अपराजिता -62
ओ लुक छिप ना जाओ जी,
मने दीद कराओ जी…
रे क्यूं तरसावे हो, मने शक्ल दिखाओ जी…
थारी शरारत सब जानू हैं चौधरी..
हारे से लेओ ना पंगा जी मैं कह लगी…
महारे हिवड़े में जागी घोकणी
रे चंदा में थारी चाँदनी..
माने दामण में बाँधी खुशी
रे झूम झूम झूम झूम वा झूम
म्हारे हिवड़े में जागी घोकणी
रे चंदा में थारी चाँदनी..
बारात के स्वागत की भव्य तैयारियां थी.. ठाकुरों ने किसी बात की कमी ना रखी थी…
बाजे गाजे, खाना पीना हर तरफ लोग चहकते महकते नजर आ रहे थे..
सुजाता और उसकी सास के पास तो साँस लेने की फुर्सत नहीं थी..।
ऐसा लग रहा था आज सब कुछ ढंग से निपट जाये तो दोनों सास बहु दो दिन तो सो सोकर थकान उतारेंगी और फिर गंगा नहाने निकल जाएँगी..
काम काज में विघ्न ना आये इसलिए सुजाता ने अपनी बिटिया को कुसुम के पास टिका दिया था..।
सुजाता बारातियो के स्वागत में दिए जाने वाले चांदी के सिक्कों का थैला एक तरफ लटकाये तेज़ी से इधर उधर देखती अपने पति को ढूंढ़ रही थी..।
उन्हें ही तो ये सिक्के बारातियों को नारियल के साथ देना था, लेकिन इस भारी महत्वपूर्ण कार्य के समय चंद्रा नजर नहीं आ रहा था, ये देख कर सुजाता का दिल घबराने लगा था..
वो अपनी सास की तरफ लपकी..
“अम्मा जी, ये कहाँ है ?”
“को जानी..? काहे वहाँ बाहर नहीं है का ?”
सुजाता ने ना में गर्दन हिला दी..
उसकी भयत्रस्त आंखे कुछ और ही शंका दिखा रही थी..
उसी समय धीरे धीरे सीढ़ियां उतर कर गिट्टू नीचे चली आयी..
“मम्मी.. मम्मी सुनिए !”..
अपनी तोतली बोली में अपनी मम्मी के पास पहुंची गिट्टू सुजाता की साड़ी पकड़ कर उसे बुलाने लगी..
सुजाता ने उसे देखा और और उसे गोद में उठा लिया..
“मम्मी सुनो… फुआ ना.. !”
“हम्म बस बस… आओ तुम्हे कुछ खिला दे.. !”
सुजाता तुरंत गिट्टू को लिए खाने पीने के स्टॉल की तरफ बढ़ गयी..
“मम्मी सुनो ना.. !”..
“चुप करो गिट्टू.. तुमको भूख लगी है ना.. चलो कुछ खिला दे.. !”..
गिट्टू अब भी अपनी माँ से अपने मन की बात ना कह पा रही थी, दरअसल उसकी माँ शायद उसके मुहं से ये सुनना ही नहीं चाहती थी कि गिट्टू की फुआ भाग गयी है..
सकुशल भाग जाती तो खैर थी, लेकिन सुजाता के सर ये चिंता भी सवार हो गयी थी कि उसका खून खार पति कहीं नजर नहीं आ रहा था, ऐसा कैसे संभव था ?
कहीं चंद्रा को पता तो नहीं चल गया था कि कुसुम घऱ छोड़ कर भागने वाली है..?
सुजाता के चेहरे पर पसीने की बूंदे छलक आयी..
अब क्या होगा ?
अगर कुसुम पकड़ी गयी तो ?
उसने तुरंत कुसुम के नंबर पर कॉल लगा दिया..
कुसुम और राजेंद्र गाडी में थे..
ठंडी ठंडी हवा चल रही थी.. मौसम गज़ब सुहावना हो चला था, हर तरफ यूँ लग रहा था प्यार कि बहार छायी हुई है..
कुसुम का चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था, लेकिन राजेंद्र के दिल में जाने क्यों रह रह कर एक ही बात आ रही थी कि क्या ये सब ठीक है ?
और इसका भविष्य क्या होगा ?
कुसुम ने लोकेशन ट्रेस ना हो जाये इस डर से फ़ोन बंद कर रखा था, इसलिए सुजाता का फ़ोन नहीं लगा !
बाइक सरपट रास्ते पर भागती चली जा रही थी.. कुसुम ने दोनों तरफ पैर कर के बैठने के कारण पीछे से राजेंद्र को अपनी बाँहों में कस रखा था…
वो राजेंद्र की पीठ से लगी आंखे मूंदे कुछ गुनगुना रही थी…
“आजा पिया तोहे प्यार दूँ
गोरी बैयाँ तोपे वार दूँ
किसलिए तू इतना उदास
सुखे सुखे होंठ अंखियों में प्यास…
किसलिए….
*****
द्वारचार निपटने के साथ ही यज्ञ बाबू को दूल्हे की वेदी पर बैठा दिया गया था, पंडित ने शाखोच्चार प्रारंभ कर दिया था..
देखते ही देखते मंत्र और श्लोक की आवृत्तियों के बीच उठती कपूर और गुग्गुल की खुशबू ने उस पूरे परिसर को पवित्र कर दिया था और उसी वक्त पंडित जी ने “कन्या को बुलाइये” की पुकार लगा दी…
सुजाता वहीँ घबराई सी खड़ी थी..
अपनी ताई सास के इशारे पर वो लड़खड़ाई सी अंदर की तरफ बढ़ गयी..
कुसुम की अम्मा अंदर कोहबर में बाद की पूजा पाठ की तैयारी में लगी थी..
दुल्हन की बहने, सहेलियां सजीले दूल्हे को छेड़ने में लगी थी और दूल्हे के दोस्त उन सुन्दरियों को ताड़ने में लगे थे…
माहौल गुलाबी हुआ जा रहा था…
इस सब से हटकर अखंड की नजर पूरी तरह से वीर पर टिकी हुई थी।
क्योंकि अखंड को मालूम था कि वीर पूरे दिन भर में बिना पिए नहीं रह सकता था। और वीर मौके की तलाश में ही था,और उसे मौका मिल भी गया। बारातियों के लिए खाना खुल चुका था। ठाकुरों के यहां की शादी होने के बावजूद वहां शराब की कोई व्यवस्था नहीं थी। लेकिन वीर अपनी व्यवस्था खुद करके आया था। उसने अपने एक गुर्गे को पास बुलाया और उसे अपना सामान लाने का इशारा कर दिया। उस बड़े से मैदान के कोने में लगी कुर्सियों पर टिककर वह बैठ गया। उसका दोस्त जैसे ही उसके लिए शराब की बोतल लेकर आया उसी वक्त अखंड वहां पहुंच गया, और उसने वीर के कंधे पर हाथ रख दिया। वीर ने घबराकर पलट कर देखा और अपने सामने खड़े अपने बड़े भाई को देख वह शर्मा कर नीचे देखने लगा।
” माफी मांगते हैं भैया, लेकिन हमने सुबह से नहीं पी थी, तो बस तलब लगने लगी थी।”
” इसी बात के लिए तो तुम्हें मना किया था ना छोटे। आज तुम बिल्कुल नहीं पियोगे।”
“भैया हम रह नहीं पाएंगे। बस एक घूंट पी लेने दीजिए, जिससे हम सामान्य हो सके।”
” ठीक है। हमारे सामने पी लो।
यह पूरी बोतल नहीं गटकना तुम्हें,समझे ?”
वीर ने हामी भरी और बोतल खोलकर अपने मुंह से लगा ली। अखंड जब तक उससे बोतल छीन पाता, तब तक वीर आधी बोतल गटक चुका था।
अखंड ने नाराजगी से उससे बोतल ली और वीर को चुपचाप चलकर बैठने का इशारा किया।
वीर भी अखंड की बात मानकर उसके साथ हो लिया, और मंडप में जाकर चुपचाप बैठ गया।
अखंड की नजरे यज्ञ पर टिकी हुई थी। आज यज्ञ बहुत प्यारा लग रहा था। उसके माथे पर लगा तिलक उसे और भी सुंदर दिख रहा था। अखंड मोहित सा अपने छोटे भाई को देखकर उसकी खुशी में खुश था..।
इस समय पंडित जी ने एक बार फिर पुकार लगा दी “कन्या को बुलाइये..”
दूर एक दीवार की ओट के पीछे छिपी सुजाता का दिल जोरो से धड़कने लगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?
अगर चंद्रभान यहां मौजूद रहता तो शायद वह इतना नहीं घबराती, लेकिन उसका पति और उसकी ननंद दोनों ही यहां से गायब थे।
अब पता नहीं भगवान आगे क्या करने वाले थे? यह सोचकर सुजाता ने अपनी आंखें बंद कर ली। उसने कुसुम को जाने कितना समझाया था, कि जल्दी से शहर निकल जाना, पर पता नहीं ये लड़की निकल पायी भी या कहीं फंस कर रह गयी…?
तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा और वह चौंक कर पीछे मुड़ गई, उसके ठीक सामने उसकी सास खड़ी थी…
“का भया बहु.. हियाँ काहे खड़ी हो ?”
“अम्मा जी, वो कुसुम.. !”
“का हुआ ?” अम्मा जी ने अपने सपाट पड़े चेहरे से सुजाता की तरफ देखा…
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जल चुके हैं बदन कई,पिया इसी रात में
थके हुए इन हाथों को, दे दे मेरे हाथ में
हो सुख मेरा ले ले, मैं दुःख तेरे ले लूँ
सुख मेरा ले ले, मैं दुःख तेरे ले लूँ
मैं भी जिऊँ, तू भी जिए……
राजेंद्र को कुसुम का गुनगुनाना बड़ा भा रहा था.. कि तभी अचानक उसे सामने खड़ी एक गाड़ी से अपनी आँखों पर तेज़ रौशनी चुभती सी महसूस हुई और तेज़ चलती गाड़ी को तुरंत गियर ना बदल पाने के कारण उसने ऐसे ही ब्रेक लगाया और गाड़ी कुछ दूर तक घिसट कर गोल घूम कर खड़ी हो गयी..
इस झटके से कुसुम ने भी आंखे खोल ली और सामने की तरफ देखने लगी..
राजेंद्र ने देखा और उसकी आंखे चौड़ी हो गयी…
सामने अपनी जीप के पास चंद्रा खड़ा था… वो अपनी जीप से लग कर खड़ा राजेंद्र की तरफ घूर घूर कर देख रहा था…
राजेंद्र के अचानक रुकने से कुसुम भी सीधे होकर बैठ गई।
उसने राजेंद्र के पीछे से झांक लगाकर देखा और सामने खड़े अपने भाई को देखकर उसके चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगी। वह धीरे से राजेंद्र की बाइक पर से उतर गई।
चंद्रा ने गुस्से में घूरते हुए उसे देखा।
यूँ लग रहा था जैसे एक शेर के सामने शेरनी निर्भीक तन कर खड़ी हो।
राजेंद्र चुपचाप दोनों भाई बहनों को देख रहा था।
चंद्रा ने कुसुम को देखा और उसे अपनी तरफ आने का इशारा कर दिया।
” कुसुम!! ” चंद्रा चीख उठा
” शांति से कह रहे हैं, हमारे साथ घर वापस चलो। बारात खाली हाथ नहीं लौटेगी।”
” भैया हमारी भी सुन लीजिए, हम डॉक्टर साहब से ही शादी करेंगे !”
“एकदमे पगला गयी हो क्या बैझड, बौड़म लड़की.. चलो चुपचाप..
“नहीं जायेंगे !”
“हम जानते थे, ऐसे नहीं मानोगी.. !”
चंद्रा ने अपनी शर्ट में छिपा राखी गन निकाली और सामने खड़े राजेंद्र की ओर तान दी।
लंबे-लंबे डग भरता चंद्रा राजेंद्र और कुसुम की तरफ चला आया।
कुसुम खा जाने वाली नजरों से अपने बड़े भाई को देख रही थी। लेकिन उसके इस तरह देखने से उसका भाई डरने वालों में से नहीं था।
उसने आकर अपनी गन राजेंद्र के माथे की ठीक-बीचों-बीच तान दी। चेहरा कुसुम की तरफ घुमा कर चंद्रा ने अपनी बहन को निगल जाने वाली नजरों से देखा और उसे जीप की तरफ बढ़ने का इशारा कर दिया।
कुसुम तब भी पत्थर बनी खड़ी रही। उसकी आंखों से गुस्से में आंसू गिरने लगे, लेकिन इस वक्त उसके भाई को सिर्फ अपनी ऊंची नाक की फिकर थी।
” कुसुम तुम अच्छे से जानती हो, यह गन चलाना हमारे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं है…।
तुम चाहे जो कर लो, लेकिन तुम्हारा ब्याह यज्ञ बाबू से ही होना है। और उन्हीं से होकर रहेगा।
अगर इस लड़के की जिंदगी बचाना चाहती हो तो चुपचाप जाकर जीप में बैठ जाओ। हम तुमको वापस ले जाएंगे और इस लड़के को जिंदा छोड़ देंगे और तुम्हारा ब्याह शांति से निपट जाएगा।
और अगर तुम अपनी मर्जी से जाकर जीप में नहीं बैठी, तब हम इस लड़के को मार के यही गाड़ देंगे और उसके बाद तुम्हें खींचतान कर वापस ले जाएंगे। यज्ञ की वेदी में बैठने।
अब बोलो, किसी की लाश के ऊपर से चढ़कर अपने ब्याह का स्वांग भरना चाहोगी..?
राजेंद्र उन भाई बहन के बीच कुछ कहे बगैर चुपचाप सांस रोके खड़ा था। उसकी समझ से परे था कि उसे इस वक्त क्या करना चाहिए?
उसकी कुसुम की तरफ देखने के लिए गर्दन घूमाने की भी हिम्मत नहीं थी। क्योंकि उसके माथे पर चंद्रभान ठाकुर की गन लगी हुई थी।
गन का धातु वाला गोल हिस्सा ठंडा पड़ा हुआ था। और उस सर्द स्पर्श को राजेंद्र अपनी त्वचा में महसूस कर पा रहा था। इस पल को उसे साक्षात यमराज अपने सामने खड़ा नजर आ रहा था।
सच कहते हैं लोग अपने जीवन से प्यारा इस जगत में कुछ भी नहीं। हालांकि अब भी राजेंद्र कहीं ना कहीं यही चाह रहा था कि कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि कुसुम उसकी हो जाए। लेकिन अपनी मौत के बदले यह सौदा उसे बहुत महंगा लग रहा था।
इस वक्त वह अपनी जान बचाना चाहता था….लेकिन साथ ही उसे कुसुम की जान का भी डर बना हुआ था.. कुसुम के पागलपन से वो परिचित था, कहीं ऐसा ना हो की चंद्रा की गन खींच कर वो खुद को नुकसान ना पहुंचा ले, और बस यही सोच सोच कर राजेंद्र और भी जड़ हुआ जा रहा था..
उसे अपनी जान प्यारी थी, बहुत प्यारी..
लेकिन कुसुम की सुरक्षा और उसकी ज़िन्दगी के सामने वो अपनी जान की कीमत बहुत कम पा रहा था….
हर हाल में कुसुम की सुरक्षा ही उसके लिए महत्वपूर्ण थी..
गुस्से में कांपती कुसुम कुछ भी बोल पाने में असमर्थ हो उठी थी। उसने जलती हुई नजर से अपने भाई की तरफ देखा और भरभरा कर वहीं जमीन पर ढेर हो गई…
***
निनाद से अलग होकर भावना ने उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए अपने घर की तरफ ले जाने लगी..
निनाद ने धीरे से मुस्कुरा कर उसे रोका और अपनी टैक्सी की तरफ बढ़ गया। टैक्सी की पिछली सीट का दरवाजा खोलकर उसने भावना को अंदर बैठाया और उसके पीछे ही खुद बैठ गया। अंदर बैठते ही उसने भावना के कंधे को अपनी बाहों के मजबूत घेरे में ले लिया, जैसे अब वो भावना को पल भर के लिए भी खुद से दूर नहीं करना चाहता था।
भावना भी सकुचा कर उसके पहलू में सिमट गई। और टैक्सी भावना के घर की तरफ बढ़ गई।
मुश्किल से मिनट 2 मिनट में वो लोग भावना के घर पहुंच गए। टैक्सी से उतर कर भावना निनाद को लिए घर के अंदर दाखिल हो गई। भावना की मां जो कि बाहर वाले कमरे में ही बैठी भावना का इंतजार कर रही थी, भावना के साथ आए सांवले सलोने से लड़के को देखकर चौंक कर खड़ी हो गई।
और भावना धीरे से अपनी मां की तरफ बढ़ गई।
उसने निनाद का परिचय माँ से करवाया और उन दोनों को कमरे में बैठा छोड़कर निनाद के लिए चाय बनाने रसोई में चली गई। भावना की मां कुछ देर तक निनाद को देखती रही और जाने कैसे उनकी अनुभवी आंखों ने सब कुछ समझ लिया।
जाति धर्म की बेड़ियों में बचपन से घिरी इस कुशाग्र बुद्धि की महिला ने उन बेड़ियों को अपनी बेटी के पैर के बंधन बनने से पहले ही काट दिया।
उन्होंने मुक्त कंठ से निनाद और भावना के रिश्ते को स्वीकार कर लिया।
निनाद से बैठे-बैठे बातें करने में लगी, भावना की मां भी भावना की तरह ही इस सुलझे सुथरे से लड़के पर वारी जा रही थी। इधर रसोई में चाय बनती भावना अपनी मां और निनाद की मीठी-मीठी बातों को सुनकर मुग्ध होती जा रही थी, तभी उसे पिछले आंगन में कुछ चहल-पहल की आहट सुनाई दी।
चाय को धीमा करके वह रसोई के पिछले दरवाजे को खोल पीछे तरफ के आंगन में बढ़ गई। वह थोड़ा आगे बढ़ी थी कि किसी ने उसके चेहरे पर एक गमछा डालकर उसे उसकी गर्दन के पास से लपेटा और उसे एकदम से खींचकर आंगन के पिछले दरवाजे से बाहर ले गए।
भावना की मां और निनाद बैठे हुए भावना के सुनहरे भविष्य के बारे में परिकल्पनाओं में लगे रहे और इधर भावना को चंद्रा भैया के गुंडे उठाकर उसके घर से बाहर ले गए…
” छोड़ दो कौन हो तुम लोग, छोड़ दो हमें।”
भावना की रिरियाती सी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सी दब कर रह गयी..
उस कपड़े के भीतर कहीं खो कर रह गई उसकी चीख और उन दोनों गुंडो ने अपने साथ लाई हुई जीप की पिछली सीट पर दोनों तरफ से पकड़ कर भावना को बीच में दबाकर बैठाया और जीप को चंद्रा के बताएं पते की तरफ निकाल दिया….
***
अपने भाई के पैरों के पास जमीन पर गिरी कुसुम के आंसू जमीन पर लगातार गिरते जा रहे थे, लेकिन राजेंद्र के माथे पर गन ताने खड़े चंद्रा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था..
” हमारी इज्जत नीलाम करने चली थी?
तुमने इतना बड़ा कदम उठाने से पहले यह नहीं सोचा कि अगर तुम भाग कर चली गई और बारातियों को पता चल गया कि दुल्हन मौजूद नहीं है तो बाबूजी का क्या होगा ?
उनकी नाक सरे आम काट कर बाजार में नीलाम करवाने में तुमको क्या मिल गया कुसुम? हमारे घर के ऐसे तो संस्कार नहीं थे ना।
आखिर शादी ब्याह ही तो करना था। अगर अपनी पसंद के लड़के से न करके हमारी पसंद के लड़के से कर लेती तो कौन सा सूरज पश्चिम से उग जाता।
अरे शादी ब्याह के बाद प्यार मोहब्बत सब हो ही जाता है। हम कौन सा तुम्हारी भाभी से प्यार मोहब्बत करने के बाद ब्याह किए है? यह सब आजकल की फालतू बातों में ना दिमाग सङा रही हो तुम।
तुमने जो काम किया है, कायदे से तो हमें सीधे तौर पर तुम दोनों को गोली मार देनी थी। लेकिन क्या करें, बहन हो हमारी।
हमारा ही खून!!
आखिर तुममे हमने हमेशा बचपन से अपनी बेटी को देखा था। हमें आज भी तुम्हारे रूप में गिट्टू ही नजर आती है और गिट्टू के रूप में कुसुम।
बस इसीलिए ना तुम्हें गोली मार पाए और ना तुम्हारे इस डॉक्टर साहब को।
वरना तो इस लड़के का चेहरा भी बर्दाश्त नहीं हो रहा हमें।
लेकिन हम जानते हैं, अगर इसे गोली मार दी, तो तुम खुद के साथ कुछ गलत कर लोगी और तुम्हारे साथ सब सही करने के लिए हमें इस लड़के को जिंदा रखना पड़ेगा।
हम इतना तो जानते ही हैं कसम कि तुम इसके साथ कुछ बुरा नहीं होने दोगी।
तो अब यह रोने धोने का नाटक नौटंकी सब अपने विदाई के लिए बचा के रखो। अपनी विदाई के समय अपने डॉक्टर साहब को याद कर करके ही आंसू बहा लेना। अब चलो हमारे साथ..।”
कुसुम जिद में वही जमीन पर बैठी रही और चंद्रा ने हाथ बढ़ाकर कुसुम की कलाई थामी और खींचकर उसे उठा लिया।
कुसुम कसमसा कर रह गई, लेकिन उसमें इतनी ताकत नहीं थी कि अपने बड़े भाई की शारीरिक क्षमता का मुकाबला कर सके।
लंबे चौड़े चंद्रभान ने कुसुम को खींचकर उठाया और खींचते हुए अपने साथ जीप की तरफ ले गया। जीप के पास पहुंचकर ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट का दरवाजा खोला और कुसुम को अंदर धक्का दे दिया। गिरती पड़ती सी कुसुम जीप में सवार हो गई। जीप में बैठने के बाद भी उसके आंसू रुक नहीं रहे थे। चंद्रा ने वहीं से अपने लोगों को इशारा कर दिया। राजेंद्र को घेर कर लगभग 8-10 लड़के खड़े थे। उनमें से एक ने अपनी गन निकालकर राजेंद्र के माथे पर तान रखी थी।
चंद्रा ने उन लड़कों को कुछ इशारा किया और खुद घूम कर ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया। चंद्रा ने एक बार घड़ी देखी और अपना फोन निकालने जा रहा था कि दूर से उसे अपनी ही दूसरी जीप आती दिखाई दी। जैसे-जैसे वह जीप करीब आती गई, चंद्रभान के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
कुसुम अब भी नीचे चेहरा किए रोए जा रही थी। उसकी राजेंद्र से भी नजर मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
लेकिन तभी वह दूसरी जीप आकर ठीक जहां राजेंद्र खड़ा था, वहां खड़ी हो गई। और उन लड़कों ने गन पॉइंट पर राजेंद्र को आगे बढ़कर जीप की अगली सीट पर बैठा दिया।
चंद्रा ने हल्की टेढ़ी सी मुस्कान दी, उस जीप को देखा और वापस अपनी बहन की तरफ देखने लगा।
” कुसुम आखरी बार देख लो अपने डॉक्टर साहब को! क्योंकि अब यह तुम्हें तुम्हारी शादी के बाद भी नजर नहीं आने चाहिए।और तुम्हारी शादी के बाद अगर कभी यह कहीं किसी मोड़ पर तुमसे टकरा भी गए तो तुम इन्हें पहचानने से इनकार कर दोगी। वही तुम्हारी शादीशुदा जीवन के लिए सही रहेगा, समझी !!
तुम एक ठकुराइन हो, और इस बात को भूलना मत। एक बार अग्नि के पवित्र फेरे लेने के बाद तुम पूरी तरह से यज्ञ बाबू की हो जाओगी,और उसके बाद यह डॉक्टर साहब वाला कांड जिंदगी भर के लिए भुला देना समझ रही हो ना।”
चंद्रा ने गन को अपनी दूसरी तरफ जरा हिफाजत से रखा और जीप को मोड़कर हवेली की तरफ घुमा लिया, इसके साथ ही वह दूसरी जीप मुड़कर शहर की तरफ बढ़ने लगी…
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क्रमशः
aparna…

Bhawna ke sath kya kiya chandra ne 😱😱😱