अपराजिता -156

अपराजिता -156

  भोर का सूरज उग रहा था, आसमान नारंगी हुआ जा रहा था.. पंछी अपने ठिकानो से निकल कर कोलाहल मचाते काम पर जाने लगे थे..
गांव के लोगो की दिनचर्या भी शुरू हो चुकी थी… कुछ औरतें पानी भर रही थी, कुछ आदमी अपनी भैंसो को तालाब में नहला रहे थे..
बच्चे नीली बुशर्ट पहने छोटी छोटी निकर को संभालते पंक्ति बना कर स्कूल की तरफ जा रहे थे..

गुड्डी हाथ में पकड़ रखी छड़ी को इधर उधर घुमाती अपने में मगन कुछ गीत गुनगुनाती चली जा रही थी कि तभी रास्ते में उसे पुष्पा काछी दिख गयी… पुष्पा रेशम की खास मरीज़ थी, रेशम से खूब टॉनिक लिखवा कर पीये थे उसने..
वो अपने बगीचे से ताजा भिंडियां तोड़ कर निकल रही थी कि गुड्डी को देख उसने रेशम के लिए भिंडियां उसके हाथ रख दी..

“ये क्या है पुष्पा दीदी.. ?”

“साग है, दीदी के लिए ले जा !”

“अब कहाँ साग खाएंगी दीदी, वो तो वापस लौट रही ना ?”

“काहे ? काहे लौट रही यहाँ से.. हमारा गांव पसंद नहीं आया क्या ?”

“पसंद काहे नहीं आएगा दीदी, लेकिन उनका दो साल यहाँ पूरा हो गया था और फिर साहब भी तो शहर में रहते हैं ना.. कब तक दोनों जने अलग अलग पड़े रहेंगे !”

“हाँ जे बात तो सही कही तूने ! तो मतलब डॉक्टर दीदी सच में चली जाएँगी.. !”

“हाँ.. और क्या ? “

गुड्डी जवाब देकर वापस अपनी छड़ी लहराती आगे बढ़ गयी…
लेकिन उसकी कही ये बात पुष्पा के मन में बैठ गयी.. उसका जी जाने कैसा तो हो गया..
इन्ही रेशम दीदी के प्रयासों से उसके पति की पीने की लत छूटी थी.. और भी जाने कितने घरो के चिराग नशे के जाल से मुक्त हुए थे रेशम के प्रयासों के कारण..।

पुष्पा से रहा नहीं गया और वो अपनी पड़ोसन सरिता को बताने चली गयी..

रेशम का दूर्वागंज में दो साल का कार्यकाल पूरा हो चुका था.. इन दो सालों में उसने क्या कुछ नहीं देखा था…
ग्रामीण जन जहां भोले भाले से थे वहीँ कुछ लोग उसे तंग करने से भी बाज नहीं आते थे..
गांव में काम करने के अपने फायदे थे तो अपने नुकसान भी थे..
लेकिन उसके जीवन में जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आया था वो भी इस गांव में ही आया था..

सदियों से उसके दिल दिमाग में बैठा डर दूर हुआ था… उसके जीवन का वो कलुषित अतीत जिससे वो अकेले जूझ रही थी, अब उसके दिमाग से बिलकुल ऐसे गायब हो गया था जैसे वो दर्द वो तकलीफ कभी थी ही नहीं !!

उसे रह रह कर वो शाम याद आ जाती थी जब वो धीरेन्द्र पर टूट पड़ी थी.. पता नहीं उसके अंदर कौन सी ऐसी अदृश्य ताकत आ गयी थी, जो वो बिना अपने घाव की परवाह किये उसे ताबड़तोड़ मारती चली गयी थी…।
उसे ये तक होश नहीं रह गया था कि वह पुलिस वालों के सामने धीरेंद्र की इतनी बुरी तरह से पिटाई कर रही है।

यहां तक की अथर्व भी वहीं खड़ा था। लेकिन उस वक्त उसे कुछ भी होश नहीं था। उसके दिल दिमाग पर जैसे किसी और नहीं कब्जा कर लिया था। अगर उस वक्त पर आकर अथर्व ने रोक नहीं होता तो शायद उस दिन वह धीरेंद्र का खून कर देती। उस दिन उसके शरीर की सारी ऊर्जा उसके शरीर का एक एक कण जैसे गुस्से से पिघल कर फौलाद बन गया था..।

और फिर जब अथर्व ने उसे थामा तो पल भर के लिए सारा संसार उसकी आंखों के सामने घूम गया था। और वह चकरा कर बेहोश हो गई।

    शायद उसके अंदर की शक्ति, उसकी ऊर्जा का प्रवाह इतना तेज था कि जब तक वह उस प्रवाह को धीरेंद्र के ऊपर बहाती रही, तब तक तो होश में रही, लेकिन जैसे ही अथर्व ने उसे रोका, वह सारा प्रवाह उसके अंदर एक क्षण में सिमट कर एक ऐसा विस्फोट कर गया कि उसे वह संभाल नहीं पाई और अपनी सुध बुध गंवा बैठी।

    उसके बाद उसे जब होश आया, तब वह अपने घर पहुंच चुकी थी। अथर्व उसे लेकर सीधे शहर आ गया था। रास्ते पर शायद वह बेहोश रही थी और अथर्व ने मानव को फोन कर दिया था। अथर्व वाकई कितना समझदार है। वह उसे लेकर ससुराल नहीं बल्कि मायके गया था, और इत्तेफाक से उस समय उसके माता-पिता तीर्थ दर्शन के लिए गए हुए थे।

बस मानव और अथर्व ही थे। इसलिए उसकी उस हालत को घर पर और किसी ने नहीं देखा। जब वह होश में आई तब अथर्व ने बताया कि पिछले लगभग सात आठ घंटे से वह बेहोश पड़ी थी। उसके होश में आने के बाद ना अथर्व ने उससे धीरेंद्र के बारे में कोई बातचीत की और ना मानव ने यहां तक कि वह पुलिस वाले भी उससे कुछ भी पूछने नहीं आए। सब लोग इतने सामान्य बन गए थे कि उसे खुद को भी धीरेंद्र का क्या हुआ यह पूछने में संकोच होने लगा था।

दो-तीन दिन बीत जाने पर जब वह सामान्य हो गई, तब उसे साथ लेकर अथर्व जिला कार्यालय पहुंच गया था। और उस पर दबाव देकर उसने उसके तबादले का आवेदन भी भरवा दिया था। अथर्व का कहना भी सही था आखिर दो साल उसके बिना वहां गुजर चुकी थी, और कितना दोनों अलग-अलग रहते। अब उन्हें अपने परिवार को आगे बढ़ाने के बारे में भी तो सोचना था।

और यह सब सोच कर रेशम ने भी हामी भर दी। आवेदन लगाने के बाद जिस दिन वह और अथर्व वापस  लौट रहे थे, तब रास्ते में बड़ी हिम्मत करके उसने अथर्व से धीरेंद्र के बारे में पूछ लिया था। अथर्व ने बड़ी गहरी नजरों से रेशम को देखा और उसके हाथ को धीरे से पकड़ कर दबा दिया था।

” धीरेंद्र एक एक्सीडेंट में मर गया।”

अथर्व की यह बात सुनकर रेशम चौक गई थी। उसने आश्चर्य से अथर्व की तरफ देखा।

“एक्सीडेंट में? लेकिन कैसे?”

“उस दिन जब तुम बेहोश हो गई, तब तुम्हारी पकड़ से छूटने के बाद वह सीधे भाग कर मेन रोड की तरफ गया, और सामने से आती एक ट्रक के नीचे चला आया और अब तुम इन सब बातों को भूल जाओ। अपने मन को शांत रखो। तुमने वैसे भी बहुत मेंटल ट्रॉमा झेला है रेशम…।”

“हम्म… !” इसके बाद रेशम ने और कुछ नहीं पूछा था, लेकिन कहीं न कहीं शायद उसे उस राक्षस का अंत सुन कर सुकून ही मिला था..

उस वक्त उसके साथ आया अथर्व फिर हफ्ते भर तक उसके साथ रह गया था..।
अथर्व का रेशम को छोड़ कर जाने का मन ही नहीं कर रहा था.. लेकिन वो भी नौकरीपेशा था, जाना तो था ही.. और वो लौट गया..।
लेकिन लौटने के पहले रेशम की माँ को वहां बुला गया था..।
रेशम को अथर्व का इतनी चिंता करना देख कर हंसी भी आ रही थी..

उसने अथर्व से कहा भी कि बस दो महीने बाद ही तो वह खुद शहर में पोस्टिंग ले लेगी। लेकिन पता नहीं क्यों अथर्व उसे छोड़ना ही नहीं चाहता था, और देखते ही देखते दो महीने बीत गए।

आज वह अपनी मां के साथ अपनी पैकिंग में ही लगी हुई थी कि तभी उसके मोबाइल पर एक नए नंबर से फोन आने लगा। रेशम ने कुछ देर उस नंबर को देखा और पहचानने की कोशिश करने लगी, और फिर फोन उठा लिया।

दूसरी तरफ से एक मीठी सी आवाज उसके कानों में शहद घोल गई।

” हेलो रेशम मैं बोल रही हूं, मानसी!”

रेशम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई

” मानसी कैसी हो?”

” मैं अच्छी हूं, तुम कैसी हो?”

” मैं भी ठीक हूं,बस तैयारी में लगी हूं। मम्मी पैकिंग में मदद करवा रही है। तुम बताओ तुम्हारा पासपोर्ट रेडी हो गया।”

” पासपोर्ट रेडी होकर आ गया है।”

” अरे वाह बधाई हो, क्योंकि मानव ने शादी के बाद तुम्हें यूरोप घूमाने की सोची है।”

“रेशम तुम भी ना, मैंने इसलिए थोड़ी ना पासपोर्ट बनवाया है।”

“अच्छा जी, तो फिर किस लिए पासपोर्ट बनवाया है मैडम ने?”

” वह तो मेरे पास था नहीं, तो मुझे लगा अब शादी हो रही है तो मुझे पासपोर्ट बनवा लेना चाहिए।”

” हां मैडम क्यों नहीं? उस दिन जब पहली बार मानव से मिली थी,उसी दिन तो आपका पासपोर्ट खोया था ना ?”

“पासपोर्ट नहीं पासपोर्ट के लिए लगने वाले ज़रूरी डॉक्युमेंट्स खोये थे !”

“हाँ वही, लेकिन बन गए ना ? अब हनीमून पर जाने के लिए कोई दिक़्क़त नहीं है ना ?”

  रेशम के ऐसा कहते ही  मानसी के चेहरे पर हंसी खिल गई और हंसते-हंसते वो अपनी उस शाम को याद करने लगी..

****

उस दिन मानसी को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे, और वो अपने एनजीओ के लोगों के साथ किसी बस्ती में गरीब बच्चो को पेन्सिल और किताबे बाँटने गयी हुई थी….

ये सभी लोग अपनी अपनी दुपहिया गाडी से आये हुए थे.. मानसी अपनी सहेली पूजा के साथ आयी थी.. बीच दुपहरिया पूजा की दादी की तबियत ख़राब है का, फ़ोन आया और वो एकदम से वापस चली गयी..

वहां बच्चो और गांव वालों की भीड़ भाड़ में वो मानसी को बिन बताये ही निकल गयी..
कुछ लड़कियाँ हॉस्टलर थी, वो भी एक एक कर मानसी से मिल कर जाती गयी…..
बाद में लड़के भी जाने लगे !

उसी समय उन बच्चो में से एक बच्चा ज़ोर से मुहं के बल गिरा और उसके मुहं से खून निकलने लगा..
मानसी उस बच्चे को गोद में लेकर उसके घर की तरफ भागी और उसके घर पहुँच कर उसकी माँ के पास बच्चे को सौंपने के बाद वो कुछ घरेलु उपाय कर के उसके खून को बहने से रोकने के प्रयास में लग गयी..

इधर बाहर जो भी लड़के बचे थे, उन लोगों को लगा कि उनके अलावा बाकी लोग यहां से जा चुके हैं! और इसलिए उन लोगों ने भी अपना अपना सामान समेटा और बाइक पर सवार होकर वहां से निकल गए।

उनमें से किसी ने भी मानसी को उस बच्चे को लेकर घर की तरफ जाते नहीं देखा था। मानसी जब वहां से बाहर निकली तब खुद को अकेला पाया। गांव के लोग भी एक-एक कर अपने घर जा चुके थे। कुछ बच्चे थे, लेकिन वह उन बच्चों से क्या मदद मांगती।
    लोगो से भी मदद मांगना बेकार ही था। इसलिए वह अपना बैग टांगे हुए रास्ते की तरफ बढ़ने लगी। उसे लगा गांव के कच्चे रास्ते से वह पक्के रास्ते पर आएगी तो जरूर कोई ना कोई लिफ्ट मिल जाएगी।

उसे नहीं मालूम था कि के सब लोग उसे यूं अकेले छोड़ कर चले जाएंगे। हालांकि सभी को गलतफहमी ही हुई थी। लेकिन उसे भी जल्दी घर पहुंचना था। आज सुबह घर से निकलते समय ही उसकी मां ने कहा था कि शाम को उसे देखने के लिए लड़के वाले आने वाले हैं।

   वह परेशान सी रास्ते पर खड़ी लिफ्ट के लिए देख रही थी। और फिर उसने पर्स खोल कर अपना मोबाइल निकाल लिया। उसे लगा घर पर फोन करके पापा को ही बुला लेना चाहिए। लेकिन मुसीबत हर दिशा से दौड़कर उसे गले लगा रही थी।

उसका मोबाइल भी डिस्चार्ज होकर बंद पड़ा था।
अब वह पापा क्या, किसी को भी मदद के लिए नहीं बुला सकती थी। उसी समय वहां से एक कार जाती हुई नजर आई।

उसने बिना कुछ सोचे समझे लिफ्ट के लिए हाथ दे दिया। गाड़ी मानव की थी। मानव ने उसके पास पहुंचकर धीरे से कांच उतार दिया और उसने लिफ्ट मांग ली। मानव ने भी बेहिचक उसे लिफ्ट दे दी….

“थैंक यु सो मच.. ! बस मुझे शहर तक ही जाना है, वहां पहुंचकर आप उतार दीजिएगा। मैं अपने घर के लिए टैक्सी ऑटो ले लूंगी.. !”

“ठीक है.. !” मानव ने एक बार उसकी तरफ देखा और कार आगे बढ़ा दी..

मानव ने गाडी आगे बढ़ा दी…
आगे चौक पर जाकर मानव ने गाडी रोक दी, लेकिन बारिश इतनी तेज़ थी कि मानसी का बाहर निकल कर खड़ा होना मुश्किल था..

“आप यहाँ ऑटो रिक्शा के लिए खड़ी नहीं हो पाएंगी.. वैसे घर किस तरफ है आपका ?”

“अरे नहीं आप क्यों परेशान हो रहे है ?”

“मैं परेशान नहीं हो रहा, लेकिन आपको ऐसे रात में बारिश में यहाँ कैसे छोड़ कर जाऊं ?”

मानसी ने मानव की तरफ देखा और जाने क्या सोच कर उसे अपना पता बता दिया..

“झवेरी बाजार के आगे ताज अपार्टमेंट जाना है.. वहीँ मेन गेट पर उतार दीजियेगा.. !”

“ठीक है !”

मानव ने झवेरी बाजार की तरफ गाडी घुमा ली..

उसकी गाडी में रेडियो चल रहा था…

आई मेरी सुबह हंसती हंसाती
बोली आँखें तेरे लिए संदेसा है, हा है
जागी आँखों को भी सपना मिलेगा
कोई ख़ुशी आने का भी अंदेशा है हां है
आहा गुलाबी सी सुबह, आहा शराबी सी हवा
भीगी सी भागी सी मेरी बाजुओं में समाये
जोगी सी जागी सी कोई प्रेम धुन वो सुनाये

तभी उसका फ़ोन बजने लगा.. उसकी माँ का फ़ोन था..

असल बात तो यही थी कि उसकी मां ने सुबह ही उसे फोन कर दिया था कि उन्हें किसी के घर शाम को बहुत जरूरी काम से बैठने जाना है…
और इसलिए मानव का घर पहुंचना बहुत जरूरी है! उनकी बात सुनकर मानव, रेशम और अथर्व के आने का इंतजार ही कर रहा था। जैसे ही वह दोनों लौटे वह तुरंत निकल गया था। लेकिन वह घर पहुंच पाता उसके पहले यह लड़की मिल गई ।और इसके घर की दिशा उसके घर की दिशा से बिल्कुल विपरीत थी। फिर भी उसने उस लड़की से कुछ भी नहीं कहा, और चुपचाप गाड़ी चलाता रहा।

लेकिन जिस बात का डर था, वही हुआ, और उसकी मां उसे फोन लगाने लगी। उसने धीरे से फोन उठा लिया।

” हां बोलो मां?”

” कहां पहुंचा है तू? मैंने तुझे कहा था ना, शाम तक पहुंच जाना। देख अब तो बारिश भी शुरू हो गई, कहीं फंस तो नहीं गया?”

” कैसे बात करते हो मम्मा। कार में हूं, मैं कैसे फंस जाऊंगा?”

” हां तो फिर सीधा इधर आ, मैं तुझे लोकेशन भेज रही हूं।”

” ठीक है आप भेज दीजिए… ।”

उसने सोचा पहले इसे छोड़ दूँ उसके बाद लोकेशन की सेटिंग ऑन करूँगा.. यही सोच कर वो उसके बताये अनुसार गाडी चलाता रहा और वो लोग ताज अपार्टमेंट पहुँच गए…

अब तक बारिश काफी हद तक रुक गयी थी… मानसी गेट पर ही उतर गयी..

“थैंक्स… अगर आपने लिफ़्ट नहीं दी होती तो…

वो कुछ बोल पाती उसके पहले मानव बोल पड़ा..

“तो किसी और ने दे दी होती ” मानव इतनी देर में पहली बार मुस्कुराया और बाहर खड़ी मानसी उसे देखती ही रह गयी..
उसका घर लौटने का उत्साह जैसे क्षण भर में कपूर सा उड़ गया..
वो जल्दी जल्दी भीगती भागती सी आयी थी कि उसे देखने लोग आने वाले है.. उनके आने के पहले तैयार हो लेगी, लेकिन अब पता नहीं क्यों मन अजीब सा हो गया..

अचानक ही उसे लगा की किसी बहाने से मानव थोड़ी देर और रुक जाए… या काश ये रास्ता ही थोड़ा लम्बा हो जाता..
लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था..
मानसी के चेहरे की मुस्कान गायब हो गयी..

उसने सर झुकाया और चुपचाप गेट की तरफ मुड़ गयी..
मानव भी गाड़ी मोड कर मुख्य मार्ग पर आ गया..
मानव सोच में पड़ गया..

“अजीब लड़की थी.. इतने लम्बे रास्ते साथ आयी, पर ना मेरा नाम पूछा न अपना बताया !”
.
उधर अपार्टमेंट की लिफ़्ट में चढ़ कर मानसी भी यही सोच रही थी..

“कैसी अजीब बात है.. ना मैंने उस का नाम पूछा ना उसने मेरा.. खैर ठीक भी है.. जब अब कभी मिलना ही नहीं तो नाम ही पूछ कर क्या हो लेना था !”

मेरी आँखों कि सिआही पिया देती है गवाही
मैं प्यासी थी निरासी तू पानी की सुराही
मेरी आँखों कि सिआही पिया देती है गवाही,
तुझे देखा तो खिला हूँ, तेरी चाहत में धुला हूँ
मिले मंदिर में खुदा जो मैं तो तुझमें यूँ मिला हूं

भीगी सी भागी सी मेरी बाजुओं में समाये।
जोगी सी जागी सी कोई प्रेम धुन वो सुनाये …

क्रमशः

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कांति
कांति
1 year ago

रेशम के साथ साथ अब मानव के प्रेम की गाड़ी भी आगे बढ़ गई। बारिश ने दो अजनबियों को मिलाया पर प्रकृति की साजिश को न समझ सके दो भोले भाले लोग ।
न नाम, पूछा न पहचान फिर भी मिलने वाले हैं दो अनजान।
प्यारा भाग 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Vandana Bairagi
Vandana Bairagi
1 year ago

Nice part… Me piche hu abhi….. Or ptaa nhi kaha kon se part me kho gai hu…
Beautiful story

Upasna
Upasna
1 year ago

तो मानव बाबू की प्रेम की गाड़ी भी रफ्तार पकड़ रही बढ़िया है जी वैसे जैसे भला मानुष मानव है उसे ऐसी ही कोई पयारी सी मानवी मतलब मानसी ही मिलनी चाहिए हैं न…

चलेंगे साथ तेरे हमकदम हरदम
प्यार महकेगा बनकर शबनम
ऋतु पिया कोई आये जाए
तू मेरा ही रहेगा और
मैं रहूंगी तेरी ही हरदम

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

जागृति
जागृति
1 year ago

Wonderful episode lovely

Preeti
Preeti
1 year ago

Bahut hi badiya story rahi hai ab bas aage ki story bhi likh dijiye ma’am 👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌is story k liye mene aapke blog page ko bhi dund hi liya …

Meera
Meera
1 year ago

मानव की मानसी को आज देखा ❤️😍😍🤩 वह भई ये गाड़ी भी आगे बढ़ गई , अब तोबस हमारे अखंड बाबू का ही इंतजार है , उनके लिए कोई दबंग कहा छुपी हुई है ??? , भावना के राजी भी अच्छे से ही है और हमारी कुसुम का यज्ञ भी अच्छा ही चल रहा है , अथर्व का रेशमी ख्याल तो uff 🫡🫡 👌👍👍

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

एक खूबसूरत सुबह के साथ रेशम की ज़िन्दगी भी खूबसूरत हो गई, बहुत सुकून मिला आज का भाग पढ़कर 😊रेशम की ख़ुशी अपनी सी लगी, हम आपके किरदारों को इस तरह से महसूस करते है जैसे सब चलचित्र हो सब हमारे सामने हो बीत रहा हो। लाजवाब लिखती हो आप डॉक्टर साहिबा 😘।
मानव और मानसी… चलो जी बन गई दोनों की खूबसूरत जोड़ी 😊।
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

Sushma
Sushma
1 year ago

Beautiful part 👍👍👍👍👍

Tripti dubey
Tripti dubey
1 year ago

Khani abhi और aage जायेंगी सही है akhand का स्याही भी हो जाये और kusumkumari की सहेली dr. बन जाये इतनी accidental jodiya real life me kyo nhi बनती reality मे tragedy kyo रहती है