अतिथि -7

अतिथि -7

   ऑफिस में काम बहुत था, उस पर कोई भी सीनियर माधव की मदद करने या काम समझाने को तैयार न था !  माधव को आधा वक्त काम समझने में ही लग जाता था, बाक़ी के समय में वो काम पूरा करने की जद्दोजहद में लगा रहता था..।

    आज दोपहर बाद उसे थकान सी लगने लगी थी.. अपनी टेबल पर फाइलों पर सर झुकाये वो काम निपटा रहा था कि उसके साथ वाली टेबल में बैठने वाला रस्तोगी उसके पास चला आया..।
रस्तोगी उससे उम्र में दो चार साल बड़ा होगा, उसे अनुकम्पा नियुक्ति मिली थी यहाँ..
उसके पिता किसी समय यहाँ के सबडिविजनल अधिकारी थे। उनकी असामयिक मृत्यु ने उनके पुत्र को उनके पद से नीचे का एक पद दिलवा दिया था..
रस्तोगी खुशदिल इंसान था !

  उसके घर पर उसकी माँ बस थी, और उनका रोज़ का एक ही प्रिय काम था प्रणय रस्तोगी के लिए लड़की ढूँढना !!

  लेकिन इन सब उलझनों के बावजूद वो हँसता हंसाता रहता था..
माधव से ऑफिस में बात करने वाला सबसे पहला आदमी वही था, इसलिए दोनों के बीच अब बांड सा बन गया था..।

“चल भाई माधव चाय पी के आते है !”

“बहुत काम है भाई, यहाँ मरने की फुरसत नहीं है !”

माधव की बात पर प्रणय ज़ोर से हंस पड़ा…

“यहाँ के खेतों में हर नए जुते बैल को यही लगता है कि पूरा खेत उसे ही जोतना है। पर यक़ीन मानो दोस्त ये काम तुम कल या परसो भी पूरा कर के दोगे न, तो कोई प्रलय नहीं आ जायेगा !”

माधव आँखे फाडे प्रणय को देखने लगा

“अबे सच कह रहा हूँ यार.. यहाँ हमें ऐसे ही डेड लाइन मिलती है। लेकिन जब तू मर खप के इस फाइल को पूरी कर देगा न, तब वो ऊपर अधिकारी के दफ्तर की टेबल पर हफ्ते भर उंघती पड़ी रहेगी।
इन सरकारी कर्मचारियों की पुरानी आदत सी हो गयी है काम को खींचतान कर पूरा करने की..।
जब तक ऊपर के ऑफिस से चार बार फ़ोन नहीं आएगा ये एक भी फाइल सरकाएंगे नहीं..
अब चलो गुरु चाय के बिना कमजोरी सी महसूस हो रही है.. !”

माधव भी उसके साथ खड़ा हो गया…
इस वक्त पर ज्यादातर कर्मचारी चाय और  पान तंबाखू के नाम पर ऑफिस से बाहर निकल जाते थे। हालाँकि ग्यारह बजे के आसपास ऑफिस में चाय लिए गुमटी का लड़का खुद घूमता था..
लेकिन ये ढाई से तीन के बीच का समय सभी के लिए थकान और ऊब भरा हो जाता था..

“इसी तरफ अधिकतर लोग चाय और सुट्टे के लिए आएंगे, चलो हम उस तरफ निकलते है !”

प्रणय ने माधव को साथ लिया और रोड क्रॉस कर दूसरी तरफ बनी बड़ी सी इमारत की तरफ बढ़ गया..
लगभग बारह पन्द्रह माले की इमारत थी..।
माधव नीचे से ही देखने लगा..

“यहाँ चाय की गुमटी कहाँ है ?”

“अमा आओ तो यार, ज़न्नत की चाय पिलायेंगे तुमको !”

प्रणय माधव को साथ लिए उस इमारत में घुस गया, सामने ही लिफ़्ट थी, उसने लिफ़्ट का बटन दबा दिया..

चाय की गुमटी, वो भी इस ऊँची सी इमारत में, माधव की समझ के बाहर था..
वो दोनों लिफ़्ट में दाखिल हो गए..

दो मंजिल के बाद ही लिफ़्ट रुकी, दरवाज़ा खुला और तेज़ी से डिंकी लिफ़्ट में दाखिल हो गयी..

डिंकी की नजर माधव पर पड़ी और माधव की डिंकी पर।
लेकिन डिंकी के चेहरे का रंग उड़ गया था..।

इस बात को माधव ने ताड़ लिया और इसलिए वो चुप रहा..।
प्रणय के सामने वैसे भी वो चुप ही रहना चाहता था। उसे लगा डिंकी ही पहले बात शुरू कर देगी, लेकिन डिंकी की चुप्पी देख वो भी फिर कुछ नहीं बोला…। डिंकी के हाथ में कुछ पैकेट्स थे और वो ज़रा हड़बड़ी में लग रही थी..

आंठवी मंजिल पर एक बार फिर लिफ़्ट रुकी और जिस तेज़ी से डिंकी अंदर घुसी थी, उतनी ही तेज़ी से बाहर निकल गयी..।
वो बिलकुल ऐसे चली गयी, जैसे उसने माधव को पहचाना ही नहीं..।

लिफ़्ट में आइना लगा था, माधव एकदम से पीछे पलट कर खुद को देखने से अपने आप को रोक नहीं पाया..
क्या मैं कुछ अलग दिख रहा हूँ? इसने मुझे नजरअंदाज क्यों कर दिया.. ?

वो मन ही मन सोच रहा था कि लिफ़्ट सबसे ऊपर के माले पर रुकी, और माधव प्रणय के साथ बाहर निकल आया। लेकिन पता नहीं क्यों उसका चाय पीने का सारा उत्साह तिरोहित हो गया.. ।

डिंकी से कोई रिश्ता नहीं था, सिर्फ जान पहचान थी लेकिन अब तक दो तीन बार मिल चुका था। इस लड़की के घर पर खाना खा चुका, यहाँ तक की इसी के कमरे में उसका रात रुकना भी हुआ था। और ये लड़की यूँ छिटक कर निकली जैसे कभी देखा ही नहीं।

बात सीधे जाकर दिल पर लगी थी !

“क्या सोचने लगे गुरु.. लो चाय पियो !”

प्रणय ने उसकी तरफ चाय का प्याला बढ़ा दिया ..
माधव ने प्याला पकड़ा ही था कि तभी टेरेस पर इधर उधर किसी को ढूंढती डिंकी पर उसकी नजर पड़  गयी..।

माधव चाय की चुस्की लेते हुए उसे ही देख रहा था कि डिंकी की नजर उस पर पड़ गयी..
वो जैसे थम कर रह गयी। वो धीमे कदमो से उसकी तरफ बढ़ रही थी कि माधव अपनी जगह पर खड़ा हो गया..
उसी के साथ खड़ा प्रणय चाय वाले से सिगरेट जलवा रहा था। उसे समझ में नहीं आया कि माधव अचानक अपनी चाय स्टूल पर रख उस लड़की की तरफ क्यों बढ़ गया..

डिंकी उन लोगो तक पहुँच पाती, उसके पहले माधव उस तक पहुँच गया…

“आप यहाँ कैसे ?”..बिना किसी औपचारिकता के डिंकी ने पूछ लिया

“यही सामने मेरा ऑफिस है.. वहां उस तरफ !”

“हम्म… !”

डिंकी चुप हो गयी, और माधव के दिमाग में एकदम से सवाल घूम गया…

“तुम यहाँ कैसे ?”

डिंकी के चेहरे का रंग बदलने लगा…

उसने पास खड़े प्रणय की तरफ देखा और पलट कर छत की रेलिंग की तरफ बढ़ गयी, माधव भी उसके पीछे बढ़ गया..

“डिंकी !”

“हम्म, मैं यहाँ पार्ट टाइम जॉब करती हूँ !”

माधव के माथे पर बल पड़ गए..

“अच्छा ?” असल में माधव को समझ ही नहीं आया कि इस बात पर डिंकी इतना अजीब सा व्यवहार क्यों कर रही..

“दरअसल, घर पर इस बारे में किसी को मालूम नहीं है !”

“ओह्ह !” एक लम्बे से ओह्ह के साथ अब माधव को डिंकी की बात समझ आ गयी थी..

“मम्मी चाहती थी मैं डॉक्टर बनूँ, लेकिन मैं मेडिकल सेलेक्ट नहीं हो पायी। तो अब मम्मी का मन है बीएससी करने के बाद नर्सिंग का कुछ कोर्स कर लूँ…

“अच्छा !”

“लेकिन मुझसे ये खून खराबा देखा नहीं जाता। मेरे सामने कोई खुला घाव लिए आ जाये तो मुझे उलटी हो जाएगी.. मुझे तो अस्पताल में घुसते ही साथ उलटी सी लगने लगती.. ! ये स्टूल टेस्ट यूरिन टेस्ट खून इन सब चीज़ो से नफरत है मुझे !”

“ओह्ह ! फिर तुम्हे क्या पसंद है ?”

“डिज़ाइनिंग… मुझे कपडे बनाना पसंद है।
  मेरा मन भी इन्ही में लगता है। अलग अलग रंगों के धागे मिला कर बुनना, कपड़े के डिज़ाइन तैयार करना, उन्हें सिलना, मुझे ये सब पसंद है.. ।
   इस बिल्डिंग में सबा मैडम का ऑफिस है, जो यहाँ की बहुत बड़ी डिज़ाइनर है..।
मैंने दो दिन पहले ही उनका ऑफिस ज्वाइन किया है !”

“अच्छा तो यहाँ काम कर रही हो ?”

“हाँ, अभी तो काम सीख रही हूँ, जब सीख जाउंगी तब शायद वो मुझे यहाँ नौकरी भी दे दे !”

“घर पर क्यों नहीं बताया ?”

डिंकी के चेहरे पर एक थकी सी मुस्कान आ गयी..

“घर वाले मानेंगे नहीं.. और उन्हें दुखी कर के ये काम नहीं सीखना चाहती, बस इसीलिए नहीं बताया !”

“पर चोरी से ये करना भी तो गलत है !”

“लेकिन ऐसा कर के एक हुनर ही तो सीख रही हूँ। जिस दिन नौकरी मिल गयी, मम्मी को सरप्राइज दूंगी…
कोई बुरी लत तो नहीं है जो मैंने छुपाई है !”

डिंकी ने हंस कर कहा, लेकिन माधव उसका व्यंग समझ गया..
उसने चुपचाप सर झुका लिया..

“मैं चलता हूँ.. वापस ऑफिस भी जाना है !”

“यहाँ कैसे आये थे आप ? अक्सर आते है क्या ?”

“नहीं.. आज पहली बार आया हूँ, चाय पीने !”

“ठीक है !” डिंकी मुस्कुरा कर वापस चली गयी और माधव प्रणय के पास चला आया..

“कौन थी भाई, यहाँ आते ही लड़की भी मिल गयी..। एक हम है चार साल से इसी ऑफिस में घिस रहे है, नाम के लिए भी कोई नहीं मिली ! तुम्हारे तो मजे है गुरु !”

“ऐसा कुछ नहीं है.. पापा के दोस्त की बेटी है ! यहाँ इंटरव्यू के लिए जब आया था, तब इन्ही के घर रुकना हुआ था !”

“ओहो… दोस्तों के बच्चे.. क्या बात है ! मैंने प्यार किया देखी है या नहीं ?”

“अरे वैसे कोई बात नहीं !” माधव चाय के पैसे देने उठने लगा कि प्रणय ने उसकी तरफ सिगरेट बढ़ा दी..
सिगरेट की तरफ बढ़ता माधव का हाथ अचानक रुक गया..

“ऊँहुँ, नहीं चाहिए !” पैसे चुकाकर वो लिफ़्ट की तरफ बढ़ गया, प्रणय भी उसके पीछे निकल गया..

क्रमशः

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
1 year ago

बहुत बढ़िया भाग दीजी, सभी की ज़िंदगी में सपने और अपनों के बीच उधेड़बुन बनी हुई है..💐

Nisha
Nisha
1 year ago

Dinki galat nahi kar rahi hai

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

दिल में कुछ और चल रहा है सिगरट कहाँ फूंकेंगे अब

अपने सपने को पाने के लिये डिंकी डबल मेहनत कर रही है
कॉलेज के साथ डिज़ानिंग भी
बहुत खूब

Jagruti
Jagruti
2 years ago

Nice part

Seema Srivastava
Seema Srivastava
2 years ago

Very beautiful

Manu Verma
Manu Verma
2 years ago

लाजवाब भाग 👌👌👌👌👌💐💐💐💐💐💐

ROOPSAGAR
ROOPSAGAR
2 years ago

👌👌👌👌👌

Upasna
Upasna
2 years ago

अच्छा लगा माधव का dinki के प्रति कन्सर्न …वाजिब भी था वो इतनी भी अनजानी नहीं रही थी… माता पिता बच्चों के लिए भला ही सोचते हैं लेकिन उनकी रुचि को जाने बिना उनको पुश करना बच्चो को बात छुपाने पर मज़बूर कर देता है ,अनजाने ही dinki भी यही कर रही ,।
माधव को भी वो याद दिलाना नहीं भूली कि वो कितना सच बताता है … त्रिवेणी जी की नैया पार लगे न लगे पर अपने माधव की सुई तो जरा अटक सी गयी लड़की पर तभी तो सिगरेट को न कर दिया …Going to next part eagerly

Priyanka Shukla
Priyanka Shukla
2 years ago

Beautiful story

Jyoti
Jyoti
2 years ago

Very nyc part 👌