अपराजिता -55

अपराजिता -55

निनाद से बात करने के बाद भावना ने वही तालाब के पानी से अपना मुंह धोया और अपने फोन को संभाले अपने घर की तरफ बढ़ गई।
रह-रह कर उसे अपने बाबूजी की याद आ जाती थी, और आंखों में वापस आंसू झलक आते थे। वह घर पहुंची उस वक्त उसकी मां सर पर से आंचल लिए तुलसी के सामने दीपक जला रही थी।

उस दीपक की रोशनी में, उसकी मां का चेहरा खिले चांद सा दमक रहा था। माथे पर पूरे एक रुपये के सिक्के के बराबर सिंदूरी टीका लगा था.. ।

माथे के बीचो-बीच निकली मांग, लाल सिंदूर से पटी हुई थी। हाथों में लाल हरी चूड़ियां खनक रही थी। गले का मंगलसूत्र दपदपा रहा था। उसने जैसे ही अपनी मां को देखा, श्रद्धा से उसकी आंखें झुक गई ।
वो धीमे कदमों से घर के अंदर की तरफ बढ़ने लगी कि उसकी मां ने उसे भी तुलसी को प्रणाम करने के लिए बुला लिया।

अपनी मां का कहा वह टाल नहीं पाई, और वापस आकर तुलसी को प्रणाम करने के बाद अंदर चली गई। अब भी उसके दिल में धक-धक बनी हुई थी। कुछ देर में ही उसकी मां अपनी पायल छनकाती हुई रसोई में चली गई..

भावना अपने कमरे में बैठी सोच में पड़ गई। आज तक कभी उसका ध्यान इन बातों पर गया क्यों नहीं था? उसका यह छोटा सा घर, उसकी मां की आभा से दमक था।
   उनकी पायलों की रुनझुन, चूड़ियों की खनखन से पूरा घर गुलजार रहा करता था। उसकी मां की माथे की बड़ी सी बिंदी हमेशा उसे भी तो यही आश्वासन दिया करती थी कि उसके पिता जहां भी हैं, सुरक्षित हैं।

लेकिन आज उसका वह भ्रम टूट गया था। वह अपनी सोच में गुम थी कि उसकी मां उसके लिए चाय और नाश्ता लिए उसके कमरे में चली आई..

” आज बड़ी अबेर कर दी लाडो..
अंधियारा हो जाता है तो दिल घबराने लगता है। जल्दी आ जाया कर.. ! वैसे हमारा गाँव सुरक्षित है, लेकिन फिर भी अकेली लड़की का बाहर घूमना लोगों को फूटी आंख नहीं भाता..!”

“हाँ अम्मा.. कुसुम के घऱ पर देर हो गयी.. !”

“कैसी हैं कुसुम की अम्मा.. सुना उनकी तबीयत खराब हो गई थी..!”

यह माँ क्या पूछ रही थी? इस बारे में तो भावना को भी नहीं पता था..

वह आश्चर्य से अपनी मां की तरफ देखने लगी..

“क्या हो गया था मां, कुसुम की मां को ?आज उन पर ध्यान ही नहीं दिया हमने!”

” अरे आज सुबह ही पड़ोस वाली गुप्ताइन बता रही थी, कुसुम की अम्मा दो दिन पहले बहुत बीमार पड़ गई थी..!”

“पता नहीं.. हो सकता हैं !”

“हम्म भली चंगी हों जाये ठकुराइन.. कम से कम अपनी कुसुम का ब्याह तो कर दे। उसके बाद जो होना है होता रहे। वैसे भी हम औरतों की यही प्रार्थना तो रहती है भगवान से, के हमारी सारी जिम्मेदारी निपट जाए उसके बाद भगवान हमें पहले उठा ले ।
अपने नाथ के सामने हम आंखें मूंद कर चली जाएं, इस में हमारी किस्मत है..!”

” कैसी बातें करती हो अम्मा? यह क्या हमारे हाथ में है कि हम कब ऊपर जाएंगे और कब नीचे आएंगे..!”

” हमारे हाथ में तो नहीं है बिटिया, लेकिन हमारे मन की बात तो यही है ना। अब देखो आज भले इतने साल हो गए तुम्हारे बाबूजी को गांव लौटे लेकिन उनकी एक चिट्ठी आ जाती है, उनके पैसे आ जाते हैं। तो गांव भर में किसी आदमी की मजाल नहीं है जो हम मां बेटी की तरफ आंख उठा कर भी देखें। उनका नाम ही काफी है हमारे सहारे के लिए..।.
ये दुनिया बहुत ख़राब है बिटिया, खास कर अकेली औरत के लिए..।
अकेली औरत किसी भी उम्र की हो उसे चैन से जीने नहीं देते हैं लोग, समझ रही हो।
नोच खाने के लिए भेड़िया बनकर बैठे हैं। इसलिए एक औरत अपने घर द्वार के अंदर अपने नाथ के नाम के साथ जितनी सुरक्षित है ना, उतनी बाहर नहीं..।
हम जानते हैं, तुम्हें हमारी बातें पुराने जमाने की लगेंगी, लेकिन बेटा सच तो यही है और सच को झुठलाया भी नहीं जा सकता…!”

भावना से इसके आगे कुछ कहा नहीं गया..

उसकी माँ अपनी चाय ख़त्म कर रसोई में रात के खाने की तैयारी करने चली गयी..।
और भावना बैठी बैठी निनाद की बात पर विचार करने लगी कि क्या उसे वाकई इस वक्त अपनी माँ से कुछ भी नहीं बताना चाहिए..
.कुछ सोच कर उसने निनाद को मैसेज कर दिया..

“क्या हमारी दुबई में नौकरी लग सकती हैं ? हम ये गांव हमेशा के लिए छोड़ देना चाहते हैं !”

मेसेज भेज कर वो कुछ देर के लिए मोबाइल पकडे बैठी रही.. लेकिन निनाद शायद अपने काम में व्यस्त था.. उसने कोई जवाब नहीं दिया..

थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद वो मोबाइल एक तरफ रख कर रसोई में चली गयी..
लेकिन उसका वहाँ भी मन नहीं लग रहा था..
वो बाहर वाले कमरे में चली आयी… वहां पड़ी किसी किताब के पन्ने निरर्थक पलटते हुए भी उसके दिमाग में निनाद ही चल रहा था…
पता नहीं ये अनजान लड़का कैसे उसे इतना बेचैन किये दे रहा था..
उसका मन कर रहा था, वापस निनाद को फ़ोन लगा कर उससे बात कर ले.. लेकिन क्या ये संभव था ? वो अपने काम पर हैं, ऐसे में वो हर घडी उससे बात तो नहीं कर सकता ना ?
और वैसे भी वो सोचेगा क्या ? कैसी पागल लड़की हैं.. छी… वो ऐसा कुछ सोच बैठा तो.. ।

उसी समय भावना के दिमाग में एक और बात चलने लगी..
आज निनाद ने उसके पिता की सच्चाई उसे बता दी.. आज तक नहीं मालूम था तब तक वो हमेशा उन्हें पैसे भेजा करता था, वो अलग बात थी, लेकिन अब सब जानने के बाद वो उससे पैसे कैसे ले सकती थी ? किस हक़ से ले सकती थी ?
अब कायदे से उसे निनाद से बात कर के मना कर देना चाहिए कि वो उससे पैसे नहीं ले सकती..
लेकिन अगर पैसे नहीं लेगी तो घऱ कैसे चलेगा ? उसके पास पैसे कमाने का कोई साधन भी तो नहीं..।
कुछ समय पहले कुछ दो चार बच्चे उसके पास ट्यूशन के लिए आए थे, लेकिन वो दो चार बच्चे सौ रूपये दिया करते थे.. गांव देहात में इससे ज्यादा मिलने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती..

हे भगवान !! तुम ही कुछ राह सुझाओ..
सोचते सोचते भावना के सर में दर्द होने लगा था.. वो उठ कर अंदर गयी..
उसने फ़ोन उठा कर देखा.. अब तक निनाद ने उसका मेसेज नहीं पढ़ा था..
वो एक बार फिर बेचैनी में घिर उठी..
उसके मन में कोलाहल मचा हुआ था, और वो शांत बैठी थी..

उसकी माँ उन दोनों का खाना परोस कर उसी के कमरे में ले आयी….
भावना ने थाली हाथ में ली और थाली में परोसे भोजन को देख उसकी आंखे छलक उठी..
कितना मूलयवान था ये भोजन ! इस भोजन को कमाने उसके पिता बाहर गांव गए थे, और अपना जीवन गँवा  बैठे..
आज उसके लिए इस भोजन का इंतज़ाम करने वाला वो अनजान सा फरिश्ता उसके जीवन की धुरी बन गया था..

“क्या हुआ बिटिया.. का सोच रही हो ? खाते समय दिमाग पर इतना ज़ोर नहीं डालते !”

“हम्म.. अम्मा.. सुनो.. !”, भावना को लगा सब कुछ बोल दे अपनी माँ से…

“हाँ बोलो ना, क्या बोलना चाहती हो ?”

अपनी अम्मा का सुंदर सा मुखड़ा देख वो पल भर के लिए देखती रह गयी..

“तुम आज बहुत प्यारी लग रही हो.. और सुनो, खाना भी बहुत स्वाद बना हैं !”

“पगली… खाना तो रोज़ यही बनाती हैं हम ! आज कोई अलग थोड़े ना बना दिया हैं.. चलो खा लो !”

भावना ने एक निवाला लिया, उसी समय उसके मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया, उसने लपक के मोबाइल उठा लिया..
मेसेज निनाद का था..

“क्या आधे घंटे बाद फ्री रहोगी ? बात कर सकते हैं ?”

भावना को हर तरफ सितार बजते सुनाई देने लगे..
वो जैसे इसी मेसेज का इंतज़र कर रही थी..
उसने तुरंत “हम्म” लिख कर भेज दिया..
और मुस्कुरा कर फ़ोन नीचे रख खाने लगी..

उसकी माँ बड़े ध्यान से उसे ही देख रही थी..

******

अखंड अपने कमरे में बैठा था कि नीचे से उसके नाम की पुकार मचने लगी..
कुछ सोच कर वो उठ कर बालकनी में चला आया..
नीचे आंगन में उसके पिता और उसके चाचा बैठे किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे..
उसके पिता के हाथ में कोई परचा था..
अखंड को देख उन्होंने उसे नीचे बुला लिया..
वो नीचे चला आया..
उन्होंने उसके हाथ में परचा थमा दिया..

वो बड़े ध्यान से उस पर्चे को पढ़ने लगा..
ग्राम सरपंच के पद का फॉर्म था जिसका चुनाव होना था..
पूरा फॉर्म पढ़ने के बाद उसने अपने पिता की तरफ देखा..

“बाबूजी ये.. !”

“हाँ अखंड.. हम चाहते हैं तुम सरपंच के पद के लिए खड़े हो !”

“लेकिन बाबूजी.. हम नहीं खड़े हो सकते.. आप जानते हैं हम जेल जा चुके हैं.. उसके बाद.. !”

“लेकिन तुम पर कुछ भी साबित नहीं किया जा सका था, ये क्यों भूल जाते हो तुम ! तुम निर्दोष साबित किये गए थे अखंड !”

“बाबूजी लेकिन…

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. हम कुछ सुनना नहीं चाहते.. तुम ये फार्म भर रहे हो और सरपंच के पद के लिए लड़ोगे भी.. हमे पूरा भरोसा हैं कि तुम ये चुनाव जीत कर रहोगे..
हमने तुम्हारे लिए इससे बहुत बड़ा सपना देख रखा है अखंड !
हमारा अखंड सिंह परिहार एक दिन विधायक बनेगा… और हम जानते हैं, हमारा ये सपना तुम पूरा करोगे !”..

अखंड सर झुकाये बैठा रहा.. उसने उस पर्चे को उलट पलट कर देखा और साथ लिए अपने कमरे में चला गया..
उसके साथ जो हुआ था, वो कभी भूलने लायक नहीं था, लेकिन वो उन बुरी यादों को भूल जाना चाहता था.. पूरी तरह !!

बस अब दिल में एक ही ख्वाहिश बची थी, किसी तरह जिंदगी के किसी मोड पर कभी रेशम से मिलना हो और रेशम उसे निर्दोष मान ले..

लेकिन ये असंभव था..
अब इस जनम उसके माथे से ये कलंक मिटना असंभव था..

लेकिन अपनी सोच में ग़ुम अखंड ये भूल गया था कि हम कितना भी कुछ भी सोचें, ऊपर वाला हमेशा हमारी सोच से आगे का कुछ सोच कर रखते हैं, और उसकी कलम की स्याही वो लिखती हैं जो हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ होता हैं….

****

सचिवालय में चयनित डॉक्टर्स की सूची का मिलान करते हुए उन्हें पोस्टिंग की जग़ह आबंटित की जा रही थी…

डॉक्टर्स के नाम के साथ उनके लिए चयनित स्थान कम्प्यूटर पर चढ़ाया जा रहा था..
रेशम के नाम के आगे, अभी अभी का खाली हुआ दूर्वागंज लिख दिया गया..
दूर्वागंज में पदस्थ चिकित्सक ने कुछ दिन पहले ही अपना स्थानांतरण करवाया था और जिला चिकित्सालय में पोस्टिंग ले ली थी, उसके बाद से दूर्वागंज का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खाली पड़ा था..
आसपास के सारे गांव के लिए यही एक केंद्र था..

वहीँ उस पोस्ट पर रेशम का नाम लिख दिया गया..

क्रमशः

aparna..

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Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
1 year ago

Super se bhi upar wali story ❤️