अतिथि-59

अतिथि -59

     योगिता को दीपक ने थाने से छुड़ा तो लिया था लेकिन उसे एक बार भी वापस घर चलने के लिए नहीं कहा! थाने से निकलने के बाद बिना उसकी तरफ देखे दीपक घर चला गया था।
   योगिता कुछ देर तक ठगी सी खड़ी रह गई थी, और फिर अपने रोष को खुद में समेटे हुए वह भी तेज कदमों से मुड़कर दूसरी तरफ चली गई थी…।

    मन में मचलते अंधङ के साथ वह तेज तेज कदमों से चली जा रही थी। जैसा मौसम उसके मन के अंदर चल रहा था, वैसा ही कुछ बाहर भी था। तेज तेज हवाओं के साथ रह रहकर बिजली भी कड़क जाती थी। लेकिन उसे इस वक्त किसी का डर नहीं था। उसके मन में बस यह चल रहा था कि दीपक ने एक बार भी उसे साथ चलने क्यों नहीं कहा ?

उस बेवकूफ औरत के दिमाग में यह बात आ ही नहीं रही थी कि अपनी हंसती खेलती गृहस्थी को अपने ही हाथों उसी ने आग लगाई थी, पर अब वह चाह रही थी कि दीपक उससे माफी मांग कर उसे अपने साथ ले जाए..।
अपनी खुद की गलती पर माफी मांगने की जगह, वह इस अकड़ में थी कि वह दीपक से श्रेष्ठ है, और इसलिए उसने जो किया वह कोई गलती नहीं, सिर्फ एक बहकावा था। और ऐसे देखने पर दीपक को उसे माफ कर देना चाहिए, और उसे अपने साथ ले जाना चाहिए।
       उसे अभी भी यही लग रहा था की सारी गलती दीपक की है। अगर दीपक उस पर ढंग से ध्यान देता, उसकी बातों को तवज्जो देता तो यह भटकन इतनी आगे तक नहीं जाती। भूषण के लिए उसका लगाव, कहीं ना कहीं दीपक के अनमने स्वभाव के कारण ही था..।

अगर दीपक उसे प्यार से रखता, उसकी कदर करता, बात बात पर उस पर तानाशाही नहीं दिखाता, उसकी इज्जत करता तो वो क्यों भूषण की तरफ आकर्षित होती ?

  वो यही सब सोचती हुई आगे बढ़ती गयी..
छठ घाट पर बनी लम्बी सीढ़ियों पर वो बैठ गयी।
कभी किसी ज़माने में इन्ही सीढ़ियों पर कितना सुकून मिला करता था। वह घंटों दीपक के साथ यहां बैठी रहती थी। यह शादी के शुरुआती दिनों की बात थी, जब दीपक उसे घुमाने लाता था। यहां बैठे दोनों अपनी भविष्य की रूपरेखा तय किया करते थे।
    दीपक भी लंबी-लंबी बातें किया करता था, और वह बड़े ध्यान से उन्हें सुना करती थी। वह अपनी ख्वाहिशे दीपक को बताया करती थी, और दीपक उन ख्वाहिशों को पूरा करने के लंबे-लंबे वादे किया करता था। कितना अच्छा लगता था उस वक्त सब कुछ। लेकिन फिर धीरे-धीरे जाने कहां खटास पड़ती चली गई।
   शायद उसकी ख्वाहिशों को पूरा करने की जद्दोजहद में दीपक उसके साथ ही वक्त गुजारना भूल गया था। लेकिन, लेकिन इसमें उसका भी क्या कसूर था? वह अपनी ख्वाहिशे, अपनी इच्छाएं, अपने पति को नहीं बताती तो किसे बताती? अगर वह महत्वाकांक्षी थी तो क्या वह गलत साबित हो गई। उसका महत्वाकांक्षी होना उसकी अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रयास करना गलत था..?

वो अपने में खोई थी बैठी दूर तक फैली नदी को निहार रही थी कि तभी एक बुजुर्ग सी महिला धीमे-धीमे कदमों से आई और अपनी साड़ी का आंचल समेटते हुए उसके बगल की सीढ़ियों पर बैठ गई। उनके बैठते ही योगिता का ध्यान उन पर गया और उसने अपने आप को जरा समेट कर दूसरी तरफ करने की कोशिश की।
     उस महिला के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई। बिन बाहों के ब्लाउज पर फिरोजी रंग की तांत की साड़ी में वह महिला बहुत फब रही थी। गले में एक लड़ का मोतियों का हार था। बालों का करीने से जूड़ा बना हुआ था। कुछ हल्की सी लेट माथे पर थी, और एक चौड़े फ्रेम का चश्मा आंखों पर चढ़ा हुआ था। उनके हाथ में एक डायरी और एक पैन थी। उन्होंने अपना चश्मा सही करते हुए योगिता की तरफ देखा और हल्के से मुस्कुरा कर बोल पड़ी।

” मैं यहां अक्सर आती हूं, यहां बैठकर अपनी डायरी लिखना मुझे बेहद पसंद है।” योगिता ने एक उड़ती सी नजर उस महिला पर डाली और वापस पानी देखने लगी।
उसका इस वक्त किसी से बात करने  का मन नहीं था।
और ये बात उन अनुभवी आँखों से छिपी नहीं रही..

“कुछ परेशान लग रही हो ? घर पर झगड़ा हुआ क्या ?”

“आपसे मतलब ? मुझे इस वक्त शांति चाहिए । मैं किसी से बात नहीं करना चाहती।”
एक कड़वा सा जवाब उस महिला के मुहं पर फेंक कर योगिता वापस बहते पानी को देखने लगी..

“हां समझती हूं तुम्हारी सारी उलझन और परेशानी को समझती हूं। क्योंकि मैं भी कभी इसी उम्र में थी। जानती हो इस बहते पानी को देखने के भी अलग-अलग नजरिये होते हैं। जब मैं तुम्हारी उम्र में इस पानी को देखती थी, तो इसका भाव मुझ में जुनून सा भर देता था, जिंदगी में मुझे सबसे आगे दौड़ना है इस बात का जुनून मेरे अंदर भर देता था।
    लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव पर जब इस बहते पानी को देखती हूं, तो मुझे यह समझ में आता है कि यह बहता पानी मुझसे कह रहा है कि मेरी तरह बहते चलो। जिन्होंने तुम्हारा अपमान किया उन्हें भुलाते हुए और जिन्होंने तुम्हारा मान रखा उनकी यादों को साथ लिए हुए, बहते चलो। बस सारी अच्छी चीजों को अपने अंदर रखो और यूं ही बहते चलो।”

      उनकी बात सुनकर योगिता ने पलट कर उनकी तरफ देखा। अब योगिता के चेहरे पर वह पहले वाली तल्खी नहीं थी। उसके चेहरे पर हल्की सी नरमी का एक भाव आ गया था।

” हेलो मेरा नाम नीला है…।
तुमसे कुछ पूछूँगी नहीं, समझ रही हूँ कि तुम अभी बहुत परेशान हो। लेकिन अगर खुद कुछ बताना चाहो तो बता सकती हो, और नहीं भी बताओ तो मुझे कोई दिक़्क़त नहीं..।
तुम्हारी उम्र में यह सब बातें बड़ी आम होती है। सिर्फ जवानी के जोश में हम अपनी एक अलग ही दुनिया में रहते हैं, और अक्सर सामने वाले को गलत और खुद को ही सही समझते हैं। इसीलिए झगड़े भी थोड़े ज्यादा होते हैं। लेकिन मेरी उम्र तक आते-आते यह समझ में आने लगता है कि हम युवावस्था में अपनी अस्तित्व की जिस लड़ाई के लिए जूझ रहे थे, उसका खुद का कोई अस्तित्व ही नहीं था।
          वह सारी बातें बड़ी खोखली सी लगने लगती है। जिन्हे उस वक्त हम सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण माना करते थे..।

मैंने अक्सर लड़कियों को इस बारे में लिखते देखा है, कि हमारा घर कौन सा है? मायके में मां कहती है अपने घर जाना तो अपनी मनमर्जी करना। ससुराल में सास कहती है कि तुम दूसरे घर से आई हो, हमारे संस्कार अपनाना और लड़कियां इसी कुंठा में अपना सारा जीवन निकाल देती हैं कि मेरा तो कोई घर ही नहीं..।
      कुछ लड़कियां इस निराशा में अपना व्यक्तित्व ही भुला बैठती हैं। खुद को घर की चाकर समझने लगती है, अपने पति और बच्चे के लिए किए काम को भी एहसान की तरह गिनाती है। लेकिन कुछ लड़कियां इस निराशा में ऐसी कुंठित होती है कि अपने आप को बिना किसी काम के भी क्रांतिकारी घोषित कर देती हैं। घर के छोटे-छोटे कामों को करने से इनकार करके उन्हें लगता है कि वह किसी जंग में लड़ने वाली जुनैद है। उन्हें यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि घर पर अगर तुम्हारा नाम नहीं लिखा तो इसका यह मतलब नहीं कि घर तुम्हारा नहीं है।
  
       घर के हर कमरे में तो उस औरत की ही छाप नजर आती है, जो उस घर में रहती है, और घर को सजाती संवारती है। सिर्फ कागजों पर नाम होने से ही घर आदमी का नहीं हो जाता,  क्योंकि एक घर को बनाती तो औरत ही है।
यह सारी बातें उस उम्र में कभी समझ नहीं आती और जब तक समझ आती है, तब तक बहुत देर हो जाती है। हम औरतें अपने मानसिक विकारों से जूझते हुए इतना आगे निकल जाती हैं कि वापसी का कोई रास्ता ही नहीं सूझता।

उस महिला की बातें सुनते हुए योगिता की आंखे अनचाहे ही बरसने लगी..

“क्या हुआ कोई बात बुरी लगी क्या ?”

“नहीं.. मैं बस ये सोच रही थी कि मैंने कहाँ गलती की जो आज इस मोड पर हूँ, जहाँ मेरे साथ कोई नहीं।
मेरी बेटी तक मेरा साथ नहीं दे रही, जिसके लिए मैंने अपना सोना जागना तक त्याग दिया..।

अपनी बेटी को अच्छी परवरिश दे सकूं, इसलिए मैंने नौकरी की, काम पर जाने लगी। लेकिन आज जब मुझे उसकी जरूरत थी, मैंने उससे बात की तो उसने भी मुझे चार बातें सुना दी। वह भी अपने बाप की ही बेटी निकली ।उसने मुझे साफ-साफ कह दिया कि मैंने तो नहीं कहा था कि आप मेरे लिए नौकरी करने जाएं। मैं तो उतने में ही खुश थी, जितना हमारे पास था। सोचिये नीला जी, मेरी क्या गलती? क्या नौकरी करना गलत है..?”

“नहीं! नौकरी करना तो बिल्कुल भी गलत नहीं। अपने पैरों पर खड़े होने से अच्छी बात और क्या हो सकती है? लेकिन जिस कारण से नौकरी की, उस कारण को गलत बताना गलत है। तुमने कहा तुमने अपनी बेटी का भविष्य सुधारने के लिए नौकरी की, ऐसा नहीं है। कोई भी इंसान सबसे पहले अपने लिए करता है, जो भी करता है।
तुमने भी नौकरी अपने खुद के लिए की। अपने वजूद को, अपने व्यक्तित्व को स्थापित करने के लिए की। तुम्हारी जिंदगी में क्या चल रहा है, वह तो मैं नहीं जानती, लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि अगर तुम्हारी जिंदगी में कुछ भी गलत हो रहा है तो उसकी अकेली जिम्मेदार तुम खुद हो..।
    हमें कोई भी इंसान सही और गलत का फर्क बता सकता है, किस तरफ मुड़ने से हमें सही रास्ता मिलेगा यह बता सकता है, लेकिन अब इस उम्र में कोई हमारा हाथ पकड़ कर हमें चला नहीं सकता। और अपने आप को इस भ्रम से बाहर निकालो कि तुमने जो भी किया वह किसी और के लिए किया, या किसी और की वजह से किया। एक बार अपने अंदर झांक कर देखो, तुम्हें खुद सही और गलत साफ-साफ नजर आने लगेगा।
    और उस वक्त तुम अपने आप को भी समझ पाओगी, और सामने वाले को भी। कभी जब तुम्हें सामने वाले पर बहुत नाराजगी हो, तो एक बार उसकी जगह खुद को रख कर सोचना की क्या वह वाकई इतना गलत है जितना हमें नजर आ रहा है?
    क्योंकि जब हम खुद में होते हैं, तब हम सामने वाले की स्थिति को अक्सर अनदेखा कर जाते हैं। और उसे समझने का, उसकी मुश्किलों को जानने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि खुद को उसकी जगह रखकर सोचो।
   तुमने कहा ना तुम्हारी बेटी ने तुम्हें मुंह तोड़ जवाब दिया। एक बार उसकी जगह खुद को रख कर देखो और सोचो कि अगर तुम्हारी मां तुम्हारे साथ यही करती जो तुमने अपनी बेटी के साथ किया, क्या तुम अपनी मां को वही जवाब देती, जो तुम्हारी बेटी ने तुम्हें दिया या तुम उनके गले लग कर उन्हें थैंक यू कहती?
    यही मैं तुम्हारे पति से होने वाले झगड़े और क्लेश के लिए भी तुम्हें कहूंगी कि एक बार उनकी जगह पर खुद को रख कर देखो। तुम दोनों के बीच जो भी बात रही हो, जो भी क्लेश रहा हो जिसके कारण आज तुम्हें यहां अकेले बैठकर आंसू बहाने पङ रहे हैं, उसके पीछे का कारण जो भी रहा हो, लेकिन अगर तुम अपने पति की जगह होती तो क्या वही निर्णय लेती, जो उसने तुम्हारे लिए लिया?
क्या तुम्हारा निर्णय कुछ और होता…?”

नीला की बातें सुनते हुए योगिता को धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि उसने कहां पर गलती की थी? वह अपनी जगह दीपक को रखकर सोचने लगी। अगर दीपक की दुकान में काम करने वाली किसी लड़की के साथ दीपक इस तरह के संबंधों में जुड़ता तो क्या वह उसे माफ कर सकती थी? और क्या उसकी मां अगर किसी पर पुरुष के साथ संबंधों में होती तो वह अपनी मां को माफ कर पाती?
     इन दोनों बातों को सोचते ही उसे लगने लगा कि ना दीपक उतना गलत है और ना उसकी बेटी। उसे वापस लौट कर उन दोनों से एक बार माफी मांगनी ही होगी।
       भले ही उसके बाद उस घर में ना रहे, लेकिन एक बार तो दीपक से माफी मांगनी ही पड़ेगी। योगिता ने अपनी आंखें पोछी और उस महिला की तरफ घूम गई..

“थैंक यू नीला जी, आपने सच कहूं तो मेरी आंखें खोल दी। मैं अब तक खुद को गलत समझ ही नहीं रही थी। लेकिन अब समझ में आ रहा है कि कहीं ना कहीं सब के पीछे गलती तो मेरी ही थी।
मुझे खुद ही वापस लौटना होगा, जानती हूँ मुझे लेने कोई नहीं आएगा।
लेकिन घर तो जाना ही होगा !”

“ज़रूर.. अच्छे से विचार करो और एक सही निर्णय लेकर घर लौट जाओ। हाँ उसके बाद भी ऐसा लगता है कि तुम्हे लोग नहीं समझ रहे, तब तुम अपना स्वतंत्र निर्णय ले सकती हो !”

“जी धन्यवाद !” कह कर योगिता उठ खड़ी हुई.. जाते जाते वो अचानक रुकी और मुड़ कर वापस उस महिला तक चली आयी..

आपका कोई पता या नंबर, जिस पर आपसे बात  कर सकूं ?”

” मैं नीला हूँ, डॉक्टर नीला! में पिछले तीस सालों से यहां के मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग की विभागध्यक्ष हूँ..।
कभी मिलने का मन हो तो वहीँ चली आना.. क्यूंकि मेरे पास कोई नंबर नहीं है.. मैं मोबाईल नहीं रखती !”..

“जी अच्छी बात.. थैंक यू..।”

हल्के से मुस्कुरा कर योगिता अपने घर की तरफ बढ़ गयी..
आज बहुत दिनों बाद उसे हल्का महसूस हो रहा था..
और साथ ही उसके दिमाग में छाया भूषण भी एक किनारे हो गया था !

क्रमशः

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Jagriti
Jagriti
9 months ago

Nice part 👌

Umita kushwaha
Umita kushwaha
9 months ago

अच्छा हुआ की योग्यता के दिमाग पर पड़ी हुई धूल साफ हो गई अक्सर गलती करने के बाद इंसान को अपनी गलती कभी नजर नहीं आती वह इस हम में जीता है कि मेरी क्या गलती है मैंने तो दूसरों के लिए इतना किया और आज मैं ही इस दोराहे पर हूं पर अगर गंभीरता से बेचारा जाए तो फिर सारी गलती समझ में आने लगती है चाहे वह अपनी हो या सामने वाले की इसी तरीके से आज योग्यता को अपनी गलती समझ में आ गई है और यही बात उसे अपने जीवन में सही निर्णय लेने के लिए मदद भी करेगी
किसी भी इंसान को अपनी गलती जब तक समझ में नहीं आती जब तक कोई समझने वाला नहीं हो अक्सर हम खुद के गलत कार्यों को दबाने के लिए दूसरों की छोटी-छोटी बातों को उखाड़ने लगते हैं और यही बात है मनमुटाव और क्लेश का कारण बन जाती है अब जबकि योग्यता को समझ आ गया है तो फिर ज्यादा परेशानी नहीं होगी उसे किसी भी तरीके के निर्णय को लेने में

Ritu Jain
Ritu Jain
9 months ago

Very nice part.

Aruna
Aruna
9 months ago

👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏👏

Savita Agarwal
Savita Agarwal
9 months ago

Ab Yogita apnaya ghar ki taraf lout jati hai,usaya apni galti samaj aati hai.

Deepa verma
Deepa verma
9 months ago

चलो लौट के बुद्धू घर को आए तो सही।

Mukesh Duhan
Mukesh Duhan
9 months ago

Nice ji

Nishu
Nishu
9 months ago

Very nice part mam 👍 😀 😊 👌 👏🏼 ☺️

Jyoti Agrawal
Jyoti Agrawal
9 months ago

Bahut achhe se samjhaya neela ji ne yogita ko ki uski galti kahan par hai aur use deepak aur apni beti ke pass jakar unse ek baar baat jaroor karni chahiye

Poonam Aggarwal
Poonam Aggarwal
9 months ago

👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👏👏👏🫀🫀🫀🫀💚💚💚💚