
जीवनसाथी -3 भाग -136
वो चुपचाप शौर्य के साथ अपनी सीट पर जा बैठा..
दोनों ही चुप थे, खामोश थे…
उन दोनों को ही नहीं पता था कि लंदन में उनके लिए एक सरप्राइज इंतज़ार कर रहा था..
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महल को भी भावी विवाह के उत्साह उल्लास की छूत लग गयी थी.. जिसे देखो वो किसी न किसी कार्य में व्यस्त था !
महल के कुलगुरु ने शुभ ग्रहदशा आदि के अनुसार सबसे शुभ तिथि विवाह के लिए स्थिर कर दी थी.. और जिस दिन से तारीख तय हुई थी उसी दिन से सारा महल जश्न में डूब गया था..
कहीं महल का रंगरोगन किया जा रहा था, तो कहीं बगीचे के फूलों की अदलाबदली शुरू हो चुकी थी..
बगीचे के पीछे के कृत्रिम तालाब में प्रवासी सायबेरियन पंछियों का आने का समय हो चला था, इक्का दुक्का वो भी नजर आने लगे थे..
दक्षिणी भाग के बगीचे के तालाब में हंसों के कुछ नए जोड़े लाकर स्थापित कर दिए गए थे..
कुछ नए गुलदाउदी, गुलबकावली, रातरानी, कुंदा, मालती के बड़े पौधे लगाए जा रहे थे..
बगीचे का एक बड़ा हिस्सा तो सिर्फ फूलदार पौधों से पटा पड़ा था..।
महारानी रूपा चाहती थी, उनके पुत्र की वरमाला विदेशी ऑर्किड की जगह उनके स्वयं ये बगीचे के ताजा खिले गुलाबों से बनायीं जाये..
उन्हें इस वक्त किसी बाह्य वस्तु या व्यक्ति पर लवलेश मात्र भी विश्वास नहीं हो रहा था..
एक तो पुत्रमोह का आधिक्य, उस पर दुनिया भर के वहम, की ब्याह लगते ही ग्रह भारी हो जाते है। इसलिए भावी वर वधु को नजर लगने का अधिक भय होता है..
बस यही सब सोच कर रूपा चुन चुन कर हर काम कर रही थी..
भावी पुत्रवधु के चढाव के लिए बड़े बड़े ब्रांड्स के जौहरी अपनी दुकाने महल में ही समेट लाये थे..
कपड़ो के लिए बनारस से विशुद्ध बनारसी के थान खुले जा रहे थे तो वहीँ कांचीपुरम से कांजीवरम में बोल्ड विपरीत बॉर्डर की पारम्परिक दक्षिण भारतीय टेंपल साड़ियां छटा बिखेर रही थी.. ।
रूपा को साँस लेने की फुर्सत नहीं थी, कहाँ देखे, किसे समझाये,.. काम का काम फैला पड़ा था..।
कहने की भर बात होती है कि अगर रुपया हो तो इंसान हाथ बांधे खड़ा रह कर भी सब करवा सकता है, लेकिन यहाँ तो अलग ही नजारा था !
बिना मरे स्वर्ग नजर नहीं आ रहा था !!
महल की महारानी भी एक सामान्य माँ की तरह अपने लाड़ले के जीवन के सबसे बड़े दिन को अतिविशिष्ट बनाने के लिए पूरा ज़ोर लगाए हुए थी..
हर्ष का फेरो का जोड़ा फिल्मकारों के ड्रेस डिज़ाइनर शनीम से बनवाया जा रहा था..।
असली रेशम के धागों से बने कुर्ते में सच्चे मोती और मीना टांका जा रहा था..
लेकिन साथ ही रूपा को इस बात का एहसास भी था कि उसके लाड़कुंवर का कुरता कहीं कुछ ज़्यादा ही भारी न हो जाए..।
हर एक मौके के लिए अलग कपड़े और जूते तैयार करवाए जा रहे थे..
समझ नहीं आ रहा था मौके के लिए कपडे बन रहे या कपड़ो के लिए मौके..
रईस लोग शादी ब्याह के लिए बड़े ब्रांड्स की तरफ भागते हैं, यहाँ देशी विदेशी महंगे ब्रांड्स खुद चल कर महल पहुँच रहे थे..।
सभी में एक अजब उत्साह था..
और इस सारे रागरंग के बीच बैठी फू साहब कैसे ये सब रुक जाये इसी बात पर अड़ी हुई थी ….
वो अपने कमरे में बैठी थी, उनकी दासी उनके पैरों में तेल लगा रही थी, तभी उनकी बहु किसी काम से उनके कमरे में चली आई..
उनकी बहु मेघा को सस्ते जासूसी और हॉरर उपन्यास पढ़ने का गज़ब का शौक था..।
वो अपने कमरे में पड़ी पड़ी यही किया करती, और इसलिए उसके दिमाग में किसका मर्डर किसने किया ? कौन असली भूत है ? इस भूत का उस पेड़ से क्या सम्बन्ध है, आदि सवाल ही घूमते रहते थे..
उसकी कोई किताब फू साहब के कमरे में छूट गयी थी, उसे ही ढूंढते हुए वो चली आई थी..
“माँ साहब आपने हमारी किताब देखी क्या ?”
“कौन सी किताब ?” खुद के विचारो में उलझी फू साहब को अपनी बौड़म बहु का बेकार सा सवाल उलझा गया..
“द टेंथ मर्डर, दंसवा हत्यारा !”
“छि ये कैसी किताब है.. तुमसे सौ बार कहा है ये सस्ती मर्डर मिस्ट्री किताबों में अपना समस्य न बर्बाद करो.. हमे तो ये पढाई लिखाई ही समझ नहीं आती.. !”
“हाँ क्यूंकि आप उतना पढ़ नहीं पायी न ?”
“हैं? तुम्हारी इस बात का क्या मतलब ? हमने कॉलेज तक की पढाई की है। ये और बात है कि हम कॉलेज गए नहीं कॉलेज हमें पढ़ाने घर चला आया..।
अरे ऐसे ही किसी छोटी मोटी रियासत के थोड़े न हैं हम..।
नेपाल के आसपास हमारे पिता साहब का खूब नाम था.. वहाँ के लोग उनके नाम की कसमें खाते हैं..
हमसे बोल रही हो पढाई के बारे में..
अरे खूब पढ़े लिखे हैं हम !”
“फिर भी अक्ल ढेला चवन्नी की नहीं !” मेघा धीमे से फुसफुसा गयी..
“क्या कहा तुमने, हम सुन नहीं पाए !”
“कोई बात नहीं, आपके सुनने के लायक बात थी भी नहीं !” बातें करते हुए वो इधर उधर अपनी किताब भी ढूंढ रही थी, और आखिर उसे अपनी किताब मिल गयी..
“मिल गई !” उसके चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी..
“ऐसा क्या रहता है इन बिन सर पैर की कहानियों में, जो ऐसे प्राण दिए रहती हो !”
“पूछिए मत कितना मजा आता है इन्हे पढ़ कर.. ये अभी जो कहानी चल रही है इसमें एक आदमी है।
ये ऐसे तो सामान्य रहता है, लेकिन हार शनिवार की रात इस पर किसी भूत का साया आ जाता है। और तब ये अजीबोगरीब हरकते करने लगता है। जैसे ज़मीन में रेंगने वाले कीड़े उठा कर बाहर फेंक देना, पंखे खोल कर निकाल देना, बाथरूम का नल खुला छोड़ देना, बगीचे की मिट्टी खुद पर पोत लेना और इसी के साथ ये एक काम और करता है.. !”
. “मर्डर करना ?” वहाँ बैठी दासी जो बड़े मजे से मेघा की कहानी सुन रही थी चट से बोल पड़ी
“नहीं.. वो अपने घर में काम करने वालीं का काम खुद करने लगता है.. !”
“अरे वाह.. ये तो बड़ा अच्छा भूत है.. फिर मर्डर कौन करता है ?”
“यही तो राज की बात है.. कहानी के पहले अध्याय से ही सस्पेंस शुरू हो जाता है.. जैसे ही लगता है इसी ने मर्डर किया है, उसके अगले सीन में उसी का मर्डर हो जाता है.. गजब का रहस्य और रोमांच है किताब में.. आखिरी तक समझ नहीं आता कि असली हत्यारा है कौन.. ?”
“तो आप बता दीजिये न असली हत्यारा है कौन ? हमे तो लगता है लेखक खुद भी नहीं सोचे की किसे हत्यारा रखें.. कहानी बढती जाएगी तो अंत खुद ब खुद मिल जायेगा.. ! है न बहूजी… हम सही बोले की नहीं ?”
“अभी हमे भी कहाँ पता है, हम अभी आखिरी अध्याय पढ़ ही कहाँ पाए हैं.. ?”
“ओह्ह तो जल्दी से पढ़िए न ! और पढ़ कर हमे भी सुनाइयेगा !”
“हाँ हाँ सुना देंगे.. पहले पढ़ तो ले !”
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फू साहब अपनी बौड़म बहु और सहायिका की बातें सुन कर खीझ रही थी…
उन्होंने अपने बेटे के लिए बड़ी सारी लड़कियों में से छाँट कर ग्वालियर के पास की छोटी सी रियासत के राजाधिराज की बेटी को चुना था..।
देखने सुनने में निहायत ही खूबसूरत सी मेघावली जब विदा होकर आई तो देखने वालों की आंखे चुंधिया गयी थी, कुछ मेघा का चमकता रूप और बाक़ी उसके साथ आया सामान..
पहले से भरा पूरा महल ठसा ठस भर गया था..
मेघा के घर से आये तोहफों से महल पट गया था, लेकिन जब धीरे धीरे मेघा का दिन रात जासूसी किताबो में गुम मन और स्वभाव फू साहब के सामने आया तो उन्होंने अपना सर धुन लिया..
उसे महल के वास्तविक अस्तिस्त्व से परिचय करवाने ही वो यहाँ लेकर आई थी लेकिन मेघा का यहाँ भी वही हाल था..
अपने घर में तो फिर भी वो थोडा समय महल. के बाकी सदस्यों को दे देती थी यहाँ तो उसे और किसी से को लेना देना नहीं था.. वो अपने में मगन हो गयी थी…
क्रमशः

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻
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Very very nice part 👌👌
Very beautiful
बढ़िया भाग महल और महल के षड्यंत। मियां बीवी सासू सब राजी लेकिन ये फू साहब अभी भी काजी बनी पड़ी हैं सब कुछ बिगड़ने को हद है
Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
Writer sahiba bahot intezar karna pada new part ke liye☺️Superb part 👌🏻 sahi kaha paisewalo ki baat hi nirali hai shadiyo mai pata hi nahi raheta kitni befizul ki shopping kar lete hai😀waise fusaheb ab kaunsa khel khelne wali hai🤨
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Very nice n in nteresting and Bahtareen n Lajabab and Fantastic n Fabulous part, Waiting for the next part eagerly.
Fu saheb phir se koi gadbad na kar de shadi me