अपराजिता -58

अपराजिता – 58

    कहानी के पिछले भाग पर एक समीक्षा थी कि कहानी पास्ट में चल रही,फिर भावना का रिश्ता मानव के लिए वर्तमान में कैसे आया ?
इसका जवाब पहले क्लियर कर के आगे बढ़ूंगी..

भावना के लिए मानव का रिश्ता कुसुम की शादी के हफ्ते भर पहले ही पंडित जी लेकर आये हैं.. और भावना की माँ को ये रिश्ता पसंद आया है.. भावना की माँ ने काफी पहले से ही भावना की तस्वीर और कुंडली अपने नन्दोई जी यानी पंडित जी को दे रखी थी, जिसे वो मानव के घऱ बाद में लेकर गए हैं….
पढ़ते समय आप पाठक बस इतना ध्यान रखिये की रेशम और अथर्व वाला हिस्सा वर्तमान का है और कुसुम के शादी के दिन भागने से पहले का कुसुम वाला हिस्सा कहानी का पास्ट है..

आज के भाग के बाद से कहानी पूरी तरह वर्तमान में लौट आएगी..
आशा करती हूँ समाधान हो गया होगा, बाकी बातें कहानी के साथ क्लियर होती जाएँगी….

******

   भावना के मन का मैल धुल गया था। और अब उसके मन में निनाद के नाम का सूरज खिल चुका था..
रात माँ के साथ खाना खाने के बाद वो पढाई का बहाना कर अपने कमरे में चली गयी..
वैसे वो सोती अपनी माँ के पास ही थी..
लेकिन आज तो उसके और निनाद के बीच ढेरों बातें होनी थी…
उसने उस वक्त निनाद को कोई जवाब नहीं दिया था… निनाद उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था..

इसी ख़ुशी में उससे ढंग से खाया भी नहीं जा रहा था…

कहने भर की बात होती है कि सुख और दुःख में इंसान अपनी मुलभुत आवश्यकताओं को भूल जाता है, लेकिन अकाट्य सत्य यही है कि प्रेम में पड़ा इंसान ही बस अपनी भूख और प्यास को भूल पाता है… शोक और दुख के समय यही आवश्यकता कुछ अधिक तेजी से इंसान को गले लगा लेती हैं.।

शोक में पड़ा व्यक्ति भूख भी नहीं सहन कर पाता और प्यास भी नहीं…

यहाँ भावना शोक के पीछे से अब मोह में पड़ी थी, और यह मोह उसे खुद से अलग किये दे रहा था..
दो चार उलटे सीधे कौर डाल जैसे तैसे पानी पीकर वो अपने कमरे में चली आयी..
आते ही दरवाज़ा बंद कर उसने निनाद को कॉल लगा लिया..
लेकिन एक रिंग जाने से पहले ही संकोचवश काट भी दिया…पलंग पर पड़ी तकिये को गले से लगाए वो शर्म संकोच से गड़ी जा रही थी, कि उसका कॉल देख जाने वो क्या सोचेगा.. की तभी निनाद का फ़ोन आ गया….

भावना ने थोड़ी देर बजने के बाद फ़ोन उठा लिया..
निनाद की घबराहट भरी हेलो सुन कर भावना को हंसी आ गयी..
“कैसी हो ? तुमने कहा था रात में कॉल करने को और किया नहीं ? “

“हम्म.. सोचा था लेकिन.. !”

“लेकिन एक रिंग जाने पर काट दिया.. क्यों ?”  भोला निनाद भावना के हृदय में मचे कोहराम को समझ पाने में असमर्थ था..

वो तो उन साधारण प्रेमियों में से भी नहीं था, जो अपने प्रेम का प्रतिदान मांगते हैं।
कुछ प्रेमी अपनी प्रेमिका से अपने प्रेम के बदले स्वयं के लिए प्रेम चाहते हैं, और पूरा ना हो पाने पर या तो पूरी जिंदगी उस प्रेमिका के नाम की माला जपते हुए दुख और विरह में बिता देते हैं।
और कहीं तो ऐसे प्रेमी भी होते हैं जो उस इनकार के बदले अपनी प्रेमिका को तेजाब से नहला भी देते हैं। लेकिन ऐसे प्रेमियों के हृदय में क्या कभी प्रेम का वास हो भी पाता है? नहीं।

वह तो सही मायने में निनाद जैसा प्रेमी ही कर सकता। है एक सच्चे प्रेम की अनुभूति, जहां उसने आज तक भावना को सामने से देखा तक नहीं, और उससे प्यार कर बैठा..।

भावना को खुद पर गुरुर सा होने लगा..
आखिर ऐसा उसमे है क्या, जो निनाद जैसा लड़का उससे प्रीत लगा बैठा.. 

“बावना… तुम सुन रही हो ना ?”

“हाँ.. सुन रहे हैं .. और सुनिये .. आपसे कुछ कहना भी चाहते हैं.. !”

“क्या ?”  धड़कते दिल से निनाद ने पूछा

“निनाद… क्या आप हमसे शादी करेंगे ?”

निनाद ने तुरंत कॉल काट दी.. और पल के सौंवे हिस्से में भावना के कुछ भी सोचने से पहले विडिओ कॉल आ गयी..

भावना ने लजा कर फ़ोन लिया और सामने स्क्रीन पर वो बड़ी बड़ी आँखों वाला लड़का आश्चर्य से उसे देख कर मुस्कुरा रहा था…

भावना भी उसे देख मुस्कुरा उठी..
निनाद ने आँखों के इशारे से पूछा कि वो क्या कह रही थी और भावना ने धीरे से ऊँगली के इशारे से उसे बता दिया की वो उससे शादी करना चाहती है..
और क्या वो भावना से शादी करने को तैयार है ?

इस पर निनाद ने ज़ोर ज़ोर से गर्दन हिला दी.. वो उसकी इस हरकत पर हँस कर रह गयी..
फिर तो, वो रात इन दोनों प्रेमियों की आँखों ही आँखों में कट गयी..

निनाद का बचपन, उसका स्कूल कॉलेज, उसके दोस्त उसकी बहने उसके अम्मा और नाना, उसके खेत, उसका नारियल का बगीचा, अमलापुरम, गोदावरी नदी, उसका खान पान सब कुछ भावना सुनती चली गयी और निनाद सुनाता चला गया..

निनाद के मुहं से निकली हर एक बात भावना का दिल छूती चली जा रही थी.. उसकी आवाज़ किसी सौम्य खुशबूदार हवा के झोंके सी उसे सहला रही थी और उसी झोंके में मगन कब रात बीतने के साथ ही किस पहर में दोनों ही अपना अपना फ़ोन पकडे सो गए उन्हें मालूम नहीं चला….

सुबह खिड़की से छिटकी धुप जब चेहरे पर पड़ी तक कसमसा कर भावना ने आंखे खोल दी.. वो उठ कर बैठ गयी..
खिड़की पर जाकर उसने परदे को एक तरफ कर पूरा खोल दिया.. सुबह की हवा का झोंका अंदर चला आया… उसी वक्त दरवाज़े पर दस्तक होने लगी..
दरवाज़े पर माँ होंगी, सोच कर उसने दरवाज़ा खोल दिया। लेकिन हाथ में चाय लिए माँ की जग़ह कुसुम कमरे में तीर की तरह दाखिल हो गयी..
ऐसे सुबह सुबह कुसुम को अपने घर देख भावना आंखे मलने लगी..

“तुम एक बात बताओ, तुम्हारा फ़ोन क्यों बंद आ रहा है सुबह से ?”

“बंद आ रहा है ? नहीं तो.. ?”

भावना को डर था कहीं कुसुम उसका फ़ोन ना देख ले.. ऐसा नहीं था वो कुसुम से कुछ भी छिपाना चाहती थी, लेकिन बिना उसके बताये अगर कुसुम को कुछ भी मालूम चलेगा तो कुसुम इस बात का बतंगड़ बना देगी। बस इसीलिए पलंग पर पड़े फोन को भावना ने कुसुम के बढ़ते हुए हाथ की पहुंच में आने से पहले ही उठा लिया..

” अरे हां हमारा फोन तो बंद हो गया है.. रात में हम चार्ज में लगाना भूल गए थे शायद!”

कुसुम बड़े ध्यान से भावना को देख रही थी! भावना ने कुसुम से नजर मिलाये बिना फोन को लिया और चार्जिंग पर लगा दिया..

” तुम सुबह-सुबह यहां कैसे चली आई कुसुम ?”

“लो देख लो चाची.. अब हम आपके घर भी नहीं आ सकते ? “

“अरे पागल लड़की.. तुम बैठो चाय पियो हम ज़रा हाथ मुहं धोकर आते हैं !”

कुसुम ने हामी भर दी और भावना झटके से कमरे से  बाहर निकल गयी.. जाने क्यों आज उसे कुसुम की निगाहें खुद पर जलती सी महसूस हो रही थी..
उसे ऐसा लग रहा था, जैसे कुसुम उसे ध्यान से देख कर उसके सारे राज़ जान लेगी..

वो फटाफट हाथ मुहं धोकर चली आयी..
इतनी देर में भावना की माँ ने कुसुम और भावना के लिए नाश्ता भी रख दिया था…
भावना के लिए दूसरी चाय बना कर वो ले आयी..
भावना के आने तक में उसकी अम्मा और कुसुम घऱ के बीचो बीच बने खुले से आंगन में बैठी बातों में लगी थी.. इतनी देर में भावना भी थोड़ा सम्भल गयी..

भावना अपनी चाय का प्याला लिए कुसुम के ठीक बाजु में आ बैठी..

“अच्छा भावी सुनो.. हम किसलिए आये हैं वो तुम्हे बता दे ?”

“हाँ बोलो ना ?”

“हमें कुछ थोड़ा बहुत सामान खरीदना है.. तो हमने सोचा तुम्हे साथ ले चलते हैं.. वैसे चंद्रा भैया का ड्राइवर भी हमारे साथ चलेगा !”

भावना ने हामी भर दी..
चाय ख़त्म कर भावना नहाने और तैयार होने चली गयी..

कुछ देर बाद ही दोनों सखियाँ शहर के बाजार की तरफ बढ़ चुकी थी..

एक बड़ी सी जूतों की दुकान पर कुसुम भावना के साथ दाखिल हो गयी.. दो तीन नयी दुल्हनों वाली चप्पलें लेने के साथ ही उसने एक जोड़ी शानदार स्पोर्ट्स शूज़ भी ले लिए..

“ये किसके लिए ले रही हो कुसी ?”

“अपने लिए और किसके लिए.. बल्कि ये बाकी की चप्पलें तुम्हारे लिए हैं गिफ्ट.. !”

कुसुम हँस पड़ी, और भावना सपाट सी खड़ी रह गयी..
उसने जो चप्पलें ली थी उनमे से एक चप्पल कपल में थी.. दोनों एक सी चप्पलो की जोड़ियों में एक मेल और एक फीमेल चप्पल थी.. जो कुसुम को बहुत पसंद आयी थी, और इसलिते उसने वैसी दो सेट खरीद ली थी..
कुसुम ने राजेंद्र को भी वहाँ पहुंचने का मेसेज भेज दिया था..
वो लोग शहर के उस मॉल में घडी दो घडी मिलना चाहते थे, लेकिन चंद्रा भैया का ड्राइवर बराबर उनके साथ बना हुआ था। और इसलिए एक सेट चप्पल को दुकान के ठीक बाहर बनी एक बेंच पर चुपके से छोड़ कर राजेंद्र को इशारा देकर कुसुम भावना के साथ निकल गयी..।

भावना इस सब में एकदम खामोश बनी हुई थी.. उसके दिल दिमाग में निनाद छाया हुआ था..।
उसके दिमाग में अब भी बीती रात की भीनी भीनी सी बातें महक रही थी…

एक दिन पहले तक अपने मर्यादित आचरण से उसका दिल जीत लेने वाला वो अजनबी कैसे एक ही रात में नखशिखांत बदल गया था..।
उसकी हामी भरने की देरी थी और वो उससे कैसी कैसी बातों में उतर आया था.. उसकी मांग बढ़ती ही चली जा रही थी..
पर उसका वो बेबाक पन, उसकी बेशर्मी भावना को और भी ज्यादा उस के करीब करती चली जा रही थी..।

छिछोरा एक ही बार में उससे किस भी मांग बैठा था, और भावना शरमा कर रह गयी थी, लेकिन वो छिछोरा पूरी बेशर्मी से उसे घूरता चला जा रहा था….

“बावना तुम्हारी नेक पर लेफ्ट साइड में एक टिल है.. !”

उसके ऐसा कहते ही अनायास ही भावना का हाथ अपनी गर्दन पर चला गया था…

“हम्म है तो ?”

“तो.. मैं मिलने पर सबसे पहले वही किस करूँगा !”

भावना ने शरमा कर स्क्रीन नीचे कर दिया था..

फिर धीरे से फ़ोन वापस ऊपर कर बड़ी मुश्किल से वो उसकी तरफ देख पायी थी…

“टिल नहीं तिल कहते हैं !”

भावना के चेहरे पर उभर आयी मुस्कान देख कुसुम ने उसे टोक दिया..

“क्या हुआ ? किस बात पर इतनी हंसी आ रही है ?”

“हम्म.. नहीं कुछ नहीं.. चले ?”

“हम्म चलिए.. !”कुसुम उसका हाथ थामे मॉल से बाहर निकल गयी..

और पहली मंज़िल पर खड़ा राजेंद्र आस भरी नजर से अपनी प्रेयसी को जाते देखता रहा..
उसने कुसुम का छोड़ा पैकेट उठा लिया..
अपने फ्लैट पर पहुँच कर राजेंद्र ने देखा, बहुत खूबसूरत चप्पलो का कपल सेट था.. मुस्कुरा कर राजेंद्र ने उसे अलमीरा में सबसे नीचे रख दिया..

दो चार दिन यूँ ही पलक झपकते बीत गए और कुसुम की मेहँदी हल्दी का दिन चला आया..

ठाकुर परिवार की हवेली मेहमानों से अटी पड़ी थी.. हवेली इतनी बड़ी थी कि हर मेहमान के रहने का प्रबंध वहीँ था। किसी को बाहर कहीं रोकने रखने की आवश्यकता ही नहीं थी..।

घऱ के बीचो बीच के बड़े खुले ओसारे में एक तरफ महाराज बैठे बड़े कड़ाहे में दूध औंट रहे थे, वही दूसरी तरफ बने हुए मावे से महाराज के कामगार मिठाइयां तैयार कर रहे थे..

घऱ की औरते इधर से उधर कामो में व्यस्त थी.. कुछ बड़ी बुज़ुर्ग औरते इधर उधर की बातों में लगी थी.. वहीँ एक तरफ बैठी बुआ अपने परमपूज्य बाबा जी के चमत्कारों के किस्से सुनाने में मग्न थी…
हालाँकि उनके बाबा का कई बार भंडाफोड़ हो चुका था बावजूद बुआ की उन पर अनन्य भक्ति और श्रद्धा थी…
बुआ की बात कोई सुन भी नहीं रहा था, लेकिन वो लोगो को पकड़ पकड़ कर अपनी बात सुना रही थी..

उसी समय भावना भी वहाँ चली आयी..
पंडित जी एक तरफ गड़े मंडप के पास बैठे पूजा पाठ की तैयारियों में लगे थे..
उन्होंने तेल हल्दी के लिए कन्या की पुकार मचा दी..

इन दो तीन दिनों में भावना को रोज़ देख कर बाहर से आये कई मेहमान भी भावना को पहचान गए थे..

बुआ ने भावना को आवाज़ लगा दी..

“जाओ जाओ भावना, जाकर कुसुम को ले आओ !”

“जी बुआ जी !”

भावना तेज़ी से ऊपर की तरफ बढ़ गयी, लेकिन आधे रास्ते पर ही उसकी सुजाता के साथ आती कुसुम से भेंट हो गयी…
कुसुम के हाथ में नारियल था, और उसे अपने आंचल की छाँव में समेटे सुजाता मंडप में लेकर आ रही थी..भावना भी उनके साथ चली आयी..

मंडप तक पहुँच कर सुजाता ने कुसुम को पाटे पर बैठाया और उसके पीछे खड़ी हो गयी..
पंडित जी ने पांच कुंवारी कन्याओ को बुलवा भेजा..

“पंडित जी पहले तो सुहागने तेल हल्दी करेंगी ना.. !”

बुआ जी ने वहीँ से बैठे बैठे अपना ज्ञान दिया..

“नहीं बुआ जी.. पहले कन्याये करेंगी… सुहागने तो बाद में नेग करेंगी ना !”

“पता नहीं.. हमे तो लगता है पहले सुहागिल करेंगी तब ना कन्या करेंगी.. !”

“ना ना बुआ जी, पहले कन्या, ततपश्चात सुहागन !”

“को जानी दादा… हमारे समय तो उल्टा होता रहा, यहाँ आप उल्टा कराये दे रहे..

बुआ जी पंडित जी से बहस में लगी थी..

“खुद तो शादी की नहीं, अब सब की शादी में जाकर ऐसे ज्ञान देती हैं, जैसे चार बार ब्याह कर रखा हो !”  सुजाता ने धीरे से फुलझड़ी छोड़ दी  … कुसुम को हंसी आ गयी, भावना भी चहक रही थी..
माहौल खुशनुमा बना हुआ था..
पांच कन्याये आयी और कुसुम के सर से पैर तक तेल चढ़ा कर एक तरफ खड़ी हो गयी.. सुजाता ने एक एक कर पांचो कन्याओ के हाथ में सौ सौ के पत्ते पकड़ा दिए..
उनमे से एक कन्या ने हाथ में पकड़ रखी तेल हल्दी की कटोरी सुजाता को थमाने आगे बढ़ा दी, लेकिन उसका संतुलन बिगड़ा और कटोरी कुसुम के ठीक बगल में बैठी भावना के सर पर पलट गयी..
उसके सर से बहता तेल और हल्दी उसके चेहरे के साथ साथ उसकी गर्दन और उसकी कुर्ती को भी पीला कर गया..
भावना ने जैसे ही अपना चेहरा पोंछना चाहा, सुजाता ने पलट कर उसके पूरे चेहरे को हल्दी से रंग दिया..
इसके साथ ही वहाँ खड़ी बाकी औरते भी पूरे जोश से हल्दी खेलने में लग गयी..
माहौल ज़बरदस्त खुशनुमा हो गयी थी.. औरते एक दूसरे के चेहरे और शरीर पर हल्दी पोतती एक दूसरे के पीछे भागने लगी.. इसी सब में उन औरतो ने कुसुम और भावना को भी खूब सारी हल्दी पोत दी..

ये सारी रस्मे निपटने के बाद अपने कमरे में नहाने आयी कुसुम ने अपनी तस्वीर खींच कर राजेंद्र को भेज दी और नहाने घुस गयी…
भावना भी अपने चेहरे और हाथ की हल्दी झाड़ कर घऱ जाने निकलने लगी कि सुजाता ने कुसुम के कपड़े पकड़ा कर उसे नहाने भेज दिया..।
इतनी भीड़ भाड़ में सुजाता को मना ना कर पाने से भावना ने उनकी बात मान ली..

सारी रस्मो रिवाज़ो के बीच वो दिन कब ढल गया उन्हें पता ही नहीं चला..
कुसुम रात में भी भावना को अपने साथ रोके रखना चाहती थी, लेकिन रात में भावना वहाँ रुकने को किसी कीमत पर तैयार नहीं हुई..।

रात का यही समय तो होता था, जब वो निनाद के साथ पूरी दुनिया भूल कर, मन भर कर बातें कर पाती थी, इस अनमोल समय को वो खोना नहीं चाहती थी.. किसी कीमत पर नहीं..
आज की रात निनाद बहरीन से निकलने वाला था.. अगले दिन वो दिल्ली पहुँच कर वहाँ से सीधे दूर्वागंज पहुंचने वाला था..।
कितने सारे सुहावने सपने उसने और निनाद ने देख लिए थे.. और अब इन सपनो के बिना जीना उन दोनों के लिए ही नामुमकिन सा हो गया था…

रात में जब निनाद ने फ्लाइट पर बैठने के बाद भावना को वीडियो कॉल कर के दिखा दिया कि वो उससे मिलने आने को तैयार है, तब भावना के चेहरे पर अलग सी चमक चली आयी…।

निनाद के फ़ोन बंद करने के बाद भी वो काफी देर तक अपने सुंदर भविष्य के सपने बुनती रही और रात के किसी पहर में वो नींद के आगोश में चली गयी…
अगली सुबह एक नयी शुरुवात के लिए…

क्रमशः

भावना कहाँ हो यार ? तुम अब तक पहुँची क्यों नहीं.. हमारा घर से भागने का समय हो गया है.. !”

“आ रहे है कुसुम.. बस तुम्हारी ही कुछ तैयारी बाकी है.. !”

कह कर भावना ने फ़ोन काट दिया और तेज़ी से भागती हुई बस स्टेण्ड की तरफ बढ़ गयी..
उसका लहंगा पैरो में फंस रहा था, लेकिन निनाद से पहली बार मिलने की ख़ुशी में वो भागती चली जा रही थी..

….
अगले एपिसोड की झलक ।

aparna..

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Nisha
Nisha
1 year ago

Sab thik toh hoga na kyunki dil bahut ghabra raha hai ki kahin kuch galat hone wala hai