अपराजिता -95

अपराजिता -95

   कुसुम की किस्मत ख़राब थी या कुछ ज्यादा ही अच्छी थी… मालूम नहीं..।

लेकिन वो हर बार गलत वक्त पर भावना के घर पहुँच जाती थी..।

ऐसा ही उस समय हुआ था जब कुसुम ससुराल से निकल कर भावना के घर पहुँच गयी थी..

आज भी कुछ वैसा ही हुआ..।

जाने क्यों कुसुम का मन घबरा रहा था, ठीक उसी वक्त से जब दीपक भावना के घर घुसा था..
कुसुम का अपनी सखी के लिए दिल से जुड़ा सच्चा प्यार था, जो उसके दिल तक भावना के दिल की घबराहट पहुँच गयी थी। और वो भावना से मिलने छटपटा उठी थी। लेकिन किस्मत की मारी कुसुम को मौका तब मिल पाया जब तक भावना डॉक्टर साहब के साथ पुलिस थाने से घर लौट आई थी। भावना और राजेंद्र एक ही थाली से बैठकर खा रहे थे कि उस वक्त कुसुम यज्ञ के साथ उनके घर पहुंच गई।

कुसुम ने बेधड़क दरवाजा खोला और अंदर चली आई। सामने ही अगल-बगल कुर्सी पर बैठे भावना और राजेंद्र खा रहे थे। कुसुम की नजर भावना पर पड़ी और भावना की कुसुम पर!!
      दोनों सखियां कुछ कल के लिए एक दूसरे को देखती रह गई। लेकिन कुसुम पर नजर पड़ने से जाने क्यों भावना के अंदर एक आत्मग्लानि सी आ गई। उसे लगा कि उसने गलत कर दिया है। डॉक्टर साहब पर तो कसम का हक था, फिर कैसे वो ये हक छीन बैठी..?

उसकी आँखों में पश्चाताप सा उभर आया.. और कुसुम की आँखों में आग नजर आने लगी..।
उस अति उत्साही ठकुराइन के साथ यही समस्या थी, किसी बात की तह तक पहुंचे बिना ऊपर से जो नजर आ गया उसे सच मान कर तुरंत ही प्रतिक्रिया दे बैठती थी.. भले ही बाद में सच मालूम पड़ने पर अफ़सोस करना पड़े..।

भावना को घूरने के बाद उसने बड़ी ममता से अपने डॉक्टर साहब को देखा।
राजेंद्र बिना किसी भय और शंका के भावना के साथ बैठा था… उसके चेहरे पर किसी तरह की ग्लानि ना देख कुसुम चकित थी..।
कुसुम से ज्यादा भावना चकित थी!!

पीछे खड़ा यज्ञ अपनी शेरनी की हार पर दुखी होने की जगह हल्के से मुस्कुरा रहा था..

“अरे.. आप लोग.. आइये ना, अंदर आइये !”

कुसुम के पीछे खड़े यज्ञ को देख राजेंद्र खड़ा हो गया..
कुसुम अपनी जगह ठूंठ सी खड़ी थी, उसे धीरे से सरका कर यज्ञ अंदर चला आया..।

“लगता है हम गलत समय पर आ गए.. !” ये बोलने के बावजूद यज्ञ अंदर आकर भावना के सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया..

“गलत समय क्यों..? जिस वक्त जो हो रहा है, वही उसका सही समय है.. विधाता ने जो तय किया है !”

राजेंद्र ने ये बोलते हुए कुसुम की तरफ देखा.. अब तक भावना भी अपनी जगह पर खड़ी हो गयी थी..।

“आओ कुसुम.. अंदर आओ ! हम आप लोगो के लिए चाय लेकर आते हैं !”

भावना अंदर चली गयी….
कुसुम भी भावना के पीछे अंदर रसोई में चली गयी.. दोनों लड़के बाहर चुपचाप बैठे रह गए..।

“डाक सब के साथ एक ही थाली में खाना खा रही थी ?”

कुसुम का जलता सा सवाल भावना के चेहरे को काला कर गया..

“नहीं.. कुसुम वो.. बात ये है की..”

“हम सब समझने लगे है भावना, हमे उल्लू मत समझना… तुम दोनों के बीच क्या चक्कर चल रहा, सब समझ आ रहा है हमें !”

“जैसा तुम सोच रही, वैसा कुछ नहीं !”

“अच्छा.. तो जो ये देखा हमने, वो झूठ था ? एक ही थाली में खा रहे, तब तो अब साथ सोने भी लगे होंगे ना ?”..

भावना की आँखों में खून उतर आया.. कैसी पागल लड़की थी ये.. पल भर में इसका गुस्सा कहाँ से कहाँ पहुँच जाता था..?
ज़बान पर तो लगाम डालना सीखा ही नहीं था !
कुसुम को उसके गुस्से के वक्त कुछ भी समझाना फिजूल था..।
हाँ जब गुस्सा उतरेगा शांत रहेगी, तब उससे बात की जा सकती थी… यही सोच कर भावना चुप रह गयी..

“बोलो ना.. जवाब दो.. तभी तो डाक साहब से तुमको छोड़ कर रहा नहीं जा रहा.. है ना !”

“हाँ सही समझ रही तुम..” राजेंद्र जाने कब आकर खड़ा कुसुम की बकवास सुन रहा था…

“हम साथ खाते ही नहीं, साथ सोते भी है..। इसमें तुम्हे क्या परेशानी है ? भावना सिर्फ तुम्हारी दोस्त है.. लेकिन मेरी पत्नी है..।
और मै आज तुम्हारे सामने खुल कर कह रहा हूँ कि मैंने उसे पत्नी के सारे अधिकार दे रखे हैं। और तुम्हारी दोस्त पर मेरा भी पूरा अधिकार है..। तुमसे कहीं ज्यादा.. !
और तुम, किस अधिकार से मेरी पत्नी से ये सब सवाल जवाब कर रही हो…?
हमारी शादी तो तुम्हारे ही भाई चंद्रभान सिंह ने जबरदस्ती करवाई थी।
     वो भी गन माथे पर टेक कर हमारी शादी हुई है। हम दोनों ने भाग कर शादी नहीं की है कुसुम कुमारी जी। मजिस्ट्रेट के सामने बाकायदा तुम्हारे भाई के गुंडे हम दोनों को घेर कर खड़े थे। भावना को उन लोगों ने धमकी दी थी कि मुझे गोली मार देंगे, और मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने साइन नहीं किया तो तुम्हें गोली मार देंगे।

     इस शर्त पर हमारी शादी हुई, लेकिन अब मैं भावना को ही अपनी पत्नी मानता हूं। और जब तक जिंदा रहूंगा मेरी आखिरी सांस तक, मेरे इस शरीर पर, मेरे मन पर, और मेरी कमाई सारी दौलत पर, सिर्फ मेरी पत्नी भावना का ही हक रहेगा।
      तुम या तुम्हारे जैसी कोई भी लड़की आकर मेरे वैवाहिक जीवन को बर्बाद नहीं कर सकती। हां मैं तुम्हें किसी तरह की एडवाइस नहीं दूंगा, क्योंकि तुम्हारी शादीशुदा लाइफ, तुम्हारी जिंदगी, तुम्हारा समाज, तुम्हारा रुतबा, तुम्हारा खानदान, सब कुछ मुझसे बहुत अलग है…।

तुम्हें अपनी शादीशुदा जिंदगी में आग लगानी है, तो लगाओ। लेकिन मेरी जिंदगी में आग लगाने का तुम्हें कोई हक नहीं है।
आगे से अगर भावना से साफ मन से दोस्ती निभा सकती हो, तभी हमारे घर का रुख करना। वरना हमारे घर के दरवाजे तुम्हारे लिए बंद है..।”

“ये क्या कह रहे हैं डाक साब आप… आपकी शादी होते ही आप हमें भूल गए ? हमें भूल गए आप, अपनी कुसुम को ?”

” हां भूल गया और तुममे ऐसा कुछ था भी नहीं कि मैं याद रख सकूं।
    तुम्हारे साथ की यादें जब भी याद करूं तो तुमसे पहले तुम्हारा वह क्रोधी भाई याद आता है। जिसकी जिंदगी का लक्ष्य ही मेरी मौत है। उसके बावजूद तुम्हारे भाई को बचाया है मैंने। क्योंकि वह मेरा डॉक्टरी धर्म था।
     तो जैसे मैंने अपने फर्ज को निभाया है, वैसे ही अपने पति धर्म को भी निभाऊंगा। भावना के साथ मैं जिंदगी भर कभी बेवफाई नहीं करूंगा…।

जिस दिन तुम्हारी शादी किसी और लड़के से हुई और भावना मेरी जिंदगी में आ गई, उस दिन से मैं तुम्हारा नाम भी भूल गया हूं कुसुम।
    सच कह रहा हूं, मुझे अब कुछ भी याद नहीं तुम्हारे साथ का।
     मुझे याद है तो बस तुम्हारी वह सहेली, जिसने मेरे बिखरे से कमरों को घर बना दिया। जिसने मेरी बीमारी में मेरी इतनी सेवा की जितने सेवा अगर मेरी मां होती तो वह करती।
जिसके मेरे जीवन में आने के बाद पहली बार मुझे लगा कि मुझे एक परिवार मिल गया है।
    अब अस्पताल से घर लौटता हूं ना, तो दरवाजे पर पहुंच कर अपने आप एक मुस्कान चली आती है, क्योंकि पता है अंदर कोई है जो मेरा इंतजार कर रही है। रात दिन एक कर जिसने मेरी बीमारी में मेरी सेवा की है, अपनी उस प्यारी सी पत्नी को मैं तुम्हारे जैसी बददिमाग लड़की के कारण कभी खो नहीं सकता।

     कुसुम तुम्हारे और मेरे बीच जो था, वह हमारा अतीत था। और अब उस काले अतीत का साया भी मैं अपने सुनहरे भविष्य पर नहीं पड़ने दे सकता। पहली बार मुझे एक परिवार मिला है।
माता-पिता को मैंने बहुत बचपन में खो दिया था, एक दादाजी थे उन्हें भी खो चुका हूं। लेकिन अब अपनी पत्नी को नहीं खो सकता..।
एक बात कहूं, जब तुम्हारा भाई ऑपरेशन टेबल पर नीम बेहोशी में मेरे सामने पड़ा था..
उस वक्त उसकी शक्ल देखकर गुस्सा बहुत आया था। इस बात का नहीं कि उसने तुम्हें और मुझे अलग कर दिया, बल्कि इस बात का कि उसने एक बार मेरे सामने भावना को तमाचा मारा था। और वह याद करते ही मेरी आंखों में खून उतर आया, उस वक्त उसके सामने भावना का दुपट्टा उससे काफी दूर गिरा हुआ था, मुझे और भावना को रस्सियों से बांध कर रखा था तुम्हारे भाई और उसके गुन्डों ने।
वहां आसपास ढेर सारे लड़के थे, लेकिन तुम्हारे भाई को इतनी अकल नहीं आई कि अपनी बहन समान भावना का दुपट्टा ही कम से कम उसे ओढा दे।

    बस वही याद करके मेरी आंखों से खून निकल आया था, लेकिन फिर यह याद आ गया कि तुम्हारे उस नीच और घटिया भाई ने भावना से मेरी शादी करवाई है। और यकीन मानो जिस वक्त तुम्हारे भाई कि मैं सर्जरी कर रहा था उस वक्त अपने दिमाग में सिर्फ मैंने भावना को रखा हुआ था। जिससे मैं ठीक से सर्जरी कर सकूं।
      इसलिए आज तुम्हारा भाई तुम्हारे सामने जिंदा है। वरना मेरे लिए बहुत आसान था एक आध नस काट देता और जिंदगी भर के लिए तुम्हारे भाई को अपाहिज कर देता।

तुम्हारी तरह मैं ठाकुर हूं, ठाकुर हूं, कह के रिवाल्वर के दम पर या चाकू छुरी के दम पर दूसरों को डराने का शौक नहीं है मुझे…
बेशक होंगे तुम्हारे पास लाखों हथियार, लेकिन मेरे पास मेरा दिमाग ही काफी है।

तुमसे निवेदन करता हूं कि अगर मेरी पत्नी की अच्छी सहेली बन कर बैठ सकती हो, तो जाकर चुपचाप बाहर बैठ जाओ। भावना चाय बहुत अच्छी बनाती है, चाय पी कर जाना…।”

कुसुम स्तब्ध थी। राजेंद्र का यह रूप उसे आश्चर्य में डुबोए दे रहा था।
क्या सच में राजेंद्र उसे भूल गया था? और क्या वाकई वह भावना से इतना प्यार करने लग गया था?
कुसुम की आंखों में आंसू चले आए। आज तक इतना कड़वा उसे किसी ने नहीं कहा था।
वह वाकई राजेंद्र से प्यार करती थी। वरना इतने कड़वे शब्द सुनकर वह सामने वाले का मुंह ना जला डालती?

    रसोई के दरवाजे के ठीक बाहर दरवाजे के पास छिप कर खड़े यज्ञ ने भी सब सुन लिया था। वह चुपचाप बाहर जाकर बैठ गया।

      कुसुम चुप सी बाहर चली आयी, लेकिन अपने आंसू वो यज्ञ को भी तो नहीं दिखा सकती थी। वरना यज्ञ के सामने उसकी क्या इज्जत रह जाती ? अपने आंसुओं को आंखों ही आंखों में पीकर यज्ञ से छुपाते हुए वह बाहर निकलने को थी कि यज्ञ ने उसका हाथ पकड़ लिया..।

” अपनी सहेली से मिलने आई हो ना, वह चाय बनाने गई है। दो मिनट बैठ जाओ। चाय पीकर निकलना।”

कुसुम तड़प कर रह गई!!

कैसे थे यह दोनों लड़के? एक उसके दिल पर तेजाब की बारिश कर रहा था, और दूसरा उस तेजाब के ऊपर नमक छिड़कने को हाथ में नमक की पोटली लिए बैठा था।
और कुसुम की यह हालत थी कि ना यह सब कुछ उगलते बन रहा था, ना निगलते!

     राजेंद्र की बातें सुनकर कुसुम स्तब्ध थी, लेकिन भावना महास्तब्ध थी।
उसकी आंखें फटी रह गई थी।
वह आंखें फाड़े राजेंद्र को देख रही थी कि यह वह क्या कह गया था।

कुसुम के बाहर निकलते ही राजेंद्र ने भावना को गले से लगा लिया और बाहर निकलते निकलते भी कुसुम को यह दृश्य दिख गया था…।

राजेंद्र ने कुसुम के बाहर निकलते ही भावना को खुद से अलग किया और उसे चाय बनाने के लिए अदरक कूट कर देने लगा..

” आप रहने दीजिए हम कर लेंगे..”

भावना जरा लजा गई, क्योंकि जब राजेंद्र ने उसे खींचकर अपने गले से लगाया था, तब कुसुम ने उन दोनों को ऐसे देखकर मुंह फेरा था, और यह बात सोच कर ही भावना को शरम सी लग रही थी कि कुसुम के सामने राजेंद्र ने कैसे उसे गले से लगा लिया..?

“तुम चाय का पानी चढ़ाओ.. !”

राजेंद्र ने अदरख इलायची कूटी और खौलते पानी में डाल दिया..

कुसुम सांस रोक कर यज्ञ के बगल में बैठी थी। उसका मन अब वहां नहीं लग रहा था। उसे ऐसा लग रहा था कि उसे सांस नहीं आ रही है…।

उसे तो हमेशा से खुलकर हंसने की आदत थी, और आज उसे आंसुओं को भी रोकना पड़ रहा था। ऐसा लग रहा था उसके गले में कोई गोला आकर अटक गया है। जिसके कारण उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही है..।

कुछ देर में राजेंद्र और कुसुम चाय लिए बाहर चले आए। राजेंद्र आकर यज्ञ के ठीक सामने की कुर्सी पर बैठ गया। भावना ने सबसे पहले चाय का प्याला यज्ञ की तरफ बढ़ाया, यज्ञ ने हल्के से मुस्कुरा कर प्याला लिया और भावना को धन्यवाद दे दिया। कुसुम के सामने ट्रे बढ़ाते हुए भावना के हाथ कांपने लगे।  यज्ञ ने कुसुम का प्याला भी खुद उठा लिया..।

“लो कुसुम चाय पियो !”

उसके सामने चाय का प्याला बढ़ा कर यज्ञ ने कहा और कुसुम ने बिलकुल बेमन से प्याला पकड़ लिया…

चाय पीने तक चारों खामोश बैठे रहे। सबसे पहले यज्ञ ने हीं अपना प्याला रखा, और खड़ा हो गया।

” आप लोगों से मिलने का कुसुम का बहुत मन था। बस इसीलिए उसे इतनी रात को लिए आए, अब हम लोग चलते हैं। वैसे कभी हो सके तो आप भी हमारे घर आइये !”
    यज्ञ ने राजेंद्र से कहा और पहली बार मुस्कुरा कर राजेंद्र की तरफ अपनी हथेली बढ़ा दी।
राजेंद्र ने भी अपने दोनों हाथों में यज्ञ का हाथ थाम लिया। बहुत गर्म जोशी से दोनों लड़कों ने हीं हाथ मिला लिया…
वही बैठी कुसुम अब तक राजेंद्र की बातो के सदमे में थी..।

“चले कुसुम ?”

यज्ञ ने कुसुम से पूछने वाला वाक्य कहा, लेकिन बिना उसकी तरफ देखे, उसका जवाब सुने, गाड़ी की चाबी हिलाते हुए बाहर निकल गया।
कुसुम की समझ से परे था कि यह लड़का वाकई उससे कुछ पूछता भी है, या सिर्फ अपनी ही चला लेता है।

वहां से उठकर दरवाजे तक पहुंच कर पलट कर कुसुम ने भावना को देखा। भावना अब भी जमीन पर गड़ी जा रही थी।
उसे बार-बार कुसुम के सामने राजेंद्र का खुद को गले से लगाना याद आ रहा था, और वह इस शर्म में मरी जा रही थी।

    कुसुम ने जलती हुई आंखों से भावना को देखने के बाद राजेंद्र को देखा। राजेंद्र भी उसे उतनी ही जलती हुई निगाहों से देख रहा था।
   राजेंद्र ने उसे जाने का इशारा कर दिया।

अपमान से काली पडती कुसुम पलट कर घर से बाहर निकल गई। पैर पटकती हुई कुसुम यज्ञ तक पहुंची कि यज्ञ ने उसके लिए कार का दरवाजा खोल दिया।

दरवाजे के अंदर घुसकर तमक कर वो अपनी जगह पर बैठ गई। यज्ञ में झुक कर उसकी साड़ी का आंचल समेट कर बहुत प्यार से उसकी गोद में रख दिया, और खुद दूसरी तरफ से आकर गाड़ी में बैठा और गाड़ी घर की तरफ घुमा दी..

” चाय बड़ी अच्छी बनाई थी तुम्हारी दोस्त ने..।
वैसे हमें लगता है भावना खाना भी बहुत अच्छा बनाती होगी। किस्मत वाले हैं डॉक्टर साहब।”

यज्ञ के चेहरे से शरारत भरी मुस्कान नहीं जा रही थी, और कुसुम अपनी जगह पर अकड़ी हुई बैठी थी। उसे लग रहा था वह अपना सर फोड़ ले।

” इतना भी कुछ खास अच्छा नहीं बनाती। उससे अच्छा तो हम बना लेते हैं।”

यज्ञ जानता था कि उसकी बिगड़ैल बिल्ली ऐसा ही कुछ जवाब देगी।

” हमें क्या पता? हमने तो कभी कुछ खाया ही नहीं?”

” ठीक है, कल कुछ खिला देंगे। बताइए क्या खाना चाहते हैं आप ?”

“अब बोल कर ही अपनी पसंद बनवाई तो फिर क्या मतलब है? कुछ ऐसा बनायें की खाकर यूं लगे की यही चीज बार-बार खानी है।”

” आप बातों को इतना गोल-गोल घूमाते क्यों है? साफ और सीधा बोलना नहीं आता?”

” नहीं बिल्कुल नहीं। लेकिन हमें गाने, गाना आता है। आज वह दोनों जब सामने बैठे थे ना, बड़े रोमांटिक से कपल लग रहे थे। तब एक गाना दिमाग में घूम रहा था।”

कुसुम ने जलती हुई नजर से घूर कर यज्ञ को देखा और यज्ञ ने बुरी तरह से उसकी गुस्से वाली नजर को नजरअंदाज करते हुए गाना शुरू कर दिया..।

ऐसे भोले बन कर हैं बैठे, जैसे कोई बात नहीं
सब कुछ नज़र आ रहा है, दिन है ये रात नहीं
क्या है, कुछ भी नहीं है अगर
होंठों पे है खामोशी मगर
बातें कर रहीं हैं नज़र चुपके चुपके
दो दिल मिल रहे हैं,मगर चुपके चुपके  …..

गुनगुनाते हुए यज्ञ गाड़ी को मानौर की तरफ भगाए जा रहा था कि तभी उसे रास्ते में एक मटका कुल्फी वाला दिख गया। उसने गाड़ी रोकी और बड़े प्यार से दो कुल्फी  लेकर चला आया ।

“लो खा लो, दिमाग थोड़ा ठंडा होगा।”

” हमारा दिमाग एकदम ठंडा है।”

” तो फिर ऐसे मुंह चढ़ाकर क्यों बैठी हो?”

” हम कुछ सोच रहे थे?”

” क्या सोच रही थी?”

” कि कल आपके लिए क्या बनाएंगे?”

यज्ञ को जोर से हंसी आ गई। वह जानता था उसकी बिगड़ैल बिल्ली को झूठ बोलना नहीं आता। वह जैसी है वैसी ही सामने से नजर आ जाती है। आज जरूर वह भावना और राजेंद्र पर नाराज थी, लेकिन कुछ दिनों बाद जब उसका बचपना दूर हटेगा तब वह खुद भी समझ जाएगी की राजेंद्र ने आज जो कुछ भी भावना के बारे में कहा वह सच है। और जिस दिन उसकी आंखों से उसकी झूठी मोहब्बत का चश्मा हटेगा, वह यज्ञ को भी चाहने ही लगेगी।

यज्ञ ने दोनों कुल्फियां खाना शुरू कर दिया, वह दूसरी कुल्फी पर मुंह लगाने वाला था कि कुसुम ने उसके हाथ से कुल्फी ले ली ..

“ज्यादा ठंडा खाएंगे और रात भर खांस कर हमारी नींद ख़राब करेंगे.. !”

मुहं फुलाए हुए कुसुम अपनी कुल्फी खाने लगी..
यज्ञ ने मुस्कुरा कर गुनगुनाते हुए गाडी आगे बढ़ा दी..

दूरियाँ अब कैसी, अरे शाम जा रही है
हमको ढलते-ढलते समझा रही है
आती-जाती साँसे जाने कब से गा रही है…
कहीं बीतें ना…
गाता रहे मेरा दिल,तू ही मेरी मंज़िल
कहीं बीतें ना ये रातें,कहीं बीतें ना ये दिन…

क्रमशः

aparna..

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Preeti Bhatia
Preeti Bhatia
2 years ago

Vaise bhavna ne chai bnai kaise doodh to khatam ho gya tha

pusp233
1 year ago
Reply to  Preeti Bhatia

Mai v wahi soch rhi thi ..s
Padhte time …bina dudh wali chai mention kar diya hota toh achha hota

Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

वाह! आज के पार्ट में तो मजा ही आ गया, राजी ने क्या जवाब दिया है कुसुम को !! पर कुसुम ने ये सवाल सिर्फ भावना से किया, बल्कि ये swal राजी से करना चाहिए था , या दोनो से!! अकेले भावना से गुस्सा जताया वो राजी से देखा नही गया और कूद पड़ा दोनो सहेली के बीच, एक बारगी तो खुशीभी हुई और दूसरी तरफ से कुसुम के लिए बुरा भी लग रहा था , एक ने तेजाब डाला और दूसरे ने नमक की पोटली से नमक ।
पर कुछ भी हो राजी का भावना को कुसुम को दिखाकर गले लगाना अच्छा नही लगा, बिना दिखाए ये हरकत करता तो नजर उतार लेती। पर लगता तो ऐसा ही है की राजी के मन में भावना के लिए भाव तो कब से थे पर आज कुसुम को सुनने के बहाने ही सही भावना के सामने उसे सब स्वीकारा ।♥️♥️
यज्ञ का गाना गाना उफ्फ अल्लाह 😍🤗🤗🤗
अब तो भावना से अच्छा खाना बनाती है वो दिखाने ही सही, अब ठकुराइन खाना बनाने तो जायेगी ही अपने सैया के लिए 😍😅 देखते है क्या बनाती है और कैसा बनाती है , लगता है नमक डालना भूल भी जायेगी तो दीवाना उंगली चाट चाट के खा लेगा 🤣🤣🤣
भावना जितना महास्तब्ध थी वैसे ही हम सब थे , आज तो राजी के मुंह से इतनी सारी बातें बुलवाकर , हमे तो आपने स्टेच्यू कर दिया था , जब गले लगाया तब जाकर कुछ सांस आई 🙈🙈🙈🙈🙈
अब देखते है की कुसुम के जाने के बाद , राजी का व्यवहार कैसा होगा भावना संग , वापिस साइलेंस ज़ोन में चला जायेगा की यज्ञ से हाथ मिलाकर कुछ यज्ञ जैसी आदत भी आयेगी उसमे 🤭🤭🤭🤭🫣🫣😎