Bestseller-6

    The Bestseller -6

                    “कोयलीगढ़”

         जैसे जैसे वक्त बीतता जा रहा था नंदिनी के दिल की धड़कने भी तेज होती जा रहीं थी। उसने सोचा अब ठंडे और शांत दिमाग से उसे सोच समझ कर कुछ प्लान करना होगा।
     और अब शाम होने से पहले कुछ भी करना मुमकिन नही था। इतनी हिम्मत तो उसमें थी नही की सरेराह दिन दहाड़े वो एक लाश को ठिकाने लगा दे।
    वो मोबाइल खोल कर आसपास की सुनसान लोकेशन ढूंढने लगी जहाँ आसानी से जाकर वो उस लाश को फेंक सके।

   …. जैसे जैसे अंधेरा घिर रहा था नंदिनी भी उस अंधेरे की जद में आती जा रही थी। उसने जीन्स पर डेनिम की ही जैकेट डाली और बालों को ऊपर बांध कर घर पर पड़े ग्लव्स ढूंढने लगी। वो अक्सर बालों में मेंहन्दी लगाने से पहले डॉक्टरों वाले सर्जिकल ग्लव्स पहन लिया करती थी। वही ग्लव्स उसने ढूंढ कर निकाले और अपनी जेब में रख लिये।
    अपना बैग कंधे पर टांगे वो फ्लैट बंद कर बाहर निकल रही थी कि सामने सुरेखा पर नज़र पड़ गयी…-“नंदिनी ! आज पॉटरी क्लास नही गयीं तुम?”
  नंदिनी को एकाएक याद आया कि हाँ आज तो वो क्लास गयी ही नही।
” ओह्ह हाँ ! वो मैं थोड़ा थकी थी। तबियत भी सही नही लग रही थी,बस इसलिए…
“अरे तो बताना चाहिए था ना,कहीं मैं जिया को तुम्हारे भरोसे भेज कर बैठी रह जाती की तुम तो ले आओगी तब क्या होता? “
“जिया कहाँ है अभी? क्लास में? “
” नही वो तो आज मेरा उसे भेजने का मन ही नही किया। इसलिए नही भेजा।”
  नंदिनी को लगा अपना सिर फोड़ ले। अरे जब बेटी को क्लास भेजा ही नही फिर किस बात की पूछताछ कर रही वो भी पुलिस बन के। इतना तो मेरा पर्सनल पुलिसवाला नही पूछता।
“तुम्हें क्या हुआ? तबियत खराब है कह रही हो?”
“नथिंग स्पेशल! वही डेट्स!! अपना हर महीने का प्रॉब्लम!”
“ओह्ह अच्छा। “
” मैं चलूं। वो ज़रा कुछ काम है।”
“आ जाओ चाय पीकर जाना।”
” नो नही मैं ऑलरेडी  पी चुकी हूं। ” एक तरह से सुरेखा से पीछा छुड़ा कर गिरती पड़ती नंदिनी वहाँ से भागी और पार्किंग में पहुंच गई।
   उसका डर अपने चरम पर था। उसने फटाफट गाड़ी निकाली और वहाँ से शहर के बाहर के तरफ के रास्ते पर डाल दी।
    यातायात के नियमों का पालन करने वाली नंदिनी आज सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाती अपनी गाड़ी को भगाए जा रही थी कि, सिग्नल पर उसे दिखा पुलिस वाले गाड़ी वालों को रोक रोक कर कुछ जांच रहें हैं।
    माथे पर छलक आये पसीने को पोंछती वो गाड़ी निकाल कर दूसरी दिशा में आगे बढ़ गयी।
    घने अंधेरे के बीच उसने गाड़ी जंगलों की तरफ घुमा ली।
   रात में जंगल भयानक हो जाता है। ये उसने किसी फिल्म में सुना था लेकिन आज उसे धीरे धीरे ये एहसास हो रहा था।
   जंगल के उबड़ खाबड़ रास्ते पर गाड़ी उचक उचक कर हिचकोले खाती चल रही थी। नंदिनी को ऐसा महसूस हुआ कि उसकी गाड़ी में कोई गंध भरती जा रही है।
  उसने एक गहरी सी सांस खींची और उस तेज़ अजीब सी गंध के कारण उसे खांसी आने लगी।
उसे लगा वो एक लाश के साथ इस एसी कार में बैठी है,हवा ठीक से सर्कुलेट नही हो पा रही होगी और उसने गाड़ी के दरवाज़ों पर लगे कांच नीचे कर दिये। अब वैसे भी वो एक सुनसान घने जंगल के बीच थी जहां इंसान तो क्या उस वक्त कोई परिंदा भी नजर नहीं आ रहा था जो उसकी गाड़ी में ताकझाँक कर सकें।
   लेकिन गाड़ी का कांच खुल जाने से बाहर  की ठंडी हवा उसे चुभने लगी थी। कहीं दूर उसे एक पीली से रोशनी नजर आ रही थी लेकिन उस रोशनी तक जाने का नंदिनी का कोई विचार नहीं था उसे तो इस लाश को किसी अंधेरे में ही छोड़ना था।
   वो शायद  जंगल के बीचो बीच पहुंच चुकी थी।  क्योंकि अब जंगल से अजीबोगरीब आवाजें  उसके कानों में पड़ रही थी।
     झींगुरो  की तेज आवाज उसके कानों को परेशान कर रही थी कि तभी उसे लगा एक तरफ से कुछ काला सा धुआं सा उठ रहा है …..और उसकी तरफ आ रहा है। वह अभी ध्यान से देख और समझ पाती कि तभी काले झींगुरो का जत्था का जत्था एक साथ तीर सा उसकी गाड़ी में प्रवेश कर गया।
     वो अपने दोनो हाथों से उन कीड़ों को बाहर निकालने की कोशिश करने लगी। और साथ ही अपने चेहरे हाथों को उनसे बचाने की भी। लेकिन वो झींगुर उसकी पूरी गाड़ी में भर गए। उसने तुरंत गाड़ी में पड़ा एयर फ्रेशनर निकाला और उस झींगुर दल पर स्प्रे मारना शुरू कर दिया।
   खुद को बचाती वो जैसे तैसे कार से बाहर निकल आयी। लेकिन उसके स्प्रे का कमाल था कि झींगुर टपक टपक कर नीचे गिरने लगे और बाकी बचे वहाँ से उड़ने लगे।
   उसे और आगे जाना सही नही लगा,उसने सोचा यही इस लाश को फेंक कर उसे वापस चले जाना चाहिए।
   आसमान में चांद निकला था इसलिए बहुत गहरी काली रात नही थी लेकिन जंगल के अंदर घने पेड़ो के कारण रोशनी कम आ रही थी।
    तेज़  कदमों से वो पीछे चली गई और उसने गाड़ी की डिक्की खोल दी…. लेकिन गाड़ी की डिक्की खोलते ही उसके सामने जो भयानक नजारा था वह देखकर उसकी रूह कांप गई।
     पूरी गाड़ी छोटे छोटे काले लिजलिजे  कीड़ों से भरी थी। और वह सारे कीड़े उस लाश के ऊपर रेंग रहे थे। गाड़ी की डिक्की खोलते ही वह कीड़े भरभरा कर एक तरफ से लाइन बनाकर गाड़ी से बाहर निकलने लगे और इस घिनौने दृश्य को देखकर नंदिनी चौक कर दो कदम पीछे हट गई।
    उसे लगा उसे भयानक उल्टी हो जाएगी । अपने पेट को दोनों हाथों से थामे वह गाड़ी की बाहरी सीट की तरफ चली आई उसने दरवाजा खोल कर पानी की बोतल निकाली लेकिन उसे पानी खोल कर पीने में भी घिन सी आ रही थी । कुछ देर पहले के झींगुर और अब यह लिजलिजाते रेंगते से कीड़े। उसने बोतल वापस सीट पर फेंकी और एक बार फिर पीछे चली गई। अब तक वह कीड़े काफी हद तक उसकी गाड़ी से निकल कर जा चुके थे। उसने हल्की सी राहत की सांस ली और वापस डिककी की तरफ नजर फेरी तो उसके होश उड़ गए… उस लाश का पूरा चेहरा वह कीड़े खा चुके थे।
     कहीं आधी नुची नाक तो कहीं थोड़ा सा माथे का हिस्सा बाकी था। एक आंख पूरी ही वो कीड़े खा चुके थे। दूसरी आंख मौजूद थी… बाकी जगह खून मांस के लोथड़े और गंदगी देखकर उसे सिहरन सी होने लगी और उसने फटाक से डिक्की बंद की और गाड़ी में सामने जाकर बैठ गई।

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      अपनी सांसो को सामान्य करने की कोशिश में उसने अपनी आंखें बंद कर रखी थी। उसने निश्चित कर लिया कि वह अभी यहीं से शेखर को फोन करके बुला लेगी। और उसे सब कुछ बता देगी। ऐसा सोच कर उसने आंखे खोली कि उसके बैक व्यू मिरर में वही आदमी यानी वही अधनुची लाश उसके पीछे की सीट पर बैठी दिखी। नंदिनी को लगा वो अपनी एक आंख से उसे घूर रहा है।
    डर की सारी सीमाएं पर करते हुए नंदिनी के मुहँ से एक तेज़ चीख निकल गयी….

….. और वो सोफे पर चौन्क कर उठ बैठी।
  तो क्या यह सब जो वह देख रही थी वो सपना था नंदिनी ने राहत की सांस ली वह अपने कमरे में मौजूद थी। उसने अपने चेहरे को छूकर देखा वह पूरी तरह पसीने से भीगी हुई थी।
   तो इसका मतलब यह था कि लाश को कैसे ठिकाने लगाना है यही सोचते सोचते ही उसे यही सोफे पर नींद पड़ गयी थी। उसने समय देखा शाम के छै बज रहे थे। उसे लगा यही सही समय होगा जब वह उस लाश को किसी सुनसान बियाबान जगह पर छोड़कर वहीं से अपने ऑफिस निकल जाएगी। उसने तुरंत अपना मोबाइल अपना बैग और गाड़ी की चाबियां उठाई और घर से निकल गई।
    पर जाने क्यों इस थकान भरे दिन के बाद उसका ऑफिस जाने का मन नहीं किया और उसने वहीं से मोबाइल पर ही छुट्टी का आवेदन मेल कर दिया।
     वो लिफ्ट तक  पहुंची रही थी कि सुरेखा के फ्लैट का दरवाजा हल्का सा खुला। वह मन ही मन यह मनाते हुए कि सुरेखा उसे पीछे से आवाज ना दे दे  तुरंत लिफ्ट में एक झटके से घुस गई।
        नीचे पहुंच कर उसने फटाफट अपनी गाड़ी पार्किंग से निकाली और मेन रोड पर चली आई। वह आगे बढ़ रही थी कि उसे वापस अपनी गली के नुक्कड़ पर मौजूद  ट्रैफिक कंट्रोल पुलिस की पेट्रोलिंग जीप दिख गयी।
    अरे यार यह लोग यहां क्या कर रहे हैं? अपने आप पर खींझती नंदिनी ने गाड़ी वापस मोड़ ली। गाड़ी जिस तरफ को मोड़ी थी उसी तरफ की एक लेन उसे खुली नजर आई और उसने अपनी गाड़ी उस लेन में घुसा दी।
      सुनसान सी उस लेन में कोई आवाजाही ना देखकर उसका माथा एक बार को ठनका भी, लेकिन फिलहाल उसके पास इतना सब सोचने का वक्त नहीं था। वह तेजी से गाड़ी आगे बढ़ाते  जा रही थी कि, सामने चेक नाका पर बैरियर लगा कर दो पुलिस वाले खड़े थे।
   उसने अपना माथा पीट लिया। चल बेटा आज तो फसने वाली है। उसने फटाफट अपनी गाड़ी के पेपर देखें और पुलिस वालों तक जाकर गाड़ी धीमी कर दी..
” मैडम यह नो एंट्री में काहे गाड़ी डाली?”
” सॉरी सर मुझे नहीं पता था कि यह नो एंट्री है।
” बाहर बोर्ड लगाया है मैडम काहे को नहीं देखते आप लोग?”
” सो सॉरी सर मैं वापस मोड़ लेती हूं।
“चालान तो कटेगा मैडम।
और कोई दिन होता नंदिनी उस पुलिस वाले को नियम कानूनों की पट्टी पढ़ा चुकी होती, लेकिन आज वह खुद उन लोगों के पास से बचकर भागना चाह रही थी।
” नो प्रॉब्लम काट लीजिए ना!! कितना दूँ?”
उनमें से एक पुलिस वाला अपनी चालान पुस्तिका को खोल कर उसमें से कुछ गुणा भाग करने लगा और दूसरा अपने हाथ के डंडे को हिलाता गाड़ी के चारों तरफ चक्कर मारने लगा।  उस दूसरे पुलिस वाले को तिरछी नजरों से देखती नंदिनी मन ही मन भगवान का नाम जप रही थी कि बस आज किसी तरह बच जाऊं फिर सारी बातें शेखर को बता दूंगी।
    कि तभी उस पुलिस वाले ने पीछे गाड़ी की डिक्की पर डंडे को धीरे से मारा..
” मैडम डिक्की खोलना जरा।
” लेकिन क्यों?
” अरे खोल दो मैडम देखना है ।”
     भगवान का नाम लेते हुए डरते डरते धीरे से नंदिनी गाड़ी से नीचे उतर गई।
     धीमे धीमे कदमों से वह उस पुलिस वाले तक चली आई….-“सर मैं कुछ नहीं जानती इस बारे में। मेरा विश्वास कीजिए। मुझे खुद नहीं पता कि यह कब और कैसे मेरे डिक्की में…..
     नंदिनी अभी खुद ही इकरार ए जुर्म कर बैठती कि उसके पहले ही पुलिस वाले ने डिक्की खोल दी।
   
       डिक्की खाली थी।  

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     नंदिनी की आंखें फटी की फटी रह गई । उसे समझ नहीं आया कि ऋषिकेश रायसागर की लाश आखिर गई कहां?
   भावनाओं के अतिरेक में उसकी आंखें डबडबा गई “थैंक यू सर थैंक यू सो मच।”
  पुलिस वाले के हाथ में एक पांच सौ का नोट रखकर वह गाड़ी में बैठकर गाड़ी मोड़ कर  वहां से चली गई।  और पुलिस वाले भी उस झल्ली सी लड़की को देखते रह गए जो डेढ़ सौ के चालान के बदले पाचं सौ उनके हाथों में थमा कर चली गई थी।

******

        कामिनी अपनी खिड़की पर बैठी बाहर देख रही थी। बाहर बूंदे बरस रही थी और अंदर उसका दिल।
” आपके लिए कुछ ले आऊँ चाय या कॉफी।”
“चाय ले आइए जमना ताई!”
      हर एक बात के साथ उसकी कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थी।  इस चाय के साथ भी उसकी और ऋषि की कम यादें जुड़ी थी क्या?  कॉलेज के उस साहित्य सम्मेलन में जहां पहली बार उसने अपनी एक ओजस्वी सी कविता कह सुनाई थी… वहाँ ऋषि चीफ गेस्ट बनकर आए थे। और उनके ही हाथों से उसे पहला पुरस्कार मिला था। और उस समय उसने झुककर उनके पैर छू लिये थे। और उन्होंने उसे उठाकर कहा था “हमारे यहां हम लड़कियों से पैर नही छुवाते। “
  और वह चुपचाप मुस्कुरा कर जाकर एक तरफ खड़ी रह गई थी।

   उसी के बाद तो मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ था। जब उसे अपने कॉलेज की त्रैमासिक पत्रिका के संदर्भ में उनके ऑफिस जाना पड़ा था।
    कितने प्यार से उससे मिला करते थे वह हमेशा और वह भी उनके पीछे पीछे ऋषि सर ऋषि सर करती घूमती रहती थी।
    शादी के बाद भी वही सर” बोलने की आदत रह गयी थी। उससे और कुछ कहा ही नही जाता था और ऋषि इसी बात पर कभी कभी प्यार से खफा भी हो जाते थे।
     एक झलक में उनके सुंदर व्यक्तित्व को देखकर लगता ही नहीं था कि वह 55 पार कर चुके हैं। बल्कि उसने तो पहली मुलाकात में उन्हें 40-42 का ही सोचा था …लोगों के लिए भले ही बड़ी बेमेल जोड़ी थी उनकी लेकिन उन दोनों के बीच प्यार दिन दुनिया के नियमो से परे था।
   वो अपनी और ऋषि की मीठी यादों में खोई हुई थी कि तभी उसका मोबाइल जोर से बजने लगा…
  उसके प्रकाशक का फोन था…
” हां मैडम रायसागर जी और कितना इंतजार करना पड़ेगा? आप की कहानी का तेरवा और अंतिम भाग आना है। पाठकों में इतना जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है कि आप सोच भी नहीं सकती मैडम।
   आप का ये अंतिम भाग कमाल कर जाएगा देख लीजियेगा।”
” हम्म। “एक छोटा सा जवाब देकर कामिनी चुप बैठी रही।
“क्या हुआ मैडम आप कुछ अपसेट लग रही हैं? किसी प्रॉब्लम में तो नहीं है आप?”
“नहीं नहीं कोई प्रॉब्लम नहीं?”
“तो फिर यह लेखकों वाले नखरे तो नहीं शुरु हो गए आपके राइटर्स ब्लॉक एंड ब्ला ब्ला।”
“आप अच्छे से जानते हैं कि मुझे राइटर्स ब्लॉक की समस्या कभी नहीं आती।  मेरे दिमाग में हमेशा मेरी कहानियां चलती रहती हैं। बस इस वक्त थोड़ा तबीयत सही नहीं है। मुझे थोड़ा सा वक्त और लगेगा और मैं जल्दी ही अंतिम भाग पूरा करके आपको दे दूंगी।”
“जी मैडम!! वो क्या है ना कि आप के बारह भाग इतना तहलका मचा चुके हैं कि उसके फीवर में जब तक रीडर्स है, तब तक मे आप अगला भाग ले आएंगी तब तो ठीक है। वरना अगर आपने ज्यादा लेट कर दिया तो रीडर्स कहानियों को ही भूल जाएंगे। और तब फिर उन्हें वापस इस लास्ट पार्ट के साथ कनेक्ट करना मुश्किल होगा।”
“मैं यह सारी बातें समझती हूं! कोशिश करती हूं कि आपको दो-चार रोज में ही अंतिम भाग दे दूं।”

   परेशान हाल कामिनी ने फोन रख दिया। उसके पास ही खड़ी जमना उसका चेहरा ध्यान से देख रही थी। “आपकी चाय ठंडी हो गई है मैडम! दूसरी बनाकर ले आऊं।”
“प्लीज बना दजिये। मैं थोड़ा लिख लेती हूं शायद लिखूंगी तो अच्छा लगेगा।”
“मैं भी यही कहना चाहती थी मैडम! कि आप लिख लीजिए …क्योंकि यही वह काम है जिसे करते समय आप सबसे ज्यादा खुश रहती हैं।”

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******

  सुहास अपनी गाड़ी  रोड पर लाने के बाद राहत की सांस लेते हुए इधर-उधर देखते हुए गाड़ी आगे भगाने लगा।
    उसे आसपास लोग और गाड़ियां नजर आ रही थी! उसने दूर एक पान ठेले पर चार पांच लोगों को खड़े देखा। उसने ध्यान से देखा उन सभी लोगों की परछाई जमीन पर बन रही थी। उन्हीं लोगों के पास जाकर उसने अपनी गाड़ी रोक दी। कांच नीचे कर उसने उन लोगों को आवाज दी …..”भाई जरा सुनना। यह कोई कोयलीगढ़ गांव यहां से कितनी दूर और पड़ेगा?”
“कौन सा गांव?’
“कोयलीगढ़!”
” नहीं भाई इस तरफ तो ऐसा कोई गांव नहीं सुना आप दूसरी तरफ पूछ लो।”
  अपना सा मुहँ लेकर सुहास आगे बढ़ने को था कि उसके दिमाग में विचार आया।  थोड़ा फ्रेश हो जाना चाहिए …उसने पान ठेले वाले से एक सिगरेट मांगी और जला ली।
    गरम काला कड़वा ज़हरीला सा धुँआ जब उसके अंदर उतरा तो उसे थोड़ी राहत महसूस हुई। गहरे गहरे कश भरकर उसने अपने सिगरेट बुझाई और गाड़ी लेकर आगे बढ़ गया।
     उसे सूझ नहीं रहा था कि वह सही रास्ते पर आगे बढ़ रहा है या नहीं? गूगल मैप भी उसकी कोई मदद नहीं कर रहा था… उसने दो चार लोगों से रुक कर पूछा लेकिन कोईलीगढ़ जाने का रास्ता उसे कोई नहीं बता पाया। वह कुछ और आगे बढ़ा कि सामने रास्ते पर उसी की उम्र का एक हसीन सा जोड़ा खड़ा था।
    आदमी ने एक लंबा चौड़ा काले रंग का ओवरकोट डाला हुआ था और नीचे बूट पहने हुए थे। साथ ही सिर पर एक बड़ी सी हैट और मफलर से लगभग आधा चेहरा उसका ढका हुआ था।
   औरत ने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी। खुले कटे हुए कंधों तक के बालों को उसने झटक कर लिफ्ट के लिए सुहास को हाथ दिखाया..
   उस औरत का हाथ अचानक से गाड़ी के कांच के इस कदर सामने आया कि सुहास अगर झटका देकर गाड़ी को  ब्रेक नही लगाता तो उस लड़की के हाथ से जरूर टकरा जाता।
   वह दोनों कुछ असामान्य से कपड़ों में एक सामान्य सा जोड़ा लग रहे थे। सुहास को एक पल को लगा कि शायद यह किसी फैंसी ड्रेस थीम वाली किटी पार्टी में हिस्सा लेने जा रहे होंगे और इनकी गाड़ी खराब हो गई होगी।
   उसने अपना कांच नीचे कर दिया….
” जी क्या आप हम लोगों को लिफ्ट दे सकते हैं ? हम इस तरफ किसी काम से जा रहे थे और हमारी गाड़ी खराब हो गई उसके बाद हमने कैब बुक  की लेकिन वह भी समय पर नहीं आ पाई। उसमें भी कुछ समस्या  आई और बुकिंग कैंसिल हो गई तब से बस हम यहां लिफ्ट का इंतजार करते खड़े हैं!”

  उस औरत ने ईतनी शानदार तरीके से अपनी बात रखी कि सुहास को यकीन हो क्या कि यह जोड़ा वाकई किसी पार्टी में ही जा रहा है।

” वह रही हमारी गाड़ी।” उस आदमी ने सुहास के तरफ झुक कर उसे दूर खड़ी एक गाड़ी की तरफ इशारा कर दिया।
” जी वैसे आप लोगों को जाना कहां है?”
  सुहास के इस सवाल पर उन दोनों ने लगभग एक साथ जवाब दिया…
   कोयलीगढ़!!!

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क्रमशः

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aparna…

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Kavita
Kavita
2 years ago

Nandini ko to bacha liya aapne..ab dekhte hai suhas ke saath kya hota hai