
बेसब्रियां… 4
अक्षत नहा धोकर कपड़े बदल कर सुथरा निखरा होकर नीचे चला आया ! उसके नीचे आते ही मोहिना के चेहरे की रौनक बढ़ गई! उसे देखकर श्लोक ने आदम कद लकड़ी के बने सेलर की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए.. लेकिन उसे उस तरफ जाते देख अक्षत ने उसे रोक दिया…
” नहीं श्लोक, इस वक्त और कुछ नहीं सिर्फ कॉफी पीने का इरादा है..!”
” एज़ यू विश..!” कहकर श्लोक भी सोफे की तरफ चला आया ! मोहिता घर के नौकर के साथ सबके लिए कॉफी लेकर हॉल में ही चली आई…
” कैसे हो राज..?”
ट्रे में से कॉफी का कप उठाकर मोहिना ने अक्षय की तरफ बढ़ाया और उसकी आंखों की गहराइयों में झांकते हुए उससे सवाल कर लिया ! अक्षत ने एक नजर मोहना को देखा और कंधे उचका कर ठीक हूं का जवाब दे दिया…
मोहिना से अक्षत की बातचीत कम होती थी ! जाने क्यों वह अक्सर उससे बचा करता था | लेकिन श्लोक की बड़ी बहन मोहिता को वह अपनी सगी बड़ी बहन की तरह ही मानता था | अपना कप पकड़ कर वह मोहिता के बगल में जाकर बैठ गया…
” कैसी हैं आप..?”
अक्षत ने एक साधारण सा सवाल पूछा था | लेकिन उसकी आवाज की गहराई ऐसी थी कि मोहिता की आंखें नम हो गई..
” ठीक हूं.. तू कैसा है..?”
” कैसा दिख रहा हूं..?”
” दिखते तो मेरे दोनों भाई बिल्कुल हीरो हैं…! बाकी मेरा सवाल तेरे मिजाज़ के लिए था.. ?
कुछ गुस्सा कम हुआ है या अब भी वैसे ही बात बात पर सनकता रहता है.. !
आंटी कितना परेशान रहती थी, बचपन में तेरे गुस्से से..!”
मोहिता की बात सुन अक्षत के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आते-आते थम गयी ! वह मुस्कुराता बहुत कम था | उसे शायद ही आसपास किसी ने भी मुस्कुराते देखा हो.. |
अपने चेहरे पर के पथरीले भाव लिए वह उसी तरह बैठा कॉफी पीता रहा कि तभी श्लोक भी उसके ठीक बगल में आकर बैठ गया | उसके कंधे पर हाथ रख कर श्लोक ने अपने मन की बात उससे कहनी शुरु कर दी..
” देख मैं अच्छे से जानता हूं कि तेरे अपने प्लांस होते हैं | और तू कभी किसी और के प्लान के हिसाब से चलना नहीं चाहता | लेकिन बस आज रात के लिए मेरी छोटी सी अर्जी मान ले | यहाँ पास में शर्मा आंटी रहती हैं | वह एक्चुअली मॉम की दूर की कजिन की बेस्ट फ्रेंड है और बस इसीलिए उनके बुलावे को हम लोग मना नहीं कर सकते | आज रात को उनके घर पर माता की चौकी है | आज हम सब का खाना पीना उन्हीं के घर है तो प्लीज मना मत करना यार..!”
” मैंने कब तुझे मना किया ? तू जा ना आराम से…
माता की चौकी में गाने गा, जगराता कर, मसालों के ज़हर से ज़हरीले छोले और फैट की नदी में तैरते भटूरे ठूंस, और इतने सारे मज़े करने में बाद आधी रात को घर वापस आ जा..
मैंने तुझे कभी नहीं रोका इन सब से..!”
” अरे मैं तुझे साथ चलने की बात कर रहा हूं..!”
‘ यह तो गलत बात है श्लोक.. मैं क्यों जाऊं तेरे साथ..?!
” तू अकेला घर पर करेगा क्या..?”
” बेटा आज के जमाने में जिसके पास स्मार्टफोन हो ना उससे यह सवाल करना बेमानी है ! क्योंकि आजकल इंसान अकेला कोना ही ढूंढता है अपने पर्सनल मोबाइल के साथ, समझे..!
तो मैं बोर नहीं होऊंगा तुम तीनों चले जाना..!”
” अक्षत तुम भी चलो ना प्लीज.. ! यहां दिल्ली पर माता की चौकी बहुत अच्छी होती है..!”
अक्षत ने मोहिना की बात पर धीमे से ना में गर्दन हिलाई और उठकर दीवार से लगी एक लकड़ी की दराज की तरफ बढ़ गया..!
वो एक लंबी चौड़ी अलमारी थी जिस पर ढेर सारी किताबें रखी थी ! यह श्लोक के दादाजी की बुक शेल्फ थी ! जिसमें नई पुरानी सैकड़ों किताबें सजी हुई थी ! और इस अलमारी से अक्षय को कुछ विशेष लगाव था ! वह उस अलमारी के पास पहुंच कर उन किताबों में से अपनी पसंद की कोई किताब ढूंढने लगा कि तभी मोहिता उसके पास चली आई, उसके कंधे पर हाथ रखकर उसने अक्षत से अपनी बात कहनी शुरू कर दी…-” अक्षत !! मैं चाहती हूं कि तुम मेरे साथ आज माता के जगराते में चलो.. पता नहीं क्यों आजकल मन बहुत कड़वा सा रहता है ! इसलिए मैं खुद चाहती थी कि मैं माता के जगराते में जाऊं…
मुझे तुम्हारी भी जरूरत है..!”
अक्षत ने लाचारगी से मोहिता की तरफ देखा…
” ठीक है….
तुम्हारे केस की डेट कब की है..?”
अक्षत के सवाल पर मोहिता ने चुप्पी साध ली और श्लोक अक्षत के पास चला आया ! उसके कंधे पर हाथ डालकर वह उससे बात करते हुए उसे एक तरफ ले गया…
” हम लोग कोशिश में हैं कि मोहिता के पति से बातचीत करके आउटसाइड कोर्ट सेटलमेंट कर लें…! बार-बार तलाक के लिए कोर्ट जाकर मोहिता अब थोड़ा परेशान होने लगी है..!”
” छोड़ना नहीं है उस मक्कार इंसान को..! एक बात बता क्या आउटसाइड कोर्ट सेटलमेंट के बाद वो लोग इस बात पर राज़ी होंगे जिस बात के लिए हम उन्हें फ़ोर्स कर रहे.. ?
क्या इस सेटलमेंट में वह मोहिता को वह सारा हर्जाना देने को तैयार है जो हम उससे मांग रहे हैं..!”
” मैं तो बस यह कह रहा था अक्षत कि वह..!”
” श्लोक प्लीज तू इस तरह से हिम्मत मत हार… !
मोहिता पहले ही अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी कर चुकी थी उस इंसान से शादी करने की.
. अब ले देकर तो बात अलग होने तक पहुंची है और उस पर भी बिना उनसे सारा हरजाना वसूले, उन्हें इस तरह खाली छोड़ देना कहीं से भी ठीक नहीं है…!
आखिर मोहिता की सारी जिंदगी का सवाल है.. श्लोक यह कभी मत भूलना कि हम बिजनेसमैन हैं…
हर चीज को हम अपने बिजनेस के नजरिए से देखते हैं..!”
” मैं वह सारी बातें समझता हूं अक्षत, लेकिन सामने वाले को हम इन बातों के लिए फोर्स तो नहीं कर सकते..?”
” क्यों नहीं कर सकते…?
जब हम लोग इस शादी की सारी सच्चाई अच्छे से जानते हैं कि आखिर क्यों मेहरा ने यह शादी रचाई थी..?
शादी क्या रचाई थी, शादी का स्वांग रचाया था… ?
आखिर मेहरा फैमिली ने अपने लड़के की शादी मोहिता से सिर्फ इसीलिए करवाई जिससे उनका बिजनेस तेरे बिजनेस के साथ जुड़ सकें और उनके शेयर्स से उन्हें प्रॉफिट हो सके और वह अपने बिजनेस को एक अच्छी हाइप दे सकें…
चलो यह सारी बातें भी अगर एक तरफ रख दी जाये, तो कम से कम उन लोगों को मोहिता को खुश तो रखना था | पर वह भी तो उनसे हो नहीं सका…|
बात-बात पर अपनी बहू को टॉर्चर करके मायके भेजना उससे उल जलूल डिमांड करना यह कहां तक सही था..?
ऐसे रिश्तो का अंजाम आखिर में यही होता है | और मैं इस बात को मानता हूं कि शादी हमेशा बराबर वालों में होनी चाहिए | मैं जानता हूं कि मेहरा के पास पैसों की कमी नहीं है लेकिन तेरे बिजनेस एंपायर के सामने वह लोग बहुत कम है…!
एक अपर मिडल क्लास फैमिली और अपर क्लास में बहुत फर्क होता है श्लोक..! वो लोग रईस थे, पैसे वाले थे लेकिन थे तो मिडिल क्लास ही ना….
और यह मिडिल क्लास लोग बहुत शातिर होते हैं.. इनसे जितना दूर रहोगे उतना अच्छा है…!”
उन दोनों की बातों के बीच मोहिता हाथ में कुकीज़ की प्लेट थामें उन दोनों तक चली आई और उसने कुकीज़ अक्षत के सामने बढ़ा दी है..-” मैं जानती हूं, तू मेरे लिए बहुत परेशान होता है | पर अब सुन ले मैं कुछ भी नहीं सुनूंगी | आज रात तू भी मेरे साथ माता की चौकी में चल रहा है..!”
अक्षत ने मुड़कर मोहिता की तरफ देखा और उसके सर पर हाथ रखकर धीमे से हिला दिया..-” हमारी प्रिंसेस कुछ आर्डर दे और हम फॉलो ना करें ऐसा पॉसिबल नहीं है…… मैं चलूंगा शाम को..
लेकिन मुझसे कुर्ता पजामा पहनने की उम्मीद मत करना मुझसे वो रिंकल्स वाली पैंट्स पहनी नहीं जाती प्लीज सॉरी…
मैं अपने कैज़ुअल्स में ही जाऊंगा..!”
” ओके बाबा!! जिसमें जाना हो उसमें चलना… अब खुश ! और उसे रिंकल्ड पैंट्स नहीं चूड़ीदार कहते हैं.. !”
हाँ में गर्दन हिला कर अक्षत वहीँ टेबल पर पड़े अपने बैग से कुछ काम की फाइल्स निकालने चला गया … श्लोक भी उसे साथ लेकर अपने ऑफ़िस वाले रूम की तरफ बढ़ गया…
****
शाम को शर्मा जी के लम्बे चौड़े लान में चौकी की ख़ूब तैयारी सज रही थी… रेशमी सलवार दुपट्टों में सारी किटी वाली लेडीज़ दमक रही थी…
भारी मेकअप और हेयर स्टाइल के साथ सबकी यहीं कोशिश थी कि सब अपनी उम्र से कम से कम दस साल तो कम नजर आ जाएँ…
हर कोई मिसेज़ शर्मा से एक बार मिल कर अपनी मण्डली की तरफ बढ़ती चली जा रही थी.. कि उसी वक्त पम्मी भी अपनी तीनों कन्या रत्नों के साथ उस विशाल पंडाल में पहुँच गयी…
उसके ठीक पीछे लीला भी गेट से अंदर दाखिल हुई और उसे देखते ही मुहल्ले की ही पिंकी दसाज़ अपने साथ बैठी मिसेज़ सेठी के कान में गुनगुनाने लगी..
“ये लो आ गयी चुगली की दुकान.. ! और देखो ज़रा हम सब को थीम रेड है बोल कर खुद मेजेंटा पहन लिया… !!
“हाँ और की.. ? ये सही आदत ना है लीला की.. हमेशा ही ऐसी करती है… आइंदा मैंने इसकी बात नहीं सुननी !
याद है पिछली बार सबको पीले कपड़े पहनवा कर खुद ऑरेंज पहन कर चली आई.. ! “
उनकी बातों के बीच ही लीला और पम्मी वहाँ पहुंची और सब से पहले फुदक कर पिंकी ही खड़ी होकर लीला के गले से झूल गयी..
” क्यों लीला.. हम सब को रेड पहना कर खुद मेजेंटा क्यों डाल लिया खुद पर !”
“अरे मेरा रेड कुरता ड्राई क्लीन में पड़ा था.. याद ही नहीं था कि घर पर नहीं है ! अप्सरा वाले के यहाँ से ड्राई क्लीन करवाती हूँ ना… पैसे भले ही ज्यादा लेता है पर काम चंगा है बंदे का !”
लीला के शो ऑफ़ पर पिंकी का पारा उबलने लगा.. मन ही मन उसे गालियों से नवाज़ती पिंकी सामने से मुस्कुरा उठी… -” हाँ पर वक्त पर कपड़े देता भी तो नहीं !”
“हाँ !! बस इसीलिए रेड से मिलता ये पहन लिया.. !”
“चल झूठी.. ऐसी बोल रही जैसे एक ही रेड कुरता रखा है तेरे पास !”
“है तो बहुत, लेकिन चौकी के लिए कोरा पहनना था ना.. !”
वो सब बातों में लगी थी कि मिसेज़ शर्मा लगभग भागती गिरती पड़ती सी गेट की तरफ भागी और सभी औरतों का चेहरा उसी तरफ को हो गया…
गेट पर श्लोक और उसकी दोनों बहने दिखाई दी और मुहल्ले की सभी ऐसी औरतें जिनकी बेटियाँ शादी की उम्र पर थी लपक कर गेट की तरफ बढ़ गयी…
पम्मी की बाँह पकड़ कर लीला उसे भी खींचने वाली थी कि जाने कहाँ से आफत की परकाला सिम्मी टपक पड़ी और उसने कस कर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया…
“शाहरुख़ खान नहीं आया है कि उसका ऑटोग्राफ लेने दौड़ना पड़े आपको… ठण्ड रखो मम्मी जी ! वो लोग भी अंदर ही आएंगे.. !”
“अरे तो स्वागत के लिए जाने तो दें… सब जा रही, और मैं ही ना जाऊं.. ? अच्छा नहीं लगता.. !”
“ये सब जिस तरह लार टपकाते जा रहीं वो भी अच्छा नहीं लगता.. समझी आप.. !”
“तू तो जाने किस ग्रह से आई है… हमेशा तेरा दिमाग सांतवे आसमान पर क्यों टंगा रहता है.. ?”
पम्मी को सिम्मी के साथ बातों में उलझता छोड़ कर लीला भी गेट कि तरफ भाग गयी…
श्लोक बड़े प्यार से सभी का अभिवादन कर रहा था.. मोहिता भी पूरी विनम्रता से उसका साथ दे रही थी… लेकिन मोहिना का मुहँ इन आंटी नंबर वन को देख देख कर सड़ा जा रहा था…
“एक्सक्यूज़ मी ! भाई मैं उधर से कुछ पीने के लिए लेने जा रही.. गला सूख रहा है.. !”
“हाँ हाँ बेटा जी ! वहाँ फेंटा, स्लाइस, कोक सब रखा है.. मैं लें आऊं जी कुछ आपके लिए.. !”
आंटी ने बहुत सारी चाशनी घोलकर मोहिना से सवाल किया और मोहिना ने अपनी तिरछी सी जहरीली मुस्कान उन पर फेंककर नो थैंक यू का साइन बोर्ड चिपका कर सैंडल खटपटाती जूस कॉर्नर की तरफ बढ़ गयी…
“सॉरी आंटी..! आप परेशान ना हों, मैं भी खुद ही लें लेता हूँ… आखिर अपना ही घर है.. !”
जितना करारा जवाब देकर मोहिना गई थी उतना ही शीतल और सौम्य सा जवाब देकर श्लोक भी मोहिना के पीछे बढ़ने लगा और उसका कहा आखरी वाक्य कि ‘आखिर अपना ही तो घर है ‘शर्मा आंटी के दिल पर गुलाबों सा छा गया…
उनका दिल बल्लियों उछलने लगा..
वह श्लोक की तरफ से निश्चिंत होकर अपनी बेटी रानी को ढूंढने लगी..
पता नहीं कहां मर गई..! ऐसे सब मौकों पर उनकी लाड़कुंवर उनकी इकलौती, अक्सर जादुई बौने सी कहीं गायब हो जाती थी…
और उसे भर भर कर मन ही मन कोसती मिसेज़ शर्मा अपनी लसर फसर रेशमी साड़ी संभालती उसे ढूंढने निकल गयीं…
श्लोक जूस की तरफ बढ़ रहा था कि उसे अक्षत का फ़ोन आने लगा…
“कहाँ हो यार.. तुम लोग दिख नहीं रहें… ? कौन से नंबर का घर है.. ?”
“दस बटा ए में चला आ अक्षत ! बाहर के लॉन में ही सब कुछ है.. गेट भी सज़ा हुआ सा दिख जायेगा.. !”
“ओके.. पहुँच रहा हूँ.. !”
अक्षत ने फ़ोन काटा और श्लोक अपना फ़ोन जेब में डालने वाला था कि उसके हाथ से उसका मोबाइल फिसल कर नीचे गिरने को था कि उसने दोनों हाथों से उसे लपक लिया.. लेकिन इसी सब में उसका बेलेंस बिगड़ा और सामने से हाथ में जूस का गिलास लिए अपने फ़ोन पर कुछ देखती हुई आती निम्मी से उसकी ज़ोरदार भिड़ंत हो गयी….
श्लोक ने फ़ोन के साथ साथ गिरती हुई निम्मी को भी थाम लिया लेकिन निम्मी के हाथ का ऑरेंज जूस निम्मी के गुलाबी दुपट्टे के साथ साथ श्लोक की सफ़ेद शर्ट के एक हिस्से को भी नारंगी कर गया…
और उसी वक्त चौकी पर माइक की टेस्टिंग में लगा डिब्बा सिंह भजन की जगह कुछ और गीत बजा गया….
धुप से निकल के छाँव से फिसल के,
हम मिले जहां पर लम्हा थम गया…..
आसमान पिघल के शीशे में ढल के,
जम गया तो तेरा चेहरा बन गया….
दुनिया भुला के तुमसे मिला हूँ
निकली है दिल से ये दुआ….
रंग दे तू मोहे गेरुआ
रांझे की दिल से है दुआ रंग दे तू मोहे गेरुआ…..
क्रमशः
aparna….

ओहो 😃तो जोड़ियाँ तैयार हो रही हैं 😊। सीमी और अक्षत, निम्मी और श्लोक 👌🏻👌🏻👌🏻। वैसे ये सीमी और अक्षत तो दोनों ही नकचढ़े, खड़ूस से दिख रहे हैं।
सच मे दिल्ली का जगराता ऐसा होता है क्या 😃और ये ऑन्टीयाँ 🤦♀️😃।
अब देखते है अक्षत और सीमी की दूसरी मुलाक़ात कैसी होती है 🤔और निम्मी और श्लोक रंग पाते है इस रंग मे या नहीं 🤔।
बहुत ही रोचक भाग 🙏🏻।