Bestseller-4

The Bestseller -4

         Missing kids…

     अजीब सा खौफनाक मंजर था छत की लोहे की रॉड से लटके सात काले दुपट्टे और उन काले दुपट्टे से फांसी पर लटके घर के सात सदस्य।
       इन लाशों में दो लाशें आदमियों की थी तीन औरतें थी और दो बच्चे।
   शेखर ने किरायेदारों से पूछताछ शुरू की तो पता चला उनके घर में दो और बच्चे भी मौजूद थे।
सारी पूछताछ के बाद शेखर को कुछ अलग सी जानकारी भी मिली।
   यह परिवार संयुक्त परिवार था जहां कुल तीन भाइयों का परिवार एक साथ रहा करता था। जिनमें से घर का सबसे बड़ा बेटा गांव के पुश्तैनी घर में रहकर खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी निभा रहा था।  उसी के साथ उनकी मां भी रहा करती थी, जो कुछ समय पहले ही स्वास्थ्य सही नही होने से गुज़र चुकी थीं। उसकी बीवी बच्चे अभी दो साल पहले ही शहर आए थे और परिवार के साथ रह रहे थे।
    शेखर ने फटाफट पंचनामा करने के बाद मेडिकल टीम को भी जगह पर बुलवा लिया था उनके जांचने परखने और तस्वीरें लेने के बाद सभी लाशों को फंदों से निकाला गया और पॉलीथिन कवर में पैक करके अस्पताल के लिए भेज दिया गया।
    सभी की फॉरेंसिक जांच होनी बेहद जरूरी थी।
   शेखर ने किरायेदारों से नंबर लेकर उस घर के बड़े बेटे जो कि गांव में था को फोन द्वारा सूचना भिजवा कर तुरंत बुलवाया और खुद अपने थाने की तरफ निकल गया।
   इस सब में और इस सारे परिवार में देखा जाए तो अब उस घर का बड़ा बेटा जो गांव में रहा करता था ही ज़िंदा बच रह गया था और बचे थे उसके दोनो बच्चे जो फिलहाल पढ़ाई के लिए बाहर शहर रहा करते थे।

******

       जैसे-जैसे दिन चढ़ता जा रहा था नंदिनी की हालत खराब होती जा रही थी। वह जिस फील्ड में काम कर रही थी उसके कारण उसे कत्ल, लाश आदि के बारे में काफी जानकारी थी।
   उसे पता था मरने के 8 से 10 घंटे के बाद बॉडी में “राइगर मोरटिस” शुरू हो जाएगा और उसके बाद इस बॉडी को हिलाने डुलाने में भी तकलीफ हो जाएगी। वह यही सोच रही थी की बॉडी खराब होनी शुरू हो उसके पहले उसे कोई ना कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा।
    पर अब तक इस निर्णय पर नहीं पहुंच पाई थी कि उसे इस बारे में शेखर से बात करनी चाहिए या नहीं।
उसका एक मन कह रहा था शेखर को बता देना चाहिए, वो ज़रूर उसका साथ देगा । लेकिन दूसरा मन कह रहा था कि शेखर एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर है। और वह कभी किसी कीमत पर एक लाश को छुपाने में नंदिनी की मदद नहीं करेगा।
     नंदिनी को इस बात की भी चिंता थी यह लाश कोई ऐसी वैसी लाश नहीं थी। जिसे वह कहीं भी छोड़ दे और लोग पहचान ना पाए।
    फिर भी अभी दिनदहाड़े इस लाश को लेकर कहीं भी ज्यादा घूमना फिरना उसके लिए सुरक्षित नहीं था और यही सोचकर वह अपनी बिल्डिंग की तरफ मुड़ गई।
   
      गाड़ी पार्किंग में डालने के बाद उसने अच्छे से अपनी गाड़ी की डिक्की का लॉक चेक किया, उसके बाद ऊपर अपने फ्लैट पर चली गई। फ्लैट पर जाने के बाद उसने जल्दी से अपना परफ्यूम ,डियोडोरेंट और रूम फ्रेशनर निकाला और वापस एक बार गाड़ी के पार्किंग में पहुंच गई। डिक्की बिना खोले ही वह गाड़ी की पिछली सीट पर गई और वहीं से उसने बिना पीछे देखे खूब सारा डीयो और परफ्यूम पीछे डाल दिया। एक बार फिर वह गाड़ी अच्छे से लॉक करके अपने फ्लैट पर वापस लौटने निकल गयी।
   वो लिफ्ट में दाखिल हुई ही थी कि तभी पीछे से भागते हुए अनिल आया और उसने हाथ का इशारा देकर लिफ्ट रुकवा ली। लिफ्ट का दरवाजा बंद होने से पहले ही नंदिनी ने लिफ्ट खोल दी, और अनिल भी दोनों हाथ में सामान का बैग पकड़े अंदर दाखिल हो गया…
” गुड मॉर्निंग नंदिनी अभी तो ऑफिस से आ रही होंगी ना !!..लेकिन आज जरा ज्यादा लेट नहीं हो गया…. दस बज गए! तुम तो सुबह सुबह आ जाती हो?”
अनिल के सवाल पर वह हल्के से मुस्कुरा कर चुप रह गई। उसके दिमाग में फिलहाल यही चल रहा था कि आखिर ऐसा क्यों होता है अगर गलती से किसी से कोई गुनाह हो जाए तो सारी दुनिया करमचंद बन जाती है।
   लिफ्ट उनके माले पर रुकी और दरवाजा खुल गया
” कम ऑन नंदिनी तुम थकी हारी आई हो… हमारे साथ चाय पी लो।”
   वैसे तो वाकई इस वक्त इतनी थकी थी कि उसका चाय पीने का मन कर रहा था। लेकिन उसका सर दर्द से इतनी बुरी तरह फट रहा था कि अभी अनिल की कोई बकवास सुनने का उसका मन नहीं था…” नहीं मैं एक्चुली रात भर से सोई नहीं हूं । तो थोड़ा फ्रेश होने का मूड है…. मैं चलती हूं।”
   जरा रूखा सा ही जवाब देकर वह अपने फ्लैट की तरफ मुड़ गई। अपने फ्लैट का दरवाजा खोलते हुए अचानक उसका ध्यान गया कि अनिल ने दो बैग भर कर सामान पकड़ा हुआ था। उसने तुरंत झटके से नजर पीछे की।  उस वक्त अनिल घर पर दस्तक देने के बाद दरवाजे को चाभी से खोल रहा था। उसे अनिल के हाथ में पकड़े एक बैग से झांकता काला कपड़ा, नारियल, काला धागा और भी कुछ मनकों की माला सा नजर आने लगा। उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन फिर वह अपने फ्लैट में दाखिल हो गई।
      अपने फ्लैट में दाखिल होने के बाद वो सीधा सोफे पर जाकर पसर गई। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, कि यह सब उसके साथ हुआ था।
    आज तक उसने सिर्फ टीवी सीरियल्स और फिल्मों में ही ऐसा देखा था और आज उसकी खुद की गाड़ी की डिक्की में एक लाश थी। सोच कर ही उसके पूरे शरीर में झुर्झुरी से दौड़ गई। और उसने अपना सर पकड़ लिया। उसका सिर इतनी तेजी से दर्द कर रहा था कि लग रहा था फट जाएगा। उसने दराज़ से दर्द की गोली निकाली और पानी भरे गिलास में दो गोलियां डालकर घोल कर पी गई।

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      आज उसकी इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि बाथरूम में जाकर हाथ मुहँ में भी धो ले ।
   वो एकटक छत की तरफ देखती सोचने लगी…. कि आखिर उसकी गाड़ी में लाश आई कहां से?
    और फिर थोड़ी देर में ही उसका पत्रकार वाला दिमाग तेजी से काम करने लगा!  अब तक तो वह बिल्कुल एक साधारण सी लड़की की तरह लाश को देखकर घबरा रही थी।  और सारा वक्त उसके दिमाग में यही चल रहा था  कि वह खुद को बेगुनाह कैसे साबित करेगी, लेकिन अब तक सिक्के के दूसरे पहलू पर उसने ध्यान ही नही दिया था।
    वह खुद जानती थी कि वह गुनहगार नहीं है। इसका मतलब था कि गुनहगार कोई तो था। और वह गुनहगार कौन था? आखिर कौन हो सकता था जिसने ऋषिकेश रायसागर का मर्डर किया था? और मर्डर करने के बाद उसकी गाड़ी की डिक्की में डेड बॉडी लाकर पटक दी थी।
     अब ये दस मिनट पहले खाई गोली का असर था, या उस लाश के लिए उसके सोच में हुई बदलाव का असर था कि अब उसका सर दर्द गायब हो चुका था।  और नंदिनी के अंदर का पत्रकार पूरी तरह से चाक-चौबंद होकर उस लाश के बारे में सोचने लगा था।
      आखिर लाश मेरी गाड़ी में आई कैसे?  लाश के खुद तो पैर होते नहीं यानी कि उसे किसी ने लाकर उसकी गाड़ी में डाला था! अब पहला सवाल था कि उसकी गाड़ी में ही क्यों ? तो क्या कोई उससे किसी रंजिश का बदला निकाल रहा था? लेकिन वह इस शहर के लिए नयी थी और ये शहर उसके लिए नया था।  लगभग छह -सात महीने ही तो हुए थे उसे यहां आ कर काम करते हुए।
   तो इस छोटे से समय में उसका इतना बड़ा सा दुश्मन कौन हो सकता है, कि किसी का मर्डर कर दे और उसकी गाड़ी में डाल दें।
     इसके बाद नंदिनी का दिमाग अपने दुश्मनों की तरफ दौड़ने लगा। 
       अभी कुछ दिन पहले ही ऑफिस में धीरज जिस कॉलम को लिखा करता था, उसे वहां से हटाकर एडिटर साहब ने उसकी जगह पर नंदिनी को वह कॉलम लिखने का जिम्मा सौंपा था, तब धीरज थोड़ा सा नाराज भी हो गया था। हालांकि नंदिनी ने जब उससे बात की तब तो उसने ऐसी कोई नाराजगी सामने से नहीं दिखाई थी, लेकिन नंदनी को समझ में आ गया था कि धीरज को उसकी जगह लिखना पसंद नहीं आया था।
    
     “पर ये बात इतनी बड़ी तो नहीं थी कि इसके लिए धीरज एक इतने फेमस साहित्यकार को मार डाले और उसकी लाश मेरी गाड़ी में छुपा दे….. नो नेवर धीरज ऐसा नहीं कर सकता? “
     फिर कौन हो सकता है?
  
नंदिनी खुद से ही बातें कर रही थी
  
    “कहीं मेरे साथ स्कूल में पढ़ने वाला अमितेश तो नहीं जो, स्कूल के बाद कॉलेज तक पिछले 5 सालों से हर वैलेंटाइन डे पर कार्ड और रेड रोज भेजा करता था और  उसके बारे में माला के बताने पर मैंने सारे कॉलेज के सामने उसका कार्ड फाड़ कर उसके मुंह पर फेंक दिया था।
    और वह बेचारा अपना सा मुहँ लेकर कॉलेज से वापस चला गया था। उस दिन के बाद से लेकिन वह कहीं नजर भी नहीं आया था।
      पर यार यह बात भी इतनी बड़ी तो नहीं थी कि बदला लेने के लिए वह मेरी कार की डिक्की में ऋषिकेश रायसागर की डेड बॉडी डाल देगा?
     मतलब एक तरफा प्यार में तो लोग अजीब से बदले लेते हैं। जैसे मेरे बॉयफ्रेंड को फोन करके अपने बारे में बताना या, अपने हाथ की नस काट लेना, या मेरे घरवालों से आकर शिकायत कर देना। और कुछ ज्यादा ही कमीना आशिक हुआ तो चेहरे पर तेजाब फेंक देना। लेकिन यह सब छोड़कर किसी का मर्डर करके उसकी डेड बॉडी कौन अपनी एक्स की गाड़ी की डिक्की में डालता है? वो भी जो न हो सकी ऐसी एक्स!”

     अब नंदिनी का दिमाग इस तरफ से हट कर दूसरी तरफ दौड़ने लगा था। उसे लगने लगा की डेड बॉडी डालने के लिए पहले डेड बॉडी होनी भी चाहिए। इसका मतलब किसी ना किसी ने तो ऋषिकेश राय सागर को मारा था। और जिसने भी इस रायसागर का खून किया था उसका कुछ ना कुछ मर्डर मोटिव भी रहा होगा।
    तो ऐसे कौन लोग हो सकते थे जिनके पास ऋषिकेश रायसागर को मारने का कोई स्ट्रांग मोटिव रहा हो।
     हो सकता है किसी ने खुद ऋषिकेश को मार कर उसकी बॉडी को छुपाने के लिए ऐसे ही मेरी गाड़ी की डिक्की में डाल दिया हो। और यह भी हो सकता है कि किसी ने सुपारी किलिंग करवाई हो। यानी कि ऋषिकेश को मारने के लिए कुछ गुंडों को सुपारी दी हो और उन गुंडों ने उसे मार कर जो डिक्की खाली दिखी उसे खोलकर उसमें ऋषिकेश की बॉडी डाल दी।

    होने को तो बहुत सारी संभावनाएं है… नंदिनी पर अब तुझे सबसे पहले यह करना है कि इस मर्डर मिस्ट्री को सॉल्व करना है कि आखिर ऋषिकेश रायसागर को मारने वाला है कौन।
    नंदिनी का दिमाग तेज़ी से घूम रहा था।

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    पर अगर डेड बॉडी को बिना एग्जामिन किए वह उसे फेंक देती है, तो मर्डर के काफी सारे सबूत भी डेड बॉडी के साथ ही चले जाएंगे। और ऐसी हालत में पता करना बेहद मुश्किल होगा कि मर्डर किसने किया है?
   और अगर वह यह रिस्क ले की डेड बॉडी को ऊपर अपने फ्लैट में ले आए और उसके बाद एग्जामिन करने के बाद डेड बॉडी को डिस्ट्रॉय कर दे, तब भी उसके लिए केस सॉल्व करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि अगर वह लाश को ही खत्म कर देगी तो एक तरह से वह खुद भी कानून की नजरों में मुजरिम हो जाएगी।
     परेशान हाल नंदिनी सोच ही नहीं पा रही थी, कि उसे क्या करना चाहिए? कि तभी उसके दरवाजे पर दस्तक हुई!
      वह एकदम से चौंक गई कि इस वक्त कौन आया होगा? वह  सोफे पर से उठी और धीमे कदमों से जाकर उसने दरवाजे के मैजिक आई से बाहर झाँक लगाई।
    बाहर पुलिस खड़ी थी। उसे सामने खड़े पुलिस वाले की शक्ल नहीं नजर आ रही थी। जो भी पुलिस वाला था, वह उसके दरवाजे की तरफ पीठ किए खड़ा था। और उसने अपने दोनों हाथ बांधकर कमर पर रखे हुए थे।
    हे भगवान इतनी जल्दी पुलिस वालों तक लाश की महक भी पहुंच गई जो सूँघते सूँघते मेरे फ्लैट तक चले आए….
     डर के मारे नंदिनी के हाथ पांव कांपने लगे कि तभी एक बार फिर बेल बज गयी… और इस बार बेल लगातार बजती रही। घबराकर उसने जल्दी से दरवाजा खोल दिया।
      
        सामने शेखर खड़ा था।

” क्या हुआ नंदू इतनी घबराई हुई सी क्यों हो?”
” नहीं!  कुछ भी तो नहीं। बस ऐसे ही थोड़ी थकान थी। कल रात में ऑफिस में बहुत सारा काम था।”
” ओह्ह उसके बावजूद मेरे लिए भैया जी कचोरी वाले के यहां से पोहा बंधवा कर ले आयीं और तुमने क्या नाश्ता किया सुबह से?  यह बताओ।”
     नंदिनी का फिलहाल इस चिगी-विगी रोमांस का बिल्कुल मूड नहीं था।।
  उसे शेखर पर खीझ सी हो रही थी, की इस वक्त वो उसके घर क्यों आया है।
नंदिनी के चेहरे के उड़े रंग की तरफ ध्यान दिए बिना ही शेखर उसके सोफे पर पसर गया….-” एक अच्छी सी चाय मिलेगी नंदू?”
” हम्म लाती हूँ। ” सुखा से जवाब देकर नंदिनी किचन में चली गई।
शेखर के आने से पहले वह क्या सोच रही थी, ये उसके दिमाग से निकल गया। उसने वापस से सोचना शुरू किया कि तभी उसे एकदम से यह ख्याल आया कि शेखर भी तो एक अजीब से केस में गया हुआ था। उस केस के बारे में जानने की उत्सुकता के साथ वह चाय लेकर बाहर चली आयीं…
” आज इंद्रपुरी वाले जिस केस में गए थे, वह क्या था एक्चुअली।”
” अरे खतरनाक था वह केस पूछो मत। एक परिवार के पूरे सात लोग एक साथ फांसी का फंदा लगाकर मर गए।”
” ओ माय गॉड लेकिन क्यों? “
” प्राइमा फेसी में तो यही लग रहा है कि शायद किसी बिजनेस राइवल ने या फिर और किसी ने उनकी हत्या करके उन्हें एक साथ हैंग कर दिया। लेकिन कई बातें अजीबोगरीब चीजों की ओर इशारा करती हैं।”
” जैसे?”
” जैसे यह कि घर के सात लोग एक जैसे रंग के काले दुपट्टे से लटके हुए थे। उनके घर में कुल 3 औरतें थी जो तीनों साड़ियां पहना करती थी। दो छोटे बच्चे थे और दोनों ही लड़के थे। एक और बच्चा था उनके घर में जो उस वक्त एक दूसरे कमरे में मरा हुआ पाया गया। शायद उसे जहर देकर मारा गया था। वह बच्चा बहुत छोटा था और इसलिए शायद उसे फांसी पर लटकाने की किसी की हिम्मत नहीं हुई होगी।
   उनके घर में एक और बच्चा भी था आई मीन बच्ची थी। “
” वो कहां मिली? मेरा मतलब क्या वो जिंदा है?
” नहीं आज से लगभग एक डेढ़ साल पहले वह बच्ची एक दिन अचानक अपने घर से गायब हो गई और उसके बाद उसका कोई पता नहीं चला। उस समय बहुत इन्वेस्टिगेशन हुई थी। और उस वक्त मैं इस थाने का इंचार्ज नहीं था। जब मैं आया तब मुझे बताया गया था और मैंने भी अपनी तरफ से काफी इन्वेस्टिगेशन की लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। “
” बच्ची की उम्र क्या थी?”
” लगभग छैह या साढ़े छैह साल!”
” मतलब सिया की उम्र की थी।” नंदिनी के मुंह से बेसाख्ता  सिया का नाम बाहर आ गया और शेखर उसे चौक कर देखने लगा…
” कौन सिया?”
” मेरे सामने वाले फ्लैट में रहती थी।  वह भी लगभग एक डेढ़ साल पहले अपने घर से अचानक गायब हो गई। और उसके बारे में भी पुलिस तफ्तीश करने के बावजूद कुछ भी पता नहीं चला।
   और आज भी वह केस पेंडिंग है”।
“हम्म ! अच्छा सुनो मैं जरा एक दूसरे केस के सिलसिले में पूछताछ करने जा रहा हूं… क्या तुम भी मेरे साथ चलना चाहोगी?”
” कहां जा रहे हो?”

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” वह राइटर है ना कामिनी रायसागर उनके घर जा रहा हूं !  उनके हस्बैंड मिसिंग है… उसी बारे में जरा पूछताछ करनी है…..
          तुम चलोगी?
  इस सवाल के साथ ही नंदिनी की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे ही अटकी रह गई….

क्रमशः
  
 


  

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Siya
Siya
2 years ago

Very nice

Raj Kumar
Raj Kumar
2 years ago

Nice story ❣️💕❣️