
जीवनसाथी -2 भाग -81
कहते हैं हमारे पैदा होने के पहले ही वह सर्वशक्तिमान हमारे जन्म और हमारी मृत्यु की तारीख चित्रगुप्त के पास अंकित कर चुका होता है..
हम चाहे कितना भी बदलना चाहे लेकिन यह दो तिथियां हम अपनी मर्जी से नहीं बदल सकते… !
जैसे किसी की मृत्यु अटल है, टाली नहीं जा सकती… ठीक वैसे ही आने वाले का जीवन भी अटल है !!
किसी का जन्म भी टाला नहीं जा सकता !
परिस्थितियां चाहे कितनी विपरीत हो जाए, लेकिन अगर उस सर्वशक्तिमान परमात्मा ने किसी आत्मा को इंसानी रूप में जन्म लेने के लिए पृथ्वी पर भेजा है तो, वह सारी विपदाओ को पार करके भी पैदा जरूर होती है… !
और कहां जाता है कि अगर कोई आत्मा ढेर सारी विपदाओ को पार करके पैदा होती है, तब उसके जन्म का निश्चित ही कोई ना कोई कारण अवश्य होता है..!!
और उस पुण्य आत्मा का जीवन और जन्म किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता है और वह उद्देश्य जब तक वह पूरा ना करें तब तक उसका जीवन सफल नहीं होता….
इसलिए चाहें कोई कितना रोक लें उसे जन्म लेना ही होता हैं जिसका प्रारब्ध पहले ही तय हो चुका हो…
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अनिर्वान की आँखों के सामने नेहा की गाड़ी बच्चों की खिलौना गाडी सी उछल कर एक धमाके के साथ ज़मीन पर गिर पड़ी और देखते ही देखते आग के गोले में बदल गयी…
ट्रक वाले की क्रूर आँखों में वहशी चमक चली आई…..
उसे अपने किये का ना तो खौफ था और ना पश्चाताप था.. वो ट्रक के भीतर बैठा अपनी क्रूरता पर अट्टहास लगा रहा था.. !
जैसे उसने किसी इंसान का जीवन नहीं छीना बल्कि रास्ता चलती एक चींटी मसल कर फेंक दी हो..
हालाँकि समान्य आदमी तो चींटी को भी अपने कदमो के नीचे आते देख लें तो खुद के पैरों को बढ़ने से रोक लेते हैं…
लेकिन वो ट्रक ड्राइवर सामान्य इंसान नहीं था.. |
अपनी खुनी आँखों से वो सामने आग का गोला बनी कार को घूर रहा था, तभी तेज़ी से एक गाडी उसके बगल से निकल कर तेज़ी से घूम कर वहीँ खड़ी हो गयी..
एक झटके में गाड़ी का दरवाज़ा खोल कर अनिर्वान निकला और आग का गोला बन चुकी उस गाडी की परिधि में समा गया…
गाडी की ड्राइविंग सीट पर बेहोश पड़ी नेहा को आग की लपटों के भीतर से उसने देखा और अपने इष्ट महादेव को स्मरण कर उसने कार की पिछली सीट के कांच पर एक बड़े से पत्थर से वार कर दिया…
ये सब इतनी जल्दी हुआ कि ट्रक वाला कुछ समझ ही नहीं पाया..
वो आंखें मलता सामने उस आग के गोले में अभी अभी घुसे उस फैंटम जैसे लम्बे चौड़े आदमी की आकृति को देख कर यही सोचने में लगा था कि आग में बेधड़क घुस जाने वाला ये अजूबा असल में इंसान हैं या प्रेत ..
कि तभी उस आग के गोले से वहीं लम्बा चौड़ा महाकाल सा आदमी अपने हाथों में एक औरत को थामे बाहर निकल आया…
क्या ये कोई चमत्कार था ? या ये आदमी वाकई कोई भूतप्रेत था, उसे ध्यान से देखने के लिए वो अपनी आंखें मसल रहा था कि, अनिर्वान ठीक उसके बाजू में आकर खड़ा हो गया..
ट्रक के ड्राइवर सीट के ठीक नीचे की सड़क पर खड़ा वो ड्राइवर की तरफ ही घूर रहा था…
उसका भस्म पुता चेहरा, बिखरे से बाल और उसकी लाल लाल कपाल पर चढ़ी आंखें देख जाने क्यों ट्रक वाले के बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी..
उसे लगा साक्षात् शिव अपनी सति को थामे तांडव करने वाले हैं !!
उसे भस्म कर देने वाली आँखों से घूरते हुए वो नेहा को संभाल कर अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया…
गाडी के अंदर गैस बढ़ जाने के कारण नेहा बेहोश हो गयी थी… गाडी बहुत ज़ोर से गिरी थी, और इस दुर्घटना में नेहा को चोट भी काफी लग गयी थी…
उसे गाड़ी के पिछली सीट में लेटाने के बाद अनिर्वान पल भर को रुका और वापस तेज़ी से पलट कर ट्रक की तरफ बढ़ गया…
अनिर्वान की टांगो की लम्बाई के कारण वो दो चार कदम पर ही लम्बी दूरी पार कर जाता था..
ट्रक वाला उसके जाने के बाद उसी के बारे में सोचते हुए अपनी सीट के दरवाज़े के पास से आकर पीछे झाँकने को था कि अनिर्वान की गन से निकली गोली उसका सीना चीर गयी..
कुछ सोच समझ पाने से पहले ही एक कातिल अपनी सज़ा पाकर अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गया था…..
उसके पाप के सामने सज़ा बेहद मामूली थी, लेकिन इस वक्त अनिर्वान के पास इससे ज्यादा वक्त भी नहीं था !
ट्रक वाले का आधा शरीर ट्रक के दरवाज़े से नीचे लुढ़क गया, जिसे अनिर्वान ने एक झटके में नीचे खींच लिया…
उसी वक्त उस ट्रक वाले के शरीर को किसी ने झुक कर पकड़ लिया..
अनिर्वान ने नीचे देखा, बाबूराव उसके पैरों के पास नीचे झुका ट्रक ड्राइवर के शरीर को पकड़ कर खींचने में अनिर्वान की मदद करने की कोशिश कर रहा था..
“साहब आप अस्पताल जाइये, इसे हम ठिकाने लगा लेंगे !”
अनिर्वान ने जलती हुई गाड़ी की तरफ एक नज़र देखने के बाद अपने कदम अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा दिये…
क्षण भर में वो अपनी गाड़ी में बैठा और गाड़ी अस्पताल की तरफ भगा दी…
बाबूराव ने उस ट्रक ड्राइवर के शरीर को खींच तान कर उस जलती हुई कार के सुपुर्द कर दिया…
ट्रक में अंदर चढ़ने के बाद बाबूराव ने उस ट्रक में ड्राइविंग सीट के सामने के कांच को अंदर से भारी चीज़ से मार कर तोडा और कूद कर नीचे उतर गया…
कुछ देर रुकने के बाद उसने पुलिस कंट्रोल रूम में फ़ोन घूमा कर गोल चौक में घटी दुर्घटना की सुचना नामजद कर दी..
गोल चौक के अंधे मोड़ पर तेज़ी से आती ट्रक ने कार को टक्कर मारी जिसमे ट्रक ड्राइवर की घटना स्थल पर ही मौत हो गयी.. कार किसकी थी ये अभी मालूम नहीं चल पाया है.. !! नंबर प्लेट की जाँच से मालूम करने की कोशिश जारी है !!
इधर बदहवास सा अनिर्वान नेहा को लेकर अस्पताल पहुँच चुका था..
इमरजेंसी में जिस डॉक्टर की ड्यूटी थी वो अपने ड्यूटी रूम में बैठा पीजी एंट्रेंस की तैयारी कर रहा था..
लेकिन अनिर्वान और उसकी गोद में नेहा की हालत देख अस्पताल स्टाफ घबरा गया और तुरंत ही नेहा को एडमिट करने के बाद वहाँ की सीनियर नर्स ने डॉक्टर को फ़ोन घूमा दिया…
उसी वक्त अपनी ड्यूटी ख़त्म कर पंखुड़ी निकल ही रहीं थी कि उसकी नज़र आपात चिकित्सा के बाहर मची भगदड़ पर पड़ी और वो भी वहाँ हो क्या रहा है ये देखने वहीँ चली आयी…..
डॉक्टर को अपने सामने देख स्टाफ और भी चौकन्ना हो गया.. नेहा को तुरंत भरती कर लिया गया…
नेहा को आपातकालीन चिकित्सा कक्ष में ले जाने के बाद पंखुड़ी ने उसकी जाँच करनी शुरू कर दी….
पंखुड़ी बाँसुरी को पहचानती थी, उसे लगा ये बाँसुरी ही है.. !
उसके ज़ख्मो का पूरी तरह निरिक्षण करने के साथ ही पंखुड़ी को ये भी मालूम चल गया था कि मरीज़ को काफ़ी सारी अंदरूनी चोटें आई हैं…
वो उसके बारे में नर्स को ज़रूरी निर्देश देने के बाद तुरंत बाहर चली आयी..
बाहर आकर उसने कॉरिडोर में इधर उधर अनिर्वान को ढूंढने की कोशिश की… अनिर्वान वहीँ थोड़ा दूर हट कर किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था…
“एक्सक्यूज़ मी !!”
अनिर्वान ने पलट कर देखा और तेज़ी से भागता हुआ पंखुड़ी के पास पहुँच गया..
“कैसी है वो.. ? ठीक तो है ना ?”
“अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.. उन्हें अंदरूनी काफी चोट आई है… ब्लीडिंग बंद नहीं हो रहीं है.. हमें रानी साहब का ऑपरेशन करना होगा वरना बच्चे को बचाना मुश्किल हो जायेगा.. !”
अनिर्वान इन कुछ पलों में इस बात को भूल ही बैठा था कि उसके साथ नेहा बाँसुरी के तौर पर थी…
अच्छा हुआ खुद में गुम उसने नेहा कह कर नहीं पुकार लिया उसका नाम.. !”
“जी डॉक्टर ! उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए आपको जो सही लगे कीजिये, पर उन्हें बचा लीजिये !”
“कोशिश तो हम कर रहें हैं लेकिन इनके घर से भी किसी का यहाँ होना ज़रूरी हैं..
वैसे आप इन्हें यहाँ कैसे लेकर आये ?
क्या इनका कोई एक्सीडेंट हुआ है ? कहाँ हुआ वो एक्सीडेंट ? ये पुलिस केस है..
“जी मै खुद पुलिस हूँ.. !”
और अनिर्वान ने अपना कार्ड पंखुड़ी के सामने कर दिया !”
“ओह्ह ओके ! तो आप महल में सूचना भिजवा देंगे, या मै यहाँ से फ़ोन करवा दूँ !”
“जी मैंने वहाँ सूचना भेज दी है !”
पंखुड़ी ने हाँ में सर हिलाया और तेज़ी से वापस लौट गयी..
पंखुड़ी के साथ दूसरा डॉक्टर और बाकी सारा स्टाफ जैसे किसी युद्ध में लग गए थे.. कोई वहाँ से फार्मेसी भाग कर दवा और इंजेक्शन ला रहा था तो, कोई इक्विपमेंट रूम से कोई ना कोई मशीन लेकर आ रहा था..
सारे लोग इधर से उधार भागते जी जान से महल की रानी को बचाने के लिए लग गए थे…
कुछ आधे घंटे बीतते में महल से रूपा, युवराज, रेखा, जया और जय भी अस्पताल चले आये…
सभी घबराये हुए से थे…
युवराज ने समर को भी फ़ोन घूमा दिया था…
समर राजा की वापसी से पहले अपनी अलग ही तैयारियों में लगा था! उसने जब बाँसुरी के एक्सीडेंट की बात सुनी तो वो भी घबरा गया और पिया को लिए अस्पताल के लिए निकल गया…
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पंखुड़ी और शेखर का आज शाम डिनर पर जाने का प्लान था और उसके लिए शेखर अपने ऑफ़िस से घर पहुँच चुका था..
उसके घर पहुँचने के बाद भी जब बहुत वक्त बीतने पर पंखुड़ी नहीं पहुंची तो उसने पंखुड़ी को फ़ोन लगा दिया…
पंखुड़ी अंदर ऑपरेशन थियेटर में थी और उसका फ़ोन बाहर था… बाहर एक नर्स ने उसका फ़ोन उठा लिया…
शेखर ने जैसे ही पंखुड़ी के लिए पूछा नर्स ने तुरंत बताना शुरू कर दिया..
“सर मैडम एक केस में बिज़ी है.. !”
“ओह्ह कितना वक्त लग जायेगा ?”
“नहीं कह सकती सर ! महल का केस है.. रानी साहब का एक्सीडेंट हुआ है और वो भी ज़बरदस्त..
रानी बाँसुरी ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहीं हैं सर !! अभी तो ये वी आई पी केस है.. मैडम आज रात शायद ही घर लौट पाए !”
नर्स शेखर को जानती थी, लेकिन शेखर के लिए बाँसुरी क्या है ये नहीं जानती थी.. !
और बस इसलिए अपनी रो में बहती वो सब कुछ कह गयी और बाँसुरी जीवन और मौत के बीच झूल रहीं है सुन कर शेखर के हाथ से फ़ोन गिरते गिरते बचा…
उसने तुरंत रिदान और लीना को फ़ोन किया और अस्पताल के लिए निकल गया…
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सुनील लुटा पिटा सा बैठा था…
सारी बाज़ी पलट चुकी थी… उसने और उसकी माँ ने जो कुछ सोचा था सब एक चुटकी में खत्म हो गया था..
उसने तो खैर इतनी तैयारी भी नहीं की थी लेकिन उसकी माँ तो जाने कब से राजा अजातशत्रु से बदला लेने को तरस रहीं थी..
तिनका तिनका जोड़ कर जैसे चिड़िया अपना घोंसला बनाती है, वैसे ही उसकी माँ ने ज़हर की एक एक बूँद पीकर खुद के अंदर अजातशत्रु के खिलाफ गरल कुंड बना लिया था…. !
लेकिन उनकी इतनी चाक चौबंद तैयारियों का तो राजा साहब ने पल भर में भरता बना कर रख दिया था..
वो बुझी बुझी पलकों से राजा को देख रहा था…
जैसे पूछ रहा हो कि कितनी देर में मेरी बलि चढाने वाले हो.. ?
राजा ने उसे देखा और वापस हलके से मुस्कुरा उठा..
“सिगरेट पीनी है ?”
सुनील ने हाँ में गर्दन हिला दी…
और राजा साहब के इशारे पर वहीं रखें सुनहरी सिगरेट केस से एक महंगी सी सिगरेट निकाल कर जला कर प्रेम ने उसके मुहँ में ठूंस दी…
“आओ सुनील तुम्हें चाँद के पार लें चलते हैं !”
सुनील आज्ञाकारी शिष्य की तरह खड़ा हो गया…
राजा अजातशत्रु आगे निकले, उनके पीछे सुनील और सुनील के पीछे प्रेम हो गया…
तीनों वापस राजा की गाड़ी के पास पहुंचे और उन लोगों के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी वहाँ से बाहर निकल गयी…
गाड़ी रास्ते पर सरपट दौड़ने लगी…
सुनील की समझ से परे था कि वो लोग कहाँ जा रहें है..?
लगातर चलने के बाद वो लोग वापस उसी हवेली में पहुँच गए जहाँ से राजा ने सुनील को उठाया था..
“ये हवेली तुम्हें बड़ी पसंद आ गयी है क्या सुनील ?”
सुनील से कुछ कहते नहीं बना ! अभी तक उसने खुद ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया था, बावजूद राजा उसके बारे में सब जानता था.. !
कोई अन्तर्यामी था क्या ये राजा.. ?
क्या इतना स्ट्रांग नेटवर्क भी किसी का होता है भला ?
सुनील इतना तो समझ गया था कि बाँसुरी को अपने साथ लें जाने का उसने जो ख्वाब देखा था वो अब किसी सूरत में पूरा नहीं हो सकता.. !
बल्कि वो मन ही मन गणना करने लगा था कि, उसने अपने मन के इस खूबसूरत से ख्याल से किस किस को रूबरू करवाया था..?
कहीं ये बात भी इस राजा को पता चल गयी तो ये सनकी और इसका ये महा सनकी और पागल सेनापति मिलकर उसे ऊपर से नीचे तक ज़िंदा चीर कर उसमे नमक भर कर उसे अपनी छत पर सूखने को ना डाल दे…
जिस छत पर वो बाँसुरी की झलक ढूँढ रहा था..
“तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया सुनील ?”
“जी…. वो…. अहम्म्म्म… बात ये है कि.. !”
“जाने दो.. बात कोई भी हो.. !!
अगर तुम्हें ये हवेली पसंद आ रहीं है तो तुम्हें इस हवेली में घूमा भी देंगे… !”
राजा की इस बात को सुनते ही सुनील ने एक गहरी ठंडी सी साँस छोड़ दी..
उसे समझ आ गया कि ये हवेली भी राजा की ही है..
वो सर झुकाये चुपचाप राजा के पीछे आगे बढ़ गया..
राजा को आते देख गेट पर खड़े गार्ड्स ने पूरे सम्मान के साथ उसे सैल्यूट ठोंका और वो बड़ा भारी सा दरवाज़ा खुल गया..
अंदर एक बार फिर राजा की हवेली सा ही माहौल था.. चारों तरफ काली यूनिफॉर्म में प्रेम के लोग यहाँ से वहाँ गन ताने तैनात खड़े थे….
वहाँ सुनील जैसे ही गाड़ी से उतरा, उसके ठीक करीब आकर प्रेम ने धीमे से उसकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया, और पीछे कमर में खोंस रखी उसकी गन निकाल ली..
सुनील वैसे ही थका हारा सा था.. !
उसे अब समझ आ चुका था कि, अपनी छोटी सी गन की सहायता से वो वहाँ से भाग तो कतई नहीं सकता | हाँ इतना ज़रूर हो सकता था कि वो वहाँ के टॉर्चर से बचने के लिए अपनी गन से खुद को गोली मार सके…
लेकिन अब प्रेम के गन छीन लेने के बाद वो गुंजाइश भी खतम हो गयी थी..
उसने प्रेम के हाथ में अपनी गन देखी और लाचारगी से राजा की तरफ देखने लगा..
“मेरी हुकुम को ये गन, रिवॉल्वर ये सब ज़रा पसंद नहीं है… !!
आज बहुत दिनों बाद उनसे मिलने जा रहा हूँ तो, मै ये सब कैसे लेकर जा सकता हूँ.. समझ रहें हो ना !!
मैंने अपनी गन भी बाहर छोड़ दी है..
मुस्कुरा कर राजा मुख्य दरवाज़े पर पहुंचा कि वो दरवाज़ा खुल गया…
अंदर के हॉल में एक तरफ काका और दर्श खड़े थे…
दोनों ने राजा को देखा और उसके सम्मान में झुक गए…
सीढ़ियों से तेज़ी से नीचे आती सारिका की नज़र राजा प्रेम और उसके साथ आये सुनील पर पड़ी और वो जल्दी से दर्श के पास आकर खड़ी हो गयी…
उसने भी राजा और प्रेम को नमस्कार कर दिया.. सुनील की हालत देख कर उस नासमझ भोली सी लड़की को भी समझ आ गया था कि ये राजा साहब की तरफ का कोई बंदा नहीं है और इसलिए उसने उसे नमस्कार करना ज़रूरी नहीं समझा !
“कैसी हो सारिका.. . ?”
राजा को मंत्रमुग्ध होकर देखती सारिका ने जब उसके मुहँ से अपना नाम सुना तो लजा गयी, उसने धीमे से हाँ में सर हिला दिया…
राजा ने हवेली पर चारों तरफ नज़र घुमाई…
वो सब कुछ बड़े ध्यान से देख रहा था….
और उसे इस तरह हवेली को देखते देख सारिका उसे बड़े ध्यान से देख रहीं थी…
“अपना मुहँ बंद करो !”
पास खड़े दर्श ने सारिका को टोक दिया और झेंप कर सारिका नीचे देखने लगी…
“हुकुम कहाँ… ?”
राजा के सवाल से पहले सारिका, दर्श और काका ने एक साथ ऊपरी मंज़िल के बाँसुरी के कमरे की ओर इशारा कर दिया….
एक गहरी सी साँस लेकर राजा ने अपने कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ा दिये..
सारिका भी दौड़ कर राजा तक पहुँच गयी…
राजा ने उसे देखा और मुस्कुरा कर धीरे से अपना हाथ उठा कर उसे साथ आने से रोक दिया…
सारिका हाथ बांधे वहीँ खड़ी रह गयी और लम्बे लम्बे डग भरता राजा ऊपर चला गया…
कमरे के दरवाज़े पर पहुँच कर उसने दस्तक दी और अंदर से वहीं मुलायम सी आवाज़ उसके कानों में ऱस घोल गयी जो उसकी ज़िन्दगी का आधार थी..
“आ जाओ सारिका !”..
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महल वासियों के पहुँचने के साथ ही लगभग उसी वक्त में समर और पिया भी अस्पताल पहुँच गए…
और उसी वक्त शेखर भी भागता हुआ सा अस्पताल पहुँच गया…
ये सारे लोग ऑपरेशन थियेटर के बाहर परेशान हाल भटक रहें थे…..
कुछ देर में ही रिदान और लीना भी शेखर के पास पहुँच गए…
ये सभी लोग एक दूसरे को सांत्वना देते, ढांढस बंधाते खड़े थे..|
और इन सब से दूर एक किनारे की दीवार से टिक कर वो भी खड़ा था, जो सबके सामने खुल कर रो भी नहीं सकता था.. !
जो सबके सामने ये भी नहीं स्वीकार सकता था कि जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने वाली उसकी अपनी पत्नी है !!
जो इन सबके सामने जाकर उसे अपनी बाँहों में भर नहीं सकता था, उसके कानों में अपने होंठ रख कर धीमे से उसके कान में गुनगुना नहीं सकता था कि नेहा मरना मत, मै बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ… !
उसकी आँखों में आँसू रोकें रहने से दर्द की लहर सी उठने लगी…!
उसकी लाल लाल आंखें ही उसके दिल का दर्द बयां करने को काफ़ी थी…
वो खिड़की के बंद कांच से बाहर शहर की रौशनी देखता अपने मन में चलते कोलाहल को रोकने की कोशिश में था कि उसके कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया..
वो पलटा, उसके सामने लीना खड़ी थी..
लीना ने उसके सामने कॉफ़ी का कप बढ़ा दिया..
कॉफ़ी लेने का उसका हरगिज़ मन नहीं था.. लेकिन वो लेने से इंकार भी नहीं कर सका.. !
दिल के हाथों मजबूर उसकी सबसे बड़ी समस्या यही थी कि वो दुनिया के सामने अपना दर्द दिखा भी नहीं सकता था…..
उसने चुपचाप कॉफ़ी का कप पकड़ा और घूंट भरने लगा..
पहली ही सिप में उसका शरीर कांप गया.. लेकिन उसने खुद को संभाल लिया..
लीना उसके पास खड़ी उसे बड़े गौर से देख रहीं थी… अपने चेहरे पर लीना की नज़र महसूस होते ही उसने अपना चेहरा फेर लिया और कांच के बाहर देखने लगा…
खिड़की से नीचे बाहरी सड़क पर चाय की टपरी में चलते रेडियो में वहीं गाना चलने लगा जो कभी नेहा उसके लिए गाया करती थी..
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के,
बात अधम कह दिनी रे,मोसे नैना मिलाइके ||
बलि बलि जाऊँ मैं,तोरे रंग रजवा,
अपने ही रंग, रंग लिनी रे,मोसे नैना मिलाइके ||
सच तो था, नेहा ने वाकई उसे अपने रंग, रंग ही लिया था…
उसी समय ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला और एक नर्स बाहर चली आई…
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” आ जाओ सारिका !”
बाँसुरी की आवाज़ सुनते ही राजा ने धीमे से दरवाज़ा खोल दिया….
बाँसुरी खिड़की पर खड़ी बाहर देख रहीं थी…
उसकी गुलाबी चुन्नी पलंग पर पड़ी थी.. और फिरोज़ी कुर्ते में अपने खुले बालों को हाथ से कान के पीछे लगाती वो कुछ सोच रहीं थी कि उसके कानों में वो आवाज़ पड़ी जिसे सुनने को उसके कान तरस कर रह गए थे…
“हुकुम !”
बाँसुरी का दिल धक से रह गया…
वो पलटी और कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़े राजा को देखती रह गयी….
क्रमशः
aparna….

लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻