
Gone girl:-3
— पैसों का है खेल ये सारा
मेरी और अनन्या की शादी एक ही मुहूर्त पर हुई और हम दोनो साथ साथ बिदा होकर ससुराल पहुंच गई,….घर घर नही महल था ….बिल्कुल वैसा ही जैसे किसी बड़े कारोबारी का होता है….,घर पे नौकरों की फौज थी…..
मुझे और अनन्या को कोई असुविधा ना हो इसलिए हमारे लिये एक एक पर्सनल हेल्पर थी। मेरी हेल्पर अकसर मेरे साथ रहा करती और खूब बाते किया करती थी, उसी ने मुझे कुछ अजीब बातें उस घर के बारे मेँ बताई ,जिनमें से एक बात ये थी कि मेरी सास असल में मेरे ससुर जी की दुसरी पत्नि थी और समर उनका बेटा नही था।
उसने बताया कि असल मे अमर उनका बेटा है,अब मैनें भी नोटिस करना शुरु किया कि उनका प्यार अमर के लिये जैसा निश्चल था वैसा समर के लिये नही था, लेकिन समर इन बातों को हमेशा अनदेखा किया करते थे।।
मैनें एक आध बार इशारों में समर से कहना भी चाहा पर उन्होनें मुझे बड़े प्यार से चुप करा दिया।
पर्सि अंकल पापा से मिलने गये और कुछ ही देर में भारी कदमों से बाहर आ गये, इसके बाद पापा जी को ऑपेरशन के लिये ले जाया जाने लगा लेकिन तभी , पापा जी की आंखे हमेशा हमेशा के लिये बन्द हो गई ……
……. सर ससुर जी की मौत के कुछ दिनों बाद पर्सि अंकल घर आये , वो ससुर जी की वसीयत अपने साथ लेकर आये थे, उन्होनें हम सभी घर के मेम्बर्स को बाहर बने बड़े हॉल में इकट्ठा होने कहा , घर के सारे नौकरों को भी बुलाया गया, और इन सब के बीच वसीयत पढना शुरु किया, पर तभी उन्हें सासु माँ ने रोक दिया, और पर्सि अंकल को एक तरफ ले जाकर कुछ कहा, उसके बाद पार्सि अंकल ने हम सब को ससुर जी की स्टडी में चलने कहा , नौकरों को वही छोड़ हम सारे घर के मेम्बर्स स्टडी में आ गये।
वहाँ पहुंचने के बाद सासु माँ ने कहा कि वो नही चाहती की घर की सम्पत्ति के बारे में घर के बाहर बात जाये इसिलिए यहाँ अकेले में वसीयत पढ़ी जायेगी।
अब पर्सि अंकल ने वसीयत पढ़नी शुरु की, ससुर जी की वसीयत के अनुसार __
उनकी सारी चल अचल सम्पत्ति को उन्होनें काफी सिलसिलेवार तरीके से सब में बांटा था पर बावजूद इसके उनकी सम्पत्ति का लगभग आधा भाग उनकी बड़ी बहू के नाम था, यानी मेरे नाम …..मेरे नाम पे उनके ऑफिस के 29% शेयर थे, जो की सबको मिलने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा था……उसके अलावा वो घर जिसमें सब रहते थे के अलावा सारथी के दो बंगले और दून का पेंट हाऊस सब कुछ मेरे नाम था…… उन्होनें अपने सारे लीगल बिजनेस की माल्किन मुझे घोषित कर दिया था,….उनके ऑफिस के सारे मालिकाना हक मेरे पास आ गये….मेरे बाद जिसे सबसे ज्यादा शेयर मिले वो था मेरा देवर अमर!!! उसे 22% शेयर के साथ और भी कई चीजें दी गई थी।।
मुझे आश्चर्य इस बात पे हो रहा था कि मेरे पति जो कि हर मायने मे एक आदर्श पुत्र थे के हिस्से काफी कम शेयर्स और सिर्फ एक बंगला आया था…..देवरानी को सिर्फ 8% शेयर और गहनों मे ही सन्तोष करना पड़ा था…..सासु माँ के नाम भी हीरे के गहने ,एक फ्लैट और उनके डर्बी के घोड़े ही लिखे गये थे।
कुल मिलाकर उस वसीयत के अनुसार उस सम्पत्ति की मैं आधिकारिक तौर पर माल्किन बन चुकी थी……जुलरी की डिसाइन का चयन करने से लेकर कौन से जेवर किस देश को निर्यात किये जायेंगे और हीरे कहाँ से आयात किये जायेंगे …अब हर निर्णय मेरा था।।
वसीयत के अनुसार मेरे जीते जी सब कुछ मेरा था,मेरे मरने के बाद मेरे बच्चे यानी बेटा बेटी जो हो उसका था, पर अगर बच्चे होने के पहले मेरी मौत हो जाती है तो सारी वसीयत मैं जिसके नाम करना चाहूँ या जिसे अपना नॉमिनी बना चुकी होंगी उसके नाम सब कुछ हो जाता ।
वसीयत को पढ़ कर और सबके सिग्नेचर लेकर पर्सि अंकल चले गये…..उन्होनें उस वसीयत की एक एक कॉपी हम सभी को भी दे दी और दो कॉपी अपने साथ ले गये…..
क्रमशः
aparna..

बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻