अपराजिता -165

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अपराजिता -165

अखंड के चुनाव लड़ने और जीत जाने के बाद यज्ञ पर काम का भार और भी ज्यादा बढ़ गया था.. अब अपने सारे व्यापार का जोड़ घटाव अकेले उस पर आ चुका था…

कहाँ किससे ज़मीन ली, उसके कितने कच्चे हिस्से किये, उन्हें किस को बेचा.. किससे पूरा पैसा लिया, किसका बकाया कितना बाकी.. ये सारे हिसाब अकेले रखना उसके लिए मुश्किल हो रहा था और इसलिए यज्ञ ने एक लड़का इसी काम के लिए रख छोड़ा था..।
लड़का वीर का बताया हुआ था..।

वीर का भी ज़मीन का काम ही था, वो भी यज्ञ के साथ मिल कर काम किया करता था। लेकिन कई बार वो ज़मीन के एडवांस पैसे कुछ बताता और कुछ वसूलता… बहुत बार पैसों का कोई हिसाब ही नहीं देता।
वीर को वैसे भी शराब की लत ने अंदर से खोखला कर दिया था, बिना मेहनत जल्द से जल्द और पैसा बना लेने के लालच में वो जुआं,सट्टा बाजार में भी पैसे डुबाने लगा था…
उसकी संगत ही बुरी थी। किसी से सही मशविरा मिलने की जगह उसे कुंए में डुबाने वाले दोस्त ही मिले थे, जो रात दिन अखंड और यज्ञ के ख़िलाफ़ इसके कान भरते थे…
यज्ञ को तो वो अपना प्रतिस्पर्धी ही समझा करता था… बची खुची कसर कुसुम ने पूरी कर दी थी.. !!

अपनी बुरी लतो की वजह से वीर ढेर सारे कर्ज़े में डूबा हुआ था…. बस इसीलिए इन सब हिसाब किताब में हेर फेर कर वो कभी अपने कर्ज़े चुकाने के लिए और जुआं खेलने चला जाता, कभी सट्टे में पैसा डाल देता..।
इन्ही सब कारणों से जिस लड़के को इन लोगों ने काम पर रखा था उससे भी वीर अपना हिसाब गलत लिखवा लेता …

वो लड़का नवीन इस बात को समझ गया था कि वीर पैसों का हेर फेर करता है और इस बात का उसने भी फायदा उठाना शुरू कर दिया ।
हिसाब में वह भी गड़बड़ करने लगा। एक दिन जब यज्ञ  बैठकर पिछले महीने भर का हिसाब टटोल रहा था, तब उसे बहुत सी जगह पर सही हिसाब नहीं मिला। परेशान हाल वह अपने कमरे में बैठा एक-एक चीज मिलाता जा रहा था कि तभी कुसुम चाय लेकर ऊपर चली आयी..

“क्या हुआ.. कुछ ज़्यादा ही परेशान लग रहे हैं ?”

“तुम इस हाल में इतना ऊपर नीचे क्यों करती हो..? आराम किया करो ना ! घर में नौकर नहीं है क्या, जो चाय लेकर तुम आती हो?”

” आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे हम कोई बीमार हैं। सामान्य सी बात है और वैसे भी इस हालत में चलते-फिरते रहना चाहिए, तभी सेहत ठीक रहती है! लीजिये अपनी चाय पकड़िए !”

कुसुम ने यज्ञ को चाय का प्याला पकड़ाया और उसके बाजू में बैठ कर उसका हिसाब किताब देखने लगी..

“हम भी देख ले ज़रा आपका हिसाब ?”

“तुम्हे समझ नहीं आएगा.. हमारा ही दिमाग घनचक्कर हो गया हैं.. नवीन जब हिसाब बताता है, तब तो सारा हिसाब सही मिलता है। लेकिन अभी हम मिलाने बैठ रहे तो हमें कुछ रुपयों का हिसाब ही नजर नहीं आ रहा !”

“कितने रुपयों का हिसाब नहीं मिल रहा?”

“लगभग सत्रह लाख रुपये इस हिसाब से मिसिंग हैं !”

कुसुम का मुहं खुला रह गया..

“क्या बात कर रहे हैं आप.. इतनी बडी राशि का हिसाब नहीं मिल रहा, जरा दिखाइए !”

“तुम रहने दो कुसुम ! तुम स्ट्रेस मत लो अभी !”

“दिखाइए तो सही.. माना की हम पढ़ने में कमज़ोर थे, लेकिन हिसाब के बड़े पक्के थे.. घर पर बाबूजी अक्सर हमसे ही हिसाब करवाते थे.. !”

कुसुम ने यज्ञ की हिसाब वाली कॉपी उठायी और खुद एक रफ कागज़ पर कुछ नोट करने लगी..
यज्ञ को झुंझलाहट सी होने लगी थी, एक तो इतनी देर से एक ही काम करते करते उसका दिनाग काम करना बंद कर चुका था। दूसरा कुसुम के उस कॉपी को ले लेने से उसे हिसाब पूरा करने में और देर हो रही थी..।
चाय ख़त्म करने के बाद उसने अपनी कॉपी खींचनी चाही कि कुसुम ने कॉपी उसकी तरफ घुमा दी..

“इस तारीख पर आपने ये ज़मीन बुक की थी और रुपये नवीन को दिए.. ये रूपये चेक के रूप में आपको मिलने वाले थे..नवीन ने यहाँ लिखवाया हैं कि वो रूपये आपके किसी अन्य क्लाइंट को उसने दिलवा दिए।
जिस क्लाइंट ने बाद में आपकी ज़मीन खरीदी.. ठीक हैं ना ?”

“हाँ ठीक हैं !”

“जब उसी ने ज़मीन खरीद ली तो उसे रुपये किस बात के दिए? आप एक बार इस क्लाइंट से बात कीजिये….”

कुसुम बात सही कह रही थी.. इसी बात को नवीन ने लम्बे चौड़े तरीके से ऐसे घुमा कर यज्ञ को बताया कि यज्ञ का इस बात पर ध्यान ही नहीं गया था।इसके अलावा भी कुछ जगहों पर उसके बताये रुपयों और देनदारी में स्पष्ट फर्क दिख रहा था..
यज्ञ ने उस क्लाइंट को फ़ोन मिला लिया, तब मालूम चला की उस क्लाइंट का नंबर ही गलत था..।
यज्ञ ने तुरंत अपने भरोसेमंद नौकर को बुलाया और उसे नवीन के पीछे लगा दिया..

हफ्ते भर के अंदर नवीन और वीर की असलियत यज्ञ के सामने थी..।
यज्ञ अखंड सा नहीं था…
उसने खूब खरी खोटी सुना कर नवीन को काम से हटा दिया.. खरी खोटी तो वीर को भी सुनाई लेकिन वो भाई  था, उसे घर से निकालना असम्भव था..।
वैसे भी गेंदा वाले केस के बाद यज्ञ ने पुलिस से कह कर वीर को जानबूझ कर कुछ दिन तक जेल में रहने दिया था, और उसे बाहर निकालने का प्रयास नहीं किया था.।
यज्ञ को लगा कि सजा मिलने से वीर को अपनी गलती समझ में आ जाएगी, लेकिन बाहर आने के बाद भी वीर के स्वभाव में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ था। उल्टा उस बात के बाद वो यज्ञ और कुसुम से कुछ ज्यादा ही चिढ गया था..

एक बार फिर वही हुआ, इस बार भी वीर कुसुम से ही वापस नाराज़ हो गया…

अपने कमरे में बैठा यज्ञ किसी सोच में डूबा था तभी कपडे बदल कर हाथ मुहं धुल कर कुसुम सोने की तैयारी से कमरे में चली आयी..।

पलंग पर अपनी नाईट क्रीम की डिब्बी खोलते हुए उसने यज्ञ से पूछ लिया..

“आजकल सारा वक्त चिंता में क्यों डूबे रहते हैं ?”

“कुछ नहीं !”

“बताइये भी… अब हमसे बातें भी छुपाने लगे आप ?”

“कुसुम हमारी एक मदद करोगी ?”

पूछते हुए यज्ञ की नजर कुसुम के पेट पर चली गयी.. उसने ममता से कुसुम के उभरे पेट पर हाथ रख दिया..

“बोलिये क्या मदद कर सकते हैं हम आपकी ?”

“हमारे अकाउंट्स देख पाओगी… छोटा मोटा काम नहीं हैं.. करोडो का लेनदेन होता हैं.. सब संभाल पाओगी !”

“आप साथ हैं ना.. हम सब संभाल लेंगे !”

“और ये ?”  यज्ञ ने कुसुम के पेट की तरफ इशारा किया

“इन्हे भी संभाल लेंगे !”

कुसुम ने बगल में बैठे यज्ञ के कंधे पर सर रख दिया..
उसी वक्त पेट के अंदर के जीव ने ज़ोर से गुलाटी मारी और कुसुम चौंक कर सीधी हो गयी..

“क्या हुआ ?”

“ये इधर से उधर छलांग लगा रहा !” हंस कर कुसुम ने यज्ञ की हथेली अपने पेट पर रख दी..

यज्ञ की हथेली पर एक ज़ोर की लात पड़ी और वो उत्तेजना से हंसने लगा..

“हमारी ठाकुर जूनियर तो हमसे भी बड़ी बवाल हैं.. कितनी ज़ोर से लात मार रही, पता नहीं बाहर निकलने के बाद क्या करेगी ये.. वैसे कुसुम नौवां महीना भी तो लग गया ना !”

“हम्म… अब कभी भी आपका लड्डू बाहर आ सकता हैं !”

“वैसे तुम इसे लड्डू क्यों बोलती हो.. मान लो बर्फी हुआ तो !”

“लड्डू इसीलिए तो कहते हैं कि बेटा हो या बेटी लड्डू दोनों को बुला सकते हैं… सही हैं ना !”

“लेकिन हमे तो जूनियर ठकुराइन ही चाहिए !”

“आपकी ही चलेगी क्या ? हमें तो ठाकुर जूनियर चाहिए, बिलकुल आपकी परछाई.. ! फिर उससे जी भर कर सेवा करवाएंगे हम !”

“क्यों हम कम सेवा करते है तुम्हारी ?”

“आपसे पैर नहीं न छुवाते है.. वो हमारे पैर भी दबाएगा.. बेटी हो गयी तो पैर थोड़े ना दबवा पाएंगे !”

यज्ञ कुसुम के पैरो की तरफ बैठा और धीरे धीरे उसके सूजे हुए पैरों को अपनी गोद में रख दबाने लगा..

“वाह हमारे राजकुमार से आप पैर दबवाएंगी? इससे अच्छा हम ही ये सेवा कर दे.. बदले में हमें एक राजकुमारी दे देना !”

“बिलकुल !”

एक गहरी सी साँस भर कर कुसुम ने यज्ञ को अपनी तरफ खींच लिया और उस के कंधे से टिक कर आंखे मूँद कर बैठ गयी….

अगले दिन शाम के वक्त कुसुम अपने कमरे से निकल कर नीचे जाने को थी कि सीढ़ियों पर गिरा तेल उसे नजर नहीं आया और वो सीढ़ियों पर फिसल गयी..

हालाँकि चार पांच सीढिंयां लुढ़कते ही उसने किसी तरह खुद को संभाल लिया, लेकिन धक्का इतना तेज़ था कि वो तकलीफ से अपनी जगह से उठ नहीं पायी…

इत्तेफाक से उस वक्त यज्ञ घर में मौजूद था…
वो नीचे आंगन में बैठा चाय पी रहा था… कुसुम को गिरते देख उसके हाथ की चाय का कप हाथ से छूटा और वो तेज़ी से ऊपर की तरफ भागा..
उसने कुसुम को संभाला और धीरे से सहारा देकर खड़ा कर लिया लेकिन तब तक में कुसुम को अस्पताल जाने की ज़रूरत महसूस होने लगी..

वो दर्द से कराह उठी.. उसने यज्ञ की बांह थाम ली..

“छोटे ठाकुर हमे तुरंत अस्पताल निकलना पड़ेगा !”

यज्ञ उसे लिए अस्पताल निकल गया.. साथ में यज्ञ की माँ भी थी.. !

अस्पताल पहुंचते ही कुसुम को साथ लिए अस्पताल का स्टाफ लेबर ओटी की तरफ बढ़ गया। कुसुम की हालत देखकर नर्स ने तुरंत अस्पताल में उस वक्त मौजूद लेडी डॉक्टर को कॉल लगा दिया।

  डॉक्टर अपने ड्यूटी रूम में आराम कर रही थी। लेकिन कॉल सुनते ही वह तेजी से भागती हुई नीचे लेबर ओटी पहुंच गई। उसने जैसे ही ओटी के सामने खड़े यज्ञ को देखा, वह आश्चर्य से उसके पास पहुंच गई।

“आप यहां?”

अपने सामने खड़ी रेशम को देखकर यज्ञ के चेहरे पर हल्के से राहत के भाव चले आए..

“मैडम हमारी वाइफ को लेकर आये हैं… फिसल कर गिरने से इन्हे तकलीफ हो गयी.. नौवां महीना चल रहा हैं !”

“ओह्ह मैं अभी देखती हूँ !”

रेशम तेज़ी से आगे बढ़ कर लेबर ओटी में दाखिल हो गयी…

बाहर खड़े यज्ञ ने अखंड को फ़ोन मिला लिया..

अखंड उस वक्त गीता के साथ पार्टी में था..
गीता उससे अपने दिल की बात कह रही थी..

“हम तुम्हे पसंद करते हैं, आज से नहीं बहुत सालों से लेकिन कभी कहने कि हिम्मत नहीं हुई.. अगर तुम चाहो तो हम अपना एक सुखी संसार बसा सकते हैं.. !

बोलो अखंड हमसे शादी करोगे ?”

अखंड ने गीता की तरफ देखा, एक गहरी सी साँस लेकर उसने गीता का अपने तरफ बढ़ा हुआ हाथ थपथपा दिया..

“हमे माफ़ कर देना गीता, लेकिन हमने तुम्हारे लिए कभी ऐसा कुछ सोचा ही नहीं।
हम ये नहीं कह रहे कि हम कभी शादी नहीं करेंगे, लेकिन फ़िलहाल हम सिर्फ अपने आप पर ध्यान देना चाहते हैं.. अब जाकर तो हमने खुद के लिए सोचना शुरू किया हैं… अब बस अपने कैरियर पर ध्यान देना हैं..।
अभी तो ये पहली सीढ़ी बस हैं अभी तो और ऊपर जाना हैं हमें..।
ये हमारी मंजिल नहीं हैं !
प्यार मुहब्बत शादी ये सब हमारे नसीब में नहीं हैं गीता !”

“लेकिन तुम्हारा भी तो अपना घर परिवार होना चाहिए.. क्या तुम्हे नहीं लगता कि तुम्हारा अपना बच्चा हो, जिसे प्यार से तुम गोद में खिलाओ, जिसका नाम रखो ! “

अखंड कुछ कहता, उसके पहले ही उसका मोबाइल बजने लगा.. यज्ञ का फ़ोन था..।

अखंड ने लपक कर फ़ोन उठा लिया, ये सुनते ही कि कुसुम हॉस्पिटल में है, वो तुरंत वहाँ से निकल गया.. उसी के साथ गीता भी निकल गयी..

उन लोगो के वहां पहुँचते तक में डिलीवरी हो चुकी थी..
अखंड यज्ञ के पास पहुँच चुका था, तभी लेबर ओटी से रेशम बच्चे को सफेद मुलायम कपड़े में लपेट कर बाहर ले आयी !

रेशम को बाहर आते देख यज्ञ, अखंड और यज्ञ की माँ उसी की तरफ बढ़ गयी…
रेशम ने अपने गोद में सिमटे बच्चे को नजाकत से यज्ञ की तरफ बढ़ा दिया…

“बधाई हो, आपको बेटी हुई हैं !”

यज्ञ ने मुस्कुरा कर बधाई स्वीकारी और रेशम से बच्चा अखंड की गोद में देने कह दिया..

“हमसे पहले भैया के हाथ में आएगी हमारी लड्डू… क्यूंकि हम चाहते हैं उन्ही के गुण हमारी बिटिया में भी आये !”

अखंड ने बड़े हलके से उस रुई के फाये को अपनी गोद में ले लिया…
वो अपनी छोटी छोटी आंखे मिचमिचाती अखंड की तरफ देख रही थी..
उसके लुभावने से चेहरे को देख कर अखंड खो सा गया…

“इसे क्या कह कर बुलाएँगे आप अखंड ?”

रेशम ने पूछा और अखंड ने एक बार रेशम की तरफ देख कर वापस उस गुलगोथनी को देखा और मुस्कुरा कर बोल पड़ा..

“हम सब की लाड़ो रानी का नाम होगा… अपराजिता !!”

इति…

कुछ कहानियाँ ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती, कभी हमारे ज़हन में एक मीठी सी याद तो कभी एक अधूरी सी कसक बन कर रह जाती है…
और जो कहानी ज़हन में रह जाती है वही कहानियां सफल मानी जाती हैं !!
इस कहानी ने मेरे जीवन में एक माइल स्टोन सेट कर दिया.. इसी कहानी पर हुए विवाद के बाद मैंने प्रतिलिपि छोड़ने का निर्णय लिया और सच कहूं तो अब लग रहा जैसे एक खुला आसमान सामने हैं..
जहाँ मैं हूँ, मेरे प्रिय पाठक हैं और हैं मेरे किस्सों की  दुनिया !

तो दोस्तों दुखी मत होना कि अपराजिता खत्म हो गयी, अब क्या पढ़ेंगे? क्यूंकि अब मेरी पोटली सी निकलेगी कुछ और कहानियां..
उसके साथ ही जीवनसाथी और मायानगरी भी हैं ना !!

अगली दो कहानियां जिन पर विचार कर रही हूँ, वो है वापसी और छलिया !!

जल्दी ही मिलेंगे, इनमें से किसी एक के साथ…
तब तक साथ और स्नेह बनाये रखें..
और मेरे ब्लॉग का प्रचार प्रसार करते रहें…

aparna….

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Khushi
Khushi
10 months ago

Aprana jii…..love you ❤️❤️❤️❤️

Matlab aap apne har kirdar ko itna sandar bnati h ki jii me aata h aapke hath ko chum lu….maine aapki kafi sari kahaniyo ko padha h…sari ki sari itni sandaar h ki kya bataye….chahe wo mayanagri ho ya chinab kinare…aapki bestseller book ki kahani ho ya fir ye aparajita wali…..sare mere dil ke karibi h…..av jivan sathi .com wali v padhi maine…wo v bahut pasand aayi…ab jaisa ki apne kaha ki kahniya to khatam ho gyi to ab kya padhenge ye soch ke dukhi nhi hona h….haan aap sahi kehti h…aapki sari kahani ek mitha sa ehsaas dil me chhor gyi h…jo reh reh ke mere man ko tript krta h……iss kahani ki baat kre to isme hmko raji or bhawana ki love story bahut achhi lgi….chahe ninad ka character v uske sath Mst tha….ninad ka bhawna ko bawna bulana or v romantic lgta tha…haaye wo sawla salona…jane kaha hoga…….yagya ki har baat pe maskhari krke kusum ko chher jana…ufff…… again love you yar..💕

Tripti
Tripti
1 year ago

बेहतरीन..जीवनसाथी के बाद ये khaani भी अपनी पूर्णता को प्राप्त हुई अंतिम दो पड़ाव पर आंसू आ ही गए | आपकी कहानियाँ इतनी सजीव होती है और एहसासों से भरी होती है की मन किसी दुसरी दुनिया मे ही विचरण करने लगता है | ❤️🌹

Nisha
Nisha
1 year ago

Bahut hi khubsurat kahani thi ye.thodi pareshani hui jab aapne pratilipi chhodkar yahan likhna suru kiya par phir aadat ho gayi.is kahani ka end bahut hi achha laga hame.akhand ke liye itna aasan nahi hai sab bhulkar shadi karke settle ho jana phir bhi wo koshish toh kar hi raha hai aage bahut kuch badal sakta hai.bhawna aur rajendra bhi achhe se ram gaye apne jivan me.resham ke sath atharv ne haar nahi mani aur un andheron se nikal hi liya use.kusum ki kya kahun.wo sach me chhoti thakuraine kahane layak hai.usne yajyn ki mehnat ko safal banakar sab thik kar diya.aasha hai akhand ki aprajita bhi kabhi apne jivan ke muskilon se haar nahi manegi apne naam ki tarah 👌👌👌👌👌😘👌👌❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

sarika Tripathi
sarika Tripathi
1 year ago

maam bahot pyaari story thi…bs Mera Akhand hi akela reh gaya …uske liye b jeevansathi dhundh Dena tha aapko….mann hi ni kr raha tha ki ye story khatm ho.

Kirti Ailani
Kirti Ailani
1 year ago

Awesome story

Tripti Misra
Tripti Misra
1 year ago

Mayanagri or Jeevansathi ke parts kab aayenge

Samiksha Jain
Samiksha Jain
1 year ago

Loved the story a lot…story khatm hokar bhi Kitna lively lagti hai
You are an amazing writer Aparna ji…keep it up

Jyoti yadav
Jyoti yadav
1 year ago

Sach me kahaniya khtam ho kar bhi khatm nhi hoti,aapki rachna ki khasiyat yahi hai ki wo mnn se nikalti hi nahi.
Waise ek aur rachna ki safalta ki badhai ho aapko ,💐 aap likhte rahe ham padhte rahe aur jivan ki samsyao se ubarne ka Naya najriya talshte rahe .hamari shubhkamnaye aapke sath hai.

Godrobin
Godrobin
1 year ago

Bahut acha likha aapne. Samapan bhi bahut acha hua.

Rekha Dhanaliya
Rekha Dhanaliya
1 year ago

Aakhirkar khatam ho gyi humari favorite aprajita…akhand Babu ki love life ni dekh paye kasaak to rhegi ..dr. Sahiba…sasu mom…kitne pyare pyare sambodhan ho gye aapke