
अतिथि -13
माधव डिंकी में खोया था कि प्रणय की आवाज़ उसके कानो में पड़ी..
“ये सुमन तो असली वाली से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है…।
सुपर गॉर्जियस.. है न ?”
माधव चिहुंक उठा..
“कुछ भी बोलते हो यार तुम.. सोच समझ कर बोला करो.. मेरे अंकल की बेटी है !”
‘कल को तुम्हारी धर्मपत्नी भी हो सकती है !” प्रणय टहूका..
लेकिन ये सुन कर माधव के चेहरे का रंग खिलने की जगह बुझ सा गया..
“ज़िन्दगी है मेरे दोस्त, किसी फिल्म की कहानी नहीं है! यहाँ कुछ भी हमारे हाथ नहीं होता !”
“फ़िज़ूल बकवास तो न ही करो तुम.. घर के बड़े लड़के हो, पिता जी का छप्पन बार फ़ोन आ जाता है हाल चाल पूछने।
माता जी अलग परेशान रहती हैँ दूध पीता है कि नहीं, फ्रूट्स खाता है न ?
जब इतना लाड़ लड़ाने वाले अभिभावक हैँ तो फिर काहे की चिंता यार..?
जब जिस दिन घर पर बोलोगे सब तुरंत तैयार हो जायेंगे !”
“इतना आसान नहीं है मेरे भाई, जितना तुमको नजर आ रहा.. !”
उन दोनों की बातों के बीच डिंकी वहाँ चली आयी..
हलकी आसमानी सी डेनिम पर उसने सफ़ेद कमीज पहन रखी थी, धागों और ज़री के काम की बिन बाहों की जैकेट को उसने अपनी शर्ट के ऊपर से डाल रखा था.. बाल खुले हवा में लहरा रहे थे, और कानो में अब भी वहीँ झुमके लटके हुए थे..
मुहं धोकर आयी थी इसलिए डाँस की थकान चेहरे से गायब हो चुकी थी और अब वो खिला हुआ गुलाब लग रही थी..
वो आकर माधव के ठीक सामने की कुर्सी पर बैठ गयी..
“कैसा लगा मेरा डांस ?”
“अच्छा था.. डांस भी सीखती हो ?”
माधव पूछ बैठा ….
“नहीं.. डांस भी कोई सीखने की चीज है? मैंने तो माय ट्यूब देख देख कर सीख लिया..।”
डिंकी ने मुस्कुरा कर प्रणय की तरफ देखा..
“आप लोगो ने कुछ लिया ?”
डिंकी का इशारा चाय की तरफ था, प्रणय ने होंठो को अंदर की तरफ मोड कर गर्दन हिला दी..
“ओह्ह.. मैं कुछ लेकर आती हूँ !”
वो उठने लगी कि माधव ने हड़बड़ी में उसका हाथ पकड़ लिया..-“नहीं रहने दो !”
लेकिन जैसे ही डिंकी ने थम कर उसकी तरफ देखा, उसने तुरंत छोड़ भी दिया..
“अच्छा ठीक है, चलिए बाहर ही कुछ ले लेंगे !”
डिंकी भी माधव और प्रणय के साथ वहां से बाहर निकल आयी..
माधव और डिंकी को चाय पकड़ा कर प्रणय अपनी चाय लिए एक सिगरेट सुलगा कर उन दोनों से दूर रेलिंग के पास खड़ा हो गया..
माधव चाय पीने लगा, डिंकी की नजर माधव पर ही थी..
“कल हम लोग ऑफिस की तरफ से लखनऊ केंट जा रहे हैँ.. सुबह नौ बजे निकलेंगे बस से !”
“हम्म !” माधव पूछना तो बहुत कुछ चाहता था, लेकिन सिर्फ हम्म बोल कर रह गया..
“पूछेंगे नहीं केंट क्यों जा रहे ?”
माधव ने सर उठा कर डिंकी की तरफ देखा..
जितनी प्यारी उतनी ही मासूम…।
“क्यों जा रही हो ?”
“ड्रेस डिज़ायनिंग के साथ ही इस बिज़नेस में ये जानना भी बेहद ज़रूरी है कि किस जगह पर कपड़े कैसे मिलते? कहाँ पर कैसे कपड़े बेचे जाने..।
वगैरह वगैरह..।”
“अच्छा वहाँ का बाजार देखना है ?”
“नहीं, वहाँ एक कार्यशाला है.. कल शनिवार है न !”
“अच्छा !”
“आपकी तो छुट्टी होगी न कल ?”
“हम्म !” इसके आगे माधव ने कुछ नहीं कहा और न ही डिंकी ने..
चाय ख़त्म कर माधव प्रणय के साथ निकल गया..
रात अपनी बालकनी में खड़ा माधव सामने के रास्ते को देख रहा था..
अक्सर तो डिंकी गरिमा के घर आती है, ठीक सामने वाली गली में ही तो उसका घर है, लेकिन यहाँ से नजर नहीं आता..।
आज डिंकी बता रही थी कल सुबह उसे जाना है.. इतनी खोजबीन काहे कर रही थी..?
कहीं इशारो में ये तो नहीं कह गयी कि छुट्टी है तो आप भी संग चलिए..।
नहीं नहीं सवाल ही नहीं उठता !!
वो बड़ी देर तक अपनी उलझनों में खोया रास्ते को ताकता रहा, हो सकता है गरिमा के साथ यूँ ही कॉलोनी का चक्कर लगा जाए..।
वो देर तक खड़ा रहा, लेकिन वो नहीं आयी..।
अंदर आकर देखा तो बहुत रात बीत चुकी थी, लेकिन आँखों से जैसे नींद गायब थी..
ये क्या हो रहा था, न उसे भूख लग रही थी और न नींद आ रही थी..
उसने एक सिगरेट सुलगा ली..
लेकिन दो चार कश लेकर वो भी बुझा दी..
बार बार नृत्यरत डिंकी जैसे उसकी आँखों के सामने चक्कर काटने लग जाती थी…।
वो क्यों उसकी तरफ खिंचता चला जा रहा है, जबकि वो जानता है उसे ऐसा करने का हक नहीं है..।
उसकी और डिंकी की उम्र में भी लम्बा फासला है..। इस साल पच्चीस पूरा कर छब्बीसवाँ साल लग जायेगा, वो बमुश्किल अट्ठारह उन्नीस की होगी..।
खैर उम्र को एक तरफ रख भी दे तो, भी वो उसके बारे में नहीं सोच सकता..।
बस यही सत्य है बाक़ी सब मिथ्या !!
अब से वो नहीं जायेगा उसके घर, न ही उसके ऑफिस वाली बिल्डिंग में चाय पीने जायेगा..।
देर रात तक छत पर टकटकी लगाए वो यही सब सोचते सोचते जाने कब सो गया..।
सुबह रोज़ की तरह अलार्म नहीं बजा! शनिचर और इतवार को उसका अलार्म बंद रहता था, लेकिन उसने कोई मीठा सा सपना देखा था, इसलिए नींद खुली तो बहुत तरोताज़ा लग रहा था उसे।
जैसे अभी अभी डिंकी के घर से वापस आया हो..
उसने घड़ी पर नजर डाली, घड़ी साढ़े आठ बजा रही थी..
जाने उसके दिल में क्या आया, वो फटाफट मुहं हाथ धोकर चप्पल डाल बाहर निकल गया..।
उसने फटाफट बाइक उठायी और अपने ऑफिस के रस्ते निकल गया..।
बस दूर से एक झलक देख कर वापस निकल जाऊंगा..
डिंकी ने उसे बताया था कि ऑफिस के पास से ही सब बस में सवार होकर निकलेंगे..
वो तेज़ी से बाइक चलाता हुआ वहां पहुँच गया..
लेकिन उसके पहुँचने तक में एक बस वहां से जाती हुई उसे दिख गयी..।
उसके मन में आया कि बस का पीछा कर ले। लेकिन ये कितना अशोभनीय लगता।
अगर कहीं बस में बैठी डिंकी उसे देख ले, तो कितना ख़राब लगेगा..।
बस आगे बढाती चली जा रही थी और पीछे खड़े माधव को कुछ छूटता सा लग रहा था..।
पता नहीं कहाँ बैठी होगी ? वैसे जैसा उसका स्वभाव है खिड़की पर ही बैठी होगी..।
पता नहीं कौन सी ड्रेस पहनी होगी.. जींस में चली गयी होगी या कुरता डाला होगा.. ?
कल वाले झुमके पहने होंगे या नहीं..?
बाल शायद पीछे कर के क्लचर लगा रखा होगा, क्यूंकि खिड़की पर बैठने से तो बाल सारे उड़ कर ख़राब हो जायेंगे..।
डिंकी के पास वाली सीट पर कौन बैठा होगा ? कोई लड़की ही होगी, जो अक्सर उसके साथ नजर आ जाती है, या हो सकता कोई लड़का हो..।
हाँ आजकल आधुनिकता की होड़ है, लड़के लड़कियाँ संग बैठे बातें करते जाते हैँ.. कल भी तो कितने सारे लड़के नजर आ रहे थे, हालाँकि डिंकी किसी से भी बात करने में ररुचि नहीं दिखा रही थी..।
लेकिन फिर भी..
इन आजकल के लड़को का क्या भरोसा? कोई आकर ज़बरदस्ती बैठ गया हो तो..
वैसे बिना मर्जी के डिंकी कुछ सह ले, ऐसी नहीं है.. डाँट डपट कर भगा देगी..।
ये सोच कर ही उसके चेहरे पर हंसी आ गयी..।
एकदम से उसे लगा कि डिंकी को बस एक बार देखने वो सुबह सुबह छुट्टी वाले दिन इतना दूर भाग आया.. और जबसे यहाँ खड़ा है उसी के बारे में सोच रहा है, क्या वो पागल होने लगा है..?
कल रात ही तो उसने तय किया था कि अब डिंकी के बारे में नहीं सोचना है, न उसके घर जाना है..।
फिर वो क्यों ऐसा बौराया सा यहाँ खड़ा है..?
उसने बाइक खड़ी कर दी..
बिना किसी लक्ष्य के वो यहाँ तक भागता चला आया था, सिर्फ डिंकी को एक झलक देखने चला आया था और वो भी नजर नहीं आयी..।
मौसम में ठंडक थी, और हलकी सी बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी…
बाइक खड़ी कर माधव ने पीछे रोड पर की चाय की टपरी वाले को आवाज़ लगा दी..
“एक चाय देना छोटू ?”
“जी भैया जी !”
वो वापस अपनी बाइक से कमर टिका कर खड़ा हो गया…
वो चाहता नहीं था लेकिन एक बार फिर उसका दिमाग डिंकी के ख़यालो में खोने लगा..
पता नहीं उसने सोचा भी होगा या नहीं कि मैं आऊंगा या मैं आ सकता हूँ..।
नहीं ही सोचा होगा, वरना…
वो अचानक सोचते हुए रुक गया.. वरना क्या होता.. क्या गाड़ी को रोक देती..
वो कुछ भी कर सकती है..
ये बात दिमाग में आते ही वो हल्के से मुस्कुरा उठा..
एक भीना सा खुशबु का झोंका आया और उसे हल्के से सहला गया..।
अपने में खोया सा वो गाडी को स्टैण्ड से निकाल कर निकलने को था कि उसके समने उसकी चाय का कुल्हड़ चला आया..
“अरे, मैं चाय तो भूल ही गया !”
गाड़ी खड़ी कर उसने पलट कर देखा सामने अपने दोनों हाथो में चाय लिए वो खड़ी थी..
क्रमशः

Dinki uska intzar kar rahi thi.wo gyi nahi
माधव के दिल और दिमाग पर dinki छा गई है। चाहते हुए भी नहीं स्वीकार कर पा रहा माधव जाने आगे भाग्य के क्या खेल हो। बेहद शानदार भाग 👏👏👏👏
ना उम्र की सीमा हो ना जन्मो का हो बंधन
जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन
ईश्वर ने अगर राधा माधव सोचा है तो उसे कोई नही बदल सकता
Wah jiskaya khayalo me khoya hai wahi Chai ka piyala liya aa pahuchi,kya hi Khubsurat pai hongaya us prami ke liya,Very nice n interesting and Imotional n Fantastic n Fabulous part.
Agla part kb ayega
mam aap atithi ka next part kab dengi, please ise b continue kijiye
क्या बाबू खुद ही सवाल करते हो खुद ही जवाब देते हो अब चाय ले लो लेकिन अच्छे से दिमाग से सोच लो कि वो ही असली डिकी है या छोटू को भी डिंकी बना दिए भई दिमाग में 😊👌👌👌 लाजवाब पार्ट
कितना मासूम और प्यारा 🥰🥰🥰🥰😊😊😊😊😊है यह लड़का अपने विचारों में खोने से खुद को ही रोकना है और फिर खुद ही अपनी बनाई हुई दुनिया में खो जाता है खुदसे ही सवाल कर रहा है खुद को ही जवाब देकर मना रहा है।
वो ना चाहते हुए भी सुबह उठकर पिंकी के पीछे उसकी बस तक आया और बस निकल जाने के बाद ढेरों सवाल जवाब उसके मन में उथल-पुथल मचाए ही थे कि सामने चाय लिए डिकी चली आई अब आगे क्या होगा आप ऐसे समय पर रचना को रोकती हो जहां पर दिमाग अपने घोड़े 😊😊😊😊😊😊दौड़ाना शुरू करता है
अब आगे क्या batchit hogi donon ki aur kya din ki usse poochhegi ki सुबह-सुबह vah yahan kaise jabki uski to chhutti hai आज office ki aur vah Bhala Manus kya hi jawab dega use ladki ko 🥰🥰🥰🥰🥰
Bahut sundar
imagination ही होगी, चाय वाले छोटू में डिंकी नजर आ रही, माधव बाबू मान लो इश्क हो गया है