीफें बताती हैं…
       वह नहीं चाहती कि वह बाबाजी के पास जाकर वापस वह काला धागा अपने गले में पहन ले।
    शायद वह आत्माएं उसे कोई संदेश देना चाहती हैं। उसे उन संदेशों को सुनना और समझना होगा और तभी वह उनकी परेशानियां समझ कर उनके कष्टों को दूर कर पाएगा।
     वह आज तक सिर्फ और सिर्फ इन आत्माओं से डर कर भागता रहा था। लेकिन उसने आज तक ध्यान नहीं दिया कि अपनी 23 साल की उम्र में किसी भी आत्मा ने उसे कोई कष्ट नहीं पहुंचाया था। यहां तक कि उसे एक मामूली खरोच तक नहीं आई थी पर फिर भी उसके मन में डर बैठा हुआ था।
     मन ही मन तय करके कि अब वह अपने डर से भागेगा नहीं बल्कि अपने डर का सामना करेगा, उसने अपनी गाड़ी की बैक सीट से अपना लैपटॉप बैग निकाला और ऑफिस की सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
   तेज तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ता वह पांचवें फ्लोर पर बने अपने ऑफिस पर पहुंच गया।
   सुबह के 6 बज रहे थे और ऑफिस में क्लीनिंग स्टाफ के अलावा और कोई मौजूद नहीं था। ऑफिस में झाड़ू पोछा हो रहा था और ऐसे में उसे अंदर दाखिल होते देख पियून तुरंत उसके पास चला आया..
” साहब आप इतनी जल्दी? “
“हां मुझे कुछ काम था। “
“ठीक है साहब आपके लिए कुछ लेकर आऊँ चाय या कॉफी?
“यस ! सिंगल फ़िल्टर कॉफ़ी!”
” जी साब !”  और वो मुस्कुरा कर उसके लिए फिल्टर कॉफी लेने चला गया।
    अपनी कुर्सी पर सिर टिकाए सुहास अपने बचपन की यादों में खो गया…..

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क्रमशः

aparna…..

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2 years ago

Arrey yar ye 5 star ki jagah 4 ktu dab rha…aur edit bhi nhi hota