बेसब्रियां-32

बेसब्रियां दिल की.. – 32

अगली सुबह सिमरन मासी और मासा जी के साथ खनूजा पैलेस देखने निकल गयी..

मासी को अपना आर्टिकल भी तैयार करना था इसलिए उन्होंने उस हिसाब से अपनी ज़रूरत का सामान ले  लिया था….

वो सभी लोग पैलेस खुलने के वक्त पर वहाँ पहुँच गए.. ये पैलेस महीने में दो दिन बाहर वालों के देखने के लिए खोला जाता था, लेकिन आज बाहर वालों के लिए नहीं खोला गया था…
धरा ऊपर कहीं से अनुमति लेकर विशेष भ्रमण पर आयी थी इसलिए लोगों की कोई भीड़भाड़ नहीं थी वहाँ !

पैलेस के मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते ही उन सब की आंखें चौड़ी हो गयी…
उस महल की भव्यता का वारापार ना था.. जितना ही विशाल उतना ही सुंदर और साफ सुथरा था..
बल्कि इस वक्त भी कुछ लड़के लड़कियां साफ़ सफाई में ही लगे हुए थे..

सिमरन ने सोचा नहीं था की अक्षत वाकई महलों का राजा होगा..

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मासी वहाँ पहुँच कर अपनी उत्तेजना छुपा नहीं पा रहीं थी, उन्हें हर एक वस्तु विशेष लग रहीं थी, हर किसी पर उन्हें लिखना था…

पर्शियन कालीन हो या यूरोपियन शैंडलियर हर एक वस्तु में सजाने वाले का बेजोड़  कलाप्रेम उभर कर आ रहा था..

कुछ आगे बढ़ने पर दीवानखाना था… जहाँ घर के सदस्यों के तैलचित्र टंगे थे..
महल में घूमने के लिए उन्हें महल की तरफ से एक मैनेजर भी दिया गया था, जो वास्तव में वहीँ रह कर महल की देखभाल करवाया करता था..
अपने काम से अक्षत ही अक्सर मुंबई आया करता था, तब वो ज़्यादातर अपने फ़्लैट पर ही रुकता था..
लेकिन कभी कभार अचानक अपने महल में भी आ जाया करता था..

महल कहीं से भी पुराने ऐतिहासिक महलो के जैसे नहीं लग रहा था…
साफ सफाई और रखरखाव देख कर साफ पता चल रहा था की महल के लोग सफाई को लेकर बहुत ज्यादा फिक्रमंद है.. !
बहुत ज्यादा ऊँची दीवारों के बावजूद ना किसी दीवार पर मकड़ियों ने जाल बुन रखें थे और ना ही कहीं से कोई लता या बेल निरर्थक लटक रहीं थी..
.यूँ लग रहा था महल वासी महल की तिजोरी का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ महल के रखरखाव पर ही लुटा देते होंगे..

दीवानखाने में लगे लम्बे लम्बे तैलचित्रो में महल के पुरखों से शुरू कर वर्तमान की पीढ़ी भी दीवार पर टंगी थी..
एक एक कर तस्वीरें देखती आगे बढ़ती सिम्मी के पैर अक्षत की तस्वीर के सामने ठिठक कर रह गए और महल का वाचाल मैनेजर अपनी बुद्धि लगा कर बोलने लगा..

“ये हमारे छोटे साहब की तस्वीर है ! इन्हीं के आदेश से तो यहाँ इतना कुछ होने लगा है, वरना इनके दादा जी ने बनवाया ज़रूर था लेकिन उनके बाद किसी का ध्यान इस महल की तरफ नहीं था, फिर जब से ये बड़े हुए और अपना बिज़नेस संभाला तब से इसे ऐतिहासिक धरोहर मान कर छोड़ने की जगह संवार लिया..
यहाँ के लिए अलग से बजट बना कर स्टाफ को नियुक्त किया और खुद भी बीच बीच में आ कर सब कुछ जांचते परखते रहते है..
उन्हें अपनी विरासत से बहुत लगाव है..
उन्हें अपने परिवार, अपने रिश्तेदारों से भी बड़ा लगाव है, हर किसी को जोड़े रखना चाहते हैं कुंवर सा !

अभी जल्द ही उनका प्लान है महल के दूसरी तरफ के हिस्से में एक चेरिटेबल स्कूल खोलने का..
असल में ये क़स्बा मुंबई से ज़रा बाहर पड़ता है ना.. यहाँ आसपास के स्कूली बच्चों के लिए स्कूल दूर पड़ता है  दूसरी बात आसपास गरीब बस्ती भी बहुत सी है, जहाँ की बच्चियां संसाधनों की कमी के कारण अपनी पढाई वक्त से पहले ही बंद कर जाती है..
बस यहीं सब देख कर अक्षत सर ने तय किया है की यहाँ इसी परिसर में बच्चियों का स्कूल भी बनेगा !

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आप लोग जब आये होंगे तब आपको दाहिनी ओर चलता कन्स्ट्रक्टशन दिखा भी होगा ! वो वहीं स्कूल है !”

सिम्मी को याद था की उसने बाहर एक तरफ को मजदूरों को काम करते देखा था..

उसके चेहरें पर हलकी सी मुस्कान चली आई..

अपनी बेवकूफी में उसने इतने अच्छे इंसान को मना कर दिया…
कभी कभी गैरज़रूरी स्वाभिमान अभिमान में बदल कर कैसे सब कुछ समाप्त कर देता है इसका जीता जागता उदाहरण थी सिम्मी !
.
“अगर मैंने वो फ़िज़ूल सी जल्दबाज़ी ना दिखाई होती तो आज इस महल की होने वाली मालकिन होती ! लेकिन ठीक ही हुआ, महल की मालकिन होने के बावजूद मैं अपनी जड़ो को भूल तो नहीं सकती ना… !”

“क्या हुआ सिम्मी ? क्या सोचने लगी ?”.

“कुछ नहीं मासी !”

“आइये मैडम… इधर आप लोगों के लिए चाय भी तैयार है !”

“अरे तकल्लुफ की क्या ज़रूरत ?”..

सिम्मी ने मैनेजर को टोक दिया..

“मैडम.. कुंवर सा का आदेश है की कोई भी बाहरी व्यक्ति महल घूमने आये तो उसे बिना चाय पानी के ना जाने दे !”..

सिम्मी की आंखें फ़ैल गयी..

“लेकिन यहाँ तो हज़ारों लोग आते होंगे ना.. आपका महल तो लोगों के देखने के लिए खुलता है ना ?”

“जी खुलता है मैम,  लेकिन अब कुंवर सा ने महीने में सिर्फ दो दिन ही बाहर वालों के लिए खोलने का आदेश कर रखा है और फिर बाहर वालों के लिए टिकट भी है ना महल वालों की तरफ से..
बुकिंग एक दिन पहले ही हो जाती है, तो हम लोगों को लिस्ट मिल जाती है फिर उस हिसाब से हमारी चाय पानी की व्यवस्था रहती है….
असल में महल का दबाव है टिकट लगाने के लिए वरना हर तरह के लोग अंदर चले आते है और साफ सफाई का ध्यान नहीं रखते हैं… !”

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“हम्म…..!”

सिम्मी को महल देखने में बड़ा मज़ा आ रहा था…

धरा तस्वीरें भी लेना चाहती थी, लेकिन उनके मोबाइल बाहर जमा करवा लिए गए थे, इसलिए वो अपने आर्टिकल के लिए तस्वीर नहीं लें पा रहीं थी…

“वैसे हम लोग भी आपके कुंवर सा के पड़ोसी ही है… कहने का मतलब है ललित कुमार जी जो आपके कुंवर सा वाले अपार्टमेंट में रहते हैं ना..

“हाँ हाँ, जानता हूँ उन्हें…एक आध बार मुलाकात हुई है.. बड़े चलते पुर्जे हैं वो… हर एक समस्या का समाधान है उनके पास !”

“हाँ उन्हीं ललित कुमार की बीवी की दोस्त है हमारी सिम्मी .. और उनके घर डिनर पर इसकी मुलाकात अक्षत राज जी और राहुल जी से भी हुई थी.. !”

मैनेजर ने ये बात सुनी और सिमरन की तरफ देखने लगा..

“आप सिमरन है ?”

सिम्मी आश्चर्य से उसे देखने लगी..

“हाँ… लेकिन आपको मेरा नाम कैसे पता ?”

मैनेजर मुस्कुरा कर रह गया और धरा के साथ साथ सिम्मी भी आश्चर्य में डूब गयी..

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क्रमशः

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