अनुत्तरित… !!

अनुत्तरित…

      शैली ने फटाफट अपना बैग तैयार किया और रसोई में चली गयी..
रसोई में उसकी माँ उसके लिए टिफिन बना कर पैक कर रही थी.. ।

आज शैली के स्कूल की तरफ से बच्चो को पिकनिक लेकर जाया जा रहा था..।
पिकनिक का समय सुबह से शाम तक का था। सभी अभिभावकों से लिखित अनुमति ले ली गयी थी.. शहर से बाहर किसी जगह पर उन्हें लेकर जाया जा रहा था !!
      वो पिछले चार पांच दिन से बहुत उत्सुक थी..
रोज़ अपनी माँ से नयी नयी फरमाइशें कर रही थी, कि उसे टिफिन में क्या चाहिए !!

  “क्या क्या बनाऊं तेरे लिए, एक ही दिन की तो पिकनिक है !”

“अच्छा मम्मा ऐसा करो, दादी जैसा बनाती थी न वड़ा पाव, वो बना देना !”..

“वड़ा पाव में दिन भर कैसे चलेगा, और फिर तेरी टीचर ने कहा है, कम से कम चार लोग खा सके इतना खाना रखना है.. वड़ा पाव में पेट कैसे भरेगा, बता तो ?”

“तो साथ में और भी कुछ रख देना न !”

“चल ठीक है, मसाला चावल भी बना दूंगी ! दो आइटम रहेंगे तो आराम से चार लोगों को पुर जायेगा.. वैसे तेरे टीचर्स लगता है खुद नहीं ला रहे खाना..। इसलिए अपने लिए बच्चो के घर से इंतज़ाम करवा लिया है.. है न ?”

“नहीं मम्मी, आरती बता रही थी, किसी जगह विजिट के लिए लेकर जाने वाले है, हो सकता है वहाँ के लोगो के लिए खाना रखवा रहे हो ?”

“हे भगवान!! कहीं किसी झुग्गी झोपड़ी में न ले जाये !”

“तुम भी कमाल करती हो, लाखो की फीस लेने वाला इतना महंगा स्कूल, झुग्गी झोपड़ी में क्यों ले जायेगा बच्चो को.. ।
जाने दो शैली को.. वापस आएगी तो पता चल ही जायेगा !”

शैली के पिता ने मुस्कुरा कर अपने हाथ में पकड़ रखे कुछ कड़क नोट अपनी लाड़ली के हाथ में रखे और बाहर निकल गए..

****

  नित्य के अभ्यास से घर से निकलते हुए शैली ने बाहर वाले बड़े हॉल में लगी अपनी दादी की तस्वीर को प्रणाम किया और अपनी बस पकड़ने निकल गयी…

   आज वो बहुत ज्यादा खुश थी..।
पिकनिक वो भी दोस्तों के साथ, उससे बढ़ कर ख़ुशी की बात क्या होगी..।
वो अपनी हर बात अपनी दादी की तस्वीर से ज़रूर बताया करती थी..
  दो साल पहले तक उसे तस्वीर से बातें करने की ज़रूरत नहीं थी।

दो साल पहले जब वो अपनी मम्मी के साथ नानी के घर गयी, तब वहां से लौटते वक्त उसकी मम्मी लौट गयी, लेकिन उसे उसके मामा मामी ने रोक लिया। और जब घर लौटी तब पता चला कि एक दिन दादी की बहुत तबियत ख़राब हुईं और वो अचानक कहीं चली गयी..।
मम्मी के अनुसार उन्हें मानसिक समस्याएं थी और उसी झोंक में जानें वो कहाँ चली गयी !

उसे धक्का लगता इसलिए उसे कुछ बताया नहीं गया।उस रात और उसके बाद जाने कितनी राते शैली ने रोते हुए गुज़ारी।  वो दादी के साथ ही सोया करती थी, अब अकेला कमरा उसे चुभने लगा था।

हाँ मम्मी और दादी की बनती नहीं थी, लेकिन दादी उसे बहुत प्यार करती थी..।
मम्मी को भी वो बस समझाने की ही कोशिश करती थी, पर जाने क्यों दादी की कोई भी बात मम्मी को पसंद ही नहीं आती थी..
हालाँकि दादी के जाने के बाद उसने मम्मी को भी थोड़ा उदास देखा था..
पापा ने तो दादी को खूब ढूंढने की भी कोशिश की लेकिन ढूंढ़ नहीं पाए।

कितने थके और उदास से लगते थे उस समय पापा…
लेकिन फिर धीरे धीरे मम्मी पापा ने परिस्थिति से समझौता कर लिया।
एक वो ही थी जो आज तक समझौता नहीं कर पायी।
घर पर दादी की तस्वीर टाँग दी गयी, बिलकुल दादा जी के बाजु में….

उसे ये बात पसंद तो नहीं आयी, लेकिन मन मार कर रह गयी वो, कुछ कह नहीं पायी !
वरना पूछने का मन था, दादा जी तो भगवान के पास चले गए, लेकिन दादी तो ज़िंदा है न।
फिर वहाँ तस्वीर क्यों, लेकिन पूछ नहीं पायी..

इन्ही ख़यालो में खोये खोये उसे बस में नींद लग गयी.. एक झटका सा लगा और पास बैठी आरती ने उसे जगा दिया..

“चल शैली हम लोग पहुँच गए.. !”

आंखे मीचते शैली उठ गयी..
उसके साथ के बच्चे एक एक कर बस से उतरने लगे, वो भी उतर गयी।

सामने देखा तो कल्याणकुंज वृद्धाश्रम का बोर्ड लगा था।

सभी बच्चे एक दूसरे की तरफ देखने लगे.. ये सभी ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी थे, आज उनकी सरप्राइज स्कूल विज़िट में उन्हें कल्याणकुंज वृद्धाश्रम लाया गया था..

सभी के चेहरों पर मुस्कान थी। अब उन लोगो को समझ आ गया था कि टीचर ने क्यों चार लोगो का खाना रखने को कहा था..।

सभी एकसाथ अंदर चले गए..

एक एक कर वो लोग सबसे मिलने लगे।
सारे ही बच्चे अच्छे घरो से थे, सब ने एक एक कर सभी बुज़ुर्गों के पैर छुए और आशीर्वाद लिया..
ऐसे ही आगे बढ़ते हुए शैली की नजर अचानक अपनी दादी पर पड़ गयी..।

पल भर के लिए वो चौंक कर रह गयी.. उसे एकदम से अपनी दादी को पहचानने में वक्त लगा..।
वो पलकों को झपक कर उन्हें देखती हुईं उन तक पहुँच गयी..।
दादी का रंग रूप बिलकुल बदला हुआ था।
अच्छे साफ सुथरे सूट में बालो को सलीके से कंधे तक काट कर रखा था उन्होंने..।
गालों पर भी स्वास्थ्य की लाली नजर आ रही थी।

वो अभी उन्हें देख ही रही थी कि दादी ने आगे बढ़ कर शैली को गले से लगा लिया..
दोनों जनी एक साथ फफक कर रो पड़ी..

आजू बाजु खड़े किसी को कुछ समझ ही नहीं आया की हुआ क्या है.. ये दोनों रो क्यों रही है..?
लेकिन अनुभवी शिक्षकों ने ताड़ लिया कि क्या बात है, और बच्चो और बाक़ी लोगो को वहाँ से दूसरी तरफ ले गए,जिससे दादी और पोती को अकेले वक्त मिल जाये..
ये ऐसा भावुक कर देने वाला पल था कि वहां मौजूद हर किसी की आँख भीग गयी !
देर तक दोनों एक दूसरे के गले से लगी रोती रही.. फिर शैली ही अलग हुईं..

“आप कहाँ चली गयी थी दादी ? पापा ने कितना खोजा आपको और अंत में परेशान होकर खोजना ही छोड़ दिया..”

“तू कैसी है बेटा ? और सुन, तेरा पापा कैसा है ? खाना टाइम पर खाता है न ? बीपी की गोली सुबह समय से लेता है न ? भूल तो नहीं जाता ?”

“नहीं दादी, दवा समय से ले लेते है !”

“और तेरी मम्मी कैसी है ? उसका कमर का दर्द ठीक रहता है..? माइग्रेन भी तो था उसे..? हर दूजे दिन सर पकड़ कर बैठ जाती थी!”

“अब तो उन्हें सर दर्द होता ही नहीं दादी..। कमर दर्द भी नहीं रहता..। मम्मी तो ज़ुंबा क्लास भी जाने लगी है !”

“अच्छा है ! और तू कौन सी क्लास में पहुँच गयी !”

” इलेवेंथ अह्ह ग्यारहवीं में दादी.. !”

“अरे इतनी इंग्लिश आती है मुझे ! तू बैठ मैं तेरे लिए कुछ लाती हूँ !”

दादी धीरे धीरे चलती हुईं अपने कमरे में चली गयी..
उनके पीछे शैली भी बढ़ चली..।
एक बड़ी सी डोरमेट्री में एक तरफ उनका पलंग था, और उसके बगल से एक लोहे की खुली अलमारी थी.. उसमे एक डिब्बे को लिए दादी उसके पास आ गयी..
उन्होंने डिब्बा खोल दिया..।

शुद्ध घी में भुने बेसन के लड्डुओं की सौंधी महक कमरे में फ़ैल गयी।
शैली ने गप से एक लड्डू अपने मुहं में रख लिया..

“आपने बनाया ?”

“और कौन बनाएगा मेरी चिरैया !”

शैली अपनी दादी से लिपट गयी..

“यहाँ जिसके पास जो हुनर है, वो वही काम कर लेता है। जो कुछ न करना चाहे, उस पर कोई बंदिश भी नहीं..।
मैं लड्डू, चकली, सलोनी, नमकीन बनाती हूँ, कुछ और औरते भी मदद कर देती है..।
पास में एक होटल है वो पन्नियों में पैक कर के सारा समान बेच देता है। और पैसे हमें लाकर दे देता है… हमारा भी खर्चा चल जाता है !”

“दादी अब घर चलो न.. मम्मी पापा कितने खुश होंगे आपको देख कर !”

दादी के चेहरे का रंग सफेद पड़ गया..

“एक बात बोलूं बेटा… अब मैं वापस नहीं जाउंगी !”

दादी पहले भले ही शैली से बातें छुपा जाया करती थी लेकिन अब उन्हें कुछ भी छुपाने का मन नहीं किया..

“क्यों दादी ?”

“क्यूंकि तेरे पापा मम्मी ने मुझे यहाँ छोड़ते वक्त यहाँ के मैनेजर को अपना नंबर देकर कहा कि अगर मुझे कुछ हो गया, तब उसे इस नंबर पर कॉल कर ले..।”

एक गहरी सी साँस लेकर दादी चुप हो गयी..

शैली के पास पूछने को अब कुछ बाक़ी नहीं रह गया था।

और अब उसे ये भी समझ आ गया था कि दादी के बारे में पूछे गये उसके कई सवाल घर पर अक्सर अनुत्तरित क्यों रह जाते है… !!

अनुत्तरित…. !!

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जागृति
जागृति
2 years ago

ऐसे कृत्य से घर के बड़े बच्चे से क्या अपेक्षा रखना चाहते हैं समाज का एक बेहद कड़वा सच है ये

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
2 years ago

Vyakti apni aane wali jindagi Ko kyon bhool jaate hain?

Nisha
Nisha
2 years ago

Aisa karke shaili ke parents ne apni beti ki nazron me khud ko gira liya

Vandana attri
Vandana attri
2 years ago

Beautiful and heart touching story

Shanu singla
Shanu singla
2 years ago

😕😕😕😕😕😕😕😕😕😕😕😕

Ashok Garg
Ashok Garg
2 years ago

बहुत बढ़िया कहानी आजकल के जीवन की हकीकत कई परिवारों में ऐसा ही हो रहा है अधिकांश शहरों में गांव में तो फिर भी ठीक है अभी भी संयुक्त परिवार मिल जाते हैं

Anamika
Anamika
2 years ago

🥺🥺

Rashmi Hasija
Rashmi Hasija
2 years ago

So sad .. this is harsh reality

Jasveer Kaur
Jasveer Kaur
2 years ago

Heart touching story kya iska aage bhi part aayega

Jyoti
Jyoti
2 years ago

Very touching storyline