अपराजिता -53

अपराजिता -53

चंद्रा दरवाज़े पर पहुंचा और तेज़ी से दरवाज़े को अंदर धकेल कर खुद दाखिल हो गया..

अंदर पहुँच कर चंद्रा की आंखे फ़ैल गयी..

चंद्रा ने अंदर पहुंचते ही जो देखा उसे देखकर आश्चर्य से उसकी आंखें खुली रह गई। राजेंद्र अपनी कुर्सी पर बैठा किसी महिला रोगी की नब्ज देख रहा था..

औरत पहनावे से गांव की ही लग रही थी। सुलटे पल्ले की साड़ी डाले उस औरत ने अपने माथे पर से इतना घूंघट लिया था कि उसकी नाक तक का चेहरा ढका हुआ था। चंद्रा भैया की आहट से वह औरत और भी ज्यादा सिमट कर सकुचा कर बैठ गई।

राजेंद्र ने आंख उठाकर चंद्रा की तरफ देखा और उसे वहां आने का प्रयोजन पूछ लिया..

” बोलिए, कुछ काम था आपको?”

राजेंद्र की बात का चंद्रा ने कोई जवाब नहीं दिया या शायद उसे राजेंद्र का जवाब देना जरूरी नहीं लगा। वह इधर-उधर अलट पलट कर देखने लगा कि उस डिस्पेंसरी में कितने कमरे हैं? राजेंद्र जिस कमरे में बैठकर मरीज देखा करता था, उसी कमरे में एक छोटा सा जांच कक्षा बना हुआ था। जिसके दरवाजे पर पर्दा डाला हुआ था।

चंद्रा का ध्यान उस कक्षा की तरफ चला गया।
चंद्रा तेजी से पर्दा हटाकर वहां दाखिल हो गया। लेकिन उसकी आशाओं पर वज्रपात करता खाली कमरा उसे मुंह चढ़ा रहा था।
वहां से बाहर निकल कर चंद्रा ने राजेंद्र की टेबल पर जोर से अपनी हथेली मारी।
इतनी देर में चंद्रा के गुर्गे डिस्पेंसरी के हर कमरे की खाक छानकर बाहर आ चुके थे।
राजेंद्र के बैठने के कमरे के अलावा, कंपाउंडर के लिए एक कमरा था। पीछे एक खुला आंगन सा था। जिसके एक ओर दो बड़े-बड़े स्टोर रूम थे। आंगन में ही दूसरी तरफ टॉयलेट और बाथरूम बना था। और उसी आंगन में एक छोटा सा दरवाजा पिछली तरफ के रास्ते की ओर खुलता था। फिलहाल वह दरवाजा बंद नजर आ रहा था। लेकिन चंद्रा के एक लड़के ने उस दरवाजे को खोल दिया। उस दरवाजे को खोलते ही उसमें से गांव की तरफ बढ़ती पगडंडी साफ नजर आने लगी। वह लड़का तेजी से अंदर राजेंद्र के कमरे की तरफ बढ़ गया..।

वह चंद्रा के पास पहुंचकर उसे यह बात बता पाता कि पीछे आंगन में भी बाहर की तरफ एक दरवाजा खुलता है उससे पहले चंद्रा राजेंद्र को धमकाने लगा।
और चंद्रा जब जिस वक्त कुछ बोलता रहता था, उस वक्त उसकी बात को काटकर कुछ भी बोलने का किसी को अधिकार नहीं था। वो लड़का भी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता था इसलिए वह चुप खड़ा रह गया..

” कौन है यह औरत..?”

चंद्रा ने निर्लज्जता से अपना सवाल पूछ लिया।

वह औरत और भी ज्यादा सिमट कर गर्दन झुकाए बैठ गई।
उसने अपनी उंगलियों से अपने माथे पर का पल्लू और नीचे खींच लिया। राजेंद्र ने बिल्कुल शांत भाव से चंद्रा को जवाब दे दिया..

” मरीज है, आती रहती है अक्सर..!”

” नाम क्या है? किसके घर की बहू बेटी है..?”

” क्या आप गांव के हर घर की बहू और बेटियों को पहचानते हैं?”

राजेंद्र ने भी चंद्रा की आंखों में आंखें डालकर सवाल कर लिया। जाहिर सी बात थी कि राजेंद्र डील डौल ताकत और शारीरिक स्वास्थ्य में भले ही चंद्रा से कम था, लेकिन बुद्धिमत्ता और हिम्मत में वह कहीं से भी चंद्रा से एक इंच भी कम नहीं था।
राजेंद्र का भी अपना स्वाभिमान था। उसके स्वाभिमान को छिन्न-भिन्न करने की चंद्रा ने बहुत कोशिश की थी, बावजूद वह राजेंद्र की हिम्मत को तोड़ नहीं पाया था..

उस डॉक्टर की निर्भीक आंखें चंद्रा को चुभ रही थी..

” हमारी बहन कहां है?”

चंद्रा ने अगला सवाल कर दिया, और राजेंद्र उतनी ही निर्भीकता से उसे देखते हुए ना में गर्दन हिला बैठा..

” यह तो आपको पता होना चाहिए, क्योंकि फिलहाल वह आपके घर में, आपके साथ रहती है..!”

” यह औरत कौन है? जल्दी बताओ वरना हम इसका घूंघट हटा देंगे..!”

” आपको ऐसा करने का कोई हक नहीं..
एक डॉक्टर और मरीज के बीच एक भरोसे की साझेदारी होती है कि, डॉक्टर कभी भी अपने मरीज का नाम या उसकी व्यक्तिगत परेशानियों को किसी और के सामने बयान नहीं करेगा। और इसलिए मैं अपनी मरीज का नाम या पता आपको नहीं बता सकता..!”

” मान लिया कि तुम यह नहीं कर सकते, लेकिन इस संसार में ऐसा कोई काम नहीं जो चंद्रा भैया नहीं कर सकते हैं। समझे ?”

और चंद्रा ने अपनी बात पूरी करते हुए उस महिला का घूंघट पलट दिया।
चंद्रा उसे देखकर एकदम से पहचान नहीं पाया। उसने राजेंद्र की तरफ एक बार फिर घूर कर देखा और वहां से निकलने के लिए मुड़ गया।
तभी उसका गुर्गा जोर से चिल्ला उठा..

” भैया जी इधर, पीछे की तरफ बाहर निकलने के लिए एक दरवाजा और है।”

” क्या?  क्या कह रहे हो ?”

चंद्रा ने भौंह चढ़ा कर उससे पूछा और वह तुरंत पीछे मुड़कर उस दरवाजे की तरफ भाग गया।
चंद्रा भी तेज कदमों से उस तरफ बढ़ गया। चंद्रा के उस कमरे से निकलते ही राजेंद्र अपनी हथेलियां पर माथा टेक कर चुपचाप बैठ गया।
उसके पास बैठी लड़की गेंदा थी…।

आज सुबह से राजेंद्र बिना कुछ खाए पिए ही शहर के लिए निकल गया था। इसलिए जब गेंदा को यह मालूम चला कि राजेंद्र अपनी डिस्पेंसरी में है, वह उसके लिए खाने का कुछ बनाकर पिछले दरवाजे से अंदर ले आई थी। उसी वक्त तेजी से दरवाजे को खोलकर भावना भी अंदर दाखिल हुई थी..।

उन दोनों के ऐसे अचानक अंदर आने से एक दूसरे के गले से लग कर खड़ा प्रेमी युगल एक दूसरे से अलग हो गया..।

“क्या हुआ भावी ?”

कुसुम और कुछ पूछ पाती उसके पहले भावना ने हड़बड़ा कर सब कह दिया..

” दूर से तुम्हारे भैया की जीप की एक झलक दिखाई दे गई कुसुम, जल्दी यहां से निकलो.. ।”

“किसी और की भी हो सकती है.. ?”

कुसुम का अपने डॉक्टर साहब से अलग होने का बिल्कुल मन नहीं था। उसने जैसे ही यह कहा भावना उसका हाथ पकड़ कर बाहर के दरवाजे की तरफ खींचने लगी..

” गांव में किसी और आदमी के पास तुम्हारे भैया जैसी बड़ी जीप नहीं है। और अभी इन सब वाद विवाद में पड़ने का वक्त नहीं है, कुसुम चलो..।”

लेकिन उसी वक्त गेंदा ने आगे बढ़कर भावना को रोक दिया, और उसे पीछे की तरफ निकलने का इशारा कर दिया

” आप लोग पीछे दरवाजा से निकलिए, सामने से अगर ठाकुर साहब आते रहे तो पकड़े जाएंगे आप लोग !”

भावना ने गहरी सी नजर गेंदा पर डाली और कुसुम का हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ मुड़ गई। गेंदा तेजी से उन लोगों के साथ चलती हुई पिछले दरवाजे तक आई, और उस दरवाजे को खींचकर उन लोगों के लिए खोल दिया। चरमराहट की एक आवाज के साथ वह दरवाजा खुल गया और भावना कुसुम का हाथ पकड़ कर दम साधे भाग निकली…

इस वक्त भावना के पैरों के साथ-साथ उसका दिमाग भी बहुत तेजी से दौड़ रहा था। उसे समझ में आ गया था कि चंद्रा भैया ने कुसुम को घर से निकलते हुए देख लिया है। और इसीलिए वह यहां उसे ढूंढने के लिए आ रहे हैं। और अगर कुसुम यहां नहीं मिलती तो वह सीधा घर पहुंच कर उसके कमरे में ही उसे तलाश करने जाएंगे। भावना तेजी से भाग रही थी लेकिन कुसुम को अब भी इस बात पर यकीन नहीं था कि चंद्रा भैया डॉक्टर साहब की डिस्पेंसरी तक पहुंच सकते हैं। कुछ दूर दौड़ने के बाद वह थम कर ठहर गई..

” ऐसे भागेंगे तो दम निकल जाएगा हमारा भावना, थोड़ा थम कर सांस तो ले लेने दो..!”

” यह जो कांड करके आई है ना आप राजकुमारी जी, अगर यहां चंद्रा भैया ने आपको आपके डॉक्टर साहब के गले से लिपटे देख लिया होता ना, तो सच कह रहे हैं तुम्हारे चंद्र भैया तुम दोनों पर मिट्टी तेल छिड़ककर वही आग लगा देते।
तुम समझती क्यों नहीं हो यार?  पूरा गांव जानता है कि चंद्रा भैया क्या है ? एक तुम्हारी आंखों में क्यों अपने भाई की मोहब्बत की ऐसी पट्टी बंधी है कि, तुम अंधी होकर नाच रही हो। और अगर अपने भाई पर इतना भरोसा है तो अभी जाओ और अपने डॉक्टर साहब का हाथ पकड़ो और अपने चंद्रा भैया के सामने ले जाओ, और कह दो कि हम दोनों शादी करने जा रहे हैं।
या इस तरह की उटपटांग हरकतें करना बंद करो। वरना हम तुम्हारा साथ छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चले जाएंगे समझी..।”

“हाय मेरी जान… हम अच्छे से जानते हैं, एक बार भले हमारी परछाई हमारा साथ छोड़ दे लेकिन हमारी भावी हमारा साथ कभी नहीं छोड़ेगी..।”

“यह जानती हो ना तो, यह भी जान लो कि तुम्हारा साथ देने के ऐवज में हमें मौत मिलने वाली है। ज्यादा उम्र नहीं बची हमारी, पर जितनी बची है उसे हम चैन से काट लेना चाहते हैं कुसुम। यहां मत ठहरो, भागो यहां से..।”

  मुहँ बनाती हुई कुसुम वापस भावना के साथ भागने लगी..

इधर चंद्रा भैया को जब पूरी डिस्पेंसरी में कुछ भी नहीं मिला तो पैर पटकते हुए वह वहां से बाहर निकल गए। अपने गुर्गे को उन्होंने उस पगडंडी में दौड़ा दिया था। उनके दो लड़के अस्पताल के पिछले दरवाजे के पास से बाहर निकल गांव की पगडंडी पर भागने लगे..
चंद्रा भैया की जीप इस वक्त हवा से बातें कर रही थी, उनके ड्राइवर ने उनसे पूछ लिया..

” किस तरफ जाना है चंद्रा भैया, कचहरी निकाल ले !”

“नहीं सीधा घर निकालो..”

“जी, जो हुकुम.. “

हवा से बातें करती हुई चंद्रा की जीप कुछ पलों में ही उनकी हवेली के बाहर खड़ी थी।
चंद्रा एक छलांग लगाकर जीप से नीचे उतर गया और तेजी से अंदर की तरफ बढ़ गया। वह सीढिओ के पास पहुंचा ही था कि सुजाता ने उसके सामने पानी का गिलास बढ़ा दिया। पानी के गिलास को एक तरफ हटाकर चंद्रा ऊपर जाने लगा कि सुजाता ने उसे टोक दिया..

“सुनिए, हम सोच रहे थे दो-चार दिन के लिए मायके हो आते हैं, हमारे मायके में बहुत अच्छा जोहरी बाजार बैठता है। सोच रहे हैं कुसुम कुमारी के लिए वहीं से नौलखा हार बनवा लेते हैं..।”

चार सीढ़ियां ऊपर चढ़ चुके चंद्रा ने पलट कर घूर कर सुजाता को देखा..

” तुमसे सोचने के लिए किसने कहा है? उस काम के लिए हम है ना। तुम बस हमारी आज्ञा का पालन किया करो, समझी? इस घर का जो रीति रिवाज है बस वही तुमको मानना है। तुम अपने कुंद बुद्धि से ज्यादा सोचा समझा ना करो। तुम पर सोचना, जमता नहीं है..।”

“अरे ऐसे कैसे बोल रहे हैं आप। हम क्या जड़मति हैं? बीए फर्स्ट ईयर का एग्जाम दिए हैं हम..  वह तो रिजल्ट आने के पहले आपके बाबूजी आपका रिश्ता ले आए थे हमारे घर, और हमारे घर वालों ने हमें आगे पढ़ने नहीं दिया। हमारी शादी कर दी। और यहां आपके घर तो, जब से आए हैं किताब कॉपी क्या होती है, हमें मालूम ही नहीं चला।
तो इसमें हमारी क्या गलती?”

” तुमसे जबान लड़ाने की बात नहीं कर रहे हैं, यह बताओ कि कुसुम कहां है?”

“अपने कमरे में ही होंगी.. और कहाँ होंगी.. !”

” तुमसे और अम्मा से हम पहले भी कह गए थे कि, उसके कमरे का दरवाजा मत खोलना। लेकिन तुम लोग रो धोकर  खुलवा दी। अब अगर आज वह अपने कमरे में नहीं मिली ना तो, तुम सोच लेना हम तुम्हारे साथ क्या करेंगे..!”

“आप धमकी दे रहे हैं हमको ?”

सुजाता भी बिखर गई और उसके इस तरह चिल्लाने से चंद्रा का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुंच गया। दांत पीसते हुए उसने सुजाता को खा जाने वाली नजरों से देखा  …

” हां धमकी दे रहे हैं। लेकिन इसे कोरी धमकी ना समझना..।”

” कम से कम अपने बच्चों का तो लिहाज कीजिए। उसके सामने भी हमें मारने पीटने लगेंगे क्या?”

” जरूरी है तभी तो वह भी समझेगा कि उसे गलतियां नहीं करनी है..!”

चंद्रभान की घटिया बातों से सुजाता का भी दिमाग खराब हो गया था। गुस्सा उसके अंदर भी बहुत था। लेकिन वक्त और स्थिति देखकर वह अपना गुस्सा कभी जाहिर कर दिया करती थी, और कभी दबा ले जाती थी। उसने घूर कर अपने पति की तरफ देखा और पांव पटकती हुई रसोई में चली गई। वहीं  ओसारे में बैठी उसकी सास उन दोनों को ही चुप करवाने की नाकाम सी कोशिश करती रही। लेकिन उनके कुछ भी कहने का दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ता था..

चंद्रा तेजी से ऊपर की तरफ बढ़ गया। गलियारे को पार कर वह कुसुम के कमरे के ठीक सामने पहुँच गया…।

उसी वक्त घर के पिछले दालान के बाहर तरफ खुलने वाले दरवाज़े के पार हांफती दौड़ती कुसुम पहुँच गयी..
भावना भी उसके साथ थी..

अब आफत की बात ये थी कि वो पिछली तरफ खुलने वाला दरवाज़ा अक्सर ताला डाल कर बंद ही रखा जाता था.. आज भी वो अंदर से बंद था..।

कुसुम का घऱ, घऱ नहीं हवेली था.. पिछले दरवाज़े से सामने के सदर दरवाज़े तक पहुंचने में वक्त लग जाता और दूसरी बात अगर भावना सामने के दरवाज़े से घुसती तो चंद्रा की नजर में आ जाती..
दोनों लड़कियां हांफती सी अपना अपना पेट पकड़ कर झुकी खड़ी थी.. दोनों की इतनी तेज़ दौड़ लगाने पर साँस फूल गयी थी..
दोनों यही सोच रही थी कि अन्दर कैसे जाया जाये.. उस वक्त भावना की नजर वहीं पिछवाड़े पर लगे एक बड़े से आम के पेड़ पर पङ गई।

उसने कुसुम को बड़ी गहरी निगाहों से देखा और कुसुम भावना का इशारा समझ कर ना में गर्दन हिलाने लगी।

” नहीं भावना हम इस पेड़ पर चढ़कर अंदर की तरफ नहीं कूद सकते। हमारे टांगे टूट जाएंगी।”

“सोच लो, क्योंकि टांगे तो वैसे भी तुम्हारी टूटेंगी। अब तक तुम्हारे भैया तुम्हारे कमरे के अंदर पहुंच चुके होंगे। और जब कमरे में नहीं मिलोगी तब तुम्हारी हवेली की तलाशी होगी।
सबसे आखिर में ही वह पिछवाड़े तक आएंगे।और उतनी देर में अगर तुम पेड़ से अंदर कूद कर रसोई या किसी और कमरे में पहुंच गई तो बचने के कुछ चांसेस है। वरना यह समझ लेना कि तुम्हारी 20 दिन बाद होने वाली शादी कल हो जाएगी।”

भावना की बात में दम तो था। कुसुम भी सोच में पड़ गई। वह धीरे से उस पेड़ के पास पहुंच गई। उस वक्त दरवाजे पर कुछ आवाज़ हुई। और एक झटके में दरवाजा खुल गया।
कुसुम और भावना की सांस वही की वही रुकी रह गई। दोनों को लगा की कहीं कुसुम की तलाश करते हुए चंद्रा भैया ने तो दरवाजा नहीं खोल दिया।
लेकिन तभी सुजाता दरवाजे से झांक कर उन दोनों को आवाज लगाने लगी।

” बिल्कुल धीमे-धीमे से अंदर आ जाओ। जल्दी करो।”

वह दोनों चुपके-चुपके दरवाजे से अंदर दाखिल हो गए। और सुजाता ने उनके अंदर दाखिल होते ही दरवाजे को धीरे से बंद कर दिया। वह उन दोनों को अपने पीछे से लेकर पीछे के आंगन से घूम कर आगे की तरफ बढ़ गई। और ओसारे के एक तरफ पड़ने वाले दादी जी के कमरे की तरफ भेज दिया।

कुछ देर बाद ही कुसुम के अपने कमरे में बरामद न होने पर पांव पटकते हुए चंद्रा भैया नीचे चले आए और नीचे आते ही उन्होंने अपनी पत्नी सुजाता को जोर से आवाज लगा दी…

‘”सुनती हो.. कहाँ मर गयी हो ?”

चंद्रा की आवाज़ सुन कर दादी के कमरे से कुसुम निकल आयी..

“क्या हुआ भैया ? कुछ चाहिए था क्या ? भाभी तो गट्टू को दूध पिलाने गयी है.. !”

कुसुम को घऱ अंदर से निकलते देख चंद्रा की तनी हुई भवें कुछ हद तक सामान्य हो गयी..

“तुम यहाँ क्या कर रही थी कुसुम ?”

“जे तो कब से हमाये लाने बैठी थी.. काहे ?कछु काम है का ?”

कुसुम की दादी ने चंद्रा से सवाल कर दिया और चंद्रा ने ना में गर्दन हिलायी और बाहर निकल गया..

सुजाता तो भावना और कुसुम का साथ दे गयी ये बात कुसुम ने समझ भी ली लेकिन दादी जैसी पुराने ज़माने की औरत कैसे आज चंद्रा के सामने उसका पक्ष ले बैठी, उसकी समझ से बाहर था..

चंद्रा के जाते ही उसने दादी की तरफ देखा.. दादी ने बड़े लाड़ से उसे अपने पास बुला कर बिठा लिया..

“अब तुम्हरी सादी लग गयी है, बिहाव होने वाला है.. अब तुम अपने घऱ चली जाओगी.. बिटियन से इसी के लाने मोह नहीं बढ़ाना चाहिए, जहाँ पंख पसरे वही उड़ कर दूसरी मुंडेर जा बैठती है..
अब देखो, तुम्हरे भी उड़ने के दिन आ ही गए… हमरी लाड़ो रानी अब किसी और के महल की ठकुराइन बनेगी, पूरी हवेली को अपनी ऊँगली पर नचाएगी… तो अब तुम ही बोलो, कैसे तुम्हे अपने बड़े भाई से डांट खाते देख लेते हम ?”

तो ये बात थी.. इसलिए दादी का लाड़ दुलार बहा जा रहा था.. भावना ने मन ही मन सोचा और कुसुम के पास आ बैठी..
“अब हम चलते है कुसुम.. घऱ पर और भी काम है !”

“गोड़ परते है बिटिया !”

दादी ने बैठे बैठे ही भावना को देख कर कहा और भावना झेंप कर रह गयी..
उसे कभी भी अपने से बड़ों के द्वारा उसके पैर छुए जाना पसंद नहीं था… लेकिन वह ये भी जानती थी कि गांव देहात में ब्राह्मणों को ईश्वर तुल्य मानकर सम्मान दिया जाता है..
खासकर ब्राम्हण कुमारी कन्या को तो साक्षात देवी ही मानते हैं..
खासकर ठाकुरों के परिवार में औरतें ब्राह्मण कन्याओं का कुछ ज्यादा ही मान सम्मान करती हैं! और इसीलिए संकोच के कारण वह बस चुपचाप हाथ जोड़कर निकल जाया करती थी!
आज भी दादी की बात पर सकुचा कर उसने हाथ जोड़े और बाहर निकल गई।

उस हवेली से बाहर निकाल कर उसने चैन की सांस ली। आज एक बार फिर ऐसा लग रहा था जैसे वह फांसी के एकदम करीब पहुंच गई है, और किसी भी क्षण उसके गले में फंदा डालकर इस दुनिया का जेलर उसे उसकी सांसों से मुक्ति दे देगा।
भारी मन से वह अपने घर की तरफ बढ़ने लगी कि तभी दुबई से उसके नंबर पर कॉल आने लगा…

क्रमशः

aparna..

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