जीवनसाथी- 2/12

   पिया अपनी जगह पर खड़ी हुई और ठीक सामने खड़े समर पर उसकी नज़र पड़ गयी.. ये सब इतना जल्दबाजी में हुआ कि पिया का संतुलन बिगड़ गया, वो गिरने को थी कि समर ने उसे थाम लिया…
  लेकिन उसे उसकी जगह पर खड़ा करने के बाद उसकी तरफ देखें बिना ही वो अपनी माँ और बाकियों कि तरफ बढ़ गया…
   उन लोगों को वहाँ बैठा कर वो बाहर निकल गया… दरवाजे के बाहर किनारे खड़ी पिया कि नज़र समर पर ही थी…
  तो क्या इसका मतलब वो बस इन लोगों को यहाँ छोड़ने आया था… ?
  वो वहाँ से बाहर निकल गया,  एक बार उसकी तरफ पलट कर देखा तक नहीं…
  जिन परिस्थितियों के कारण उसने सगाई तोड़ी थी,  वो सच्चाई आज तक समर को मालूम नहीं चल पायी थी… अपनी सगाई तोड़ कर पिया समर और उसके परिवार के लिए दोषी हो गयी थी ! हालाँकि समर ने  आज तक क़भी उसकी बातों को इतनी गंभीरता से  नहीं लिया था,  बल्कि हमेशा ही मिलने पर उस पर अपना हक जताता रहता था, और इसलिए शायद वो भी इठलाती हुई उससे अपनी नाराजगी को सेंतती चली आ रही थी..
   मन के किसी कोने से उसके ये आवाज़ जरूर आती थी कि एक न एक दिन उसका समर उसे मना लेगा…
सारी दुनिया के सामने उसने जो हलके फुल्के से कारण बतायें थे सगाई तोड़ने के, वो जानती थी उनमें से सच एक भी नहीं था…! लेकिन समर आज तक सच्चाई से अनजान था.. !
      असल में पिया को ना तो क़भी राजा अजातशत्रु जी को समर के समय दिए जाने से दिक्कत थी और ना ही समर के हद से ज्यादा व्यस्त रहने से… लेकिन जिस बात पर उसे दिक्कत हुई थी वो बात वो आज तक भी समर से कहने कि हिम्मत नहीं कर पायी थी..! और उसकी नज़र में गलत साबित होती हुई सगाई कि अंगूठी उसे वापस कर निकल गयी थी…
    उसे उस वक़्त भी यक़ीन था कि समर उसे रोक लेगा,  मना लेगा, और उसका वो यक़ीन आज तक बना हुआ था….  लेकिन…..

      लेकिन आज क्या हो गया… ?

   आज तक पूरे हक़ से उस पर अधिकार जताने वाले समर ने उसकी तरफ देखा भी नहीं था…
  मुहँ फेरे वो चला जा रहा था.. आख़िर पिया से नहीं रहा गया और उसने समर को आवाज़ लगा दी…

“समर…. !”

वो चलते चलते रुक गया…. और पिया अपनी जगह पर खड़ी उसका रास्ता देखती रही.. वो मुड़ कर वहीँ खड़ा हो गया… पिया कि तरफ बढ़ कर नहीं आया तो पिया को ही उस तक जाना पड़ा…..

  “कहो… !”

कहो तो ऐसे कह रहा जैसे इसे नहीं पता कि मै क्या कहना चाहती हूँ.. मन ही मन कुलबुलाती पिया को एकदम से सूझा नहीं कि क्या कहें…

“यहाँ कैसे आये थे… ?”

“यही पूछना चाहती थी… ?”

पिया के सवाल पर जैसे समर ने चांटा सा मारा हो… वो अपलक उसे देखती रह गयी थी… इतना रुड तो वो क़भी नहीं था उसके साथ.. फिर आज अचानक क्या हो गया था.. ?

“कुछ बदले हुए से लग रहे हो.. ?”

“हाँ ! मै बदल गया हूँ… !”

इतने छोटे से जवाब देकर जैसे वो बस भरपाई कर रहा था…

“लगता है कुछ काम है,  इसलिए ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे.. !”

“काम तो मेरे पास हमेशा ही रहता है… !”

हाँ में गर्दन हिला कर पिया चुप खड़ी रह गयी… वो क्या कहती इस वक़्त उससे,  क्योंकि कहना तो वो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन ये भी जानती थी कि उसका कुछ भी कहना कितना बड़ा बवाल बना जायेगा….

वो चुपचाप पीछे मुड़ कर आगे बढ़ गयी,और समर लाचारी से उसे जाता देखता रह गया….
आख़िर क्या ऐसी बात हो गयी थी जो पिया ने उससे सगाई तोड़ दी थी… उसके सामने भी पिया ने जो कारण दिए थे वो हजम करना समर के लिए मुश्किल था और इसलिए पिछले कुछ महीनों से वो लगातार  पिया के पीछे साये सा घूम रहा था.. क़भी प्यार जता कर तो क़भी हक़ जता कर वो हर मुमकिन कोशिश में लगा था कि पिया उसे सच बता दे लेकिन पिया ने कुछ नहीं कहा था…
बल्कि अब तक उसकी भावेश से सगाई को हलके में लेने वाला समर भी अब उस सगाई से थोड़ा डर गया था, कि कहीं पिया वाकई वहाँ शादी न कर ले…..
   लेकिन पिया को मनाने का कोई तरीका भी उसे समझ में नहीं आ रहा था… और इसलिए अब वो चुप हो गया था….
वो मौका देना चाहता था कि पिया ही आगे बढ़ कर उससे अपने दिल का हाल कह दे…
  वो कुछ देर वहीँ खड़े पिया को आगे बढ़ते देखता  रहा और फिर मुड़ कर बाहर निकल गया… पिया धीमे कदमो से आगे बढ़ते हुए यही सोच रही थी कि समर उसके पास आकर उसे अपनी बाँहों में ले लेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और आगे बढ़ते समय सामने के कांच पर दिखता समर कुछ देर बाद मुड़ कर वापस चला गया…
  उसे जाते देख पिया का दिल रो उठा लेकिन वो कुछ नहीं कर सकती थी.. वो चुपचाप जाकर भावेश के सामने बैठ गयी…
   अब उसे वहाँ एक सेकंड भी बैठना भारी पड़ रहा था….  उसके दिल कि जो हालत थी उसे लग़ रहा था  कहीं एक कोना मिल जायें तो वो फूट फूट कर रो ले.. अगर वो और भावेश बस होते तो शायद वो उससे इजाजत लेकर निकल भी जाती लेकिन उसका पूरा परिवार वहाँ मौजूद था, ऐसे में किसी तरह कि बदतमीजी कर वो भावेश को परेशानी में नहीं डालना चाहती थी…
  वो चुप बैठी अपनी कॉफ़ी के कप में चम्मच हिलाती रही, बीच बीच में भावेश कि माँ के सवालों के जवाब हाँ हूँ में देती वो बस वहाँ से वापस लौटने का इंतज़ार करती रही….

*****

रेखा अपने बुटीक पर बैठी अपने कुछ नए डिज़ाइन पर कम कर रही थी कि यश के स्कुल से फ़ोन आने लगा…
   फ़ोन यश कि क्लासटीचर का ही था.. आज पेरेंट्स टीचर मीटिंग थी बस वही याद दिलाने के लिए उन्होने फ़ोन किया था… पिछली दो बार से रेखा अपने काम के चक्कर में भूल जाती थी और विराज को वैसे ही कोई लेना देना नहीं था…
   रेखा ने उनसे आने कि बात कह कर फ़ोन रखा,  उसकी नज़र घडी पर चली गयी…
बस आधा घंटा ही बचा था,  इसलिए उसने अपना काम एक तरफ रखा और अपनी असिस्टेंट को बुला कर काम समझा कर निकल गयी…
   बाहर ही उसके बॉडीगार्ड्स और ड्राइवर उसका इंतज़ार कर रहे थे….  उन्हें स्कूल जाने का बता कर वो स्कुल कि तरफ निकल गयी…..
   स्कूल में यश कि क्लास टीचर से उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट देख सुन कर रेखा संतुष्ट थी.. उसका यश बदमाश तो बहुत था लेकिन दिमाग का तेज़ था.. एक बार पढाई गयी बातें वो कंठस्थ कर लिया करता था… रेखा ख़ुशी ख़ुशी उसकी टीचर से उसकी शैतानियों के किस्से सुन रही थी… ! आज बहुत दिनों बाद वो इतना खुल कर हंसी थी… !

   अपने माता पिता कि सच्चाई जानने के बाद से उसके स्वभाव में एक ठहराव सा आ गया था… अब वो बात बात पर बिखर जाने वाली रेखा नहीं रह गयी थी…. एक संयम और ठहराव उसके चेहरे को अलग रंग से रंग गया था…
  उसकी ज़िद उसका घमंड सब कुछ एक ठंडी शालीनता में बदल गया था.. !
मायके तरफ से देखा जायें तो अब सिर्फ और सिर्फ केसर ही उसकी अपनी सगी बाकी थी बाकी तो किसी से कोई संबंध नहीं बचा था..
  आख़िर जब वो ठाकुर साहब कि गोद ली हुई संतान थी, तो उनके घर परिवार से उनकी मौत के बाद कैसा रिश्ता… ?
लेकिन आदित्य से उसका रिश्ता अब भी बाकी था… आदित्य ने अपने बचपन के रिश्ते को आज भी ज़िंदा रखा था और वो आज भी रेखा को अपनी छोटी बहन मानता रहा था..
      केसर भी तो मर चुकी थी तो आख़िर उसके मायके में बच ही कौन गया.. पर जाने क्योँ उसके मन में एक आस थी कि केसर कहीं ज़िंदा तो नहीं.. वो अक्सर आदित्य से भी कहा करती थी लेकिन आदित्य उसकी बात सुन उड़ा दिया करता था.. उसके अनुसार ये सब रेखा कि गलतफहमी थी….
 
   रेखा अपने मन के झंझावात से लड़ रही थी..  मायके में भले ही कोई नहीं था लेकिन ससुराल वालों का प्यार उस पर भरपूर बरसता था ! चाहे वह जेठानी रूपा हो या फिर जेठ युवराज.. उन दोनों के अलावा विराट,  जया, जय भाई साहब, बांसुरी सभी उसका बेहद ध्यान रखते थे…
     हाँ राजा अजातशत्रु के सामने जाने में वह अभी थोड़ा संकोच महसूस करती थी क्योंकि कहीं ना कहीं उनकी जान के सबसे बड़े दुश्मन उसके खुद के पिता ठाकुर साहब थे और इसीलिए वह अब भी  राजा साहब से आमना-सामना होने से बचा करती थी….. ठाकुर साहब की इस करतूत के बावजूद पूरे महल ने उसे माफ कर के खुले दिल से स्वीकारा था !  स्वयं राजा साहब और बांसुरी ने भी..!
लेकिन एक सबसे बड़ी सच्चाई यह भी थी कि ससुराल कितना भी प्यारा हो,  अगर पति प्यार करने वाला नहीं है तो औरत के लिए महल भी कांटो भरा जंगल  हो जाता है…
रेखा के जीवन में अब सब कुछ ठीक था ! सब कुछ सलीके से चल रहा था | ऐसा कोई मसला नहीं था जिस पर उसे परेशान होने की जरूरत हो, पर  विराज का अनदेखा करना उसे आज भी अंदर तक भिगो जाता था….
विराज जब चाहता तब उसके पास उसके कमरे में चला आता और जब नहीं चाहता तो कभी-कभी महीनों उसकी तरफ का रुख भी नहीं करता था.. उन दोनों के रिश्ते की कड़वाहट महल में भी किसी से छुपी नहीं थी, लेकिन महल की औरतों में यह समझदारी भरपूर थी कि कोई भी रेखा को किसी बात के लिए टोकता नहीं था ! और इसीलिए शायद रेखा को बाकी औरतों  की तुलना में थोड़ा ज्यादा स्वतंत्रता मिली हुई थी |  वह अपने काम को लेकर हमेशा व्यस्त रहती  थी  और बाकी लोग भी शायद यही चाहते थे कि वह अपने काम की व्यस्तता में अपने रिश्ते की कड़वाहट को कुछ समय के लिए ही सही भूल सके…|
शायद इसीलिए महल के खाने-पीने के नियमों में भी उसके लिए उतनी कडाई नहीं थी | सुबह अपने हिसाब से रेखा तैयार होकर अपने काम पर निकल जाया  करती थी..  और अपने काम के हिसाब से शाम तक वापस लौटा करती थी… |
    इन्हीं सारे चक्करों में बहुत बार वह यश के स्कूल से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातों और तारीखों को भी भूल जाया करती थी… शायद इसीलिए आज यश की क्लास टीचर ने विशेष रूप से उसे फोन करके बुलाया था और वह स्कूल में यश की बातें सुनकर खुश और संतुष्ट भी थी…
    यश की क्लास टीचर से मिलकर और बातें करके उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मां की झलक नजर आने लगी थी | वह यश का हाथ पकड़े क्लास रूम से बाहर निकली थी कि सामने मेन गेट से अंदर आते हुए रोहित पर उसकी नजर पड़ गई….
   ये यहां क्या कर रहा था..? इसकी पोस्टिंग तो बनारस में थी और बहुत समय बनारस रहने  के बाद जाने उसने कहां पोस्टिंग ले ली थी…
हां कुछ समय के लिए इस रियासत में भी आया था, और एक दो बार रेखा से मुलाकात भी हुई थी  लेकिन उसके बाद रेखा ने रोहित से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखा था ! यहां तक कि काफी समय से उसने रोहित का नंबर तक डिलीट कर दिया था….!
ना जाने क्यों उसके दिमाग में बस यही चला करता था कि विराज जैसी ओछी बुद्धि का है कहीं वह उसके और रोहित के बीच के रिश्ते को कुछ ऐसा वैसा समझ कर उसके चरित्र पर कोई तोहमत ना लगा दे..
    रोहित को वहां देखते ही रेखा उससे छुपने के लिए इधर उधर घबरा कर देखने लगी कि कहीं किसी दीवार की ओट में वो यश को लेकर खड़ी हो जाए ! लेकिन वह जब तक सोच पाती उसके पहले ही यश ने उसे जोर से आवाज लगाकर कुछ दिखाना शुरू किया और यश की तेज आवाज सुनकर रोहित का भी ध्यान सामने खड़ी रेखा पर चला गया…
     उसी वक्त रेखा ने भी रोहित को देखा और दोनों की नजरें एक दूसरे पर ठहर गई….
रोहित वैसे भी पूरी तरह से इस बात को मान चुका था कि रेखा की शादी हो चुकी थी और अब वह एक बच्चे की मां थी इसलिए वह अब उसे एक दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं मानता था…
   वह अपने चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान लिए उसकी तरफ बढ़ कर चला आया…

” मम्मा उधर देखो ना..!”

रोहित पर से नजरें हटा कर रेखा ने यश पर ध्यान केंद्रित कर दिया कि आखिर वह इतनी देर से उसे क्या दिखाना चाह रहा है….
..  सामने से एक छोटी सी प्यारी सी बच्ची अपने बैग  को दोनों कंधोपर टांगे उन्हीं की तरफ चली आ रही थी….
    यह बच्ची मीठी थी निरमा की बेटी  !उसे देखते ही रेखा ने नीचे झुककर उसके गालों पर एक थपकी लगाकर प्यार से उसे चूम लिया…

” हेलो मीठी!! कैसे हो बेटा आप..?”

” आई एम फाइन आंटी ! आप कैसे हो..?”

” मम्मा सुनो ना मैं आपको मिति से ही तो मिलवाना चाहता था.. शी इज माय बेस्टी एंड आई लव हर..!”

यश मीठी को मिति बुला रहा था…

रेखा अपने बेटे की बचकानी से बात सुनकर हंस पड़ी.. उसने अपने हैंडबैग को खोलकर उसमें से चॉकलेट निकाली और मीठी और यश के हाथ में पकड़ा दी उसी वक्त रोहित उनके सामने आकर खड़ा हो गया…

” कैसी हो रेखा..?

” ठीक हूं तुम कैसे हो..?” अपने शब्दों में देखा किसी भी तरह की ऐसी मिठास या मुलायमियत नहीं चाहती थी कि उसे लेकर रोहित के मन में किसी तरह का कोई संदेह आ जायें..

” तुम यहां कैसे?”  आखिर रेखा से रहा नहीं गया और ना चाहते हुए भी उसने यहां आने का कारण रोहित से पूछ ही  लिया…

” बच्चे के एडमिशन के लिए आया था..! वैसे तो यह राज महल के बच्चों के लिए बना स्पेशल स्कूल है लेकिन राजा साहब ने यह स्कूल बाकी बच्चों के लिए भी ओपन कर दिया है..
हालांकि एक एंट्रेंस एग्जाम देना पड़ता है बच्चो को,  अगर सिलेक्ट हो गए तो राज महल के बच्चों के साथ पढ़ने का मौका मिल जाता है तो बस इसीलिए मैंने सोचा कि मैं भी ट्राई कर लेता हूं..!”

रेखा कुछ देर रोहित को देखती खड़ी रह गई, उसके मन में यह विचार चलने लगा कि क्या रोहित ने शादी कर ली ?और उसका बच्चा भी हो गया? उसने बताया तक नहीं…
…  लेकिन अभी कुछ समय पहले लगभग दो-तीन साल पहले ही तो उससे मुलाकात हुई थी.. उस समय तो रोहित ने कुछ भी ऐसा नहीं बताया था कि वह शादी कर चुका है..!
     या उसका बच्चा भी हो चुका है..!
रेखा अपने ख्यालों में डूबी थी कि तभी रोहित के फोन पर किसी का कॉल आने लगा रोहित उठाकर उस फोन पर बात करने लगा, उसकी बातों से यह अनुमान हो रहा था कि सामने वाला उससे बच्चे के एडमिशन के बारे में ही जानकारी ले रहा था!  वह भी बड़े इत्मीनान के साथ यह जानकारी दे रहा था कि उसने फॉर्म डाल दिया है और एंट्रेंस टेस्ट के लिए उसे बच्चे को लेकर आना पड़ेगा…
रेखा समझ गई कि जरूर रोहित की पत्नी का ही फोन होगा… उसने रोहित से बिना कुछ कहे अपने बेटे का हाथ थमा और उसे पकड़कर गलियारा पार करते हुए स्कूल से बाहर निकलने लगी…. रोहित ने जैसे ही  रेखा को जाते हुए देखा उसने फटाफट अपना फोन रखा और उसके पीछे भागता हुआ चला आया उसने रेखा को आवाज देने की कोशिश की लेकिन उसकी आवाज से पहले ही रेखा उस के आने की आहट पर रुक गयी…
रोहित तेज कदमों से आते हुए अपने आप को संभाल नहीं पाया और वो  सीधे  रेखा के सामने जाकर रुका दोनों कुछ पलों के लिए एक दूसरे के बिल्कुल आमने सामने खड़े थे….
   इत्तेफाक से उसी वक्त विराज भी स्कूल में दाखिल हो रहा था….
आज यश की क्लास टीचर ने सुबह रेखा को फोन लगाया था उस वक्त रेखा उस कॉल को अटेंड नहीं कर पाई थी और इसीलिए उन्होंने विराज को भी फोन लगा दिया था ! हालांकि विराज से बात होने के बाद उन्होंने दोबारा रेखा को फोन किया तो रेखा से भी बात हो गई, और विराज इस बात को नहीं जान पाया कि रेखा स्कूल आने वाली है या नहीं और जाने किस धुन में आज वह अपने बेटे के स्कूल में उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट देखने खुशी-खुशी चला आया था, लेकिन यहां स्कूल में दाखिल होते साथ उसे दूर गलियारे के पास खड़े रेखा और रोहित दिख गये….
एक गहरी सांस भरकर विराज उन दोनों की तरफ आगे बढ़ गया…..

*******

    मंत्री जी का दौरा प्रस्तावित था और इसीलिए कलेक्टर परिसर में आज शहर के सभी विभाग अध्यक्षों की मीटिंग होने वाली थी ! कमिश्नर, असिस्टेंट कमिश्नर और बाकी लोगों को भी कलेक्टर साहब के ऑफिस से इस मीटिंग को अटेंड करने के लिए आदेशित किया गया था….

  कलेक्ट्रेट परिसर में दाखिल होते ही अनिर्वाण की नजर वहां दूर एक तरफ खड़ी लीना पर पड़ गई और उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कुराहट खेल गई….
    अपनी गाड़ी को एक तरफ रुकवा कर वह गाड़ी से उतरा और उसने ड्राइवर को गाड़ी पार्किंग में डालने के लिए कह कर अपने कदम लीना की तरफ बढ़ा दिए….
लीना उस वक्त फोन पर किसी से बात कर रही थी….

” हां मेरा बच्चा !! मैं घर आकर तुम्हारा सारा होमवर्क करवा दूंगी ! डोंट वरी ठीक है…? लेकिन अभी मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है इसलिए अभी मैं वीडियो कॉल में तुम्हें प्रोजेक्ट नहीं समझा पाऊंगी प्लीज…
    समझने की कोशिश करो,  बस मुझे 1 घंटे का टाइम दे दो ठीक है..!”

अनिर्वान ने लीना कि फोन पर बातें सुनकर अपना एक हाथ अपने सीने पर रखकर ऐसे जाहिर किया, जैसे उसका दिल टूट गया हो | वही उसके साथ खड़े बाबूराव ने उसे देखा और धीरे से मुस्कुराने लगा..

” क्या हो गया साहब..?”

” दिल टूट गया बाबूराव..!”

” समझ सकता हूं साहब, जब पहली-पहली बार दिल टूटता है ना तो ऐसे ही जोर की आवाज होती है..!”

” नहीं तुम गलत समझ रहे हो बाबू राव यह जोर की आवाज तो जो उपर बादल गरज रहे है ना, उनसे आ रही है… !
….   दिल टूटने की आवाज नहीं होती है वैसे…|
और मेरा दिल टूटने पर तो कभी आवाज नहीं होती | आज तक कभी नहीं हुई | किसी को पता ही नहीं चला लगभग 15 या 16 बार टूट चुका है..!”

” क्या बात कर रहे हैं साहब…… सच्ची..?”

” हां भाई बिल्कुल सच्ची…  अब देखो बाबूराव हम आदमी जरा अलहदा किस्म के है…  लुक्स तो हमारे कतई कातिल टाइप के हैं, तुम देख ही रहे हो..
    बावजूद लड़कियां हमारा दिल तोड़ कर चली जाती है ! पर कोई बात नहीं कोई शिकवा शिकायत हम नहीं करते….

        दिल टूटने की शिकायत हम नहीं करते |
     दिल लुटाने में किफायत भी हम नहीं करते ||
      जो तोड़कर चले जाए एक बार दिल हमारा |
       उस पर नजरें इनायत फिर हम नहीं करते…||

” लेकिन साहब यह मामला वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं..?

” मतलब कहना क्या चाहते हो बाबूराव..?

” मतलब लीना मैडम की शादी नहीं हुई है..?”

” अच्छा…. ! मतलब बिना शादी के ही बच्चा  कर रखा है..?  बड़ी बोल्ड है यार तुम्हारी मैडम..! मिस वर्ल्ड जैसी खूबसूरती है तो अदाएं भी जरा वैसी ही पाई है..!

” अरे हुजूर.. सुनिए.. वैसा कुछ…

बाबूराव अभी अपनी बात पूरी कर पाता कि कलेक्टर परिसर का चपरासी बाहर आकर सभी को अंदर बुलाने लगा और उसके बुलावा देते ही अनिर्वाण तेज़  कदमों से भीतर चला गया…
  
      अंदर  एक लंबी सी अंडाकार टेबल के चारों तरफ कुर्सियां लगी हुई थी और हर एक के नाम की तख्ती उनकी कुर्सी के सामने टेबल पर रखी हुई थी |  सामने छोटे-छोटे माइक रखे हुए थे और सबसे सामने एक तरफ कलेक्टर की कुर्सी रखी हुई थी | हालांकि उस पर अब तक कलेक्टर महोदय बैठे नहीं थे |लेकिन बाकी सारे पदाधिकारी जाकर अपने अपने नाम लगी हुई कुर्सी पर बैठते चले गए | अनिर्वान ने जैसे ही अपनी कुर्सी बैठने के लिए पीछे खींची कि तभी उसके ठीक बगल की कुर्सी में आ कर लीना बैठ गई…
उसे अपने ठीक बाजू वाली कुर्सी में बैठा देखकर अनिर्वाण में एक ठंडी सांस भरी और अपनी कुर्सी पर बैठ गया…
ठीक 5 मिनट में ही शेखर वहां मीटिंग लेने के लिए चला आया… उसे देखते ही सारे पदाधिकारी अपनी जगह पर खड़े हो गए…
शेखर ने आंखों से ही सबको अभिवादन देकर बैठने का इशारा किया, और अपनी कुर्सी पर बैठ गया | जैसे ही उसकी नजर लीना पर पड़ी, उसकी आंखें मुस्कुरा उठी…
और उसे देखकर लीना के चेहरे पर एक अलग सा रंग छा गया | उन दोनों की आंखों ही आंखों चलती बातचीत देख अनिर्वाण के माथे पर चिंता की हल्की सी लकीरें खींच गयी…

क्रमशः

aparna….

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