अपराजिता -28

अपराजिता -28

कुसुम और राजेंद्र की आंखें भी बह रहीं थी लेकिन उन दोनों की धड़कने आपस में जुड़ कर जो संगीत पैदा कर रहीं थी उससे वो सारा मार्ग उज्वल हो उठा था..

गाड़ी का ड्राइवर घर का पुराना नौकर था, उसने कुसुम को अपनी गोद में खिलाया था। असल में वह कुसुम की मां के ब्याह में उनके मायके से आया था, और उन्हें दीदी माना करता था। जब वह इस घर में आया था, तब वह खुद मुश्किल से 17 अट्ठारह बरस का था….
उसने इस घर को अपने जाने कितने कीमती साल चढ़ा दिए थे।
उसकी सारी जवानी इस घर की सेवा में भेंट चढ़ चुकी थी..।
अपनी मालकिन को वो सम्मान से जिज्जी कहा करता था। और उसकी जिज्जी उससे चाहे कितना काम करवा ले लेकिन खिलाते पिलाते समय उसमें हमेशा अपने भाई को ही देखा करती थी।
उसकी आंखें इस घर के सुख दुख दर्द परेशानियां प्रसन्नताएं उत्सव त्योहार हर एक बात की साक्षी बनी थी। मालकिन की पहली जचकी बिगड़ने के बाद पैदा हुआ मृत बच्चा और उसकी जिज्जी का करुण विलाप वह आज तक नहीं भूला था।
    उसके 2 साल बाद पैदा हुआ चांद सा लड़का जिसे देखते ही मोहल्ले की बड़ी बुजुर्ग मितानिन दीदी ने बच्चे का नाम चंद्रा रख दिया था। चंद्रा के पैदा होने के 5 साल बाद पैदा हुई कुसुम को भी उसने अपने हाथों में खिलाया था।
       कुसुम के नन्हे पैरों के पीछे वह अक्सर दौड़ लगाया करता था..
कुसुम कहीं भागते हुए गिर ना जाए इसलिए उसके पीछे साये सा लगा रहता था। कुसुम को पहली बार साइकिल चलाना भी उसी ने सिखाया था, और बाइक चलाना भी। कुसुम उसके लिए भी उसकी बेटी समान थी। 25-26 बरस की उम्र में उसकी बूढ़ी दादी ने उसे एक बार याद किया था कि वह आकर शादी कर ले, लेकिन अब उसका लगाव इस घर परिवार से ऐसा हो गया था कि वह कभी वापस नहीं लौटा। और यहीं अपने जीवन को होम कर दिया।
आज भी उस बुजुर्ग काका के सामने उनकी लाडली कुसुम कुमारी किसी विजातीय लड़के के गले से लगी बारिश में भीग रही थी, लेकिन जाने क्यों यह देख कर भी ठाकुरों के घर का वह नौकर क्रोध में पागल नहीं हुआ, बल्कि भावनाओं में बहकर उसने भी अपने आंसू पोंछ लिए।
गाड़ी से उतर कर वह कुसुम के पास गया और धीरे से उसने कुसुम के कंधे पर हाथ रख दिया…

” बिटिया यह रास्ता है, यहां तरह तरह के लोग आते हैं, आप दोनों गाड़ी में चल कर बैठिये.. !”

कुसुम कुमारी को अब जाकर होश आया कि वह बीच सड़क पर खड़ी थी।
उसने राजेंद्र का हाथ पकड़ा और अपनी जीप की तरफ दौड़ लगा दी। भावना भी उनके पीछे-पीछे जीप की तरफ बढ़ गई। जीप खुली थी इसलिए उस में बैठने ना बैठने का भी कोई मतलब नहीं था। भीगना तो उन लोगों को था ही, लेकिन फिर भी दुलारे कक्का ने उन लोगों को गाडी में बैठाया और किसी छाँव की तलाश में बढ़ गए..

पास ही एक चाय की टपरी मिल गयी..
झुके हुए से छप्पर वाली फूस की झोपड़ी में एक तरफ बढ़िया चूल्हा जल रहा था, जिस पर चाय की केतली चढ़ी हुई थी..
दूसरी तरफ के चूल्हे में गरमा गरम आलू की पकौड़ी आ निकल रही थी।

वहीं एक तरफ ले जाकर दुलारे ने गाड़ी रोक दी। कुसुम राजेंद्र का हाथ थामे उस झोपड़ी में अंदर दाखिल हो गई। सबके लिए चाय बोलकर दुलारे काका वहीं एक तरफ बाहर फूस की ओट में खड़े रहे।

भावना भी राजेंद्र और कुसुम के साथ अंदर चली गई। दोनों एक मरियल सी बेंच पर एक दूसरे का हाथ थामे बैठ गए।
    टिमटिमाता हुआ लालटेन जल रहा था, लेकिन उन दोनों पागल प्रेमियों के चेहरे का उजाला ही एक दूसरे को देखने के लिए काफी था। दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे, बस एक दूसरे को देख कर ही अपनी आंखों की प्यास बुझा रहे थे।
    भावना ने हीं उन दोनों को टोका..

” तुम दोनों ने कुछ सोचा भी है कि आगे क्या करना है.. ?”

राजेंद्र ने भावना की तरफ देखा और वह कुछ बोल पाता इसके पहले ही कुसुम बोल पड़ी

“हम अभी डाक साहब को लेकर अपने घर जाएंगे, और अपने भैया के सामने ले जाकर खड़ा कर देंगे। और कह देंगे कि हमारे लिए इधर-उधर रिश्ता देखना बंद कीजिए, हम अगर शादी करेंगे तो इन्हीं से और किसी से नहीं.. !”

” कुसम एक बात कहे, हमने ना तुम से बढ़कर बौड़म  लड़की अपनी जिंदगी में नहीं देखी यार।
तुम्हारे भाई गांव में अगर कोई ऐसी शादी कर ले तो उसे जिंदा नहीं छोड़ते। वह तुम्हें कैसे छोड़ देंगे ? समझती क्यों नहीं हो यार ? कभी-कभी तो लगता है कि तुममें कितनी हिम्मत है और साथ यह भी लगता है कि तुममें  दिमाग है ही नहीं ।
बिल्कुल भी नहीं.. ।”

भावना ने अपने मन की बात कही और राजेंद्र की तरफ देखने लगी..

” राजेंद्र बाबू हमें आप काफी समझदार लगते हैं, यह लड़की तो आपसे प्यार में बिल्कुल बौरा गई है..
लेकिन आप तो हमारी बात समझ सकते हैं..  हम तो  यही रहेंगे कि आप दोनों यह गांव क्या, बल्कि यह स्टेट ही छोड़कर चले जाइए।
क्योंकि इसके भाई और उनके गुंडे आप दोनों को कहीं नहीं छोड़ेंगे। हम तो कहते हैं, हम अपने पापा का नंबर और पता ठिकाना आप दोनों को दे देते हैं। आप इंडिया ही छोड़ दीजिए, बहरीन चले जाइए। वहां पर कोई जानने पहचाने वाला नहीं होगा। आप लोग अपनी अलग जिंदगी बसा पाएंगे.. “

” पगला गई हो क्या भावना?  हम अगर ऐसे भाग गए तो हमारी अम्मा का क्या होगा सोचा है ?  बिचारी वैसे भी बिना गलती के बाबूजी से कुटती पिटती रहती हैं। बचपन से उन्हे हर बात पर मार खाते देखा है। अब अगर उनकी लड़की घर छोड़कर भाग गई ना तो हमारे बाबूजी हमारी अम्मा को फांसी से लटका देंगे…!”

” मैडम कुसुम कुमारी जी, अगर आप इतनी समझदार है और इतना सब जानती समझती है, तो यह प्यार मोहब्बत में पड़ी ही क्यों ?
आप नहीं जानती कि आपके घर का माहौल कैसा है ? हमें तो आपके बाबूजी से ज्यादा आपके भैया से डर लगता है क्या बताएं यार तुम्हें…?
तुम दोनों ने सुना है या नहीं, पता नहीं। लेकिन पास वाले गांव में एक लड़का और लड़की ने अंतरजातीय विवाह कर लिया था मंदिर में जाकर। दोनों एक दूसरे को माला पहना कर जब घर लौटे तो लड़की के घरवालों ने आकर चंद्रा भैया से शिकायत लगा दी थी। तुम्हें पता है ना कुसुम, चंद्रा भैया अपनी तलवार लेकर गए थे, और उन्होंने लड़की के सामने उस लड़के का गला काट दिया…
वह तो भगवान की कृपा थी कि लड़का जैसे-जैसे बचा लिया गया, वरना तुम्हारे भाई ने उसकी जान लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
और उस लड़के के गले पर तलवार चलाने के बाद उसके सामने उस लड़की की शादी अपने ही समाज के लड़के से करवा दी।
हे भगवान!!  हम कैसे उस दृश्य को भूल सकते हैं? हम भी वहां मौजूद थे, हमारी अम्मा तो यह सब देखकर गश खाकर गिर गई थी…।’

    भावना की बात सुनकर कुसुम कुछ देर के लिए एकदम से चुप हो गई। उसने राजेंद्र की तरफ देखा और अपनी गहरी नजरों से उसकी दोनों आंखों को लगातार देखते हुए कहने लगी..

” आपको हम पर भरोसा है ना! बस हम पर भरोसा रखिए, हम एक बार अपने भैया से बात करना चाहते हैं। हम जानते हैं कि उनके अंदर एक राक्षस है पूरी दुनिया के लिए।
लेकिन अपनी बहन को वह बिल्कुल परियों की तरह संभाल कर रखते हैं। बचपन में एक कहानी सुनी थी कि एक राक्षस की जान एक चिड़िया में कैद थी, बस यही समझ लीजिए कि हमारे चंद्रा भैया की चिड़िया हम हैं। बचपन से हम यही देखते आए हैं कि हममें उनकी जान बसती है। अब आप बताइए अपने झूठे घमंड के लिए क्या अपनी जान का सौदा कर देंगे वो…?”

कुसुम ने भावना की तरफ देखा और उसके दोनों हाथ पकड़ लिये..

” हम जानते हैं, तुम्हारी कही एक एक बात सच है। हमारे चंद्रा भैया ने यह कांड किया था और इसके बाद पुलिस उन्हें पकड़ कर भी ले गई थी। वह तो गनीमत थी कि उस लड़के के घर वालों ने ही रिपोर्ट नहीं लिखाई और चंद्रा भैया छूट गए। लेकिन हम यह भी जानते हैं भावना, की हमारे लिए वो कभी इतने कट्टर नहीं हो पाएंगे.. !
और साथ ही हम मुहँ छिपा कर भागना नहीं चाहते हैं, हम अपने घर वालों को एक मौका तो दें ?
हो सकता है वो लोग मान जायें और अगर मान गए तो भागने की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी.. !”

“और अगर नहीं माने तो ?”..

राजेंद्र ने कुसुम से पूछ लिया..

“तो फिर आपकी कसम हम घर छोड़ कर आपके साथ चले जायेंगे ! ये कुसुम कुमारी का वादा है.. !”

राजेंद्र के चेहरे पर अब हलके से राहत के भाव चले आये थे…..

*****

अखंड अपने हॉस्टल के कमरे में बैठा था, उसके दो चार चेले चपाटे उसे घेर कर बैठे इधर उधर की पंचायत गांठ रहें थे कि तभी एक लड़का भागता हुआ चला आया..

“भैया जी.. वो कमीना आय रहा है आपसे मिलने ?”

“कौन बे.. कमीने तो भरे पड़े है दुनिया में.. तुम किस वाले की बात कर रहे हो ?”

“भैया जी..प्रजापति.. !”..

“ओह्ह बोल दो जाकर, की हम व्यस्त हैं.. !”

उतनी देर में अखंड के दरवाज़े को ठेल कर प्रजापति अंदर आ गया..

“तुमसे कुछ काम था परिहार.. ?”

“अबे तुम यार दरवाजा खटकाते तक नहीं हो.. कुण्डी खटका कर आया करो बे.. कहीं ऐसा ना हो किसी दिन खुद शर्मिंदा हो जाओ.. !”

” हमको इतना तो मालूम है, तुम्हारे बारे में कि अगर तुम कोई ऐसा वैसा काम करोगे तो दरवाजा बंद करके करोगे!”

” क्या बात है, आजकल हमारे बारे में बहुत खबर रख रहे हो ? कहीं प्यार मुहब्बत तो नहीं हो गयी हमसे..!”

” अपनी हद में रहो परिहार!  तुमसे काम है इसलिए आए हैं ।  हमारे दो लड़कों को एसएचओ ने अपने थाने में बंद कर रखा है..!”

” काम भी तो थाने में बंद होने वाला किये रहे..!”

” हम भी यह नहीं बोल रहे कि दोनों ने कोई बहुत अच्छा काम किया था। अरे साले लोग किसी को गोली मारकर आते ना तो हमको भी इतना शर्म नहीं आता उन लोगों को छुड़ाने जाने में, लेकिन अब क्या करें ?
फिर बात यह है कि जितना बड़ा गलती किए हैं उससे ज्यादा सजा खा चुके हैं दोनों। और वह एसएचओ उन दोनों के नाम की कसम उठाए बैठा है कि छोड़ेगा नहीं साला। इसलिए तुम्हारे पास आए हैं ।
एक इंस्पेक्टर ने कहा था कि कोई पावरफुल छात्र नेता अपने लोगों के साथ आकर यहां बात कर ले तो बात बन सकती है। क्या है छात्रों का बवाल देखकर पुलिस वाले भी थोड़ा भय खाते हैं ना..!”

“हम्म तो ये बात है बचुआ.. तभी हम बोले की आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया.. !”
.
” परिहार यह सब बातें बाद में बना लेना, अभी हमको वाकई तुम्हारा जरूरत है..!”

” सौ क**** मरे होंगे तब तुम पैदा हुए हो प्रजापति..! याद है कभी हम भी तुम्हारे पास आए थे एक मदद के लिए और तुमने हमारे दोनों कंधों से हमें पकड़कर उल्टा भेज दिया था। हमें बाहर निकल कर दरवाजा बंद कर दिए थे।
तुम्हें याद नहीं होगा लेकिन हमें याद है। हमें यह भी याद है कि कभी तुम हमारे दोस्त हुआ करते थे, और फिर जब हमारी पहचान को बढ़ते देखा, हमारे नाम को बढ़ते देखा, तो जलन में तुम हमारे खिलाफ लोगों के दिलों में जहर भरने लग गए। हम सब कुछ अच्छे से जानते हैं। प्रजापति हम कभी सामने आकर तुम से लड़े नहीं, लेकिन तुम्हारी एक-एक हरकत हमें समझ आती थी। तुमने पता नहीं कितनी बार हमारी इमेज खराब करने की कोशिश की है। वह तो बात यह है कि हमारे चाहने वाले हमें इतने अच्छे से जानते हैं कि तुम्हारे बहकावे में नहीं आते। लेकिन फिर भी कई ऐसे बेवकूफ हमारे पाले में भी थे, जो तुम्हारे बहकावे में आकर हमें छोड़ भी गए हैं…
और सच कहे तो हमें उन बेवकूफो की जरूरत भी नहीं। क्योंकि एक बात तो हम मानेंगे, तुम से दुश्मनी में हमें एक बात अच्छे से समझ में आ गई कि दुनिया में दोस्ती भी सोच समझकर करनी चाहिए।
तुम हमको बड़े भैया बोलते थे किसी जमाने में याद है..  और आज बकायदे परिहार बोल रहे हो..
हम इतने भी बड़े अकड़ू नहीं हैं कि तुम हमारे दरवाजे तक आओ और हम तुम्हें खाली हाथ लौटा दे..
चल रहे हैं तुम्हारे साथ तुम्हारे भाई की जान बचाने के लिए..
चलो !”

अखंड की बातें सुनकर धीरेंद्र प्रजापति का खून खौल रहा था। लेकिन इस वक्त उसके बस में कुछ नहीं था। वह इसी बात पर संतुष्ट था कि ज्यादा नाटक नौटंकी दिखाएं बिना ही अखंड परिहार उसका साथ देने को राजी हो गया था। वह दोनों साथ में निकले ही थे कि अखंड के चेले गोलू ने अखंड के नाम का जयकारा लगाना शुरू कर दिया। वह सिर्फ अखंड के नाम का जयकारा लगाकर चुप हो जाता तो एक बार फिर भी गनीमत थी, लेकिन उसने उसके साथ ही प्रजापति के ऊपर भी तंज कसना शुरू कर दिया था और यही बात प्रजापति को सहन नहीं हो रही थी…

” जन जन का यह नारा है अखंड परिहार हमारा है”

” क्यों भाई भोलू क्यों भाई गोलू, प्रजापति है कौन यह बोलों “

उनके नारे सुनकर जहां अखंड खिलखिला कर हंस रहा था ।वही प्रजापति के कान में जैसे कोई गरम सीसा पिघलाकर उलट दे रहा था। अपने आप को जप्त किए धीरेंद्र ने उन सारे तानों को सुन लिया और उस वक्त के लिए सहन कर लिया। अखंड और प्रजापति एक साथ थाने पहुंचे। अखंड अपनी सारी टोली को लेकर आया था। थाने के बाहर ही सारे छात्रों ने घेराव कर दिया और
छात्र संघ जिंदाबाद पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगा दिए ।युवा छात्रों को तो मौका ही चाहिए होता है इस तरह के बवाल करने का..।
अखंड के एक इशारे पर इन सारे छात्रों ने बवाल मचा दिया..
थाने के बाहर का होहल्ला सुन कर एसएचओ को उन लड़कों को छोड़ना ही पड़ गया..
इस सब के बाद उन लड़कों को साथ लिए धीरेन्द्र वापस लौट गया, लेकिन वो अपने साथ सिर्फ इन लड़कों को ही नहीं बल्कि अखंड के लिए दिल में ढ़ेर सारा गुस्सा नफरत विषाद भी लेकर लौटा था..

और ये छोटी सी चिंगारी शुरुआत थी, उस आग की जिसने अखंड का सारा जीवन स्वाहा कर दिया..

क्रमशः

aparna..

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Manu verma
Manu verma
2 years ago

बहुत अच्छा भाग 👌👌👌♥️♥️