अपराजिता – 24
अखंड खुश था, खुद में मगन था.... अपने हॉस्टल के कमरे में अपने पलंग पर लेटा हुआ वो उस लड़की के ख़यालो में गुम था...
उसने अपने गुर्गे भेज रखे थे, उसके बारे में सब पता करवाने.. कुछ देर में ही गोलू और लल्लन वापस आ गए…
“भैया जी सारा जानकारी ले आये हैं.. !”
“तो बताओ फिर !”
“भैया जी.. लड़की का नाम रेशम है.. ! मेडिकल में फष्ट (फर्स्ट ) ईयर पढ़ रहीं हैं, पास ही के शहर में रहती है, यहाँ से दुइ घंटा का रास्ता है उनके घर का, इसलिए ज्यादातर शनिवार रविवार अपने घर चली जाती हैं.. !”
अखंड ने एक ठंडी सी आह भरी… -“और… ? और कुछ जानकारी, !”
“भैया जी अभी तो इतना ही जानकारी मिला है !”
“कार्यक्रम कब से शूरु हो रहा.. !”
“कार्यक्रम तो चल ही रहा है भैया जी… यूथ फेष्टिबल पूरे महीने चलेगा.. !”
“क्या बात कर रहे हो बे ?”
“हाँ भैया जी….कल तो महिला (किरकेट ) क्रिकेट होना है.. !”
“कहाँ पर.. ?”
“वहीँ मेडिकल कालेज के पीछे वाले गिराउण्ड में !”
“तब तो जाना पड़ेगा.. !”
“काहे आप भी किरकेट खेलेंगे ?”
“काहे हम तुमको महिला नजर आ रहें..? अबे क्रिकेट में थर्ड अम्पायर भी तो होता है.. बुलाओ उस अंबर नमबर को…!”
“बुलवा देते हैं लेकिन ऊ का करी भैया जी.. !”
“तुम साले पूरे बैझड़ हो… बिना बुलाये वहाँ जायेंगे तो स्वागत नहीं होगा हमारा समझे.. ।
समझ में तो गोलू को अब भी अखंड की बात नहीं आई थी फिर भी चेहरे पर निर्लिप्त से भाव लिए अपने सिर को खुजाता हुआ वहां से सिर हिलाता बाहर निकल गया अगले दिन सुबह मेडिकल कॉलेज की लड़कियों का क्रिकेट होना था…
हर एक साल की लड़कियों का अपना-अपना ग्रुप बना हुआ था…।
रेशम क्योंकि यूथ फेस्टिवल कमेटी में थी इसलिए वह क्रिकेट नहीं खेल रही थी, लेकिन तैयारियां उसे ही करनी थी…
सारी टीम ग्राउंड में पहुंच चुकी थी। आज पहला मैच फर्स्ट ईयर और सेकंड प्रोफ की लड़कियों के बीच खेला जाना था..।
देखने वालों की भीड़ ग्राउंड के चारों तरफ झूमी पड़ी थी..
कॉलेज के कुछ एक लेक्चरर प्रोफेसर डीन सर के साथ वहां मौजूद थे। उसी समय दूर से धूल उड़ाते हुए थार का आगमन हुआ, डीन सर ने उस तरफ देखा और फिर धीमे से ना में गर्दन हिला दी…
“अब इनको यहाँ किसने बुला लिया.. ?”
बगल में बैठे मेडिसिन के प्रोफेसर साहब बोल पड़े..
“मेडिकल के लड़कों ने चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया है.. !”
“ये लड़के भी पागल है, अब इस बवाल को यहाँ बुलाने की क्या ज़रूरत थी.. ?”
“लड़कों की सारी उटपटांग हरकतों को यहीं तो कंट्रोल करता है ना.. उस पर अध्यक्ष है, इससे बना कर रखने से लड़कों को फ़ायदा ही फ़ायदा है.. !”
” आजकल के बच्चे भी पढ़ाई कम और राजनीति ज्यादा करते हैं…!”
ग्राउंड के अंदर जैसे ही थार आकर रुकी मेडिकल फर्स्ट ईयर के लड़के भागकर रेशम और दूसरी कार्यकारिणी की लड़कियों के पास पहुंच गए…
” जल्दी वहां चलो, यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष आए हैं। उनका स्वागत करना है…!”
” यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष का यहां क्या काम ? उन्हें सिर्फ फाइनल डे पर बुलाना था ना!”
रेशम की बात सुनकर वहीं खड़ा लड़का संजय तपाक से बोल पड़ा…
” बुलाना पड़ता है यार, समझा करो !! इन्हीं लोगों से तो बनाकर रखना है। इन लोगों से अगर हमारी ठीक-ठाक बनी रही ना तो यह 5 साल मजे से निकल जाएंगे समझी..!”
ना में गर्दन हिलाकर रेशम ने चलने के लिए हामी भर दी। वह सारे लोग आगे बढ़ने लगे। उधर अखंड भी अपनी गाड़ी से उतर कर मैदान की तरह बढ़ने लगा। उसके चेले चपाटे उसके पीछे पीछे चल रहे थे। जैसे ही उन सब को सामने से आते हुए मेडिकल के विद्यार्थी दिखाई दिए, अखंड के चेलों ने अखंड के नाम के जयकारे लगाने शुरू कर दिए….
” युद्ध भूमि में जैसे समर रहे,
अखंड भैया अमर रहे…अमर रहे.. !!
उन लोगों के जयकारों के साथ अखंड सामने देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। जैसे ही रेशम और उसके साथ के लड़के लड़कियां अखंड के सामने पहुंचे, रेशम और बाकी लड़कियों ने धीरे से अपने-अपने हाथ जोड़ दिये। अखंड ने भी रेशम को देखकर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और उसी वक्त उसके शागिर्द और जोर-जोर से अखंड के नाम के जयकारे लगाने लगे। यह सुनकर पता नहीं क्यों रेशम को हंसी आ गई। लेकिन उसने अपनी हंसी छुपाने की कोशिश की, और रेशम की इस कोशिश को अखंड ने देख लिया।
उसने हाथ उठाकर अपने शागिर्दों को चुप रहने का इशारा कर दिया। रेशम के पास ही खड़े लड़के संजय ने रेशम के हाथ में फूलों का गुलदस्ता थमा दिया..
अपनी हंसी रोकने की कोशिश करते हुए रेशम ने फूलों का वह गुलदस्ता अखंड की तरफ बढ़ा दिया…
” आपका स्वागत है…. सर!!”
” अरे हम कोई सर वर नहीं है। हम पढ़ाते नहीं आपके यहां, हम यूनिवर्सिटी के….
अखंड बोल पाता उसके पहले गोलू उबल पड़ा…
” अरे जे अखंड भैया है.. भैया जी यूनिभरसिटी के अध्यक्ष हैं… बहुते नाम है भैया का..
यूनिभरसिटी का कोनो काम हो, आप एक बार आज्ञा कीजिएगा, तुरंते हो जाएगा..!”
“हम्म्म… !”
गोलू को चुप करवाने अखंड ने हुंकारा सा भरा और रेशम अपनी हंसी दबाती एक तरफ को हो गयी.. उसने अखंड और उसके चेलो के आगे निकलने के लिए रास्ता बना दिया…
अखंड अपनी शान में आगे बढ़ गया.. उसे समझ नहीं आ रहा था की रेशम को उसे देख कर हंसी क्यूँ आ रहीं थी..।
उसके लिए निर्धारित जगह में वो जाकर बैठ गया..
क्रिकेट शुरू हो गया लेकिन अखंड का मन क्रिकेट में लगे तब ना ।
वह तो बस इधर उधर जाकर रेशम को ढूंढने की कोशिश में लगा था। रेशम पता नहीं किस कोने में जा छिपी थी..।
अखंड ने अपने चमचे को अपने पास बुलाया..
” सुनो बे गोलू, हम कुछ अजीब लग रहे हैं क्या? मतलब हम को देखकर हंसी आ रहा है क्या?”
“नहीं भैया जी कौन बोला… किसका मजाल जो आप पर हंस रहा !”
अखंड जानता था कि गोलू और लल्लन उसके बहुत बड़े भक्त हैं और यह दोनों ही क्या उसके साथ आए हुए बाकी के 10- 12 लड़के भी पूरी तरह से उसकी भक्ति में रमे हुए थे। वह सब इतने अंधभक्त थे कि उन लोगों से अपने में कमी पूछना ही बेवकूफी थी। आखिर अखंड ने अंबर को बुलाया, अंबर उसे थोड़ा पढ़ा लिखा और समझदार लड़का लगता था। अंबर को अपने साथ वाली कुर्सी में बैठा कर अखंड ने उसके कंधे पर अपनी बाहें डाल दी। अंबर खुशी से तन कर बैठ गया..
“कहिये भैया जी.. !”
” अंबर बाबू एक सवाल पूछे..?”
“आप दो पूछ लीजिये भैया जी !”
“हमको देख कर हंसी आ रहा है क्या ?”
“क्या बात कर रहें हैं.. आपसे बढ़ कर हैंडसम यहाँ कोई ना होगा.. !”
“नहीं यार झूठ मत बोलों… ज़रा सा सच बोल दो.. हो सकता है हमारा भला हो जाये.. !”
“भैया जी आप जन्मजात हैंडसम है।
आपकी खूबसूरती कपड़े लत्तो की मोहताज नहीं है भैया जी.. हमारा कहने का मतलब है कि आप जो पहन लें उसमें अच्छे लगते हैं..
” मतलब अभी जो पहने बैठे हैं, उस में अच्छे नहीं लग रहे हैं?”
” नहीं ऐसा नहीं.. हमारा कहने का मतलब है कि कपड़े जरा पुराने फैशन के पहने हैं…
पुराने फैशन की जींस, उस पर कुर्ता और उसके ऊपर गमछा… यह बहुत पुराने तरीके कपड़े हैं भैया जी..
” गमछा तो बेटा स्टाइल है हमारा! ज्यादातर फिल्मों में देखा है नेतागिरी करने वाले लड़के गमछा डाले ही रहता है.. बस इसलिए डाल लिये है..
” आप पूछे इसलिए बता रहे हैं भैया जी लेकिन गमछा बहुत आउट ऑफ फैशन है। आजकल के फैशन वाले कपड़े पहनना है तो आप अपने आसपास लड़कों को देख लीजिए ज्यादातर लोगों ने रिप्ड जींस पहनी है जो जगह-जगह से कटी फटी रहती है। जींस अच्छी फिटिंग वाली होनी चाहिए, और उसके साथ में बढ़िया सी टीशर्ट और साथ में स्पोर्ट्स शूज तो अलग ही लुक आ जाता है। कभी-कभी शर्ट के साथ पेंट भी अच्छी लगती है लेकिन उसमें बेल्ट हो और साथ में फॉर्मल जूते…।
” और कितनी देर चलने वाला है बे तुम्हारा मैच.. ?”
“बस भैया जी.. पिद्दी सी तो लड़कियां है, कुछ आधे घंटे में ऑल आउट हो जाएँगी.. उसके बाद दूसरी टीम भी सिमट जायेगी.. !”
“हम्म बाकी व्यवस्थापक लोग नहीं दिख रहें.. ?”
“अब यहाँ मैच शुरू होने के बाद व्यवस्थापक टीम दूसरी तैयारी के लिए कॉलेज की तरफ निकल गयी है भैया जी.. !”
“ओह्ह… !”
एक ठंडी सी आह भर कर अखंड भी अपनी जगह से उठ गया…
“सुनो अंबर… वो लड़की…. क्या नाम था..
अरे बड़ी पहचानी सी लग रहीं… इसीलिए नाम जानना चाह रहें..
“कौन… ?”
“जो हमको गुलदस्ता पकड़ाई बे.. ?”
“रेशम थी क्या.. ?
रेशम…. रेशम…
नाम ही में रेशम है तो छुवन कैसी होगी… अखंड खुद में खोया मुस्कुराता सा निकल गया…
आज के पूरे दिन के लिए उसके पास पर्याप्त बातें इकट्ठा हो गयी थी.. रेशम की छिपी हुई सी हंसी, हँसते समय उसके ऊपर को चढ़ते होंठ और एक पर एक चढ़े हुए से दाँत.. आँखों के पास का तिल, माथे पर आती लटे… कितना कुछ था…
“चलो गोलू.. गाड़ी मॉल की तरफ ले लो “
“भैय्या जी काहे ?”
अखंड ने एक नज़र गोलू पर डाली और गाड़ी में बैठ गया, उसने अंबर को भी साथ ले लिया..
अखंड और उसके छोटे भाई यज्ञ में यही अंतर था।
अखंड दिखने सुनने में सुंदर था, लंबा-चौड़ा था, गोरा चिट्टा था, बावजूद कपड़े पहनने में उसकी कोई खास विशेष रूचि नहीं थी।
उसे खुद को राजनेता दिखाना होता था, इसलिए अक्सर वह ढीली ढाली जींस और उस पर खादी का कुर्ता पहना करता था। कुर्ते के ऊपर गमछा डालने का उसे शुरू से अभ्यास था। जबकि उसका छोटा भाई यज्ञ हमेशा ब्रांडेड कपड़े पहना करता था। अखंड की पसंद अच्छी नहीं थी ऐसा नहीं था। लेकिन जाने क्यों उसे लगा मेडिकल वाले जरा हाई-फाई होते हैं और उनकी पसंद के हिसाब से कपड़े पहनने के लिए उनकी पसंद नापसंद जानना जरूरी है, और इसीलिए उसने अंबर को भी अपने साथ खींचकर गाड़ी में बैठा लिया था। मॉल में पहुंचने के बाद उसने अंबर से पूछ कर सबसे महंगी ब्रांड वाली दुकान का दरवाजा खटखटाया और अंबर को लेकर सीधा अंदर दाखिल हो गया..
दुकान में काम करने वाले लड़के ने अखंड के लिए एक से बढ़कर एक कपड़ों की उसके सामने लाइन लगा दी..
अंबर से पूछ पूछ कर अखंड ने लगभग 10-15 जोड़ी कपड़े खरीद डाले और हॉस्टल की तरफ वापस निकल गया। इन कपड़ों के साथ ही अंबर ने उसे जूते और कुछ कैजुअल कपड़े भी खरीदवा दिए थे..
होस्टल पहुंचने तक में दोपहर के खाने का वक्त हो गया था। अखंड के साथ के लड़के भूख से कूलबुला रहे थे। लेकिन अखंड की भूख प्यास सब गायब थी। गोलू और लल्लन के ख़ूब कहने पर अखंड ने थोड़ा बहुत कुछ खाया और अपने कमरे में रेडियो चला कर लेट गया…
मेरी हर मनमानी बस तुम तक
बातें बचकानी बस तुम तक
मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक
मेरे सुख-दु:ख आते जाते सारे तुम तक,
तुम तक, तुम तक, सोनिया
तुम तक तुम तक अर्ज़ी मेरी
फिर आगे जो मर्ज़ी
मेरी हर दुश्वारी बस तुम तक
मेरी हर होशियारी बस तुम तक
मेरी हर तैयारी बस तुम तक
मेरी इश्क़ खुमारी बस तुम तक..
गोलू और लल्लन के साथ बाकी लड़कों को भी अखंड के मिजाज देखकर कुछ गड़बड़ तो महसूस हो रही थी, लेकिन अब भी वह लोग पूरी बात नहीं समझ पाए थे। लेटे-लेटे अखंड को नींद पड़ गई।
शाम के वक्त उसकी नींद खुली और उसने अपने नए खरीदे कपड़ों में से एक ट्रेक पेंट और टीशर्ट निकालकर पहना, बालों को भिगा कर उसने कंघी की और स्पोर्ट्स शूस पहनकर कमरे से बाहर निकला और बाहर बैठे गोलू और लल्लन उसे देखकर पल भर के लिए देखते रह गए..
“आज तो भैया जी गज़बे ढा रहें हैं.. वैसे सवारी निकली कहाँ को है.. ?”
“सोच रहे.. थोड़ा सैर वैर कर लें.. ! काहे लल्लन कैसे दिख रहें हैं, बे हम ?”
“भैया जी वो एक हीरो है ना आदित्य रॉय कपूर.. कुछ कुछ वैसे ही लग रहें आप.. !”
हँसते हुए अखंड बाहर निकल गया…
उसकी सारी सेना उसके पीछे लपकी और उसने सब को मना कर दिया..
सिर्फ गोलू और लल्लन को साथ लिए वो निकल गया..
वो मेडिकल केम्पस की तरफ पैदल ही बढ़ रहा था कि सामने से आते एक गुट से आमना सामना हो गया..
दोनों ही पक्ष के लोग एक दूजे को घूरने लगे..
सामने से आने वाला गुट अखंड की दुश्मन फ़ौज थी, जिसका सरगना था धीरेन्द्र प्रजापति… जिसे उसके गुर्गे धीरू भाई के नाम से बुलाया करते थे..
“क्या बात है परिहार… आज यहाँ कहाँ निकल आये तुम ?”
“तुमसे मतलब ? तुम अपने काम से काम रखो प्रजापति !”
“अपने ही काम से काम रख रहें हैं.. मेडिकल वालों का फेस्टिवल चल रहा उसके लिए डीन सर बुलाये रहें, मदद करने आ जाओ..!
कुछ फंड वंड भी जुटा रहें हैं ये मेडिकल के बच्चे.. बस उसी रैली में हम भी साथ देंगे.. ! वहीं जानकारी लेने डीन सर के पास जा रहें है.. !”
अखंड के लिए यह बात असहनीय थी कि उसके होते हुए उसकी दुश्मन सेना के सरगना को डीन सर बुलाकर मेडिकल वालों की मदद का इतना बड़ा काम सौंप दें रहे। और इसलिए वह भी डीन सर के ऑफिस की तरफ ही बढ़ गया। हालांकि उसके मेडिकल कैंपस में इस वक्त पहुंचने का एकमात्र कारण एक बार फिर से रेशम को देखना था, लेकिन इस वक्त उसके दिमाग में धीरेंद्र को हराने की बात लहरा रही थी। डीन सर के ऑफिस के सामने पहुंचकर धीरेंद्र ने पहले दरवाजे को दस्तक दी और अंदर दाखिल हो गया। उसके ठीक पीछे ही लल्लन और गोलू को साथ लिए अखंड दाखिल हो गया..।
उन दोनों को एक साथ वहां आया देख डीन सर के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई।
उन्होंने उन दोनों को बैठने को कहा और उनके साथ आए गुर्गों को कमरे से बाहर भेज दिया। और उन दोनों से वहां आने का कारण पूछ बैठे। दरअसल बात यह थी कि डीन ने अपनी तरफ से धीरेंद्र को मदद के लिए नहीं बुलाया था, बावजूद धीरेंद्र से किसी लड़के ने इस रैली के बारे में बता दिया था और इसीलिए धीरेंद्र खुद से होकर मेडिकल कॉलेज के डीन से मिलने आया था। यह सब करके वह अगले चुनाव के लिए अपनी पोजीशन पक्की करना चाहता था। अखंड ने जैसे ही डीन सर से मेडिकल रैली के बारे में पूछा डीन सर उन दोनों को ही उस रैली के बारे में बताने लगे…
” हमारे यहां के बच्चे कैंसर के मरीजों की निशुल्क कीमोथेरेपी के लिए कुछ चंदा इकट्ठा करना चाहते हैं। और इसी के लिए वह लोग रैली निकाल रहे हैं। यह रैली परसों होगी, इस रैली में जितना ज्यादा चंदा इकट्ठा होगा उतना ही हमारे हॉस्पिटल के उन मरीजों को फायदा होगा जो कीमोथेरेपी के महंगे इंजेक्शन नहीं खरीद सकते। बस इतनी सी बात है, तुम दोनों ही नेता आदमी हो अगर तुम लोग अपने लड़कों को लेकर रैली में शामिल हो जाओ तो शांतिपूर्ण ढंग से यह रैली शहर के बाजार और व्यापारी वर्ग से मिलकर थोड़ा बहुत चंदा जोड़कर वापस कॉलेज आ जाएगी। तुम दोनों से यही प्रार्थना है कि कोशिश करना किसी तरह का बवाल ना हो और यह रैली सफलतापूर्वक निभ जायें…।”
अखंड ने मुस्कुरा कर हामी भर दी.. धीरेन्द्र भी खुश हो गया.. दोनों को ही अपने पद को बनाये रखने की ललक थी, जूनून था। और इसलिए दोनों दुगुने जोश से खुद को साबित करने काम करेंगे, यहीं सोच कर डीन सर ने दोनों को काम दिया और बाहर भेज दिया…।
डीन के कमरे से बाहर निकल कर अखंड खुश था, उसे एक और नया बहाना मिल गया था..
वो मस्त मगन अपनी गाड़ी की तरफ वापस लौट रहा था, कि गार्डन में एक तरफ बने स्टेज पर उसे रेशम के दर्शन हो गए…
वो किसी डांस का अभ्यास कर रही थी…
गाना भी शास्त्रीय संगीत था, जो वहीँ लगे कैसेट पर बज रहा था..
“सुंदर मूर्तियां श्याम सुन्दर की…..
निरखत धृति मुख़ चंद्रनयन की, सुधि बिसराई सखी तन मन की… “
कथक नृत्य का अभ्यास था, जिसे देखते हुए पल भर के लिए अखंड दीन दुनिया सब भूल कर बस रेशम को देखता रह गया…
(वर्तमान )
रेशम शाम को तैयार बैठी थी, मानव ऑफ़िस से आकर चाय पी रहा था, उसके बाद वो उसे ससुराल छोड़ने जाने वाला था कि तभी उनके गेट पर हॉर्न की आवाज़ सुनाई दी..
रेशम ने खिड़की से झांक कर देखा, गेट खोल कर अथर्व अंदर आ रहा था.. उसे आते देख वो खुश हो कर चहक उठी..
“अरे ये कैसे आ गए.. ? उन्होंने बताया तो नहीं था कि आएंगे..?”
“कौन आ गया ?”
मानव के सवाल पूछते में बेल बज गयी और रेशम की माँ ने बढ़ कर दरवाज़ा खोल दिया..
अथर्व को देखकर सभी प्रसन्न हो गए, लेकिन बार-बार इसरार करने के बावजूद अथर्व वहां ज्यादा देर नहीं रुका और रेशम को लेकर वहां से निकल गया। आज उसके हॉस्पिटल के डॉक्टर का टेनिस टूर्नामेंट होना था। जहां उसे भी भाग लेने जाना था और वो रेशम को अपने साथ लेकर जाना चाहता था इसलिए अस्पताल से लौटकर वह सीधे रेशम को लेने चला आया था…
“मैं बस कपड़े बदल लेता हूँ.. !”
अथर्व अपने टेनिस वाले कपड़े बैग में डालकर सुबह ही अपने साथ अस्पताल लेकर गया था, लेकिन लौटते वक्त कपड़े बदलना भूल गया और सीधे रेशम के घर चला आया। उसने कपड़े बदलने का पूछते हुए रेशम की तरफ देखकर ऊपर के कमरे की तरफ इशारा किया और रेशम हामी भरकर उसके साथ सीढ़ियां चढ़ती ऊपर अपने कमरे में चली गई। कमरे में पहुंचने के बाद रेशम ने उसे कपड़े बदलने को कहा और कमरे से निकलने लगी कि अथर्व ने उसकी बांह पकड़ कर उसे रोक लिया..
“रुको ना.. कहाँ जा रहीं हो.. ?”
“नीचे.. यहाँ रहूंगी तो पता नहीं सब क्या सोचेंगे.. ?”
“क्या सोचेंगे ?”
“ना ना.. यहाँ बिल्कुल नहीं.. !”
झेंपती हुई सी रेशम नीचे भाग गयी.. कुछ दस मिनट में कपड़े बदल कर वो भी चला आया, तब तक में रेशम की माँ ने चाय बना दी थी.. फटाफट चाय गुटक कर अथर्व रेशम को साथ लिए निकल गया..
आज वो कार में नहीं बाइक पर था..।
रेशम उसके पीछे बड़े संकोच से बैठ तो गयी लेकिन अथर्व की इतनी महंगी सी बाइक पर सहारे के लिए पकड़ने का हैंडल तक नहीं था..।
अथर्व ने एकदम से गियर बदला और एक झटके से गाडी आगे बढ़ गयी.. रेशम ज़रा पीछे को हुई और फिर सम्भलने के लिए उसने अथर्व के कंधे पर हाथ रख लिया..
उसने पहली बार उसके काँधे पर हाथ रखा था..
अथर्व ने टीशर्ट पहन रखी थी, जो हवा से पीछे की तरफ फूलती जा रहीं थी, कंधे के पास का कपडा भी उड़ रहा था और अथर्व के काँधे का तिल उसे साफ़ नज़र आ रहा था..
अथर्व बाइक चलाने में मगन था और रेशम अथर्व के इतने करीब बैठ कर उसकी खुशबू महसूस करने में मग्न थी.. अपने ख़यालो में खोयी रेशम ने धीरे से उसके काँधे पर अपनी ठुड्डी रख दी…
वो कुछ सोचती हुई अपनी ठुड्डी से उसकी गर्दन पर ऐ बनाने की कोशिश कर रहीं थी..
“क्या कर रही हो… गुदगुदी हो रही है ?”
अथर्व ने बोला और चिहुंक कर रेशम सीधे बैठ गयी..
कुछ देर में डॉक्टर्स क्लब आ गया और रेशम को साथ लिए वो अंदर चला गया…
हाफ पैंट और टीशर्ट में वो बहुत प्यारा लग रहा था.. रेशम एक तरफ जाकर बैठ गयी और अथर्व खेलने चला गया…
ज़ोर ज़ोर से ऊँचे ऊँचे शार्ट मारता अथर्व पसीने से लथपथ हो रहा था, बीच बीच में रेशम के पास आकर वो उसके पास रखी पानी की बॉटल से पानी पी लेता था..
और कैसा खेल रहा हूँ पूछ कर भागता हुआ कोर्ट में चला जाता था, लेकिन खेल पर ध्यान जायें तब तो रेशम कुछ कहती..
पसीने से चमकता अथर्व अलग ही नज़र आ रहा था.. बीच बीच में अपनी बाँह से अपना माथा पोंछता, कभी अपनी टीशर्ट का गला उठा कर फूँक मारता अथर्व हर तरफ से जानलेवा लग रहा था..
और रेशम अपनी हथेली पर अपना चेहरा टिकाये बैठी अथर्व को देखने में मग्न थी…
मैच ख़त्म हुआ और अथर्व बहुत करीब से हार गया..
अथर्व और उसका पार्टनर भाग कर रेशम के पास पहुँच गये.. मुस्कुराती हुई रेशम ने खड़े होकर अथर्व को बधाई दे डाली..
“बधाई क्यों ?”
“क्यूंकि बहुत अच्छा खेले आप !”
“आपने देखा ?”
अथर्व ने शरारत से पूछा.. और शरमा कर रेशम ने हां में गर्दन हिला दी !
अथर्व के साथ खड़ा उसका पार्टनर जोर से हंसने लगा!
” भाभी जी आपको अथर्व को नहीं उसके गेम को देखना था ! आपके पतिदेव को मैंने 1 पॉइंट से हरा दिया है! वैसे ये भी खेलता बढ़िया है, पर आज आपको देख कर इसका भी मन नहीं लग रहा था शायद !”
वो फिर ज़ोर से हंसने लगा..
डब्बा गोल ! हर वक्त शर्मिंदा होते रहने का भगवान ने परमानेंट चार्ज मुझे ही दे रखा है शायद.. पहला तो ये सब गेम्स समझ नहीं आते, उस पर अगर सामने अथर्व ऐसे जानलेवा अदाओं के साथ दिखे तो किसे उसका गेम दिखाई देगा.. ?
मन ही मन सोचती रेशम खोयी हुई थी की अथर्व ने उसे टोक दिया…
“घर चले.. ?”
रेशम ने हामी भर दी और वो लोग वहाँ से घर के लिए निकल गए..
क्रमशः
aparna….
