
अतिथि -54
इतनी ढेर सारी शॉपिंग के बावजूद अब तक दूल्हा दुल्हन की शॉपिंग नहीं हो पायी थी..!
अगले दिन उसी के लिये मार्किट जाना तय हुआ !
शादी की तैयारियों में अक्सर यही तो होता है.. काम के काम होने के साथ-साथ कई ऐसे बेमतलब के काम भी होते हैं, जो सिर्फ वक्त की बर्बादी करते हैं। ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ था। पूरा एक दिन लगाकर माधव की मां ने, डिंकी की मां को सिर्फ लेनदेन के कपड़ों की खरीदारी में ही समेट कर रख दिया था..।
” मैं और डिंकी भर जाते, तो तुम्हारी, डिंकी की, मेरी चिंटू की हमारे पूरे घर भर की शॉपिंग करके हम आ जाते। लेकिन सुलक्षणा जी तो लेनदेन की साड़ियों को भी ऐसे अलटी पलटी कर देख रही थी, कि क्या बताऊं? रुपया खर्च हो गया सो अलग..।”
“कोई बात नहीं, समधन है तुम्हारी! अब उन्हीं से रिश्ता जुड़ने वाला है, तो उनकी पसंद नापसंद का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा ना।”
सुलोचना की चिढी हुई सी बात पर विनोद हंसते हुए उसे समझाने की नाकाम सी कोशिश करने लगा।
“उनकी पसंद, ना पसंद का ख्याल रखने में लाखों रुपए यूं ही फुंक जायेंगे..। आप जानते भी है.. ।”
सुलोचना बाजार में घटी आज की बात अपने पति से कहने को आकुल हो उठी, लेकिन चाय की ट्रे लिए उसी समय वहाँ डिंकी पहुँच गयीं, और उसने अपनी माँ को चुप करवा दिया..।
“बस करो मम्मी, पापा भी थक कर आये हैं, और आप ये सब बातें लेकर बैठ गयीं !”
डिंकी नहीं चाहती थी कि, उसके पिता को यह मालूम चले कि सारा बिल उसने पे किया है। वह जानती थी, सुलोचना ने भले ही इसे आसानी से स्वीकार कर लिया कि रुपए डिंकी ने दिए , लेकिन विनोद चुपचाप बैठकर इस बात को स्वीकार नहीं करेगा।
वह जरूर डिंकी से पूछेगा और तब यह राज उन सबके सामने आ जाएगा कि माधव अपना कार्ड उसे देकर गया था, और यह पता चलने पर ना उसके पिता को अच्छा लगेगा और ना माँ को..।
“लीजिये पापा, मेरे हाथ की चाय पीजिये !”
विनोद ने मुस्कुरा कर चाय का प्याला थाम लिया।
डिंकी “मैं आपके लिए पकौड़े लेकर आती हूं,” कहती हुई अंदर चली गई, और विनोद भरी हुई आंखों से चाय का प्याला देखने लगा।
“अरे आपको क्या हुआ? अचानक इतना इमोशनल क्यों होने लगे?”
सुलोचना पूछ बैठी।
” देखो ना, अब तक हमारी डिंकी कभी कुछ नहीं करती थी, अब जब उसे ससुराल जाना है तो हमसे और भी ज्यादा मोह बढ़ाने लगी है।
इसके जाने के बाद, यह सब कुछ कितना याद आएगा। इसलिए कहता हूं कि, अभी जो भी शादी की तैयारी चल रही है, हंसी खुशी कर लो।
सुलक्षणा जी को अपनी समधन कम, माधव की मां के तौर पर ज्यादा देखा करो, तो तकलीफ कम होगी..।”
विनोद की बात समझ कर सुलोचना की भी आंखें भर आई।
उसे लगा, सही तो कह रहे थे उसके पति। आज तक जो लड़की रसोई के नाम से ही दूर भागती थी, आज हर वक्त इसी कोशिश में रहती है कि उसे कितना आराम दे दे। जबकि खुद भी तो रात दिन खटती रहती है।
पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करते हुए उसकी छोटी सी बिटिया ने जाने कब इतने रुपए जोड़ लिए कि बड़े आराम से वहां का बिल पे कर गयी..।
अगले दिन एक बार फिर माँ बेटी तैयार होकर मार्किट के लिए निकल गए..
माधव की मां ने जो समय दिया था, डिंकी और सुलोचना उससे थोड़ा पहले ही पहुंच गए। वह लोग अपनी शॉपिंग कर लेना चाहते थे। नियत समय पर सुलक्षणा भी चली आई…।
माधव ने डिंकी से पहले ही कह दिया था कि वो उसके कार्ड से ही पेमेंट कर ले..
लेकिन डिंकी ने सुलक्षण के आने के पहले की अपनी शॉपिंग अपने ही पैसों से की..।
उसका मन था कि वो अपना शादी का लहंगा और माधव का कुरता खुद तैयार करे,और इसलिए उसने घूम घूम कर थोक दर की दुकानों से अपने लिए सामान ले लिया।
लेकिन सुलक्षणा के सामने ये कहने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी..।
सुलक्षणा उसके लिए एक से एक दामी लहंगे देखने लगी, लेकिन जो ड्रेस सुलक्षणा को पसंद आती वो डिंकी को नहीं आती, और जो डिंकी पसंद करती वो ड्रेस सुलक्षणा नापसंद कर देती..।
आखिर खूब देर की जद्दोजहद के बाद हिम्मत कर के डिंकी ने सुलक्षणा से कह दिया कि उसने अपनी शादी का जोड़ा पसंद कर लिया है।
सुलक्षणा कुछ पल को अवाक् रह गयी, और फिर अपनी नाराजगी दिखाते हुए एकदम शांत सी पड़ गयी…।
सुलक्षणा की यही आदत थी। उसे कोई बात पसंद नहीं आये तो वो एकदम से चुप हो जाया करती थी, आज भी वो अपने खोल में जा छिपी।
सुलोचना को समझ में आ गया कि वो नाराज हो गयी है। उसने डिंकी के हाथ पर हाथ रखा और सुलक्षणा की पसंद की हुई ड्रेस को ही आगे निकलवा लिया..।
“डिंकी, मुझे भी यही लहंगा पसंद आ रहा बेटा.. वैसे भी तुझ पर तो हर रंग खिलता है.. यही पहन ले !”
“नहीं ऐसी कोई ज़बरदस्ती नहीं है.. जब लड़का लड़की ने खुद अपनी पसंद से एक दूसरे को चुन लिया तो कपड़े हमारी मर्जी के क्यों पहनेंगे भला ?”
विषबुझा तीर छोड़ कर सुलक्षणा दूसरे कपड़ो को देखने लगी और सुलोचना ने आँखों से ही डिंकी को मान जाने की सिफारिश की और उसी लहंगे को दुकान वाले को पैक करने बोल दिया..।
इसके बावजूद सुलक्षण के चेहरे पर मुस्कान वापस नहीं आयी..।
किसी पर किये जा रहे एहसान वाले भाव चेहरे पर बनाये हुए सुलक्षणा फिर एक के बाद एक कपड़े पसंद करती गयी और सुलोचना चुपचाप उन कपड़ो पर अपनी पसंद की मुहर लगाती चली गयी..।
दोनों परिवारों के और दूल्हा दुल्हन के कपड़ों की खरीदी के बाद ही सुलक्षणा वहाँ से उठी..
लेकिन इस सब में डिंकी का मूड हद से ज़्यादा ख़राब हो गया..
उसे माधव से बात करने की ज़रूरत महसूस हो रही थी, लेकिन आज सुबह से एक बार भी उसकी और माधव की बातचीत नहीं हुई थी..।
कैसी अजीब लवमैरिज होने वाली थी दोनों की, आज तलक दोनों को एक दूसरे से अपनी मुहब्बत का इजहार करने तक का मौका नहीं मिल पाया था..।
वो धीमे से उठ कर एक किनारे चली गयी और उसने माधव का नंबर लगा दिया..
कुछ देर तक रिंग जाती रही और फिर फ़ोन बंद हो गया..
इस बार उसने वापस नंबर लगा लिया..
इस बार दो रिंग के बाद फ़ोन उठ गया..
“माधव, कहाँ है आप ?”
“मैं अमित बोल रहा हूँ.. माधव का दोस्त !”
“अमित ?.. माधव कहाँ है ?”
“हम्म… वो एक्चुली, हम लोग जरा बाहर हैं… मैं आपकी बात करवाता हूँ माधव से !”
उसने तुरन्त फ़ोन काट दिया..
असल में अमित के फ़ोन उठाते में ही माधव भी उस तक चला आया था, अमित ने बातचीत के दौरान इशारो में उसे बता दिया था कि डिंकी का फ़ोन है, और माधव ने ही इशारे से उसे डिंकी को बताने को मना कर दिया था कि वो इस वक्त अस्पताल में मौजूद है..।
अमित का इस तरह फ़ोन रख देना डिंकी को अजीब तो लगा, लेकिन वो ज़्यादा कुछ बोल नहीं पायी, उसकी माँ ने उसे आवाज़ लगायी और वो मुड़ कर वापस चली आयी…
क्रमशः

पता नहीं सुलोचना की से और डिकी से सुलक्षणा जी को क्या दिक्कत है कि वह हर जगह उन दोनों को नीचा दिखाने में ही लगी है मुझे बहुत पहले ही समझ में आ गया था कि सुलक्षणा जी ने कोई ना कोई कहानी बनाई है ताकि वह डिकी से अपने बेटे को दूर रख सके और अपनी सहेली की बेटी से ही माधव का विवाह कर सके पर ऐसा नहीं हुआ और मंजरी की हरकतों की वजह से सुलक्षणा जी का मनपसंद रिश्ता भी टूट गया पर इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी और को नीचा दिखाएं
Dinky Bahut samajdaar hai,Bari chaturi se apni sasu ma ko kaha ki wolahnga pasand kar chuki hai,Madhav se baat karna chati hai per baat nahi mho pai,n Very good and Fantastic n Fabulous part.
अस्पताल में कैसे पहुंच गया माधव
सुलक्षणा को शायद पता नहीं है डिंकी ड्रेस डिज़ाइनर है वो best लहंगा तैयार कर सकती है खुद के लिए पर सुलक्षणा की आँखों पर तो पैसों का पर्दा चढ़ा है जो बस महंगे कपड़े खरीद रही, वो घमड़ में चूर सुलोचना को नीचा दिखा रही पर डिंकी भी कम नहीं आखिर थक हारकर डिंकी ने कह ही दिया वो अपने लिए लहंगा खरीद चुकी है अब तो सुलक्षणा के लिए ये भी किसी झटके से कम नही और घुस गई अपने कोपभवन में पर डॉक्टर साहिबा…….. कोपभवन ही क्यों 🤔plz मेरे कमरे में किसी को मत भेजना आप 😂।
अरे ये माधव हॉस्पिटल क्यों 🤔 अब क्या हुआ 🤔🤔।
Bahut sundar
Nice part 👌👌, AB Madhav ko kya huva..
OSM 👌👌 mind blowing story❤️🌹
Madhav ki maa kab sudhregi. Wo hmesha Dinki or uski family ko nicha dikhane me rhti h….Madhav kyon nhi kuch kahta h apni maa ko? dekhte h aage or kitne twist h kahani m👌👌
Madhav hospital me kyo hai Din ki ne sahi kaha abhi tak dono ne ek dusre ke samne prem ka izhaar nahi kiya
Madhav ki ma ka waywhar thik nahi hai bilkul ager aage bhi aisa hi rahega toh kaise banegi inki aur dinki ko bhi taklif hogi.madhav hospital me hai kya uski tabiyat sach me kharab hai kya?
😇😇😇😇🤔🤔🤔🤔