जीवनसाथी -3 भाग -95

जीवनसाथी -3 भाग -95

गीता चुपचाप खड़ी थी, प्रियदर्शिनी वहां से भागने की फ़िराक में थी, लेकिन उसका हाथ रूपा ने पकड़ रखा था…

“धनुष… उस एक सरप्राइज को भी ले ही आओ… ! मैं तो बेवकूफ अंधी हूँ, लेकिन ये दोनों औरते तो बडी शातिर हैं ना !”

“जी रानी माँ.. अभी लाया.. !”

और धनुष वहाँ से निकल कर बाहर चला गया..

धनुष के वहाँ से बाहर जाते ही प्रियदर्शिनी और गीता  एक दूसरे की तरफ देखने लगे..।
इन्हीं सब के बीच गीता के पति की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति अचानक वहां से कब गायब हो गया गीता और प्रियदर्शिनी को मालूम ही नहीं चला..।

अब उन दोनों के पास भी वहाँ से भागने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था..
वो दोनों एक दूसरे के साथ आँखों ही आँखों में इशारा करती वहां से निकल भागने के मनसूबे बनाने लगी, लेकिन वहां मौजूद लोग इतने भी बेवकूफ नहीं थे कि ऐसे ही इन दोनों को निकल जाने देते…

कुछ पांच मिनट में ही धनुष किसी को साथ लिए वापस लौट आया..
उसके साथ मिलर आया था…।

मिलर को पुलिस की यूनिफॉर्म में देख कर प्रियदर्शिनी की ऑंखें फटी रह गयी..।

वो उसे सामने खड़ा देख अपना हाथ रूपा के हाथ से छुड़ा कर भाग कर मिलर तक पहुँच गयी..

“मिलर तुम ? तुम्हे किसी फिल्म में पुलिस का रोल मिल गया है क्या ? जो तुम पुलिस की यूनिफॉर्म में यहाँ आ गए ?”

प्रियदर्शिनी को लगा अब वो बच कर निकल सकती है !

“सॉरी देविका.. मैं पुलिस की एक्टिंग नहीं कर रहा बल्कि वाकई पुलिस में काम करता हूँ !”

“क्या ? लेकिन कब से ?”..

“तुमसे मिलने के पहले से ही !”

“तुम तो जिम में काम करते थे ना ?”

“नहीं.. वो सिर्फ तुम्हे फंसाने के लिए बना था.. !”

“मतलब ?” वो आश्चर्य से मिलर को देखने लगी..

“मेरा असली नाम कुणाल है, और मैं पुलिस विभाग में काम करता हूँ… यहाँ पर राजकुमारी का खेल खेलने से पहले तुमने और तुम्हारी इस नकली माँ ने बैंक में भी एक लोन वाला घोटाला किया था.. याद है ना !
एक फर्जी एनजीओ के नाम पर तुम दोनों ने खुद को उस एनजीओ का कार्यकर्त्ता बता कर लोन पास करवाया था..
वहां जो प्रॉपर्टी जमानत के तौर पर जमा की, वो भी तुम्हारी नहीं थी..
तुम दोनों वहां से पच्चीस लाख का लोन उठा कर गायब हो गयी थी, लेकिन जब छह सात महीने तक तुम्हारा ईएमआई जमा नहीं हुआ, तब बैंक ने उस प्रॉपर्टी होल्डर को तलाशा और उससे पूछताछ की, वो इस बारे में कुछ जानता ही नहीं था..।

वो तुम दोनों को भी नहीं जानता था..।

और तब बैंक ने इस सारे मामले की एफआईआर लिखवाई और ये केस मेरे थाने में पहुंचा..

इन दोनों ने बैंक में अपने जितने भी पहचान पत्र दिए थे सब नकली थे,तस्वीरें भी धुंधली सी थी।
इसलिए इन दोनों को पकड़ना बेहद मुश्किल था..
लेकिन गलती करने वाला कहीं ना कहीं कुछ तो चूक कर ही जाता है..

इन्होने जिन जमानतदारों का जिक्र किया था, उन्हेँ ढूंढ़ कर उनसे मैंने पतासाजी की.. वो लोग इनके उस वक्त के पडोसी थी.. ये दोनों उन लोगो के बीच सिर्फ चार महीने से रह रही थी..।

वहाँ पर ये दोनों बहने बन कर रहा करती थी, और सब की इतनी मदद करती थी कि लोगो को लगने लगा दोनों बहुत नेकदिल बन्दियाँ हैं..।

हालाँकि मेरे वहां पहुँचने से पहले ही वो दोनों घर छोड़ कर भाग चुकी थी, लेकिन उन पड़ोसियों से पूछताछ में जितना पता चला उसके आधार पर मैंने ढूँढना शुरू कर दिया !
  अपना नाम गीता बताने वाली मैडम का नाम समीक्षा है.. !
  इन दोनों का काम ही ठगी का है !!

  मैं इन्हे तलाशने में लगा था कि इनका पुराना पडोसी मेरे पास चला आया।
वैसे तो ये दोनों कहीं अपनी तस्वीरें नहीं लेने देती थी, लेकिन उनके बेटे के जन्मदिन की पार्टी में पीछे खड़ी देविका की एक झलक मिल गयी और फिर मैंने कम्प्यूटर की सहायता से उसकी उस आधी अधूरी तस्वीर से पूरी तस्वीर निकाल ली..।

और फिर उसकी तलाश में लग गया…

बहुत ढूंढने के बाद ये मुझे मिल गयी, लेकिन इसे मैं रंगे हाथ पकड़ना चाहता था..
मुझे लगा कि ये दोनों औरते शातिर है और सिर्फ एक बैंक फ्रॉड कर के चुप बैठने वालों मे से नहीं है। और इसीलिए मैंने चुपचाप इस पर नजर रखना शुरू कर दिया।

मुझे पता चला कि यह कब कब कहां जाती है। और फिर किसी न किसी तरीके से बार-बार इसके सामने आने लगा। फाइनली इसे मैंने अपना परिचय एक जिम ट्रेनर के रूप में दिया…।

मैं इससे दोस्ती करके इसके आगे के प्लान जानना चाहता थ।  इत्तेफाक से यह एक अच्छी बात हो गई कि इसने मुझे दोस्त बना लिया, लेकिन इसने कभी भी मुझे अपनी और समीक्षा की असली जिंदगी के बारे में कुछ नहीं बताया।
फिर भी मैं इससे मिलता-जुलता रहा और जानने की कोशिश करता रहा।

धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि यह मेरी तरफ कुछ ज्यादा आकर्षित हो रही है। लेकिन एक बात मैं अच्छे से जानता था, यह कभी नहीं सुधर सकती।

किसी लड़के के साथ जुड़ने और शादी करने के बावजूद इसके दिमाग में पैसे कमाने की जो लालसा है, वह कभी खत्म नहीं हो सकती। कुछ समय के लिए कम जरूर हो सकती है..
उसी वक्त मैंने इस बात पर भी ध्यान दिया कि समीक्षा इसे मुझसे दूर रहने के लिए टोकने लगी थी..।

ध्यान से इन दोनों की आपसी बातचीत को सुनने समझने पर मुझे लगा कि यह लोग अब फिर किसी बड़े काम की प्लानिंग कर रहे हैं। और इसलिए मैंने मुंबई जाने का बहाना बनाकर देविका से दूरी बना ली, और चुप कर इन दोनों पर नजर रखने लगा…।

उस वक्त मैं नहीं जानता था कि यह लोग सीधे महल के लोगों को फंसाने की योजना बना रहे हैं। और वह भी अभी से नहीं पिछले कई सालों से समीक्षा इस काम में लगी हुई थी।

और अब वह अपना अंतिम दाव खेलने वाली थी। मेरे देविका के जीवन से हटते ही समीक्षा देविका को लेकर महल पहुंच गई, उसने अपना पासा चल दिया..।

हालाँकि ये दोनों जब मेरे शहर से गायब हुई, तब एकदम से मुझे मालूम ही नहीं चल पाया की ये दोनों कहाँ गयी..
मुझसे बात करने के लिए देविका जो सिम उपयोग में लाती थी उसे यहाँ से जाने के पहले समीक्षा ने तोड़ कर फेंक दिया था..

ये दोनों शातिर औरते वहां से निकल कर यहाँ पहुँच गयी और मैं इन्हे तलाश नहीं कर पाया…

और फिर विभाग की तरफ से दूसरे काम में भी उलझ गया.. लेकिन इनकी तलाश मैंने जारी रखी..

मैं इन्हे ढूंढ़ नहीं पा रहा था..
और तब मुझे ढूंढते हुए ये साहब वहां पहुँच गए… !”

कुणाल ने साथ खड़े धनुष की तरफ इशारा कर दिया..

“अब आगे की कहानी मैं सुना देता हूँ.. !”

धनुष मुस्कुरा कर बोल पड़ा..

“हाँ धनुष अब आगे तुम बताओ कि कैसे तुमने हमारी मदद की है.. !” रूपा के बोलने पर धनुष ने झुक कर उनका आदेश स्वीकार करते हुए बोलना शुरू किया..

“पहली बार ज़ब हर्ष भाई के लिए इनका रिश्ता आया तभी इनके क्रेडेंशियल्स सुन कर माथा ठनका था, लेकिन उस वक्त हर्ष भाई वाला केस हो जाने के कारण मैं उसमे व्यस्त हो गया।
लेकिन जैसे ही वहां से फ्री हुआ मैंने इस परिवार के बारे में छानबीन शुरू कर दी, लेकिन इन लोगो ने काफी ज्यादा तैयारी कर रखी थी..।

कहीं से कुछ भी पता करो सब कुछ वैसा ही पता चल रहा था जैसा इन लोगो ने दिखाया था।
और प्रियदर्शिनी का यही ओवर  परफेक्शन दिमाग को खटक रहा था।
जैसे प्रियदर्शिनी के स्कूल कॉलेज डिग्री वगैरह..।

इनके सोशल मिडिया अकाउंट पर भी इनकी तस्वीरें काफी रॉयल थी..।
कहीं से कोई लूपहोल्स नहीं थे।
फिर एक बार लगा कि शायद ये जो लिगेसी दिखा रहे वो सच है…
और फिर मैंने इनके बारे में खोजबीन कुछ समय के लिए बंद कर दी..
लेकिन तभी रानी माँ ने शौर्य से प्रियदर्शिनी की शादी का एलान कर दिया..

और तब प्रियदर्शिनी दिल्ली चली आयी।

तब इनके साथ मीठी को एक पूरा दिन बिताना पड़ा।
हम सब को भी ये सौभाग्य मिला और फिर इनकी हरकतों को देख कर मुझे एकदम से समझ में आ गया की ये जो खुद को दिखाती है, वो ये नहीं है..।

उसके बाद एक बार फिर मैंने खोजबीन शुरू की और इस बार मुझे सफलता मिल गयी..
एक एक कर कड़ियाँ जुड़ती गयीं और रास्ता अपने आप बनता गया..।

जब इन दोनों के ख़िलाफ़ सारे सबूत हाथ लग गए, तब मसला ये सामने आया कि अब रानी माँ के सामने ये बात कैसे लायी जाये..

तब मैंने हुकुम सा यानी रानी बांसुरी सा से बात की और उन्हेँ सारी बातें बता दी..
वो सारी बातें सुन कर वो आश्चर्य चकित रह गयी। और फिर उन्होंने राजा साहब को सब कुछ बता दिया..।

राजा साहब को सब बताने के बाद वो रानी माँ के पास गयी और बातों ही बातों में उन्हेँ इस कदर उलझाया कि वो राजा साहब यानी अपने देवर से बात करने के लिए मजबूर हो गयी..

राजा साहब से बातचीत में उन्होंने रानी माँ का संशय दूर कर दिया और साथ ही ये भी कहा कि सगाई से पहले एक बार प्रियदर्शिनी से बात कर ले..।

रानी माँ ने अपने लाड़ले देवर की बात मान ली..

और जिस वक्त वो प्रियदर्शिनी के कमरे की तरफ बढ़ी उसी समय मैंने प्रियदर्शिनी के नंबर पर मिस्ड कॉल देनी शुरू कर दी..
दो बार अनजान नंबर से आयी कॉल पर समीक्षा जी ने अपने विचार रखें की “कहीं ये मिलर यानी कुणाल का फ़ोन तो नहीं, लेकिन उसे कैसे प्रियदर्शिनी का नंबर मिल गया ?”

मैं जानता था की ऐसे लोग जिनके मन में चोर होता है वो चीज़ो और घटनाओ को ऐसे ही बातो से जोड़ते हैं..।

मैंने जो सोचा वही हुआ और इन दोनों माँ बेटी ने बातों ही बातों में अपनी सारी छुपी हुई बातों को अनजाने में बोल दिया..।

हालाँकि इतना सब ये बोल जाएँगी ये मैंने नहीं सोचा था.. मुझे लगा था बस ये दोनों एक दूसरे को असली नाम से रानी माँ के रहे में पुकार भी ली, तो मैं सामने आकर सब उगलवा लूंगा। लेकिन ज़रूरत ही नहीं पड़ी..।

रानी माँ स्तब्ध खड़ी सुन रही थी कि मैंने आकर अपने फ़ोन का वॉइस रिकॉर्डर चालू किया और सब कुछ रिकॉर्ड कर लिया..
बाकी सब आप सब के सामने हैं.. !”

धनुष ने शौर्य की तरफ देखा और शौर्य आश्चर्य से आंखे फाडे कभी बगल में बैठ कर मुस्कुराते हर्ष को तो कभी सामने खड़े धनुष को देख रहा था..

तो इसका मतलब उसे इस सगाई से बचाने उसके भाई उसे बिना बताये ही जूझ रहे थे.. ?

“मैं भी इनके साथ शामिल था इनकी टीम में !” पीछे से आकर यश ने शौर्य के गले में बांहे डाल दी..

“और मैं भी !” मीठी भी मुस्कुरा उठी..

“हमें बस भूल जाइएगा.. आप लोग !” हंस कर उनकी टेबल पर हाथ रख परी भी मुस्कुराने लगी..

“ओह्ह गॉड मतलब तुम सब मिले हुए थे !”

शौर्य ने आश्चर्य से उन सब को देखा.. वहीँ एक तरफ शोवन भी खड़ा था.. शौर्य ने उसे देख इशारे से पूछा उसने भी गर्दन झुका कर हामी भर दी..

शौर्य हल्के से मुस्कुरा उठा..

क्रमशः

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bharti Dogra
bharti Dogra
1 year ago

👍👍👍👍❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Bahut satir dimag ki Nikli,ye nakli Ma beti,lekin galat karnaya ka bhanada to phutta hi hai,phir unki duragati hoti hi hai.

Archana
Archana
1 year ago

Mam jeevan saathi ke part show nahi ho rahe 99 ke baad please check

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐🍫🍫🍫🍫

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

ऐसे होते हैं भाई बहन एक तो तकलीफ आई तो सारे के सारे जूझ गए वो भी उसकी बताए बिना।कितने प्यारे है ना ये सब।बहुत ही उम्दा लेखन👌🏻👌🏻

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻😳😳😳😳😳😳😳😳👌🏻👌🏻👌🏻

Renu vyas
Renu vyas
1 year ago

Kya hi kahu dil kya aap jaan bhi maang le to haskar de denge
Aapki lekhni ko sat sat naman
Lajabab shaandar khoobsurat

इंदु कपूर
इंदु कपूर
1 year ago

बहुत मज़ेदार पार्ट रहा सो रिलैक्सिंग। हमारे अंतर्मन के अनुसार हो जाए तो अनचीन्ही सी खुशी से मन भर जाता।

Archana
Archana
1 year ago

Mam jeevan saathi ka next part kab aayega?

Sooch
Sooch
1 year ago

Next part kab aayega