
अपराजिता -159
रेशम पैकिंग करने के बाद आलस करती हुई माँ की गोद में सर रखे लेटी उनसे बातें करते हुए सो गयी..
उसे खुद मालूम नहीं चला कि कब वो गहरी नींद के आगोश में चली गयी….
शाम हुई तब गुड़िया चाय बना कर ले आयी और रेशम के बालों पर हाथ फेरते हुए उसकी माँ ने उसे प्यार से जगा दिया..
“तुझे कहीं जाना भी तो है ना.. रेशू..!
उठा जा, शाम ढल रही !”
चौंक कर वो उठ बैठी…
“अरे, जाने कितनी देर सोती रह गयी.. पहले तो कभी ऐसी नींद नहीं आयी !”
रेशम उठ कर मुहं धोने चली गयी और तभी गुड़िया उसके पास चली आयी..
“दीदी कुछ औरते आपसे मिलने आयी हैं !”
मुहं पोछ कर रेशम बाहर चली आयी..
गांव की ही औरते थी जो अक्सर उसके पास दवा लेने आती थी.. सबने रेशम को देख कर हाथ जोड़ लिए..
“डॉक्टर दीदी, आप सच में यहाँ से चली जाएँगी ?”
“जाना तो पड़ेगा ही.. अब यहाँ का काम ख़त्म, मुझे भी मेरे घर जाना है ना ?”.
“दीदी क्या आपका जाना ज़रूरी है ?”
“हाँ बिलकुल ज़रूरी है.. मेरे डॉक्टर साहब वहाँ मेरे बिना रहते हैं और मैं यहाँ अकेले.. ऐसे ही चलता रहा तो हम साथ कब रहेंगे ?”
रेशम की बात सुन कर वो सब भी सोच में पड़ गयी.. बात तो उसकी सही थी..
तभी उनमे से एक लड़की बोल पड़ी..
“लेकिन दीदी फिर आप वहाँ क्या करेंगी ?”
“वहाँ शहर के अस्पताल में काम करुँगी !”
“शहर का अस्पताल तो बड़ा होगा ना ?”
‘हाँ बहुत बड़ा होता है.. कई सारे डॉक्टर्स होते हैं वहाँ !”
“सब क्या आपके जैसे ही होते हैं ?”
“नहीं.. कुछ मेरे जैसे कुछ मुझसे सिनियर, कुछ जूनियर भी होते है !”
“दीदी यहाँ तो आप ही सबकुछ थी ना ?”
रेशम को एकदम से एहसास हुआ कि बात तो सच थी, इस हॉस्पिटल की कर्ताधर्ता सर्वेसर्वा सब कुछ वही तो थी..
एक ठंडी सी साँस छोड़ कर उसने हामी भर दी..
“दीदी साथ रहने के लिए क्या आपका ही शहर जाना ज़रूरी है, आपके डॉक्टर साहब क्या यहाँ नहीं आ सकते ?”
उस लड़की का ये मासूम सवाल रेशम का कलेजा मरोड़ गया..
सही तो कह रही थी वो बच्ची..
पता नहीं उसके बाद किसकी पोस्टिंग होगी यहाँ, जिसकी होगी वो यहाँ रह कर काम करेगा भी या नहीं.. ज्यादातर सरकारी डॉक्टर इसीलिए तो बदनाम है, पोस्टिंग होगी गांव में और रहेंगे शहर में..
फिर जब कभी कोई इमरजेंसी पड़ जाये तो मुसीबत ही आती है….
लेकिन अब कोई उपाय भी तो नहीं, जिसकी किस्मत होगी वो यहाँ आएगा और आगे गांव वालो की किस्मत.. अच्छा डॉक्टर मिलना होगा तो मिल ही जायेगा..
वो अपने विचारों में ग़ुम थी कि उससे मिलने आयी औरतें खड़ी हो गयी..
वो सब आपस में एक दूसरे को देख इशारे कर रही थी.. ऐसा लग रहा था किसी बात पर उन लोगो को संकोच सा हो रहा है..
रेशम ने उन सब को ध्यान से देखा और फिर पूछ बैठी..
“क्या हुआ पुष्पा ? कोई और बात भी है क्या ?”
सामने खडी उस औरत ने अपने झोले में से एक मुड़ी तुड़ी सी पन्नी निकाली और उसे हाथ से सीधा करने लगी..
रेशम को समझ में आ गया था ये औरते उसके लिए कोई तोहफा लेकर आयी थी..
पुष्प ने वो थैला बाकियों का हाथ लगवा कर रेशम की तरफ बढ़ा दिया…
“अरे ये क्या है ?”
“दीदी आपके लिए छोटा सा तोहफा है !”
“नहीं, लेकिन ये मैं नहीं ले सकती !”
“दीदी, बुरा मत मानियेगा, ये तो आपको रखना ही होगा ! हम सब की तरफ से है !”
रेशम उन सब के प्यार के सामने उनकी बात काट नहीं पायी, उसने धीरे से हाथ बढ़ा कर वो थैला पकड़ लिया..
“दीदी देखिये ना, शायद आपको पसंद आ जाये !”
“अरे पसंद तो आएगा ही, आप सब इतने प्यार से जो लाये हैं !”
उस थैली के अंदर हाथ डाल कर रेशम ने अंदर रखी साड़ी निकाल ली.. साड़ी हाथ से बनी हुई थी जिस पर हाथ का ही बारीक काम किया गया था..
दूर्वागंज के पास एक गांव था कोसाबाड़ी, जहां हाथ करघे पर साड़ी बुनकरों द्वारा तैयार की जाती थी.. वहाँ की साड़ियां बाहर के बाज़ारों में खूब ऊँचे दामों पर बिकती थी..
रेशम उस कपडे को पहचानती थी..
“ये तो बड़ा महंगा होगा.. ये क्यों ले आये तुम लोग ! “
“नहीं दीदी इतना महंगा भी नहीं है, ये लक्ष्मीन वहीँ काम करती है, इसी ने बनवायी है !”
रेशम ने मुस्कुरा कर साड़ी रख ली.. उसे शाम के लिए तैयार भी होना था.. उन औरतों के जाने के बाद वो तैयार होने लगी.. उसने एक सूट निकाला ही था कि उसकी माँ ने एक साड़ी निकाल कर रख दी….
“ये पहन कर जा.. डॉक्टर है आखिर !”
अपनी माँ की बात वो टाल नहीं पायी.. साड़ी पहन कर तैयार होने के बाद वो सोच ही रही थी कि सरपंच के घर जाने के लिए गाड़ी बुलवाये तभी उसके दरवाज़े पर एक जीप आकर ठहर गयी..
उसने खिड़की से झांक कर देखा प्रधान जी का ड्राइवर अंदर चला आ रहा था..
“ओह्ह तो प्रधान जी ने गाड़ी भी भेजवा दी ! ” उसने खुद से ही कहा और अपनी माँ को बुलाने चली गयी..
“चलो मम्मी, वहाँ से गाड़ी भी आ गयी !”
“मेरा जाना क्या सच में ज़रूरी है ? तू अकेली चली जा ना ?”
“नहीं मम्मी, आप भी चलो, देखो तो सही गांव के प्रधान का घर कैसा होता है ?”
“तू तो ऐसे कह रही जैसे मैंने आज तक गांव के घर नहीं देखे ! देख लेना कितने भी बड़े प्रधान हो खाने में तो लौकी कि सब्जी और पूड़ी खीर ही होगी !”
अपनी माँ की बात पर हंस कर रेशम ने पर्स उठा लिया और आगे बढ़ गयी। उसी के साथ उसकी माँ भी जीप में जा बैठी..
ड्राइवर ने गाड़ी अखंड के घर की तरफ बढ़ा दी…
अखंड के घर पर खाने की सारी तैयारियां हो चुकी थी..
रसोई में सब कुछ तैयार देख कर कुसुम ऊपर अपने कमरे में तैयार होने चली गयी…
हाथ मुहं धोकर उसने अलमारी से नयी साड़ी निकाली और तैयार होकर साड़ी बांधने ही जा रही थी कि जाने कहाँ से यज्ञ प्रकट हो गया..
आते ही उसने कुसुम को बाँहों में बांध लिया..
“ये कैसी शरारत है ?”
“मुहब्बत भरी !”
“अच्छा जी, ये आपकी मुहब्बत है ?”
“हाँ जी बिलकुल.. हमारी छोटी ठकुराइन इतनी प्यारी लग रही थी कि बिना बाँहों में भरे मन ही नहीं माना !”
“आजकल आपका मन बहुत चलने लगा है !”
“चलने नहीं मचलने लगा है !”
“ज़रा संभाल रखिये, कहीं मचल मचल कर आपको परेशान न कर दे !”
“परेशान भी किया तो आप है ना, संभालने के लिए !”
“ज्यादा शायराना नहीं हुए जा रहे आप ?”
“बीवी ग़ज़ल जैसी हो तो आदमी शायर बन ही जाता है !”
“चलिए नीचे, मेहमान आने वाले होंगे !”
मुस्कुरा कर यज्ञ ने कुसुम के गालों पर अपना प्यार अंकित किया और वहाँ से नीचे बाक़ी कि तैयारियां देखने चला गया..
रेशम को खाने पर बुलाने वाले प्रधान जी का ही कोई अता पता ना था.. बाक़ी सब बिलकुल चट तैयार बैठे उसका इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन अखंड जाने किस ताल तलैया में मछली पकड़ने चला गया था..
पुरे घर में उसकी हांक डली पर वो होता तब तो नजर आता.. !
यज्ञ उसे हर तरफ खोज कर आ गया और फिर उसने उसका नंबर लगा लिया, नंबर भी नहीं लग रहा था.. कहीं काम में फंस गया होगा सोच कर यज्ञ अपनी माँ के पास चला गया..
रेशम को यहाँ आने में ज़रा देर हो गयी..
उसके घर आये मेहमान भी देर से निकले थे, बस उसके बाद तैयार होकर यहाँ पहुँचने में उसे साढ़े आठ बज गए थे….
रेशम अपनी माँ के साथ आयी और उसे देख कर अखंड के घर पर सब प्रसन्न हो गए..।
अखंड के पिता अपने नित्य के अभ्यास से अपने कमरे में बैठे गिलास पर गिलास गुटक रहे थे, और एक के बाद एक खाने की समग्रियों की मांग करते जा रहे थे.. उनका खास नौकर रसोई से भाग भाग कर कभी उनके लिए कबाब की प्लेट तो कभी पापड़ लेकर आ रहा था। जिसमे से रसोई से कमरे के बीच के रास्ते में वो आधा माल उदरस्थ कर जाता था..
यज्ञ और कुसुम रेशम के स्वागत के लिए उसका इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन सबसे ज्यादा खुश अखंड की माँ थी..
उन्होने ही ज़िद कर के अखंड से रेशम को न्योता दिलवाया था…
अखंड के घर पर रेशम को यज्ञ के अलावा कोई नहीं पहचानता था, यज्ञ ने कुसुम को भी इस बारे में नहीं बताया था, लेकिन वो यही सोच रहा था कि रेशम को खाने पर बुला कर अखंड खुद कहाँ गायब हो गया है..?
दूसरी तरफ अखंड रेशम से सामना ना हो जाये ये सोच कर घर से निकल तो गया था, लेकिन छोटे से गांव में दो तीन घण्टे गुज़ारने लायक कोई जगह भी तो नहीं थी…
वो अपनी गाड़ी में निरर्थक इधर से उधर भटक रहा था कि उसके मोबाइल पर गीता का फ़ोन आ गया..
“कहाँ हो अखंड ?”
“क्या हुआ ?”
“तुमसे मिलना था, कुछ बहुत ज़रूरी काम है, हो सके तो घर आ जाओ !”
“ठीक है !” अखंड ने गाड़ी शहर की तरफ घुमा दी..
अखंड गीता के घर पहुंचा, वो बड़ी बेसब्री से अखंड का इंतज़ार कर रही थी..
घर पर अब बस वो तीन लोग रह गए थे…
गीता और गीता की नन्द सान्या के दो बच्चे.. घर का हर सदस्य लालच का शिकार हो चुका था….
अखंड अंदर चला आया.. दुनियादारी की समझ वैसे भी उसमे कम थी..
एक अकेली औरत के घर उसका आना दुनिया की नजर में खटक सकता है, ये उसने सोचा ही नहीं..
घर पर नौकरो की अब भी पूरी फ़ौज थी..
अखंड को एक नौकर ने अंदर ले जाकर बड़े वाले हॉल में बैठा दिया.. और गीता को बुलाने चला गया..
“कैसे हो अखंड ?”
“ठीक है, तुम बताओ कैसे याद किया ?”
“अखंड, नामांकन भरने से पहले ही धीरेन्द्र…
वो बोलते बोलते चुप हो गयी..
लेकिन अखंड उसकी बात समझ गया..
“हम्म.. क्या सोचा है अब ?”
“ये पापा की गाढ़ी मेहनत से बनायी पार्टी है, इसे ऐसे ही छोड़ नहीं सकती..
मैं चाह रही थी कि अगर तुम नामांकन भर कर चुनाव लड़ लेते तो ?”
“नहीं गीता, चुनाव तो नहीं लड़ेंगे हम, लेकिन हाँ बहुत दिनों से ये ज़रूर सोच रहे थे कि तुमको इस सीट को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.. तुम नामांकन भरो और चुनाव की सारी तैयारी हम करेंगे.. !”
“लेकिन अखंड हम चुनाव नहीं लड़ना चाह्ते !”
“लेकिन अपने पिता की धरोहर को आगे बढ़ाने तुम्हे लड़ना तो पड़ेगा ही !”
गीता के पिता के एक मित्र थे जिन पर उनका पूरा परिवार बहुत विश्वस करता था.. वो वकील भी थे, अखंड ने उन्ही से सलाह की बात कही और गीता ने उन्हें भी बुलवा लिया..
ढेर सारी बातों के बीच आखिर अखंड ने गीता को चुनाव में लड़ने के लिए मना ही लिया…
बातो बातों में काफी समय निकल गया..
अखंड ने घडी देखी, रात गहरी हो चली थी, अब तक तो रेशम भी लौट गयी होगी ये सोच कर वो भी घर के लिए निकल गया..
गीता के लाख कहने पर भी उसने खाना नहीं खाया..
गीता के घर से ही देर से निकलना हुआ था, उस पर रास्ते में लगने वाले समय को देखते हुए अखंड को पूरा अंदाज़ा था कि अब तक हर हाल में रेशम जा चुकी होगी..
घर पहुँच कर उसने गेट से गाड़ी अंदर डाली और गाड़ी खड़ी कर बड़े फाटक तक चला आया..
घर पर का सबसे पुराना नौकर इसी फाटक पर अपनी खटिया डाल कर सोया करता था…
वो अभी खाट पर बैठा अपनी हथेली पर तम्बाखू घिस रहा था, अखंड को देखते ही वो खड़ा हो गया..
“मेहमान चले गए ?” अखंड ने यूँ ही पूछ लिया.. ठाकुर परिवार में आये दिन कोई न कोई मेहमान बना ही रहता था, इसलिए बहादुर समझ नहीं पाया कि अखंड किसके बारे में सवाल कर रहा.. वो सोच में डूबा था कि बिना उसका जवाब सुने अखंड अंदर दाखिल हो गया..
अंदर के खुले आंगन में एक तरफ अलाव के पास कुर्सियों पर सब बैठे थे.. यज्ञ कुसुम, उसकी माँ, सुराज और इन सब के बीच बैठी रेशम पर नजर पड़ते ही अखंड जैसे जम कर रह गया..
ये गयी नहीं अब तक ? वो सोच ही रहा था कि उसकी अम्मा ने उसे देख लिया और वहीँ से आवाज़ लगा दी..
“रे अखंड.. इधर आजा बेटा ! कहाँ चला गया था तू शाम से ?”
एक ठंडी सी आह भर कर अखंड वहीँ चला आया..
क्रमशः

रेशम के अच्छे व्यवहार ने गांव के लोगों का दिल इतना मोह लिया की वो अब उसे जाने नही देना चाहते। पर चाह लेने भर से क्या होता है रेशम भी आखिर कब तक अपने अथर्व से दूर रहेगी।
प्यारी सी डॉक्टरनी को प्यारा सा तोहफा हाथ से बनी साड़ी।
कुसुम और यज्ञ का प्यार परवान चढ़ने लगा दोनों के दूसरे के होने लगे। प्यारी सी जोड़ी ❤️❤️
अखंड ने न्यौता तो दे दिया पर खुद ही सामना करने से कतरा रहा रेशम का, पर नियति को भी जाने क्या पड़ी है दोनों का आमना सामना हो ही गया।
जितना बचना चाहा हमने उनकी कुर्बत से मगर
हर बार वक़्त ने उनकी निगाहों के साये में ला दिया
वो नहीं नसीब में मेरे ये सोचकर हम उनको भुलाने लगे
पर जितना भूलना चाहा वो उतना ही याद आने लगे।
अखण्ड बाबू ने कितनी कोशिशें कर ली वाबजूद इसके रेशम से उसका सामना हो ही गया ,भले वो अब किसी और की अमानत है लेकिन दिल का एक हिस्सा उसके लिए कमजोर पड़ ही जाता है न।
अब खुद को कैसे सम्भालेगा अखण्ड ,लेकिन वो अखण्ड है न कर लेगा
Bahut hi Khubsurat and Shandaar n Jaberdast n Fantastic n Fabulous part
Next part ma’am, bahut din ho gaye
Sab कुछ ठीक ठाक चल रहा है तो अखंड को भी आगे बढ़ना चाहिए लेकिन अभि लगता है कि कुछ किस्मत का खेल बाकी है लेकिन दर्द नहीं plz बहुत सह लिया है उसने अब एक शीत लहर उसके हिस्से भी सुकून दीजिए
Akhand ab kyu katra rha h resham se …..ab jab sab theek h toh ….ab toh aage ka hi soochna chahiye…..resham ke jaane ke baad kon aayega ….ye baat toh sochne wali h …
Mere akhand k jisse sare dard likh diye
Mat Karo ye sitam…..paap hoga
Janti hu uske liye aapne kuch Achcha soch rakha hoga………..pr hum apne dol ka kya kare…..kyuki
Dil hai ki manta nhi
♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻😘😘😘😘😘😘😘😘😘👌💗💗💗💗💗💗💗💗
गाँव वालों का रेशम के लिए इतना प्यार देखकर मुझे आप याद आ गई आपको भी तो गाँव की औरतें ऐसे मान सम्मान देती होगी ना, मुझे उम्मीद है रेशम उस साड़ी को बहुत सहेज कर रखेगी आखिर इसमें इतना प्यार जो छिपा है गाँव की औरतों का।
अखंड के घर रेशम और उसकी माँ चले तो गए पर अच्छा तभी होग़ा, अगर.. रेशम की माँ ने कभी अखंड को ना तो देखा हो और ना ही उसका कभी नाम सुना हो नहीं तो शायद ही रेशम की माँ अखंडको कुछ कहे बिना रहेगी,।
अखंड ने कोशिश तो बहुत की कि रेशम के वापिस लौटने के बाद ही घर पहुँचे पर.. देखते है आगे क्या होता…।
चलो ये अच्छा हुए रेखा की ज़िन्दगी को एक मकसद मिल गया और अपने पिता की कुर्सी को संभालेगी,।
बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
मां चली जरूर गई है रेशम के साथ अखंड के घर पर पर कहीं ऐसा ना हो कि रेशम की मां अखंड को देखकर पहचान जाए और वह वहां कहीं कोई सवाल कर दे जिससे माहौल खराब हो जाए।
अब मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि जैसे गीता की तपस्या भी शायद भगवान पूरी होने पर उसे कोई फल दे दें को शुरू से ही अखंड को चाहती आई है तो क्या ऐसा हो सकता है कि उसे जीवन के किसी मोड़ पर अखंड का साथ मिल जाए।😊😊😊😊😊यूं कब तक वह दोनों अपनी जिंदगी ऐसे बिताते रहेंगे गीता तो शुरू से ही अखंड को चाहती थी पर क्या अखंड गीता को कभी अपना पाएगा 🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔क्योंकि इन सब में गीता ने उसकी बहुत मदद की है उसके सिर पर से कलंक हटाने और उसके दोस्तों की मदद करने से लेकर उसे बहुत से कम है जो गीता ने चुप-चुप कर अखंड के लिए किए हैं।😌😌😌😌😌😌
Bahut behtreen bhaag saasu mom, 🥰🥰🥰🥰