अतिथि-53

अतिथि -53

  डिंकी माधव से उसकी मानसिक व्याधि के बारे में पूछना चाहती थी, वो बस ये जानना चाहती थी कि  जो कुछ भी माधव की माँ ने बताया था, उसमें कितनी सच्चाई थी, लेकिन वो उससे कुछ पूछ पाती, उसके पहले उसकी माँ का फ़ोन आ गया..।

“कहाँ है डिंकी ?”

“क्य़ा हुआ मम्मी ?”

“आज सामान की खरीदारी के लिए जाना था, सुलक्षणा जी का दो तीन बार फ़ोन आ चुका है, तू घर आकर मेरे साथ चलेगी? या वहीँ से आ जाएगी ?”

सुलोचना के सवाल पर वो माधव की तरफ देखने लगी..

“क्य़ा हुआ ?” माधव ने पूछ लिया

“शॉपिंग के लिए आपकी और मेरी मम्मी मिलने वाली हैं, मुझे भी बुला रहे हैं वहाँ, क्य़ा आप छोड़ देंगे ?”

“हाँ क्यों नहीं.. ? चलो !”

“आप भी साथ रहेंगे क्या ?” डिंकी ने झिझक कर पूछा

माधव उसे देख कर हल्के से मुस्कुरा उठा,

“तुम क्या चाहती हो ? मैं भी साथ रहूँ ?”

“हम्म !” डिंकी ने धीमे से हामी भर दी..
दोनों के बीच जब तक ये सारी बातें नहीं हुई थी, तब तक इतना संकोच भी नहीं था। दोनों आपस में सामान्य बोलचाल कर लेते थे। लेकिन जब से थाना कचहरी हुई थी, उसके बाद से दोनों के दिल की बातें एकदम से सार्वजानिक हो गयी थी। उसके बाद दोनों को आपस में बात करने का कोई मौका ही नहीं मिला था..।
न माधव अपने मन की कह पाया था, न डिंकी।
और इसीलिए उनके बीच जैसे बर्फ की कोई ठंडी सिल्ली जम सी गयी थी, जिसे भेद कर एक दूजे तक आ पाना दोनों को ही कठिन लग रहा था !!

माधव चाहता था वो अपने मन की बात डिंकी से कह दे, लेकिन कैसे, ये उसकी समझ से परे था..। वो ये भी चाहता था, कि डिंकी भी अपने मन की बात कह दे, लेकिन डिंकी भी जरा उलझी सी थी..।

वो दोनों वहाँ से उठ कर बाहर आ गए..
माधव की माँ ने जिस जगह बुलाया था, दोनों वहाँ पहुँच गए..।
माधव की माँ को छोड़ने ड्राइवर आया था, बाहर कार में ही बैठी वो सुलोचना का इंतज़ार कर रही थी.. सुलोचना ऑटो रिक्शा से वहाँ पहुंची और माथे का पसीना पोंछती हुई ऑटो से उतर कर दुकान की ऊंचाई देखने लगी..।
उसी समय सुलक्षणा अपनी कार से उतर आयी..।

“गर्मी बहुत है न ?” सुलोचना ने सुलक्षणा की तरफ देख कर अपने हाथ जोड़ दिए..

“नहीं मुझे गाड़ी में महसूस नहीं हुई, हाँ अब जरा सी लग रही, चलिए अंदर तो दुकान में एसी लगा है !”

सुलक्षणा अंदर की तरफ बढ़ गयी.. इतनी बड़ी दुकान देख कर सुलोचना का दिल डूबने लगा था।
पतिदेव से मिन्नतें कर उसने दस हजार निकलवाए थे, लेकिन वो अपनी होने वाली समधन को जानती थी, इसलिए अपने भी बचा कर रखें रूपये भी निकाल लायी थी, पर वो भी बमुश्किल सात आठ हज़ार ही थे….
मन को कड़ा कर वो अंदर चली गयी..
उसी समय माधव और डिंकी भी वहाँ पहुँच गए।

सुलक्षणा अक्सर यहाँ से खरीदारी किया करती थी, इसलिए अंदर जाते ही मैनेजर ने उसे पहचान लिया और बड़े आदर के साथ उसे अंदर ले जाने लगा..

उस दुकान में अलग अलग फ्लोर पर अलग अलग कीमतों के कपड़े मौजूद थे..।
सबसे प्रीमियम कपड़ो वाले सेक्शन में ले जाकर मैनेजर ने सुलक्षणा को बैठा दिया।

सुलक्षणा की पसंद पूछ पूछ कर वो उसी हिसाब से साड़ियां दिखाने लगा..।
सुलोचना एक तरफ चुप सी बैठी स्वयं को उपेक्षित सी महसूस कर रही थी।
वहीँ बैठी डिंकी भी कुछ साड़ियां हाथ में ले अलट पलट कर देख रही थी,, लेकिन उसे इसमें से कुछ भी ऐसा कुछ खास पसंद नहीं आ रहा था..।

डिंकी के साथ ही माधव भी था, और उसे अपनी माँ का बर्ताव पसंद नहीं आ रहा था..।

“नहीं कुछ भी पसंद नहीं आ रहा कुछ ढंग का दिखाइए न..।
हमारे लड़के की शादी है, लेन देन के लिए भी कुछ एलिगेंट सा ही चाहिए ! और फिर बहु को भी कुछ भी ऐरा गैरा सा तो दे न दूंगी !”

“जी मैम.. आपकी चॉइस वैसे भी बहुत एलिगेंट है.. आप ये देखिये।
शादी और रिसेप्शन दोनों ही मौको के लिए आपको दिखा देता हूँ..।
ये है आसाम की मूंगा सिल्क.. गज़ब की साड़ी है मैडम। इसकी खासियत कि इस रेशमी साड़ी को बनाने के लिए इसके कीड़े को मारना नहीं पड़ता..। सिर्फ पैंतीस हजार में ये पीस है, इसमें एक ही रंग मिलेगा बाकी दूसरी डिज़ाइन्स है..। “

सुलोचना को वो पीली सी साड़ी बड़ी पसंद आ रही थी, लेकिन कीमत सुन कर उसके होश उड़ गए..।
उसने एक दूसरी गुलाबी सी साड़ी हाथ में लेकर उसकी ज़री पर हाथ चलाना शुरू कर दिया..

“इसकी क्या कीमत होगी ?”

“ये गुजरात की पटोला है.. ! बढ़िया माल पसंद किया है मैम.. एकदम प्योर पाटन पटोला है, इसका काम हाथ का किया है, मात्र अट्ठाइस हजार !”

सुलोचना का हाथ कांप गया..

उसके बाद तो वो मुँहजोर एक से बढ़ कर एक दामी साड़ियां उन लोगो के सामने फैलाता चला गया और उसके काम और दाम का विवेचन ऐसे करता गया, जैसे कोई स्वस्थ होशियार विद्यार्थी अपने शिक्षक के सामने वाइवा देते समय अपना सारा ज्ञान दिखा देता है….

माधव का कोई ज़रूरी फ़ोन कॉल आ गया, उसे उसी वक्त वहाँ से जाना था, लेकिन जाने वो लड़का अपनी होने वाली सास के मन की उलझन कैसे जान गया, उसने सुलक्षणा की नजर बचा कर चुपके से अपना डेबिट कार्ड निकाल कर डिंकी के हाथ में थमा दिया..

“ये क्या ?” डिंकी आंखे फाडे माधव को देखने लगी..

“रख लो, 1950 पासवर्ड है, शॉपिंग मेरी माँ करे, या तुम्हारी, बिल्स तुम पे कर देना, समझ गयी ?”

गहरी आँखों से डिंकी को देखते हुए माधव बोल पड़ा, मंत्रमुग्ध सी डिंकी बिना ज़्यादा सोचे विचारे हाँ में गर्दन हिला गयी..
उन औरतों को साड़ियों में उलझा छोड़ फिर माधव बाहर निकल गया !

उसकी माँ के चेहरे पर राहत के भाव चले आये.. शायद वो भी माधव के सामने खुल कर अपने मन का नहीं कर पाती थी..।
अब वो और भी ज़्यादा खुल कर अपने आप में चली आयी..
एक से एक कीमती साड़ियों का अम्बार एक तरफ कर वो सुलोचना से मुखातिब हुई..

“ये कुछ साड़ियां चुन ली है हमने, इन्हे आपको दे देंगे, आपको भी तो लेन देन भेजना ही होगा..। अब आप ऐसी साड़ियां भेज दो जो हमारे यहाँ किसी को पसंद ही न आये, तो फिर क्या मतलब ? इससे अच्छा हमने खुद की ही पसंद की साड़ियां निकाल ली.. !”

सुलोचना मन ही मन साड़ियों की कीमत का जोड़ घटाव कर रही थी..।

‘छिः कैसी दुकान थी, एक भी साड़ी पांच छह सौ की नहीं रखी है कमबख्त ने ? क्या मतलब ऐसी हजारो की साड़ी तो मेरी अलमारी में रखे रखे सड़ जाएंगी..। इन हजारों की साड़ियों को पहनने वलियाँ क्या कभी इन साड़ियों को लपेटे रसोई में जाती भी होंगी..?
हल्दी मसालों की सुगंध की लपटे क्या उन साड़ियों में सिमटती न होगी ?
और फिर इन महंगी साड़ियों को एक बार पहन कर दुबारा किसी पार्टी में कैसे कोई दिखावटी पहन पाता होगा..?

हमारी पांच छह सौ की साड़ियां ही बढ़िया हैं । मन भर कर पहनो, घिस क़र चला लो, घर पर ही धो सूखा लो.. न रंग जाने का डर न धागे निकलने का खतरा..।

मन भर कर पहनने के बाद काट कर परदे बना लो,तब भी चलती रहती है, और ये महंगी साड़ियां बस अलमारी की शान भर बनी रहती है..।
हुंह देखने में एक भी नहीं भा रही, लेकिन अब करूँ भी क्या ?

अपने विचारों में खोयी सी सुलोचना साड़ियों का मन ही मन जोड़ घटाव कर रही थी कि वापस सुलक्षणा बोल पड़ी..

“अभी डिंकी के लिए तो हमने कुछ लिया ही नहीं, उसके लिए हम फिर डिंकी को लेकर आ जायेंगे..। अभी तो बस यही साड़ियां लेकर चलते हैं !”

सुलक्षणा ये कह कर खड़ी हो गयी..
फिर वो जरा झुकी और सुलोचना के कान के पास आकर फुसफुसा गयी..

“आपने तो इतने रूपये रखें नहीं होंगे, अभी हम दे देते हैं, बाद में हिसाब देख लेंगे !”

बयासी हज़ार का बिल देख कर सुलोचना सहमी सी बैठी रह गयी थी कि तभी सुलक्षणा के हाथ से डिंकी ने धीमे से बिल ले लिया..

“बिल मैं पे कर दूंगी आंटी जी !”

“तुम ?” उपेक्षा से डिंकी की तरफ देख सुलक्षणा ने आंखे अचरज से फ़ैला ली..

“जी मैं !”

मुस्कुरा के डिंकी ने बिल और कार्ड, काउंटर पर खड़े लड़के के हाथ में दे दिया..
उसने फटाफट साड़ियों को गिन कर बिल जांचा और कार्ड से पेमेंट काट लिया..
पासवर्ड डाल कर डिंकी ने बिल भुगतान किया और कार्ड वापस ले कर अपनी पर्स में वापस डाल दिया..

सुलक्षणा जहाँ अचरज से आंखे फाड़े डिंकी को देख रही थी, वहीँ सुलोचना के चेहरे पर गर्व और राहत के मिले जुले से भाव चले आये थे..।।

सुलक्षणा सामान को दुकान वाले को पकड़ा आगे बढ़ गयी..।
डिंकी ने अपनी माँ को भी चलने का इशारा किया, और अपनी होने वाली सास के पीछे बढ़ गयी.. गर्व से अपने कंधे सतर किये सुलोचना भी डिंकी के पीछे बढ़ते हुए उस साड़ी दिखाने वाले लड़के के पास से गुजरते हुए उसे बता गयी..

“मेरी बेटी है वो !”

“जी मैम !” उस लड़के ने मुस्कुरा कर कहा और एक चौड़ी सी मुस्कान अपने होंठो पर समेटे वह बाहर निकल गयी..

क्रमशः

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Umita kushwaha
Umita kushwaha
10 months ago

ओह ! Kitna उलझन भर्रा समय था यह शॉपिंग करना कुछ देर के लिए तो मुझे भी पसीना आ गया कि सुलोचना आप क्या करेगी पर माधव की समझदारी है सारी बात संभल ले गया 🙂🙂🙂😌😌😌
पता नहीं क्यों सुलक्षणा ऐसा कर रही है उसे अगर डिकी पसंद नहीं है तो वह बैठकर बातों को सुलझा सकती है पर इस तरीके से सबको नीचा दिखाना अच्छी बात नहीं है शुरुआत में ही अपने बेटे के ससुरारी जनों के साथ संबंध बिगड़ने से इन्हें क्या ही मिल जाएगा मासूम सी डिं की का भोला चेहरा भी उनके मन की कठोरता को नहीं पिघला पा रहा है😦😦😢😢😕😕😕😔😔😔😔😔
Ab kya hoga jab सुलक्षणा ko पता चलेगा कि बिल माधव ने भरा है 🙄🙄🙄

Last edited 10 months ago by Umita kushwaha
Nisha
Nisha
11 months ago

Madhav ki samjhdari ne dinki aur uski mummy ki izzat bacha li warna sulochna toh izzat utarne hi aayi thi yahan

Aruna
Aruna
11 months ago

👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏

Vandana attri
Vandana attri
11 months ago

So beautiful part 🥰🥰♥️🥰 madhav ki help vakyi dinki ki mmy ko proud feel krva gyi

Manu Verma
Manu Verma
11 months ago

डिंकी और सुलोचना की तरह मुझे भी जानना है माधव की बीमारी के बारे में फिर भी ना जाने ऐसा लग रहा ये सुलक्षणा बहुत पहुंची हुई चीज है शायद उसने डिंकी की आँखों में माधव के लिए प्यार देख लिया था और उसने कहानी गढ़ दी और अब देखने को मिल रहा कैसे बात बात पर सुलोचना को निचा दिखा रही है, कैसे खरीदारी करते समय सुलोचना को कम पैसे होने का ताना दिया। शायद माधव भी अपनी माँ का स्वभाव जानता है तभी तो डिंकी को अपना कार्ड देकर गया और डिंकी से बिल पे करवाया और ये क्या काफी नहीं है जानने के लिए कि माधव एक सुलझा और समझदार लड़का है। इन सब में मुझे सुलक्षणा कि शक्ल देखने लायक थी 😂, मज़ा आ गया 👏🏻👏🏻👏🏻।
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

गीता
गीता
11 months ago

हाय!! मेरी बेटी है वो । कितने शान से कहा

Sonu
Sonu
11 months ago

Very nice part

कशिश शर्मा
कशिश शर्मा
11 months ago

मैने पहले भी कहा था आज फिर से कह रही हूं। माधव को कोई कहानियां बनाने की बीमारी नहीं है,खुद से गढ़कर कल्पना लोक में विचरण करने की कोई आदत नहीं है। यह सब सुलक्षणा ने डिंकी और माधव के बीच की नजदीकियों को जानकर उन्हें दूर करने के उद्देश्य से सुलोचना के कान में डाला। उसका प्रेम भरा व्यवहार दिखावा था यह तो अब तक पता चल ही चुका है हमें। माधव तो इतना सुलझा हुआ और दूरदर्शी लड़का है, ऊपर से शांत स्वभाव का। हीरा है भई हीरा।

Kavita
Kavita
11 months ago

bilkul sahi

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
11 months ago

Bahut sundar

Dr Sangeeta Rani
Dr Sangeeta Rani
11 months ago

Aaj to padhkar yahi laga Bhagwan aisa samajhdar damad har kisi ko de