अपराजिता -73

अपराजिता -73

  दिन सारा थकान में बीत गया था, किसी ने भी ढंग से कुछ खाया पिया नहीं था..
अस्पताल से लौट कर सुजाता को घऱ पहुँचते ही अपनी गिट्टू का ध्यान आया और वो भागकर अंदर चली आयी..
गिट्टू एक तरफ बैठ कर खेल रही थी.. और काम वाली बाई उसका बराबर ख्याल रखे हुए थी..
सुजाता को देखते ही गिट्टू भाग कर उससे चिपक गयी और अपनी बच्ची पर मन भर कर लाड़ लुटाने के बाद सुजाता रसोई की तरफ बढ़ गयी..!

घऱ आते ही घऱ की औरतें थकी सी इधर उधर जहाँ जग़ह मिली बैठ गयीं..!
सुजाता ने नौकरानी से चाय चढाने बोला और अस्पताल में रुके अपने ससुर जी के लिए खाने की तैयारी बताने लगी..

इतने ज्यादा मानसिक दबाव में भी उसने अपना धैर्य नहीं खोया था..
चाय ट्रे में लिए वो सबके सामने ले आयी.. सबको चाय देकर वो गिट्टू को अपने पास खींच अपनी चाय लेकर बैठ गयी..

उसके दिमाग में अस्पताल की बातें चक्कर काट रहीं थी..

उनके सामने आयी डाक्टरनी ने ऑपरेशन करने के लिए जिस डॉक्टर का नाम लिया था, वो राजेंद्र रघुवंशी ही तो था… वो बार बार अपने दिमाग पर ज़ोर डाल रही थी..
ये नाम बहुत सुना है.. लेकिन कहाँ ?
कहाँ सुना  है ये नाम..
डॉक्टर राजेंद्र रघुवंशी ? डॉक्टर राजेंद्र ? राजेंद्र ? डॉक्टर ? डॉक्टर साहब ? डाक साब ? डाक साब…

वो एकदम से चीखते चीखते रह गयी…
तो क्या इसका मतलब उसके पति का ऑपरेशन कुसुम के डाक साब ने किया है…
हे भगवान !! वो एक बार फिर अस्पताल जाने के लिए तड़प उठी…
लेकिन अभी ही तो लौटी थी, अब तुरंत उसका जाना कैसे संभव होता…?
वो अपनी चाय खत्म कर बहुत तेजी से रसोई की तरफ बढ़ गई..
उसकी सास ने उसे आवाज देकर रोकना भी चाहा,

” बहू इतनी जल्दबाजी मत करो। आराम से बैठकर चाय पी लो। तुम भी तो थक गई हो ।”

“नहीं अम्मा जी! हम फटाफट खाना बनाकर बाबूजी के लिए लेकर जाते हैं ।”
“तुम कहां जाओगी? सब ड्राइवर के हाथ से भेज देंगे। तुम्हारा ऐसे अकेले ड्राइवर के साथ अस्पताल जाना ठीक नहीं है।”

अब तक ससुराल में अपनी सास की हर बात पर चुपचाप हामी भर देने वाली सुजाता तड़प कर रह गई। उसे मालूम था कि उसे क्या करना है? इसलिए इस वक्त अपनी सास के साथ बहस में पड़ने की जगह,वो रसोई में चली गई। और वहां काम करने वाली नौकरानी के साथ लगकर वह भी जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगी।

उसे अब एक ही नाम सूझ रहा था। डॉ राजेंद्र रघुवंशी!
पता नहीं उस डॉक्टर ने सच में ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया भी है या सिर्फ इन लोगों को बहला कर भेज दिया। और सबके जाते ही अपना कारनामा दिखाकर कुछ ना कुछ गड़बड़ कर दी, तो क्या होगा?
आखिर उस लड़के के साथ भी तो चंद्रभान ने बहुत बुरा किया था तो फिर वह क्यों उसके साथ अच्छा करेगा? मन ही मन सोचती सुजाता जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी…

****

“क्या लग रहा है दीपक भैया ? चंद्रा भैया बचेंगे या.. ?”.

“अबे काहे नहीं बचेंगे ? अभी उन्हेँ पूरे दूर्वागंज और मानौर पर राज करना है.. !”..दीपक ने फ़रमान सा सुनाया !

“मानौर पर तो परिहारों का राज है.. सुना है कल सरपंच चुनाव का नतीजा घोषित होने जा रहा !”

वहीँ बैठे एक लड़के के ऐसा बोलते ही दीपक ने उसे देखा..
उसे मालूम था अखंड इस बार सरपंच के चुनाव में खड़ा हुआ था…
दीपक ने आसपास के गांव में घूम घूम कर छुपे दबे तरीके से अखंड का दुष्प्रचार करने की बहुत कोशिश की थी..
उसका ध्यान पूरी तरह से इस बात पर था कि अखंड सरपंच का चुनाव न जीते लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था…!

इधर अस्पताल के अंदर राजेंद्र चंद्रा के वाइटल्स पर पूरी तरह ध्यान बनाए हुए था..
पहले पहल जब उसने चंद्रभान को अपने ऑपरेशन टेबल पर लेटा हुआ देखा, तब एक पल को कुसुम का चेहरा उसकी आंखों के सामने से होकर गुजर गया था।

         दोनों भाई बहन का चेहरा आश्चर्यजनक रूप से मिलता था। बस रंग का अंतर था।

चंद्रभान जहां दूध की तरह सफेद गोरा था,वहीं कुसुम सांवली रंगत लिए हुए थी, पर दोनों के नैन नक्श बहुत कुछ एक जैसे थे। अगर चंद्रभान मान चुका होता तो आज कुसुम उसकी पत्नी होती, लेकिन अपनी अकड़ में चंद्रभान ने उन दोनों के प्यार के खिलते हुए फूल को अपने पैरों के नीचे मसल कर रख दिया था।

इसके पहले भी जब उसने कुसुम और राजेंद्र को एक साथ देखा था, तब कुसुम को तो घर ले गया था, लेकिन इसी चंद्रभान के गुंडो ने भावना और उसकी हालत खराब कर दी थी ।पता नहीं कितना मारा था उसे, और उसे खुद के मार खाने से ज्यादा दुख भावना पर पड़ रही चोंटों का था।
वह नाज़ुक सी लड़की और भी ज्यादा घबरा गई थी। भावना का ध्यान आते ही उसे लगा कि एक बार उसे भावना से फोन पर बात कर लेनी चाहिए ।
जब से वह अस्पताल आया है, उसने पलट कर भावना का कोई हाल-चाल नहीं लिया। पता नहीं उस लड़की ने कुछ खाया भी होगा या नहीं..

राजेंद्र एक किनारे रखी टेबल की तरफ बढ़ गया। जहां उसका फोन रखा था। उसने फोन उठाकर देखा, उसका फोन बंद हो चुका था।
     फोन को जेब में डालकर वह वापस चंद्रभान की तरफ बढ़ आया। उसी समय शिफ्ट  की बदली हुई थी और नयी आयी ड्यूटी नर्स राजेंद्र के पास चली आयी..

” सर अब आप भी घर जाकर आराम कर लीजिए, सुबह से आप यही है।
आपको अस्पताल में लगभग दस बारह घंटे बीत चुके हैं…जाइये सर,वरना आपकी तबियत बिगड़ जाएगी.. !”

राजेंद्र ने नर्स की तरफ देखा, तब तक में दूसरा ड्यूटी डॉक्टर भी आ चुका था..
उसने भी राजेंद्र के कंधे पर हाथ रख दिया..

” तुम निकलो राजी यहां मैं देख लूंगा..
वैसे भी ऑपरेशन सक्सेसफुल हो ही चुका है और अभी इन्हें सामान्य होने में वक्त तो लगेगा ही..
यूरिन आऊटपुट भी आ चुका है.. इसलिए ज्यादा टेंशन वाली बात नहीं है.. !”

राजेंद्र भी काफी थक चुका था, इसलिए वो भी वहाँ से निकल गया…
राजेंद्र वहाँ से निकला और बाहर बने कॉरिडोर से होकर गुज़र रहा था कि उसकी नजर वहाँ बैठे कुसुम के पिता पर चली गयी..
कितने बेबस और थके हुए से लग रहे थे वह। उन्हें देखते ही राजेंद्र को उन पर तरस आने लगा।वक्त बदलते देर नहीं लगती।
      बाकी जो ठाकुर किसी दिन अपनी अकड़ में, घमंड से ऊंचे आसमान में उड़ा करता था, आज किसी पर कटे पंछी की तरह बेबस और लाचार अपने घुटनों पर हाथ दिए बैठा था।

कभी-कभी वक्त इंसान को ऐसे ही अवश कर देता है। जब चाह कर भी इंसान कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि उसके हाथ में कुछ होता ही नहीं, प्रार्थना करने के सिवा। और तब भगवान अपनी लीला दिखाते हैं…
कॉरिडोर की कुर्सी पर चुपचाप बैठे ठाकुर साहब जमीन को ताक रहे थे।अभी ले देकर एक खुशी उनके घर आई थी। उनकी बिटिया बड़ी शान से आसपास के सबसे बड़े ठाकुर परिवार में ब्याह दी गई थी।
इस खुशी को अभी वह अच्छे से महसूस भी नहीं कर पाए थे कि उनके घर का चिराग हादसे का शिकार हो गया।
वह भी कोई छोटा-मोटा हादसा नहीं। रात का वक्त होता तो एक बार फिर भी वह चंद्रभान का दोष ढूंढ लेते कि हो सकता है उसने ज्यादा पी ली हो, और इसलिए संतुलन खोकर गिर पड़ा हो।
लेकिन सुबह के वक्त चंद्रा कभी भी नहीं पिया करता था। वह उसका हिसाब किताब देखने का वक्त होता था। और उस वक्त उसका दिमाग सबसे ज्यादा पैनेपन से काम करता था। ऐसे में तीसरी मंजिल से उसका गिर जाना ठाकुर साहब को अंदर ही अंदर बेचैन किया दे रहा था ।क्या सच में चंद्रा खुद ही संतुलन खोकर गिरा या किसी ने उसे धक्का दे दिया?
लेकिन वहां मौजूद हर एक इंसान चंद्रा का ईमानदार गुर्गा था, और अगर इनमें से कोई एक बेईमान होता भी तो भी इतने लोगों के बीच उसकी हिम्मत नहीं थी कि वह चंद्रा को धक्का दे दे।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि चंद्रा गिर पड़ा। वह अपने ख्यालों में खोए हुए थे कि उनके पास से गुजरते हुए राजेंद्र ने उनकी तरफ देखा और आगे बढ़ाने को था कि तभी राजेंद्र की आहट से ठाकुर साहब ने अपनी बंद रखी आंखें खोल दी।

उनकी नजर जैसे ही राजेंद्र पर पड़ी, वह धीरे से अपनी जगह पर खड़े हो गए ।
ठाकुर साहब ने आज तक राजेंद्र का चेहरा नहीं देखा था। यहां तक कि वह कुसुम और राजेंद्र के बारे में ज्यादा कुछ जानते भी नहीं थे। जो कुछ था चंद्रा सुजाता और घर की औरतों के बीच की ही बात थी। बड़े ठाकुर तक यह बात पहुंचने ही नहीं दी गई थी। उन्होंने अपने बेटे का हाल-चाल जानने के लिए राजेंद्र की आंखों में झांकते हुए सवाल किया ।

“चंद्रा ठीक तो हो जाएगा ना?”

इस छोटे से वाक्य में जैसे उन्होंने अपने जीवन की सारी शक्ति निचोड़ कर रख दी थी। इस छोटे से सवाल में एक बाप का भय झलक रहा था, अपने बेटे के लिए।
   
      दुनिया का सबसे दर्दनाक और भारी बोझ है एक बाप के कन्धों पर बेटे की अर्थी! कोई बाप अपने बेटे को कंधा देने का बोझ नहीं उठा सकता। और उस बोझ को उठाने की आशंका भी कैसे एक पिता को भयभीत कर देती है, यह चंद्रा के पिता को देखकर अनायास ही समझ आ रहा था।
    राजेंद्र को भी कुसुम के पिता को देखकर तरस आने लगा था। उसने अपने सामने जुड़े उनके दोनों हाथों को पकड़ना चाहा, लेकिन तभी उसके मन में अपनी नीची जात और ठाकुर साहब की ऊंची जात आ गई।
उसे लगा वह कैसे उन्हें छू सकता है? उसने अपना बढा हुआ हाथ रोक लिया और खुद ही उनके सामने हाथ जोड़ दिए…

“आप चिंता मत कीजिये, हम सब अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं.. ! उम्मीद है वो बिलकुल ठीक हो जायेंगे !”

उसने जैसे ही ये कहा कुसुम के पिता ने भावुकता में राजेंद्र के हाथ पकड़ लिए। राजेंद्र के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई।
कितना अजीब होता है ना इंसान, जिस वक्त उसके ऊपर मौत का खौफ मंडराने लगता है, उस वक्त वह अपनी अकड़, अपनी जात पात, बिरादरी खानदान, अपनी बड़ी-बड़ी बातें, गर्वीली चुटीली धमकियाँ सब कुछ भूल कर रह जाता है।
    ठीक है, माना कि इस वक्त कुसुम के पिता को उसकी नीची जात के बारे में मालूम नहीं है, फिर भी यह भी तो नहीं मालूम कि वह है किस समुदाय से? कौन से धर्म को मानता है? किस जात में पैदा हुआ है? बावजूद उन्होंने एक भरोसा दिखाने के लिए और एक भरोसा राजेंद्र से पानी के लिए उसका स्पर्श कर लिया।
    राजेंद्र के चेहरे पर एक पीड़ा भरी मुस्कान आई और चली गई। उसने आंखों से ही उन्हें ढांढस बंधाया और उनकी बंद हथेलियों पर अपने हाथ से थपकी देकर उन्हें सांत्वना देकर वहां से निकल गया।
        चुपचाप भारी कदमों से वह अपने घर की तरफ बढ़ता जा रहा था। उसके मन में भी कोलाहल मचा हुआ था। सुबह कुसुम भी उसे इसी कॉरिडोर में नजर आई थी। और कुसुम के ठीक बगल में खड़ा वह लंबा गोरा चिट्टा सजीला नौजवान जरूर उसका पति ही था।
     जोड़ा तो वाकई सुंदर था। लेकिन क्या वह वाकई सिर्फ अपनी छोटी जात के कारण कुसुम का पति बनने के काबिल नहीं था?

क्या कुसुम उसके बगल में खड़ी होती तो वह दोनों एक सुंदर सा जोड़ा नहीं लगते? क्या उन दोनों को एक साथ देखकर लोगों के मन में यह बात नहीं आती कि बहुत खूबसूरत जोड़ा है। क्या लोग उनकी कुशलता की कामना नहीं करते?

    अपने ख्यालों में खोए हुए, वह डूबा थका सा अपने घर पहुंच गया। इस थोड़ी सी देर में उसके दिल दिमाग से भावना गायब हो चुकी थी। उसे ध्यान ही नहीं था कि भावना भी घर पर है। उसने बाहर वाले दरवाजे को खोल शू रैक में अपने जूते उतार कर रखें और अपनी जेब से चाबी निकाल कर घर के मुख्य दरवाजे पर लगा दिया, दरवाजा एक झटके में खुल गया। वह खोलकर अंदर चला आया, लेकिन अंदर का नजारा देखते ही उसकी आंखें चौड़ी हो गई।
यह तो उसका घर कहीं से लग ही नहीं रहा था। नीचे पड़े गद्दे को साफ सुथरा करके उस पर एक साफ गुलाबी सी चादर बिछी हुई थी। दीवार से लगकर उस पर दो तकिये कुशन की तरह रखे गए थे। उस गद्दे से लगकर एक छोटा सा गुलदस्ता रखा था, और उसके किनारे एक छोटी सी टेबल थी। जिस पर राजेंद्र का लैपटॉप रखा चार्ज हो रहा था। घर की दो पुरानी प्लास्टिक की कुर्सियां जो बिना किसी काम के बालकनी में पड़ी पड़ी ऊंघ रही थी, उन्हें भी साफ करके भावना ने इस हाल में एक तरफ रख दिया था।

   अपने सजे संवरे से हाॅल को देखने के बाद राजेंद्र को ख्याल आया कि घर में अब एक लड़की भी मौजूद है। जाहिर है घर को संवरना तो था ही।
एक हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई, और वह अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके कमरे में अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ था…
यूँ लगा भावना उसके कमरे में आई ही नहीं।

उसने अपने कपड़े बदले और हाथ मुंह धोने बाथरूम में घुस गया। बाथरूम से निकल कर उसने अपना आरामदायक पजामा पहना और बाहर निकल आया..
बाहर हाल में आते ही लैपटॉप के एक तरफ एक गिलास में पानी और एक गर्म चाय की प्याली रखी थी। चाय और पानी को देखते ही उसे वापस भावना का ध्यान आ गया, और वह मुड़कर अपने कमरे में दाखिल हो गया। एक आरामदायक सी टीशर्ट निकाल कर उसने पहनी और वापस बाहर चला आया। अब तक में उसे भावना कहीं नजर नहीं आई थी। पानी का गिलास उसने एक सांस में खत्म कर दिया, और चाय का प्याला लेकर बालकनी में निकल गया…

वह इस वक्त अपने ख्यालों में ही गुम रहना चाहता था। क्योंकि यही वह जगह थी, जहां कुसुम से मिलने के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। सुबह कुसुम साड़ी पहन कर अस्पताल आई थी। उसने पहली बार साड़ी में उसे देखा था।
गहरी नारंगी रंग की साड़ी पर रानी कलर का आंचल था, और उसी रंग का ब्लॉउस..।
अपने लंबे घने बालों को उसने थोड़ा सा पकड़ कर पीछे क्लच किया था, और बाकी घुटने तक के उसके लंबे बाल पीछे लहरा रहे थे। माथे पर लगी लाल बिंदी उसके चेहरे की खूबसूरती और बढ़ा रही थी। बीच की मांग निकाल कर उसने सिंदूर डाला हुआ था और उस सिंदूर की सिंदूरी आभा उसके चेहरे पर भी निखर गई थी।
       प्रेयसी से ज्यादा किसी की पत्नी बनकर वो ज्यादा खूबसूरत लग रही थी।
    बहुत खूबसूरत !!
गले से लगकर उसने एक हार पहना हुआ था, और दूसरा हार उसके पेट तक आ रहा था।

    तो क्या अपने भाई के एक्सीडेंट को सुनने के बाद भी कुसुम इतना तैयार होती बैठी थी?  नहीं ऐसा तो संभव नहीं है, वह अपने भाई से कितना भी नाराज हो उसने जैसे ही सुना होगा, वह तुरंत अस्पताल के लिए भागी होगी। इसका मतलब वो उस हवेली में ऐसे ही बन ठन कर रहती होगी। उसका पति भी तो बिल्कुल बना संवरा लग रहा था। सलीके से सजे संवरे बाल, उस की गोरी गोरी उंगलियों में सजी अंगूठियां और उसके गले में पड़ी मोटी सी छह तोले की सोने की चेन, देखकर समझ में आ रहा था कि गांव का रईस जमींदार ठाकुर है…।

“खाना लगा दूँ.. ?”

वह खोया हुआ था कि तभी भावना की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह चौक कर पीछे मुड़ गया। दरवाजे के भीतरी तरफ भावना दीवार से लगकर खड़ी थी। उसी समय उनके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।
भावना ने दरवाजे की तरफ देखा और चुपचाप खड़ी रह गई। राजेंद्र अंदर आया और दरवाजा खोलने चला गया..

राजेंद्र के साथ यहां अस्पताल में काम करने वाला उसका दोस्त संजीत आया था..

संजीत बड़ा खुशमिजाज लड़का था, उसे मालूम था कि राजेंद्र कोर्ट मैरिज कर कर लौटा है। हालांकि संजीत को कुसुम के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। इसलिए घर के अंदर घुसते ही सामने खड़ी भावना को देखकर वह भावना के चरणों की तरफ बढ़ गया..

” चरण स्पर्श करते हैं भाभी जी..!”

भावना अचकचाकर पीछे हट गई। और संजीत हंसते खिलखिलाते खड़ा हो गया। भावना ने धीरे से अपने हाथ जोड़ दिये..

” तू इस वक्त यहां कैसे..?”

राजेंद्र ने चौंक कर संजीत से सवाल कर दिया और संजीत राजेंद्र को घूर कर देखने लगा। उसे देखने के बाद अपनी बात कहते हुए वह भावना की तरफ देखने लगा। भाभी जी एक कप चाय मिलेगी..

“हाँ क्यों नहीं.. अभी ले आती हूँ.. !”

भावना अंदर की तरफ मुड़कर जाने लगी कि संजीत ने भावना को वापस आवाज लगा दी..

” भाभी जी ऐसा कीजिए खाना ही खिला दीजिए। अब मैं खाना खाकर ही जाऊंगा..।”

भावना ने हामी भरी और अंदर चली गई। राजेंद्र भी आकर संजीत के बगल में बैठ गया। संजीत आराम से नीचे बिछे गद्दे पर पसर गया। उसने वही एक किनारे रखा रिमोट उठाया और टीवी लगा लिया..

” अब ये बता भाई, अचानक हुआ क्या जो तू यहां टपक पड़ा..?”

” होना क्या है। आज मेरे कुक ने बिना बताए छुट्टी मार दी। बाहर का खाना खाने का मन नहीं था तो मैंने सोचा तेरे घर आ जाता हूं।
मेरे टीवी का सब्सक्रिप्शन भी खत्म हो गया था। तो सोचा तेरे घर पर बैठकर कोई अच्छी सी मूवी देख लूंगा, और साथ में भाभी के हाथ का लजीज खाना भी खा लूंगा। वैसे तू इतना चौंक क्यों रहा है बे?
चिंता मत कर, रात में यहाँ नही रुकूंगा, रात में तुझे तेरी बीवी के साथ अकेले छोड़कर मैं वापस लौट जाऊंगा..।
बस खाना खाने आया हूँ.. !”

“साले खाना खाने बस आया है, तो ऐसे बोल रहा जैसे मैंने होटल खोल रखा हैं यहाँ.. खाना बनाने में भी तो वक्त लगता है..!”

“आय हाय नयी नवेली बीवी की इतनी चिंता ! वैसे भाई हम सब दोस्तों में सबसे पहले शादी तूने ही की है, तो अब तुझे एक-एक करके सबको खाने पर तो बुलाना ही पड़ेगा..अब इसमें कोई कंजूसी नहीं चलेगी.. समझा ?”
.
” अब मैं कहां कंजूसी करता हूं? कंजूस तो साले तुम लोग हो, जब भी कैंटीन में बैठते हो, कभी यह नहीं हुआ कि अपनी चाय और समोसे के पैसे तुमने दिये हों ?”

“हाँ तो क्यों देंगे.. एमबीबीएस भले ही साथ में किया हो, लेकिन एमएस के दौरान तो मैं तेरा जूनियर ही था ना। एक साल जूनियर होने का फायदा तो अब मैं जिंदगी भर उठाऊंगा, हर जगह बिल तू ही पे करेगा..।”

संजीत की बात सुनकर राजेंद्र के चेहरे पर भी हल्की सी हंसी चली आई। तभी उसका ध्यान संजीत के पीछे की तरफ खुल रहे दरवाज़े पर खड़ी भावना पर चला गया..
भावना उसे हाथ दिखा कर अंदर बुला रही थी..

राजेंद्र बहाने से अंदर चला आया..
भावना उसे रसोई में लें गयी.. और भगोने खोल कर दिखा दिए..

“घऱ पर कोई सब्जी नहीं थी, बस आलू प्याज़ पड़े थे,इसलिए ये आलू की दही वाली सब्जी बना रखी थी, और रोटियां सेंकी थी..
अभी इनके कहने के बाद फटाफट ये बेसन की सब्जी बनायीं है.. बस इतने में हो जायेगा ना, या कुछ मीठा भी बनाना पड़ेगा.. !”

भावना ने मासूमियत से उससे सवाल पूछा और भावना के माथे पर खींची परेशानी की लकीरों को देख राजेन्द्र हल्के से मुस्कुर उठा..

“ये तो बहुत है.. हम बैचलर्स तो सिर्फ रोटी और चाय खा कर भी रह लेते हैं.. तुमने तो बहुत कुछ बना लिया.. ! जितना है यही ले चलते हैं.. चलो मैं मदद कर दूँ !”

“नहीं ऐसा कोई बड़ा काम नहीं हैं.. आप चल कर बैठिये.. हम खाना वहीँ लें कर आते हैं.. !”

सलीके से थाली सजा कर भावना उन दोनों का खाना लिए बाहर चली आयी..
दो कटोरी में गर्मागर्म सब्जियां और घी लगे फुल्के के साथ कटा हुआ सलाद भी रखा था..

थाली से उठ रही खुशबु से सुबह से सोई राजेंद्र की भूख भी जाग गयी..
दोनों दोस्त खाने की थाली पर जो टूटे की भावना फुल्के सेंक कर लाती गयी और दोनों खाते चले गए..

लगभग आठ दस फुल्के सेंक लेने के बाद भावना पूछने आयी और दोनों ने मना कर दिया..
भावना ने अंदर जाकर चूल्हा बंद कर दिया..
प्लेट्स अंदर रखने आये राजेंद्र ने जब भावना को रसोई साफ करते देखा तो उसके खाने के लिए पूछ लिया..

“तुम्हारा खाना ?”

“मुझे भूख नहीं है !”

“ये क्या बात हुई ? खाने का भूख से क्या लेना देना !”

राजेंद्र कुछ भी बोल गया और भावना माथा सिकोड़े  उसे देखने लगी..

“आप डॉक्टर हैं और ऐसी बात कर रहे ? वाकई भूख नहीं मुझे वरना खा लेती !”

राजेंद्र ने भगोने खोल कर देखे, सब्जियां ख़त्म हो चुकी
थी.. उसे याद आया, सब्जी में स्वाद था इसलिए उसके दोस्त ने भी दो दो बार मांग कर लिया था सब कुछ..
इसका मतलब उन दोनों भुक्कड़ो ने भावना के लिए कुछ बचने ही नहीं दिया !

घऱ पर तुरंत बनने वाली भी कोई चीज़ नहीं रखी थी…

राजेंद्र बाहर निकल गया..

“चल संजीत पान खा कर आते हैं !” वो संजीत को साथ लिए निकल गया…

उसने अपनी कॉलोनी के बाहर बने छोटे से भोजनालय की तरफ रुख किया लेकिन उसे संजीत ने टोक दिया..

“वहाँ कहा जा रहा है यार.. उससे ज्यादा टेस्टी तो ज़हर लगता है.. कौन खायेगा इसके घटिया खाने को..?”

सब्जी के खुले भगोनों पर भिनकती मक्खियों और मोटी मोटी जली हुई रोटियों को देखकर राजेंद्र भी पल भर को सोचता रह गया कि क्या भावना इस खाने को खा पाएगी? और तभी उसे एक आइडिया आया वही पास में खुले प्रोविजन स्टोर से उसने एक बड़ा मैगी का पैकेट लिया और पान ठेले से पान बंधवाकर वह घर लौट गया। उसके घर के पास पहुंचकर संजीत ने उससे विदा ली और अपने घर के लिए निकल गया..

राजेंद्र एक बार फिर दरवाजा खोल कर अंदर चला आया। लेकिन इस बार भी उसे भावना हाॅल में नजर नहीं आई।
   वह सीधा रसोई में चला गया। लेकिन भावना वहां भी नहीं थी। वह वापस हाॅल में आया, और बालकनी में गया, भावना वहां भी नहीं थी। घर में अब सिर्फ एक उसका बेडरूम और एक दूसरा खाली पड़ा बेडरूम ही बाकी था। उसने हाॅल से ही भावना को आवाज लगा दी भावना उस दूसरे बेडरूम से बाहर निकल आई..

“क्या हुआ.. कुछ चाहिए था.. ?”

“हाँ.. पहले यह बताओ तुमने कुछ खाया?”

भावना ने ना में गर्दन हिला दी।

“मैंने कहा ना, मुझे भूख नहीं है।”

” ओके, लेकिन मुझे पता नहीं क्यों आज बहुत भूख लग रही है। मेरे लिए यह मैगी बना दोगी।”

भावना ने मैगी का पैकेट देखा और हां में गर्दन हिला कर रसोई में चली गई।

” सादा बनाऊं या आलू प्याज डाल दूं।”

” डाल दोगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा।”

भावना ने मैगी बनानी शुरू कर दी..

“सुनो साथ में चाय भी बना लोगी क्या?”

राजेंद्र के ऐसा कहने पर भावना ने हां कहा और एक छोटे चाय के बर्तन में चाय भी चढ़ा दी

दस मिनट में वह मैगी प्लेट में लिए बाहर चली आई.. इसके साथ ही उसने एक कप चाय भी रखी हुई थी। वो जैसे ही हाॅल में आई, नीचे बिछे गद्दे पर बैठा राजेंद्र खड़ा हो गया, और किनारे लगी कुर्सी पर बैठ गया।

भावना ने जमीन पर मैगी की प्लेट और चाय का कप रखा और जाने लगी कि राजेंद्र ने उसे टोक दिया..

“बैठो भावना।”

राजेंद्र की तरफ भावना आश्चर्य से देखने लगी।
बिना किसी नानूकुर के भावना चुपचाप वहां बैठ गई।

    ” सामने रखा नाश्ता और चाय खाओ भावना।”

   भावना ने राजेंद्र की तरफ देखा, और अब उसे सारी बात समझ में आई कि राजेंद्र अपनी भूख का बहाना करके उसके लिए बनवा रहा था।
भावना ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप प्लेट उठा ली राजेंद्र ने टीवी चला दिया। टीवी पर कोई पुराना मैच चल रहा था। राजेंद्र उसे देखने लगा। भावना भी टीवी देखते हुए चुपचाप खाने लगी।

हालांकि दोनों के दिल दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। दोनों की बस आंखें टीवी स्क्रीन पर गड़ी थी, लेकिन जहां एक तरफ राजेंद्र कुसुम के बारे में सोच रहा था, वही भावना निनाद के बारे में…

क्रमशः

aparna…

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