गली बनारस की -13

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-13

      सुबह सुबह अपने छोटे से बगीचे में खड़ी धानी पौधों को पानी दे रही थी…उसका दुपट्टा लहरा कर नीचे जमीन पर भीग रहा था…
वो अपने फोन पर जया से बातेँ करती इतनी मगन थी कि उसे अपने दुपट्टे का ध्यान ही नहीं था …
कि तभी एक बिल्ली का छोटा बच्चा कहीं से उस बगीचे में घुस आया , वो धीमे से आगे बढ़ रहा था कि सीढ़ी पर से उतरते बिक्रम ने झट उस बच्चे को उठा लिया ..बिक्रम अगर उसे नहीं उठाता तो उस पर पैर पडने से धानी गिर सकती थी..
लेकिन इस सब झपटा झपटी में धानी बुरी तरह से चौंक गई…
    उसका झाड़ियों मे उलझ पड़ा दुपट्टा उसने सम्भाला  और पीछे मुड़ कर बिक्रम को घूरने लगी…
  उसने ये देखा नहीं था और इसलिए उसे समझ में नहीं आया कि बिक्रम ने क्यों उस बिल्ली को उठाया …
वो आंखें फाड़े बिक्रम को देखने लगी…

” ये क्या शरारत है , हमें ऐसे डराया क्यों?”

” मैंने कहाँ?  बल्कि आपने इस मासूम बच्चे को डरा दिया ।”

” अच्छा ! तो इसलिए आपने इसे गोद में उठा लिया ..!

” बेशक ! इसकी जान जो बचानी थी ..अब इसे बचाने के लिए आपको गोद में उठा लूँ , ये अच्छा नहीं लगेगा ना …

बिक्रम की बात सुन धानी शरमा गई , उसके गुलाबी पड़े गालों को देख अनदेखा करते हुए बिक्रम ने उस बिल्ली को दीवार के ऊपर एक तरफ रख दिया …

” यहां सम्भल कर बैठो बिट्टो रानी,  कहीं कोई बुलडोजर तुम पर ना चढ़ जाए..!”

” हमें बुलडोजर कह रहें हैं आप ?”

” आपको बिट्टो रानी तो नहीं कह सकता ना ..!”

तुनक कर धानी पानी का पाईप वहीं पटक कर अंदर चली गई…
और मुस्करा कर अपनी बाइक निकाल कर बिक्रम सभरवाल के घर निकल गया…

सभरवाल के घर पर मिलने जुलने वालों का तांता लगा था …पुलिस वाले भी दो लोग वहीं एक और खड़े थे ..
बिक्रम भी हाथ जोड़े अंदर की तरह बढ़ गया …
  अंदर बहुत भीड़ भाड़ थीं…वो भी अंदर बढ़ गया..उसके साथ ही उसका ठेकेदार चरण भी मौजूद था …

   सभरवाल के बेटे से मिल कर उसे सांत्वना देने के बाद बिक्रम बाहर गार्डन में चला आया …

” लगता है इसने मुझे पहचाना नहीं ?”

बिक्रम की बात पर चरण की आंखों में सवाल उभर आया ..वो समझ नहीं पाया कि बिक्रम किसकी बात कर रहा है …

” सर कौन?”

” सभरवाल का बेटा?”

” आप इससे कब मिले?”

बिक्रम को ध्यान आया कि उसकी सभरवाल से मुलाकात के बारे में चरण भी फ़िलहाल कुछ नहीं जानता …
   सभरवाल से जब उस दिन वो मिलने आया था तब उसका ये बेटा भी वहीं मौजूद था और बिक्रम के पहुंचने से पहले ही यूँ लगा जैसे बाप बेटे के बीच किसी बात पर गर्मागर्म बहस हुई थी…
   उसने चरण से ये बात धीमे से बता दी…

” अरे सर अब हम का बताएं …ये जितना बड़ा बड़ा घर रहता है इनका लोगों का दिल उतना ही छोटा होता है …सुनने में आया है बाप बेटा का जमता ही नहीं था …
लड़के को पढ़ने के लिए सभरवाल ने बिदेश भेजा था वहीं से ये नालायक गोरी को ब्याह लाया तब से सभरवाल साहब चिढ़े बैठे थे …..
  अब किरीस्तान छोरी, का हमरे रीति रिवाज जानेगी..बस बात बात पर सास बहु की तू तू मैं मैं होती थी…फिर छूटके का ब्याह अपनी पसंद से अपना जात बिरादरी में करवाये …खूब बड़े घर की बेटी को ब्याह कर लाए ..खूब रुपया पाए ..सब बढ़िया था ..

   फिर अंग्रेजन और छूटकी मे बात बात पर कलह क्लेश मच गया सहाब। फिर एक दिन किसी बात पर ऊ गोरी जिद्दीया गई कि हमको अपना बाप घर वापस जाना है ..अब बताइए हमारे तरफ की औरत होती तो ऐसे मैके जाने की जिद करती ..? कभू ना करती साहब , उल्टा बहस हो तो पति को घर से चप्पल मार के निकल दे पर मजाल जो ब्याह के बाद अपने पति का घर छोड़ जाए …”

” बहुत ही सताएं हुए हैं चरण बाबु ..?”

बातें करते बिक्रम और चरण बाहर गार्डन में एक और खड़े थे कि , चौधरी की गाड़ी आ गई…और उसमें से माणिक चौधरी उतर कर आगे बढ़ गए….उनके थोड़ा बाद में गाड़ी से पन्ना भी उतरी ..बिल्कुल फिल्मी तर्ज़ पर उसने सफेद कुर्ता पजामा पहन रखा था , आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ा था …वो भी लोगों की भीड़ में से होकर आगे बढ़ गई…

बिक्रम ने इधर उधर देखा और धीरे से पुलिस वाले की तरह बढ़ गया …

” सर आपसे कुछ बात करना था ..?”

पुलिस वाले ने बिक्रम को घूर कर देखा …
उसके मुहँ में गुटखा था , और इस बेकार से लड़के के लिए वो अपना सवा लाख का गुटखा नहीं थूक सकता था ..उसने गर्दन को ऊपर कर ही पूछ लिया कि बिक्रम क्या कहना चाहता है …

” सर मेरे पास सबूत है ..”

पुलिस वाले की भौंह चढ़ गई ….उसने बिक्रम के कन्धे पर हाथ रख थपथपाया और एक तरफ को लगी एक खूबसूरत सी मनी प्लांट की बेल पर थूक कर मुहँ पोछते हुए बिक्रम की तरफ देखने लगा ..

” काहे का सबूत रखे हो बे..?”

” बहुत सारे घोटालों का , गंगा योजना का , और इस सभरवाल की मौत का …?”

” अबे पगला गए हो का बे? का बक रहे हो ?”

” सर इनकी हत्या के पीछे किसका हाथ है? मैं बता सकता हूं…

इंस्पेक्टर ने इधर उधर देखा और कंधे से पकड़ कर  बिक्रम को एक तरह ले गया …

” एक घंटा बाद थाने में मिलों..”

  इंस्पेक्टर उसे छोड़ कर निकल गया…कुछ देर बाद बिक्रम भी चरण को साथ लिए थाने पहुंच गया …

उसे देखते ही इंस्पेक्टर ने उसे आगे बुला लिया ..

” क्या सबूत है …?”

बिक्रम ने अपने फोन की रिकॉर्डिंग पुलिस वाले के सामने रख दी …जैसे जैसे पूरी बात वो सुनता गया , उसके चेहरे पर मुस्कान और चौड़ी होती गई ….

  ” सही जगह आए हो बेटा,  कहीं और जाते तो फंस जाते ..चलो तुम्हें बड़े साहब के पास ले चलते हैं…

बिक्रम को साथ लिए इंस्पेक्टर बाहर निकल गया …उसके पीछे ही चरण भी आगे बढ़ गया ….

इंस्पेक्टर की जीप में बैठ वो सभी लोग निकल गए ….
कुछ देर में गाड़ी चौधरीयों के गेट पर खड़ी थी…..
चरण ने अपना माथा पीट लिया …बिक्रम भी पुलिस वाले को देखने लगा …

” ये तो धोका है इंस्पेक्टर साहब ?”

” तो आप जैसे बकलोल को और का(क्या )दें? आप शहर के राजा के खिलाफ उन्हीं के सिपाही को सबूत दीजियेगा और सोचियेगा  हम उनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे …अबे जान हमें भी प्यारी है ..”

” तो पुलिस में काहे भर्ती हुए,  आप जैसे लोगों के कारण लोगों का कानून पर से यकीन उठ गया है ..

” उठ जाने दीजिए।  उनका यकीन का हमको वैसे भी अचार नहीं बनाना है ..आप आइए अंदर!”

बिक्रम के पास अंदर जाने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था …

चौधरी सभरवाल के यहाँ से वापस आकर नहा धो कर बैठा कुछ मिलने आए लोगों से उनकी समस्याओंबिक्रम पूछ रहा था कि इंस्पेक्टर चला आया ..

” अब का भया इंस्पेक्टर? आज सुबह सुबह ही चले आए ..?”

” कुछ जरूरी काम था चौधरी साहब!”

” ऐसा कौन काम आन पड़ा..

इंस्पेक्टर ने एक नजर वहां बैठे दो-चार लोगों पर डाली और उसका इशारा समझ कर चौधरी ने उन सब लोगों को वहां से भगा दिया इसके बाद इंस्पेक्टर ने बिक्रम के पास की रिकॉर्डिंग के बारे में चौधरी को सब कुछ बता दिया। बिक्रम अब भी निर्भीक नजरों से चौधरी को घूर रहा था, लेकिन उसके साथ खड़े चरण की हालत खराब थी।  डर के मारे उसकी टांगें कांप रही थी। उसने वही रखी कुर्सी को सहारे के लिए पकड़ रखा था… उसी समय अंदर से ही हीरक वहां निकल आया। उसने उन तीनों को यूं खड़े देखकर अपने पिता की तरफ देखा और उन लोगों को बैठने का इशारा कर दिया…

“अरे आप लोग बैठिए ना! खड़े काहे हैं..?”

  “अबे चुप बैल बुद्धि! यह सब सीधे सभरवाल  के यहां से आ रहे हैं। नहाए धोए भी नहीं है, कुर्सी में बैठ जाएंगे छूत नहीं लग जाएगा?  खड़े रहने दो!”

चौधरी का पारा चढ़ने लगा था उसने इंस्पेक्टर को घूर कर देखा..

  “वहां से निकलकर घर जाकर नहा धो कर फिर आना चाहिए था ना! अब हम आप लोगों को बैठा भी नहीं है सकते.., ई सब बिग्यान है भई..!”

  “जी!! कोई बात नहीं चौधरी साहब हम तो सोचे जितना जल्दी  हम आपको ये खबर दे दे, उतना बढ़िया रहेगा..!”

“अरे तुम हमको जोकर समझे हो क्या बे? आज देते खबर चाहे कल देते , कौन सा कोई मिसाइल फट जानी थी इससे.. अरे पूरा शहर  हमारा है यहां के रहने वाले लोग उनके किए काम उनका रुपया पैसा सब कुछ तो हमारा ही है।  अभी जो सबूत भी इकट्ठा किया है वह भी हमारा ही है.. तो का फर्क पड़ जाता है।”

“जी गलती हो गई हो तो माफ कीजिएगा..!”

“दिखाओ जरा का है उस सबूत में?”

इंस्पेक्टर ने अपनी जेब से निकालकर फोन चौधरी की तरफ बढ़ा दिया चौधरी ने फोन हाथ में ही लिया था कि बिक्रम गरज उठा…

“फोन को तोड़ने की बेवकूफी मत कीजिएगा चौधरी साहब…क्योंकि इस फोन का डाटा मेरे लैपटॉप में भी सुरक्षित है… अगर आप यह सोच रहे हैं, कि अपने आदमियों को भेजकर मेरे लैपटॉप को भी तुड़वा देंगे तो यह ध्यान रखें कि यह वीडियो मैंने अपने ब्रॉडकास्ट में सेट करके रखा है, और जिसका आई डी, पासवर्ड मेरे दोस्त के पास भी है।  आप मेरा लैपटॉप और फोन तो तोड़ सकते हैं , लेकिन अगर मैंने अपने उस दोस्त  से कहा तो वह मेरे ही अकाउंट से इस रिकॉर्डिंग को वायरल कर सकता है…
  फिर मैं जानता हूं आपको मेरी यह टेक्निकल बातें समझ में नहीं आ रही होंगी, लेकिन अब यह समझ जाइए कि मेरे इस फोन को तोड़ देने से आपका कोई फायदा नहीं होने वाला है…”

  चौधरी ने घूर कर बिक्रम को देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया। वह आगे बढ़ने वाला था कि पन्ना भागती हुई वहां चली आई…..

“बाबूजी आप बैठिए हम देखते हैं कि क्या बात है..?”

पन्ना ने घूर कर इंस्पेक्टर को देखने के बाद बिक्रम की तरफ देखा….

” क्या आप दो मिनट के लिए हमारे ऑफिस में आ सकते हैं..?”

बिक्रम ने पन्ना को देखा और उसके पीछे पीछे उसके ऑफिस की तरफ बढ़ गया…

  पन्ना ने उसके लिए कुर्सी खींची और फिर टेबल की दूसरी तरफ जाकर अपनी रिवाल्विंग चेयर पर बैठ गई…

” हम आपसे कल ही सब कुछ कह देना चाहते थे, पर हमें लगा बात इतनी आगे नहीं बढ़ेगी…
     लेकिन चलिए आज हम आपसे सब कुछ कह देते हैं। हो सकता है आपको हमारी बातों पर विश्वास ना भी हो लेकिन उसका हमारे पास कोई उपाय नहीं है…
  .. चौधरियों का इस शहर में बहुत नाम है। बहुत रुतबा है। आप जानते हैं बहुत बड़ा नाम होने का कर्ज भी हमें चुकाना पड़ता है। लोग हमारा नाम लेकर कुछ भी कर जाते हैं, और इल्ज़ाम लगता है चौधरियों के सर पर…
    आपने भी अब तक जगह-जगह यही सुना होगा कि चौधरी ऐसे हैं ,चौधरी वैसे हैं, शहर का हर बुरा काम हमारे सरनेम के पीछे दुबका हुआ है। पर सच्चाई इससे बहुत अलग है…
  हम यह नहीं कह रहे कि हमारे बाबूजी दूध के धुले हैं। लेकिन जितना सारा उनके नाम पर आपने सुना है वह सब कुछ सच नहीं है, और बात करे सभरवाल की तो यह तो सबसे बड़ा फर्जी आदमी था..
  आप जानते हैं इस शहर की आधे से अधिक जमीन हमारे बाप दादा की है। लोगों को रहने के लिए व्यापार करने के लिए मिट्टी के मूल्यों पर जमीन दी है हमारे बाप दादा ने।
     लेकिन इस बात को कोई याद नहीं रखता है। जब हमारे बाबु जी ने काम शुरू किया … सभरवाल शुरू से ही उनके साथ था हर मोड़ पर हर कदम पर दोनों ने एक साथ काम किया…
   लेकिन अभी पिछले काफी समय से सभरवाल हमारे बाबूजी को एक तरह से धोखा ही दे रहा था… जिस प्रोजेक्ट की आप बात कर रहे हैं उसके लिए भी हमने आपसे पहले ही बताया था कि वह काम पूरी तरह से सभरवाल ने ही किया था पैसों का सारा गबन उसी ने किया है…
   हम उसे सभरवाल अंकल कहा करते थे , और उसने हमें तक अपने रास्ते से हटवाने की कोशिश की… जानते हैं क्यों? क्योंकि हम बाबु जी की तरह हर किसी पर आँख मूँद कर भरोसा नहीं कर लेते…
  सभरवाल के दोनों बेटों के बीच प्रॉपर्टी को लेकर झगड़ा चल रहा था और बस इसलिए सभरवाल दोनों हाथ से पैसा बटोरने में लगा हुआ था
….
उसे अपने ही बेटों पर विश्वास जो नहीं था ..उसे उन दोनों को बड़े बड़े महल देने थे और इस सबके लिए उसने हमारे बाबु जी को धोखा दे देकर बहुत सारा रुपया फर्जी तरीकों से जोड़ लिया। इस बारे में जब हमने जांच पड़ताल.की तब हमारे सामने मीठा मीठा बोलने वाले इसी आदमी ने हमारे नाम की सुपारी तक दे डाली थी….

कल वो आदमी हमें मरने आ रहा था जिसने सभरवाल को मार गिराया ….
   असल में उस आदमी की एक बार कभी हमने मदद की थी ..इसलिए जब परसों सभरवाल ने उसे हमारी फोटो दिखा कर हमें मारने का हुक्म दिया तो वो एक पल को चौंक गया …
   उसने तुरंत हमें फोन कर सब कुछ बता दिया ..हमने उससे कहा कि सभरवाल का प्लान मत खराब करो , उसे उठा कर हमारे पास ले आओ..हम बात करना चाहते हैं…
  कल उस आदमी ने बहुत कोशिश की लेकिन सभरवाल हमसे बात करने आने को तैयार ही नहीं था। जबकि हम उसे एक मौका और देना चाहते थे, बस यहीं सोच कर की वो हमारे बाबुजी का करीबी है…
  और जब वो अपनी जिद पर अड़ा रहा तब हमें मजबूरन उसे गोली  मरवाना पड़ा…
अब बताए अपनी जान बचाने के लिए अगर हम किसी को मरवा दे , तो हम क्रिमिनल हो गए और वो जो हमे मारने को तैयार बैठा था उसका क्या ….?

  पैसा पद और पावर की चाह खून की होली खेले बिना कैसे पूरी होगी? बताए भला ..?”

” आप खुद को बचाने के लिए कानून की मदद भी तो ले सकती थी…

पन्ना हंसने लगी …और पीछे खड़े इंस्पेक्टर की तरफ देखने लगी….

” जैसे आपने मदद ली …? बिक्रम जी समझिए हमें भी और हमारे बाबुजी को भी…हम इत्ते बुरे भी नहीं हैं… अगर आप हमें जानना चाहते हैं तो….
   आइए आज हम आपको अपनी दुनिया में लेकर चलते हैं….

क्रमशः

aparna
   
  

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