Bestseller-17

  The bestseller -17


                           Plagiarism

  नंदिनी ने अपने सर को एक झटका दिया और शेखर के साथ वहां से पानी पूरी खाने के बाद निकल गई।

   अगली सुबह शेखर ने कुलदीप को थाने में बुलाया था। कुलदीप के वहां पहुंचते ही शेखर उससे कड़े शब्दों में पूछताछ करने लगा लेकिन कुलदीप अपनी बात पर अड़ा हुआ था।
   शेखर के पास वैसे तो कुलदीप के खिलाफ कोई सबूत नहीं थे लेकिन एक दिन पहले ही उसके घर जाने के पहले शेखर को जो फोन कॉल आया था उस उस कॉल के आधार पर ही शेखर कुलदीप के घर एक बार वापस तलाशी लेने गया था लेकिन उसे वहां पर ऐसा कुछ भी नहीं मिला था जैसा उस फोन कॉल में बताया गया था।
     उस फोन करने वाले ने इस वारदात का जिम्मेदार उस घर के सबसे छोटे भाई को ठहराया था। लेकिन वहां खोजबीन करने पर शेखर को ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिससे वह कुलदीप के छोटे भाई को जिम्मेदार मान सकें शेखर के सामने ही कुलदीप दो लोगों को घर बेचने की बात भी कर रहा था इन्हीं सब बातों के मद्देनजर शेखर ने कुलदीप को हवालात में डाल दिया।

  हवालात से बाहर आकर शेखऱ ने अपने लिए चाय मंगवाई और पीने को था कि बाहर से एक कॉन्स्टेबल हाथ में कुछ पेपर्स थामे अंदर चला आया…

” साहब!! ये कागज़ ज़रा देख लीजिए।”

” ये क्या है भोलाराम?”

“तुलाराम सर!! ये कागज़ कल कुलदीप के घर से आते समय आपके इशारे पर उठाए थे। कल बहुत देर हो गयी थी साहब तो आपको दिखा नही पाए थे।”

“अरे हां वो कागज़ तो मैंने ही उठाने कहा था और मैं खुद भूल गया। लाओ यार दिखाओ… देखें ज़रा किसकी जन्मकुंडली है?”

  चाय को एक तरफ रख शेखऱ वो कागज़ पढने लगा। और पूरे पेपर्स पढ़ने के बाद उसके चेहरे का रंग उतर गया…

“क्या हुआ साहब? क्या है ये?”

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“अरे यार महामारी !बहुत बड़ी गलती हो गयी मुझसे। अब तक जिस दीपक से घर को आग लग सकती है ये सोचे बैठा था वो दीपक तो सही मायनों में वाकई घर ही नही सारे संसार  को रोशन करने वाला सूरज निकला।”

“मतलब साहब?”

” मतलब ये कि कल जिन दो लोगों से ये कुलदीप बैठ कर घर के बारे में बात कर रहा था वो दोनो एन जी ओ चलाते हैं। और कुलदीप ने वो घर और दोनों दुकानें बेच कर सारा पैसा वृद्धाश्रम बनाने को दान कर दिया है।
   वो दोनो आदमी एक छोटा वृद्धाश्रम चलाते हैं, और उन्हें उसे बढ़ाने के लिए काफी पैसों की ज़रूरत है। और कुलदीप ने अपना सब कुछ दान कर दिया है। बुलाओ यार पंसारी कुलदीप को बुला कर ले आओ। और यार मेरे लिए दूसरी चाय भी बोल दो … रिकॉर्ड है आज तक कभी एक बार में गरम चाय पीने को नही मिली।
                ज़रूर पिछले जन्म में चाय के साथ कोई बदतमीजी की होगी मैंने इसलिए इस जन्म में चाय भी साली बदला ले रही है।”

“मान गए सर?”

“किसे ? मेरे सेंस ऑफ ह्यूमर को!”

“नही सर ये मान गए कि आप बड़े फिल्मी हैं और सर आपको एक बात भी बताना है।”

“अब यार तुमसे हम बादबाक़ी गपशप कर लेंगे पहले ज़रा उस कुलदीप को तो बुलाओ!”

  कुछ ही देर में लुटा पिटा सा कुलदीप शेखऱ के सामने बैठा था। शेखऱ ने पेपर्स उसके सामने फेंक दिए…

“इसके बारे में कल क्यो नही बताया? कम से कम आज मार खाने से तो बच जाते।”

“सर अब तो इन्ही ज़ख्मों और ऑंसूओं में सुकून मिलता है। ज़िन्दगी बिल्कुल…

“झंड हो गयी है तुम्हारी… मालूम है। पर तुम्हारे दो बच्चे भी तो है। उनका भविष्य भी नही सोचा और शहर की सारी प्रॉपर्टी खुले हाथ दान कर दी। अब तुम्हारे बच्चों का क्या?”

” साहब मेरा मानना है हर एक इंसान अपनी किस्मत खुद लेकर पैदा होता है। मेरे बच्चे भी पढ़ाई में लगे हैं। लड़की  डॉक्टरी पढ़ रही है और उसकी शादी तय हो चुकी है।  होने वाला दामाद उसी का सीनियर डॉक्टर है ।
    लड़का इंजीनियरिंग पढ़ कर अब एमबीए कर रहा है। उसका आखिरी सेमेस्टर है , और कैम्पस सेलेक्शन में उसकी नौकरी लग चुकी है।मेरे दोनो बच्चों से भी ये सब करने से पहले मैंने पूछा था।  उन दोनों को कोई आपत्ति नही है तो साब फिर अब किसे आपत्ति होगी?”

“हम्म मतलब  बच्चे सेटल्ड हैं।”

“हाँ और मेरा मन तो गांव और खेतीबाड़ी में ही लगता है।”

“ठीक है लो आज तुम थाने की चाय पियो और फिर घर जाकर आराम करो।”

   चाय पीने के बाद कुलदीप घर की ओर निकल गया…

“सर इसकी तो बेकार ही धुलाई कर दी आपने। बेचारा बेगुनाह निकला!”

“सही कह रहे हो संसारी ! पर अभी भी जाने क्यों मानने का दिल नही कर रहा कि एक परिवार सिर्फ तंत्र मंत्र की भेंट चढ़ गया। कोई तो बात है इस वारदात के पीछे। और मैं जल्दी ही ढूंढ के रहूंगा। तुम ऐसा करो, उसके घर जाकर इसके दोनो भाइयों का सामना उठा लाओ। उसमें देखतें है कुछ अगर मिला तो , और वो जो अजीब सा वास रखा है न कमरे में वो भी लेते आ आना। और सुनो इस कुलदीप के दोनों बच्चों का नम्बर चाहिए मुझे। उन दोनों से भी बात करनी है।”

******

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नंदिनी अपने कमरे में इधर से उधर चक्कर काट रही थी। उसके दिमाग में इतना कुछ चल रहा था कि उसे खुद समझ नही आ रहा था कि उसका दिमाग आखिर उससे कहना क्या चाहता है? पहले उसे कामिनी पर  शक था, फिर सुरेखा अनिल पर …! लेकिन दोनो में से कोई भी बाते इतनी मजबूत नहीं थी कि सिर्फ शक के आधार पर कोई निर्णय लिया जा सके।
   उसे याद आया अभी अभी तो उसने जिया को देखा था … जिया की याद आते ही उसके चेहरे पर मुस्कान चली आयी… वो और जिया कितने अच्छे दोस्त बन गए थे,वो अक्सर उसका हाथ पकड़ कर उसे क्लास से लेकर आया करती थी। इधर कुछ दिनो से अपनी परेशानियों में वो जिया से भी नही मिल पा रही थी। उसे अचानक जिया से मिलने का मन करने लगा… और वो सुरेखा के घर के दरवाज़े पर पहुंच गई…जिया हॉल में नही थी…….

“जिया कहाँ है सुरेखा? आज तो मैं जिया से ही मिलने आई हूँ स्पेशली। मेरी छोटी सी दोस्त !!”

  सुरेखा ने मुस्कुरा कर जिया के कमरे की ओर इशारा कर दिया।

   नंदिनी सुरेखा से इजाज़त ले उसके कमरे की ओर बढ़ गयी…

“हेलो जिया !कैसी हो बेटी?”

“हेलो दीदी!!  मैं ठीक हूं आप कैसी हो?

“मैं भी ठीक हूं बेटा.. आज मैंने तुम्हें कहीं देखा था तुमने भी मुझे देखा था ना झील के पास पेड़ के पीछे से।”

“पर दीदी मैं तो 3 दिन से कहीं गई ही नहीं।”

“तुम अपनी मम्मी और पापा के साथ झील पर घूमने नहीं गई थी?”

“नहीं तो!!! मैं तो कहीं नहीं गई… मेरी तबीयत ठीक नहीं है ना , तो मम्मी बाहर नहीं लेकर जाती।”

“अच्छा !!तो हो सकता है मैंने जिस बच्चे को देखा हो, वो तुम्हारी जैसी लग रही हो। मुझे अच्छे से याद है कि उसने मुझे धीरे से हाय भी किया था और मैंने भी उसे धीरे से हाय किया था।”

जिया मुस्कुरा कर अपनी ड्राइंग की कॉपी नंदिनी को दिखाने लगी!  नंदिनी भी अपनी आंखों में उत्साह की चमक दिखाते हुए उसकी ड्राइंग कॉपी देखने लगी..
. बावजूद उसके दिमाग में यही चल रहा था कि बिल्कुल जिया की शक्ल वाली वह लड़की आखिर थी कौन?

नंदिनी जिया के साथ व्यस्त थी कि सुरेखा उन दोनों के लिए चाय बना कर ले आई…

“इसकी क्या जरूरत है सुरेखा अब मुझे जाकर डिनर ही करना है।”

“जब दो सहेलियां मिलकर गपशप करती हैं, तो चाय उनकी गपशप का मजा बढ़ा देती है। चाहे कोई पीने की चीज थोड़ी है, यह तो सिर्फ एक माध्यम है दोस्ती को ताजा और गर्म रखने का।”

“बात तो सही है तुम्हारी सुरेखा, तुम इतना अच्छा बोलती हो, तुम भी लिखना क्यों नहीं शुरु कर देती? अपनी सहेली कामिनी की तरह।”

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“अरे ना बाबा बोलना अलग होता है, लिखना अलग। लिखना बहुत मुश्किल काम है, जो मैं कभी नहीं कर सकती।”

“इतना भी मुश्किल नहीं है यार !!  मैं भी पत्रकार हूं …मैं भी लिखती हूं । हां कहानियां कविताएं नहीं लिखती, मैं मोस्टली लेख लिखती हूं। तुम भी कुछ थोड़ा बहुत तो लिख सकती हो।”

“देखो लिखने की जहां तक बात है, तो हर लिखने वाला लेखक यह चाहता है, कि पाठक उसे पढ़े। अब अगर मैं कुछ भी कचरा लिखूंगी, तो मुझे पाठक पढ़ेंगे नहीं और ना पढ़े फिर मैं दुखी हो जाऊंगी। तो इस दुख से बचने के लिए मैंने कभी लिखने के बारे में सोचा ही नहीं और फिर बहुत मुश्किल है यार इस फील्ड में।”

“जैसे? किस तरह की मुश्किल सुरेखा?”

“अब मैंने तो कामिनी को शुरू से ही देखा है… वह शुरू से ही लेखन के क्षेत्र में रही है, तो उसकी मेहनत लगन को देखा है मैंने। रात रात भर बैठ कर वह कहानियां लिखती रहती थी, कभी कहानियों को प्रकाशक से अप्रूव कराने का टेंशन ,कभी कहानियों को पब्लिश कराने की टेंशन, और इतने सब के बाद अगर कोई अच्छी कहानी तैयार हो गई तब भी कोई भी मुहँ उठा कर आप पर कैसा भी  दोषारोपण कर सकता है।”

“दोषारोपण? किस तरह का?  क्या कामिनी पर भी कभी कोई दोषारोपण हुआ।”

“हां!!! हुआ है… उसकी शादी के पहले की बात है। उसने बहुत जोड़-तोड़ करके एक प्रकाशक के हाथ पांव जोड़ कर अपनी एक किताब पब्लिश कराने की योजना बनाई थी। उसकी किताब पाइप लाइन में ही थी, और उसी वक्त प्रकाशक ने उसे ऑफिस में बुलाकर बहुत जोर से फटकारा और उसकी किताब उसके मुंह पर फेंक दी।  कहा कि यह पूरी तरह से प्लेजेराइज़्ड है।”

“प्लेजेराइज़्ड !!! इसका मतलब तो साहित्यिक चोरी होता है ना?”

“हां!!  उस पर यही इल्जाम लगा था कि उसने किसी पुराने इंग्लिश साहित्यकार की कहानी से आइडिया चुराकर कहानी लिखी है।”

“फिर फिर क्या हुआ?”

“फिर क्या!! उसने ऐसा कुछ नहीं किया था ।असल में उसने मुझे बताया कि वह बचपन से कहानियां पढ़ती आ रही थी। उसे जैसी कहानियां पढ़ना पसंद था, वैसे ही कहानी उसने बड़े होने के बाद लिखना शुरू किया।
 
       जानती हो नंदिनी  हमारे अवचेतन मन में हमारे बचपन की कई बातें जैसी की तैसी छप जाती हैं। शायद उसके मन के किसी कोने में उसकी बचपन की पढ़ी हुई कहानियां छपी रही होंगी… और इसीलिए जब उसने बड़े होने के बाद लिखना शुरू किया तो, उसके अवचेतन मन से वही किरदार वही घटनाएं और वही कहानियां गोलमोल हो कर उसकी कहानी के रूप में निकल कर बाहर आने लगीं। और देखा जाए तो इस सब के बारे में उसे खुद भी नहीं पता था। उसे लिखते समय यही लग रहा था कि यह सब उसके किरदार है… जबकि वह उसके बचपन के पढ़े हुए किरदार थे।  जिनसे वह बुरी तरह से प्रभावित थी। तो बताओ इसमें उसकी कहां से गलती हुई ?
     एक इंसान खास कर लेखक के लिए अपने अवचेतन मन और सचेतन मन के बीच के अंतर को समझ पाना बेहद मुश्किल होता है।
    वो आखिर कैसे समझे कि क्या सही है क्या नहीं?
एक लेखक हमेशा ढेर सारी जिंदगियां जीता हैं। उसकी कहानी के हर एक किरदार को वो बड़ी शिद्दत से महसूस कर के लिख पाता है क्योंकि वो अपने अवचेतन मन में उन्हीं किरदारों के साथ होता है उन्हें जीते हुए। कभी वो अपनी कहानी का नायक होता है तो कभी खलनायक। उसके लिए ये भेद कर पाना बहुत मुश्किल होता है कि उसके बनाये किरदार वाकई उसके बनाये हैं उसके अवचेतन मन में सुप्त पड़े किसी और के रचे किरदार!!
              अब क्योंकि उसके अवचेतन मन से तो निकल कर ही कहानी के किरदार आ रहे थे, इसलिए तो उसे लगा कि उसके अपने दिमाग के बनाए किरदार है।  खैर यह केस बहुत बिगड़ जाता अगर ऋषिकेश राय सागर उसकी मदद नहीं करते।”

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“पर तुमने तो कहा कि उस वक्त कामिनी की शादी नही हुई थी।”

” हाँ उस वक्त कामिनी की शादी नही हुई थी। पर ऋषिकेश जी से उसकी दोस्ती हो चुकी थी। इस चोरी के इल्जाम में फंसने के बाद वो गहरे अवसाद में चली जाती, अगर ऋषिकेश जी उसकी मदद न करते। इसी के बाद तो उन दोनों ने शादी कर ली।”

“सुरेखा एक बात पूछ सकती हूं? “

” हॉं पूछो ना!

“क्या सिर्फ इसी एहसान के बदले कामिनी ने ऋषिकेश से शादी की या वो सच में उससे प्यार करने लगी थी?”

   सुरेखा कुछ अजीब नज़र से नंदिनी को देखने के बाद खिड़की से बाहर देखने लगी…

“एक प्यार ही तो होता है, जो इंसान मन से किया करता है।  वरना शादी तो अधिकतर लोगों की मजबूरी में ही हुआ करती है!”

  नंदिनी की समझ से बाहर थी सुरेखा की ये अजीबोग़रीब फिलॉसफी वाली बात… दोनों आमने सामने बैठी चाय सुड़क रही थीं कि दरवाज़े पर बेल बजी और अपना कप रख सुरेखा दरवाज़ा खोलने चली गयी…
   दरवाज़े से कोई लड़की अंदर दाखिल हुई और सुरेखा के गले से लग गयी…
   वो जैसे ही अंदर आयीं उसे देख नंदिनी अपनी जगह से उछल पड़ी…

“अरे शीना तू यहाँ !”

  शीना भी भाग कर नंदिनी के गले से लटक गई…

“नंदू तू यहाँ क्या कर रही है यार?”

“मैं तो यहीं रहती हूं सामने वाले फ्लैट में। पर तू तो सिंगापुर गयी थी न एडवांस कुकिंग बेकिंग कोर्स करने उसका क्या हुआ? “

“सही चल रहा है यार! बस अभी छुट्टियों पर घर आई थी तो सूरी से मिलने चली आयी..

“सूरी…?  ये नाम लेकर नंदिनी सुरेखा की तरफ देखने लगी कि सुरेखा भी चहक उठी। इतने दिनो में पहली बार नंदिनी ने सुरेखा को इतना खुल कर मुस्कुरातें देखा था…

“हम दोनों कजन हैं लेकिन सगी बहनों से बढ़कर। हर साल गर्मी की छुट्टियों में जब हमारा मिलना होता था सारी दुनिया भूल कर हम बातों में लगे रहते थे… शीना मेरी मासी की बेटी है। “

“ओह्ह ! गुड …”नंदिनी भी मुस्कुरा उठी।

” तेरे लिए चाय लेकर आती हूँ तब तक तू भी फ्रेश हो ले..!”

  सुरेखा शीना का माथा चूम कर रसोई में चली गयी और नंदिनी शीना की तरफ घूम गयी…

“यार इतने दिनों में पहली बार सुरेखा के चेहरे पर मुस्कान देखी है मैंने। थैंक्स शीना!”

” इसके जीवन में हादसे भी तो बहुत हुए हैं..!”

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“हाँ सिया के गायब हो जाने के बाद से ही ऐसी गुमसुम सी हो गयी , है ना!”

“सिया के गायब होने के पहले भी एक बहुत बड़ा हादसा हो चुका है बेचारी के साथ…!”

“ओह्ह ! क्या हुआ था…?”

“सुरेखा जब कॉलेज में पढ़ रही थी तब….

क्रमशः

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aparna……





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Kavita
Kavita
2 years ago

वाकई चाय से बदतमीजी नही करनी चाहिए कभी, जाने कब बदला लेना शुरू कर दे 😂