अपराजिता -84

अपराजिता -84

अखंड अपनी थार में डिस्पेंसरी से काफी दूर खड़ा था।
लेकिन उसकी पूरी नजर डिस्पेंसरी पर थी। वह ऐसी जगह में था, जहां से उसे रेशम का अस्पताल और वहां आने जाने वाले लोग साफ नजर आ रहे थे, लेकिन रेशम या वहां पहुंचने वाला कोई और उसे नहीं देख सकता था।

रेशम के अस्पताल के सामने एक लंबी सी कार आकर रुकी, और अखंड के चेहरे पर चिंता की लकीरें दौड़ गई। कहीं जलसों गांव का कोई बड़ा आदमी रेशम से झगड़ा करने तो नहीं चला आया।
अखंड ने अपनी कमर पर हाथ फेरा, उसकी जींस की पिछली जेब पर उसकी गन रखी थी, उसने धीरे से अपनी गन निकाल और एक बार उसे जांचने के बाद वापस लॉक करके पीछे रख लिया।

तभी कार का दरवाजा खुला और उसी समय हार्न को सुनकर रेशम वैसे भी अस्पताल से बाहर चली आई थी। कार पर नजर पड़ने के साथ ही उसकी नजर कार में बैठे इंसान पर भी पङ चुकी थी।

   रेशम का चेहरा दमकने लगा था, और उसी वक्त कार के दरवाजे को खोलकर अथर्व बाहर चला आया।

अथर्व को देखते ही लंबी सी मुस्कान देते हुए रेशम उसकी तरफ बढ़ गई..।
अपने दोनों बाजू फैलाए अथर्व रेशम को बाहों में भरने को था कि रेशम ने उसके बाजू पर अपने हाथ रखकर उन्हें नीचे कर दिया,
    और इशारे से यह गांव है यहां संभल कर रहना पड़ता है का इशारा कर उसका हाथ पकड़े उसे अपने साथ डिस्पेंसरी में ले गई।

अखंड यह सब देखा आश्चर्य मे डूबा खड़ा था। उसे आज तक यह नहीं मालूम चला था कि रेशम की शादी हो चुकी है। उसने इतने पास से रेशम को देखा ही नहीं था। और शायद देखा भी हो तो उसके मांग के सिंदूर और गले के मंगलसूत्र पर उसका ध्यान ही नहीं गया।
दरअसल बात यही थी कि सामने पड़ने पर अखंड कभी नजर उठाकर रेशम को भर नजर देख ही नहीं पाता था। और शायद इसीलिए उससे इतनी बड़ी चूक हो गई।

     फिर भी एक पल को उसे लगा, हो सकता है रेशम के परिवार से कोई आया हो।
    उसका भाई या उसका कोई कजिन। लेकिन जिस हक से अथर्व, रेशम को बाहों में भरने आगे बढ़ रहा था, वैसा हक एक प्रेमी या पति ही दिखा सकता है।

  अखंड का मन कसैला हो गया। एक गहरी सांस भरकर वह अपनी जीप में बैठ गया। ड्राइवर को हटाकर उसने खुद ही गाड़ी वहां से बढ़ा दी..।

अपने विचारों में खोया हुआ अखंड जीप चलाता अपने गांव की तरफ बढ़ रहा था और तभी चंद्रभान के घर से उसका हाल-चाल लेकर वापस लौटते दीपक की नजर अखंड पर पड़ गई।

उन दोनों का आपस में आमना सामना रेशम की डिस्पेंसरी के सामने के रास्ते पर ही हुआ था।
दीपक दूर से आते समय भी अखंड की गाड़ी को डिस्पेंसरी से कुछ दूरी पर खड़ा हुआ देख चुका था। अब वह यही सोच रहा था कि आखिर अखंड बाबू यहां क्या कर रहे हैं?

     अखंड को देखते ही दीपक के दिल में उसके लिए प्रतिशोध की ज्वाला वापस धधकने लगी थी। इतने सालों में कितना कुछ बदल गया था। दीपक ने अपने भाई पंकज को हमेशा हमेशा के लिए खो दिया था।

लेकिन उसके भाई और खुद दीपक को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाला धीरेन्द्र प्रजापति आज एक जानी मानी राष्ट्रीय पार्टी का युवा नेता बन चुका था..।

राष्ट्रीय जन सत्ता पार्टी दद्दा जी की पार्टी थी.. दद्दा जी उसी समय महापौर के पद पर थे, उसके कुछ समय बाद हुए चुनाव में वो एमएलए बन चुके थे…।
     उनकी पार्टी को धीरेन्द्र के चाचा रूपये पैसे से बहुत मदद करते थे..।
दद्दा जी का पहले पहल झुकाव अखंड की तरफ था, लेकिन किसी लड़की के रेप की कोशिश में अखंड जेल जा चुका था, भले ही उस पर आरोप साबित नहीं हो पाया था और अखंड बाइज्जत बरी हो चुका था। बावजूद उसके नाम पर ऐसी कालिख पुत चुकी थी कि उसके बाद उसका राजनैतिक कैरियर सुआह हो गया था..। 
अखंड को दरकिनार कर धीरेन्द्र तेज़ी से राजनैतिक पायदान पर पैर रखता सफलता की सीढ़ियां चढ़ गया था…। और यही तो वो चाहता भी था !

    दद्दा जी ने उसका हाथ पकड़ उसे अपनी पार्टी के युवा नेता की कमांड थमा दी थी..।

यही प्रजापति चाहता था, और इसी सब के लिए  उसने इतना प्रपंच किया था..।
अखंड से उसकी प्रतिस्पर्धा, उसकी जलन की जीत हुई थी और अखंड को एक तरफ ठेल कर वो सत्ता के सर्वोच्च सिहांसन तक लगभग पहुँच चुका था..।

    दद्दा जी ने ने धीरेन्द्र को अपनी पार्टी का प्रदेश पार्टी सचिव बना दिया था…
दोनों हाथों से रुपया बटोरता धीरेन्द्र अतीत में कर चुके सारे करम कांड भूल चुका था….।

शादी कर के उसने अपना घर भी बसा लिया था और दुनिया के सामने एक खुशहाल गृहस्थ के तौर पर स्थापित हो चुका था..
उसका अगला सपना विधायकी का टिकट था, जो अगले चुनावो में उसे मिलना तय ही था..

अखंड अब इन सब बातों से खुद को अलग कर चुका था..।
उसका सपना ज़रूर था कि कभी वो भी सत्ता का सर्वोच्च पद पाए लेकिन अपने साथ हुए हादसे के बाद वो सब भूल चुका था….

अनमना सा वो अपने घर की तरफ बढ़ते हुए अचानक रुका और उसने अपनी गाड़ी घुमा ली..।
वो जानना चाहता था कि आखिर रेशम से मिलने आने वाला व्यक्ति सच में कौन था…?

उसे नहीं मालूम था की दीपक उसे देख चुका है.. दीपक से वैसे भी सामने से उसका मिलना हुआ भी नहीं था। कभी आमना सामना हुआ भी तो अखंड को दीपक में ऐसा कुछ लगा नहीं कि वो उसे याद रख सके..

दीपक खुद अखंड के पीछे था उसने भी गाड़ी वापस  घुमा ली..

अखंड अस्पताल तक आया, उसी वक्त उसे रेशम और वो आदमी अस्पताल से निकलते हुए दिखे, वो दोनों गाड़ी में सवार हुए और उस आदमी ने गाड़ी आगे बढ़ा दी..
अखंड दूर रहते हुए उस गाड़ी का पीछा करने लगा..

कुछ गलियों में मुड़ने के बाद गाड़ी रेशम के घर के सामने जाकर रुक गयी….

वहाँ रुकने के बाद रेशम ने उतर कर गेट खोल दिया और गाड़ी गेट के भीतर चली गयी..

अथर्व ने गाड़ी अंदर खड़ी की और रेशम का हाथ पकड़ कर अंदर चला आया..।
घर पर काम करने वाली गुड्डी रेशम को आता देख चाय चढाने चली गयी.. रेशम और अथर्व अंदर पहुंचे और गुड्डी उन दोनों के लिये पानी लेकर चली आयी..।
रेशम ने गुड्डी से अथर्व को मिलवाया और अथर्व को गुड्डी के बारे में बताने लगी..
गुड्डी रेशम को दीदी बुलाती थी….लेकिन अथर्व के लिए उसके मुहं से साहब ही निकला..
वो चाय के प्याले वहाँ रख कर रसोई में नाश्ता बनाने जाने लगी..

“दीदी गरम पकौड़े बना दे ?”

अथर्व को गुड्डी को भेजने की जल्दी थी..
उसने खाने से मना कर दिया..
.”मैं अभी कुछ नहीं खाऊंगा !”

“अरे लेकिन आप इतनी दूर से आये हैं, भूख लग गयी होगी ना ?”

“नहीं अभी नहीं लग रही.. रात का खाना जल्दी खा लेंगे.. इन्हे घर भेज दो रेशम, देर हो रही है !”..

रेशम को अथर्व की हड़बड़ी समझ में नहीं आ रही थी,
“दीदी फुल्के सेंक कर जाये ?”

“अभी तक सेंके नहीं थे क्या ?” रेशम ने पूछा

“नहीं, हमे लगा गरम सेंक कर रख देंगे, आज मौसम भी ज़रा ठंडा हो गया है ना.. !”

“नहीं मत सेंको.. हम लोग मैनेज कर लेंगे !”

अथर्व भी घर देखता हुआ रसोई तक चला आया.. उसे बहुत जल्दी थी कि ये लड़की यहाँ से जाये..
उतना ही रेशम उसे कुछ ना कुछ काम बता कर व्यस्त रखे थी.. आखिर अपना काम समेट कर गुड्डी निकल गयी..
उसके निकलते ही अथर्व ने घर का दरवाज़ा खट से बंद किया और रेशम को बाँहों में भर लिया…

वो रेशम से मिलने जितना बेक़रार था, उतनी ही रेशम भी थी..।
इतने दिनों की जुदाई में उसे अथर्व की संगत का महत्व समझ आ गया था..।
उसने खुद को भी अपने अतीत से बाहर लाने के लिए उस समय को याद करना ही छोड़ दिया था..
रात दिन वो बस इसी बात की प्रतीक्षा में रहा करती थी, कि कब अथर्व के साथ वो उसकी हसरतों को पूरा कर सके….।

आज इतने दिनों बाद उसे मौका मिला था..
रास्ते में ही उसे अथर्व ने बता दिया था कि आरव का भी जॉब सलेक्शन हो गया है, और उसी की पार्टी के लिए वो उसे लेने आया है…
लेकिन फ़िलहाल वो दो तीन दिन की छुट्टी पर है.. और वो यही उसके साथ रुकेगा..
इन खुशखबरियों से वो भी खुश थी.. ।

अथर्व की बाँहों के घेरे में रेशम महफूज़ महसूस करती थी खुद को…।
आज भी आंखे बंद किये अथर्व की बाँहों में खोये हुए उसे लग रहा था, बस ये लम्हे यहीं थम जाएँ…।

उसके स्पर्श पर वो पिघलने लगी थी…।

रेशम के चेहरे पर झुके अथर्व को होश तक नहीं था कि  कमरे की खिड़की खुली है…और बाहर चलती ठंडी हवा से परदे लहरा कर बार बार हट जा रहे हैं..

“खाना तो खा लीजिये !”

“ऊँहुँ… अब तो सिर्फ तुम्हे खाना है… बाकी और किसी तरह कि भूख नहीं है ! तुम बोलो, तुम्हे खा सकता हूँ ना !”

अपनी नशीली सी आवाज़ में वो रेशम के कान में गुनगुना गया, और रेशम के कान की लोरियां जलने लगी…
कान से उठती गुदगुदी उसके पूरे चेहरे को गुलाबी कर गयी…

“छी क्या क्या बोलते हैं आप भी.. ज़रा भी नहीं सुधरे !”

“सुधरे..? अरे पागल बच्ची मैं तो तुम्हारे वियोग में और बिगड़ गया हूँ..। कैसे कैसे सपने देखता था तुम्हारे, तुम्हे बताऊंगा तो पानी पानी हो जाओगी.. ! और वैसे भी अब बताने का नहीं बल्कि प्रेक्टिकल करके दिखाने का वक्त है.. !”

आज रेशम ने भी मन ही मन खुद को तैयार कर रखा था कि वो किसी भी हाल में अपनी काली कड़वी यादो को खुद पर हावी नहीं होने देगी…।
कुछ भी हो जाये इस एकांत में वो खुद को अपने पति को समर्पित कर के रहेगी..।

अथर्व धीरे से रेशम के चेहरे पर झुकता चला गया, उसका ध्यान इस बात पर गया ही नहीं कि खिड़की के उस पार कोई खड़ा उन्हेँ देख रहा है…

वहाँ अखंड खड़ा था…।

वो अँधेरे में था इसलिए अंदर से किसी को नजर नहीं आ रहा था.. लेकिन उसे कमरा साफ़ साफ़ नजर आ रहा था..
उसकी कनपटी की नस फूलने लगी थी..।
आँखों में खून उतर आया था…।

अखंड पलटा और भारी कदमो से वहाँ से वापस लौट गया….
उसका मन कैसा तो भी हो गया था.. उसे इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि रेशम विवाहित भी  हो सकती है..।
वो सोचने पर मजबूर हो गया…
आखिर सत्य ही था।  उस बात को इतना समय भी तो बीत चुका था.. उसने खुद ने शादी नहीं की तो क्या सभी कुंवारे बैठे रहेंगे..?

उस दुःखद घटना ने उसके मानस पटल पर इस कदर असर डाला कि वो आज भी वहीँ खड़ा रह गया था…. आज भी विश्वविद्यालय की उन संकरी गलियों से वो बाहर नहीं आ पाया था जबकि उसके साथ के लोग कहाँ से कहाँ पहुँच गए थे..।  

वो अपनी थार में बैठा घर की तरफ निकल गया..

अथर्व रेशम खुद में, एक दूजे में खोये, खुद को भुलाये बैठे थे, रेशम की धड़कने बढ़ती जा रही थी, मन घबराने लगा था कि तभी उसके घर की घंटी बज गयी…

रेशम झटके से अथर्व से अलग हुई और अपना आंचल संभालती खड़ी हो गयी..

“इस वक्त कौन आ सकता है ?” अथर्व की खीझ उसके चेहरे पर झलक उठी..

“पता नहीं, आप रुकिए मैं देख कर आती हूँ !” रेशम ने प्यार से अथर्व से कहा और बाहर निकल गयी.. अथर्व एक गहरी साँस लेकर अपने बाल संवारता खिड़की पर आकर खड़ा हो गया..

*****

भावना की माँ को अस्पताल में भरती करवा दिया गया था, उनकी सारी जाँच भी शुरू हो गयी थी..!
एक एक कर के सारी रिपोर्ट्स भी आने लगी थी और जैसा की राजेंद्र को अनुमान था भावना की माँ को हड्डियों में ट्यूबरक्युलोसिस हुआ था! और वो भी उनके ध्यान नहीं देने के कारण काफी बढ़ चुका था..।

उसने तुरंत ही स्पेशलिस्ट को बुलवा कर भावना की माँ की जाँच शुरू करवा दी थी..
भावना भी साथ ही थी जब डॉक्टर से बात हो रही थी..।

“देखो राजी, मैं एक और जाँच करवाना चाहता हूँ… लेकिन..

” लेकिन क्या सर ?

उस डॉक्टर ने राजेंद्र को बड़ी गहरी सी नजर से देखा और पूछ बैठा..

“ये वैसे लगती क्या है तुम्हारी.. ?!”

“मेरी मदर इन लॉ हैं, सर.. !” पल सोचने में गंवाए बिना राजेंद्र बोल पड़ा और भावना आशचर्य से उसे देखती रह गयी.. कितनी आसानी से उसने दुनिया के सामने उस बात को स्वीकार लिया।  बाकी कुछ भी बोल सकता था, लेकिन इस वक्त शायद राजेंद्र इन बातों में वक्त बर्बाद किये बिना मुद्दे पर आना चाहता था..

“आप बोलिये सर.. क्या बात है ?”

“ये तुम्हारी वाइफ हैं ?” उन्होंने भावना की तरफ देख कर पूछा..

“यस सर !”..

“देखो तुम दोनों से मैं साफ साफ बता देना चाहता हूँ कि टीबी का बेक्टेरिआ इनकी हड्डी को अंदर से खोखला करना शुरू कर चुका है.. मैं जल्द से जल्द ट्रीटमेंट शुरू कर दूंगा, लेकिन मैं किसी बात की अश्योरिटी नहीं दे सकता.. राजी तुम समझ रहे हो ना !”

“यस सर, लेकिन हमें जल्दी ही ट्रीटमेंट शुरू कर देना चाहिए !”

“बिलकुल, ये एक टेस्ट कल हो जाये उसके बाद इनका ट्रीटमेंट प्लान कर लेंगे… अगर यहाँ सब हो सका तो ठीक है, वरना एक बार एम्स में भी सलाह ले लेना.. !”

“जी जैसा आप कहे !”

उन सीनियर डॉक्टर साहब ने राजेंद्र का कन्धा  थपथपाया और चले गए… भावना राजेंद्र की तरफ देखने लगी.. उसकी भयभीत आंखे देख राजेंद्र का दिल डूबने लगा।
क्यूंकि भावना की माँ की जैसी हालत थी, ऐसे में कुछ भी कहना व्यर्थ था..

“डॉक्टर साहब.. माँ अच्छी तो हो जाएँगी ना ?”

अपने गले की थूक निगल कर राजेंद्र दूसरी तरफ देखने लगा.. उसने धीरे से भावना की तरफ सर घुमाया..

“मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा हूँ भावना, सारे डॉक्टर्स भी कर रहे.. हम अपना बेस्ट देंगे, बाकी सब महादेव के हाथ है..।
वो चाहेंगे तो माँ ज़रूर ठीक हो जाएँगी…
हम अपने प्रयास में कमी नहीं करेंगे, तुम अपनी प्रार्थना में कमी मत करना… !”

भावना की आंखे बहने लगी.. उसे समझ आ गया था कि उसकी माँ की हालत ठीक नहीं है, वो रोते रोते वहीँ बेंच पर बैठ गयी..

“जितना रोना है यहाँ रो लो.. उनके सामने हँसते मुस्कुराते जाना, क्यूंकि एक मरीज़ को हमेशा यही भरोसा रहना चाहिए कि वो ठीक हो जायेगा.. जिस दिन मरीज़ अपनी इच्छा शक्ति हार गया उस दिन स्वयं भगवान मृत्युन्जय भी उसे नहीं बचा सकते.. !”

राजेंद्र ने भावना से कहा और भावना की माँ की बाकी रिपोर्ट्स देखने चला गया..

रो धोकर फुरसत पाने का बाद भावना भी उठ कर अंदर अपनी माँ के पास चली गयी…

क्रमशः

aparna…

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