अपराजिता -33
रेशम का स्टॉप आया और वो उतर गयी.. उसने रास्ते से ही मानव को फोन करके बता दिया था कि वह घर आ रही है इसलिए उसका भाई उसे लेने के लिए स्टॉप पर पहले ही पहुँच चुका था..
रेशम उतरी और सामने मानव को खड़ा देखकर अपना सारा धैर्य चूक गई, वो खुद को संभाल नहीं सकी और फूट-फूट कर रोने लगी।
मानव ने तुरंत आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया। उसे संभाले हुए वह अपनी बाइक की तरफ बढ़ गया। दूर खड़ा अखंड यह सारी बातें देख रहा था। उसे समझ में आ गया था कि रेशम बेहद दुखी है और उसके दुख और आँसुओ के पीछे का कारण धीरेंद्र प्रजापति और पंकज दोनों ही हैं..।
अखंड अंदर ही अंदर उबल रहा था। गुस्सा तो उसमें भी बहुत था, रेशम को देखते रहने की धुन में वहां तक चला तो आया था लेकिन अब उससे खुद को रोका जाना नहीं हो पा रहा था।
रेशम को सहारा देकर मानव अपने साथ घर ले गया और अखंड गुस्से में मुट्ठियाँ भींच कर वापस यूनिवर्सिटी की तरफ मुड़ गया…
2 घंटे के रास्ते को हवा से बातें करते हुए उसने 45 मिनट में ही तय कर लिया। यूनिवर्सिटी में दाखिल होकर धीरेंद्र प्रजापति की तरफ बढ़ रहा था कि उसी के पंटरों ने उसे रोक लिया। वह लोग उससे पंकज के बारे में शिकायत करने लगे…
” भैया जी मालूम चला है कि उस लड़के ने भौजी की इजाजत के बिना उनके साथ फोटो खींचकर अपने स्टेटस पर लगा दी थी। और साथ में दिल वाला इमोजी भी लगाया था। इसलिए सब को लगा कि भौजी और उस पंकजवा की कुछ ज्यादा ही यारी है…।”
“हैं कहाँ वो कमीना ?”
“अस्पताल में पड़ा है !”
अखंड ने गुस्से में अपनी बाइक अस्पताल की तरफ ही घूमा ली..
अखंड और उसकी टोली को अस्पताल की तरफ जाते देख धीरेन्द्र का गुर्गा उसकी तरफ लपक लिया..
“धीरू भैया.. तीर निशाने पे लगने जा रहा !”..
“अच्छा !” व्यंग से धीरेन्द्र ने होंठ तिरछे हो गए..
