हस्तरेखा
( थोड़ी सी सत्य घटना पर आधारित )
“बख्शीश अलंकार जादौन का टिकट है ये, जानते भी हो कौन है वो.. उनका एक एक पल कीमती है, उनके अगले कार्यक्रम की सारी टिकेट्स प्री बुक्ड हैं उनका लंदन पहुंचना बेहद ज़रूरी है !”
“मैं जानता हूँ सर लेकिन इस फ्लाइट में एक भी सीट खाली नहीं बची है.. योनहाप से जाने वाली ये कल की आखिरी फ्लाइट है.. मैं परसो की बिज़नेस क्लास टिकट्स अरेंज कर देता हूँ सर !”
ट्रेवल एजेंट विनम्रता से दुहरा हो गया लेकिन जादौन का असिस्टेंट उतनी ही कटुता से उससे उलझ गया !
“कोरिया में हैं सर, वरना अगर अभी हिंदुस्तान में होते तो क्या वीरानी और क्या हिंदुजा हर बड़ा व्यपारी अपना पर्सनल विमान उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देता ! “
“वो सब मैं समझता हूँ सर, लेकिन इस फ्लाइट में एक भी सीट मौजूद नहीं है ! मैं किसी तरह आपकी सहायता नहीं कर सकता !”
जितनी कड़वाहट जादौन का सेक्रेटरी स्वरूप उगल रहा था उतनी ही विनम्रता से ट्रेवल एजेंट उसे अपनी बात समझाने कि कोशिश कर रहा था.. अपनी बात कहने के बाद उसने फ़ोन रख दिया..।
स्वरूप का रक्तचाप उसकी कनपटी पर हथौड़े बजाने लगा..
जो भी हो जादौन को निकलना तो इसी फ्लाइट में होगा, कुछ न कुछ तिकड़म तो भिड़ानी ही होगी..
उसने वही दराज़ में रखी अपनी गोलियां निकाली और निगल ली.. पानी की घूंट भर कर वो एम्बेसी में फ़ोन लगाने के लिए फ़ोन उठाने ही वाला था कि उसका फ़ोन घनघना उठा…
दूसरी तरफ ट्रेवल एजेंट था..
“बधाई हो सर.. दो टिकट्स अभी केंसल हुई है, आपके लिए दो सीट्स अवेलेबल है लेकिन.. “
“लेकिन क्या ?”
“बिज़नेस क्लास नहीं मिल पायेगा.. और दोनों सीट्स अलग अलग जगह में हैं !”
“हाश… सब चलेगा, फ़ौरन बुक कर दो.. !”
फ़ोन हाथ में ले मुस्कुराता हुआ स्वरूप उस पांच सितारा होटल के सुईट रूम के अंदरूनी कमरे की तरफ बढ़ गया..
जहाँ ढीला ढाला ड्रेसिंग गाउन लपेटे जादौन साहब आराम कुर्सी में फैले एक हाथ में सिगार लिए धीमे धीमे उसका कश लेते हुए अपना मनपसंद संगीत सुन रहे थे..
सामने टेबल पर तराशे हुए कांच के गिलास में डोमिन दे ला रोमानी रखी थी..
ये अलंकार जादौन की सबसे पसंदीदा शराब थी..। जिसका एक गिलास वो रोज़ लिया करते थे, चाहे वो हिंदुस्तान में हो या अपने किसी बहुचर्चित कार्यक्रम में शिरकत करने विदेशी दौरे पर हो.. ।
स्वरूप उनकी पसंद नापसंद का ख्याल बिलकुल ऐसे रखता था जैसे कोई नयी नवेली बीवी अपने पति का ध्यान रखती हैं..।
बख्शीश अलंकार जादौन ने इसी बरस बासठवें में प्रवेश लिया था, लेकिन उनके चेहरे का तेज कांति, उनका प्रशस्त ललाट, उनका ज्ञान से उद्दीप्त चेहरा उन्हें पचास से एक दिन ज्यादा का नहीं दिखाते थे..
अपने पेशे की सक्रियता ने उन्हें कभी विवाह के बंधन में बंधने की इजाजत नहीं दी..
किशोर थे तभी अपने जनेऊधारी प्रकांड विद्वान् मामा जी के सरंरक्षण में रहने का मौका मिला और वहीँ से हस्तरेखा, माथे पर की लकीरों के साथ साथ कुंडली पढ़ना भी सीख गए..
खेल खेल में सीखा गया ज्ञान आगे जाकर अपना रंग दिखाने लगा..
कॉलेज के दिनों में हंसी मजाक में देखा दोस्तों का हाथ जब सच्चाई की करवट लेने लगा, तब युवा अलंकार को आभास हुआ कि उसका शौक ही उसके लिए धनोपार्जन की सफल सुव्यवस्था भी कर सकता है..।
यूपीएससी कि तैयारी को आधे में ही छोड़ फिर अलंकार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अपना डेरा डंडा उठा ले गए और वहाँ से अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी कर निकलते तक में उनके हस्तरेखा विज्ञान की सुकीर्ति धीमी धीमी सुगंध सी चहूँ ओर फैलने लगी..।
महज सत्ताईस की उम्र तक आते आते अलंकार ने अपने ज्ञान से जाने कितने लक्षाधिपतियों की तिजोरी सही कुण्डली गणना कर भर दी..
बदले में कोई उद्योगपति उन्हें नया घर तोहफे के तौर पर देता, कोई देसी विदेशी गाड़ियों का भोग चढ़ाता उन्हें सफलता के सोपानों पर बैठाता चला गया..
माता पिता को बचपन ही में खो चुके थे, एक बूढ़े मामा थे जिन्होंने उन्हें पाला था, वही ढूंढ ढांढ कर रिश्ता लाते लेकिन हर एक कन्या की जन्मकुंडली में लाख नकारने पर भी कोई न कोई दोष निकल ही आता और इस प्रकार विवाह करने की सुबेला कब अस्वीकृत कुंडलियों के अम्बार की भेंट चढ़ गयी उन्हें खुद मालूम न चला..।
अपनी उम्र पूरी कर मामाजी भी चले गए, और अपनी विराट हवेली में अलंकार जादौन अकेले रह गए..
काम के अतिरेक को संभालने के लिए फिर उन्होंने स्वरूप को अपना असिस्टेंट बना लिया..
अपने काम में पूरी तरह डूबे अलंकार जादौन के रात दिन पलक झपकते बीतने लगे..।
वो जैसे जैसे धन कुबेरों की तिजोरियां अपनी गणना से भरते जा रहे थे, वैसे वैसे उनके खुद के घर में लक्ष्मी अपना स्थायी आवास बनाती जा रही थी..।
देश के बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ नेताओं की कुंडली बांच बांच कर उन्होंने यथेष्ट प्रसिद्धि पा ली थी..
अब उनके देश से बाहर भी कार्यक्रम होने लगे थे…
कभी वो अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन रॉयल अलबर्ट हॉल लंदन में करते कभी लुइस हॉल में बैठी जनता को वो अपने गूढ़ ज्ञान से स्तब्ध कर देते..
दर्शक दीर्घ में बैठी किसी भी अनजान कन्या को बुला कर उसके मन में चल रहा सारा हाल बयां करने में उन्हें महारथ हासिल हो चुकी थी..
और अब उन्हें हस्तरेखाओं की गतियों को पढ़ने से कहीं ज्यादा लगाव आँख की पुतलियों को पढ़ कर मन का हाल जानने में होने लगा था !..
ऐसे ही एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर उन्हें कोरिया से लंदन जाना था, लेकिन हड़बड़ी में हुई टिकट्स में वापसी की नहीं हो पायी थी जिसके लिए उनका असिस्टेंट एडी चोटी का जोर लगाए था….
स्वरूप ने उनके रिक्त गिलास को भरते हुए उन्हें सीट मिल जाने की खबर सुना दी..
उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई..
“मैं पहले ही जानता था, सीट मिल जाएगी !”
“आप तो त्रिकालदर्शी है सर, लेकिन मैं तो परेशान हो गया था न.. काश आपकी तरह एक दिव्य चक्षु मेरे पास भी होता !”
हलके से हंस कर उन्होंने उसकी बात सूनी अनसुनी कर दी…
स्वरुप तैयारियों में लग गया, नियत समय पर वो लोग एयरपोर्ट पहुँच गए…
हर बार की तरह अलंकार जादौन को बिज़नेस क्लास नहीं मिला था इसलिए वो इकोनॉमी क्लास की तरफ बढ़ने लगे..
उनकी पहचान किसी से छिपी तो थी नहीं..
जो लोग सामान रखने बैठने आदि में व्यस्त थे, या जिन्होंने ध्यान नहीं दिया, उनके अतिरिक्त जिनकी भी नजर जादौन पर पड़ी आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से उनका मुहं खुला रह गया..
जादौन अपनी जगह बैठे ही थे कि सकुचाती हुई एक नवयुवती उन तक पहुँच गयी..
“एक्सक्यूज़ मी.. आप जादौन सर है न, द ग्रेट पामिस्ट, माइंड रीडर एंड एस्ट्रोलॉजर ?”
जादौन मुस्कुरा उठे..
उस लड़की ने तपाक से अपना हाथ उनके सामने फैला दिया..
“सर बॉयफ्रेंड को लेकर बहुत परेशान हूँ… प्लीज़ बताइये न क्या इस लड़के में मुझे कभी ग्रीन फ्लैग मिलेगा या इसे डिच कर आगे बढ़ जाऊं !”
वैसे तो बिना अपनी संहिताओं को प्रणाम किये सूर्याराधना किये वो हाथ क्या माथा भी नहीं देखते थे, लेकिन उस लड़की की चुलबुलाहट ने ही शायद उन्हें अपना चश्मा सही कर उसके हाथों की जटिल रेखाओं को सुलझाने की इच्छा प्रकट कर दी..
लेकिन उसके हाथ में झांकते ही उन्हें ऐसा कुछ दिखा कि वो पल भर के लिए सकते में आ गए..
उन्होने एकदम से अपना चश्मा उतारा और उसे वहाँ से जाने कह दिया..
“मैं ऐसे बिना वार तिथि के हस्तरेखा नहीं पढता !”
“प्लीज़ सर… बहुत टॉक्सिक है मेरा बॉयफ्रेंड.. आप एक आईडिया बस दे दीजिये !”
“देखिये मैं इस वक्त आपकी कोई मदद नहीं कर सकता.. आप जाइये प्लीज़.. !”
एक तरह से धकिया कर ही जादौन ने उस लड़की से मुक्ति पायी थी कि ठीक बगल की सीट पर बैठे प्रौढ़ ने अपना हाथ फैला दिया..
“ये आजकल के लड़के लड़कियाँ झंडो के रंग से अपना रिश्ता निभाते हैं… आप तो बस मुझे ये बता दीजिये कि बेटा बहु लंदन बुला रहे, कहीं नौकर तो नहीं बना देंगे !”
अपने मन में चल रही उलझन को दूर करने उन्होंने उस हथेली पर अपनी नज़र गड़ा दी, लेकिन उनको आश्चर्य में डुबाती वो हथेली भी कुछ कुछ वही भविष्य दिखा गयी जो उस लड़की की हथेली दिखा रही थी..
जादौन की आवाज़ घबराहट से अटकने सी लगी थी..
जादौन के बाजु वाली सीट पर बैठी एक पुरानी फिल्मो की सुप्रसिद्ध तारिका ने पानी का गिलास उनकी तरफ बढ़ा दिया..
जादौन ने पानी का गिलास तुरन्त अपने होंठो से लगाया और गटागट पी गया..
“धन्यवाद !” उसकी तरफ देख उसका आभार व्यक्त करते में जादौन ने उस तारिका को पहचान लिया..
“अरे आप तो… !”
“जी हाँ किसी ज़माने में फिल्मे किया करती थी.. अब तो बस उन खूबसूरत दिनों की यादें बाकी है !”
“आप तो आज भी काफी स्लिम ट्रिम है.. बहुत फिट लग रही है !”
उसके दुबले शरीर को देख जादौन बोल पड़ा..शायद उसका ध्यान उस सिने तारिका के रोगजर्जित धूसर पड़े चेहरे पर नहीं गया था..
“कहाँ की फिटनेस.. अब हमारा ज़माना कहाँ रह गया जादौन साहब.. किसी ज़माने में लता रानी जिस फिल्म में हो वो फिल्म सफलता की गारंटी मानी जाती थी… अब तो.. खैर छोड़िये !”
“समझ सकता हूँ.. दुनिया उगते सूरज को ही सलाम करती है !”
“सही कह रहे आप.. इतना तो मुझे कैंसर ने तकलीफ नहीं दी, जितना मेरी पिटती फिल्मो के बाद लोगों के बदलते तेवर ने.. अब तो फिल्म इंडस्ट्री को फाइनल गुड बाय कर दिया है.. !
लंदन जा रही हूँ, बाबाजी से दीक्षा लेकर जीवन के अंतिम कुछ महीने आराम से बिताना चाहती हूँ !”
“ऐसा क्यों बोल रही हैं.. मरे आपके दुश्मन !”
“मैं कहाँ कह रही हूँ, मेरी कुंडली पढ़ने वाले किसी आप जैसे ही ज्ञानी तत्ववेत्ता ने भविष्यवाणी की है कि मेरे पास सिर्फ चार पांच महीने का समय बाकी है !
अरे आप भी तो पामिस्ट है.. जरा बताइये तो कितने दिन बचे हैं इस गतयौवना के पास !”
मजाक में ही फिर उस गगनविहारिणी ने अपना दुर्बल हाथ जादौन के सामने फैला दिया.. और उस हाथ के रेखाओं की ज्यामिति ने जादौन को वापस विस्मित कर दिया..
“ब्रम्हा भी अगर कह दे कि चार महीने आपकी आयु है तो मैं नहीं मानूंगा..
आपको बीस साल से पहले यमराज हाथ नहीं लगा सकते.. आप मुझसे लिखवा लीजिये !”
“ओह्ह माय गॉड.. बख्शीश अलंकार जादौन सर… सर प्लीज़ मेरा भी हाथ देख लीजिये न..
बस ये बता दीजिये कि मेरा प्रोमोशन ड्यू है वो कब मिलेगा ?”
जादौन की न चाहते हुए भी दृष्टी उस सुकोमल सुडौल हथेली पर झुक गयी और चौंक कर उसने अपने आप को पीछे खींच लिया..
ये उस फ्लाइट में काम करने वाली लम्बी सुंदर सी परिचारिका थी..
ओह्ह तो ये अपने प्रोफेशन के बारे में जानना चाहती थी..
लेकिन एक बार फिर रेखाओं का वही मकड़जाल जादौन को त्रस्त कर गया, जो पहले की दो हथेलियों में दिखा था..
“आई एम सो सॉरी.. मेरी तबियत ख़राब सी लग रही है.. !”
उसे अचानक कुछ सुझा नहीं, उतनी देर में टेक ऑफ का संदेश ज़ारी हुआ और फ्लाइट उड़न भरने के लिए आगे बढ़ने लगी..
जादौन के माथे पर पसीना छलक आया..
उसने हाथ बढ़ा कर बेल रिंग कर दी… वही एयर होस्टेस दूर से ही उसे हाथ हिला कर इंतज़ार करने का इशारा करने लगी..
जादौन के चेहरे पर भय की काली छाया देख स्वरूप भी घबरा गया, लेकिन टेक ऑफ कर चुकी फ्लाइट में अपनी जगह से उठ कर जादौन तक जाना उसके लिए भी मुश्किल था..
घबराहट से जादौन की साँस तेज़ होने लगी.. दिल शताब्दी से होड़ लेता धड़कने लगा..
अपने मन मस्तिष्क को शांत रखने के लिए फिर जादौन ने कुछ भी सोचना ही छोड़ दिया..
उसने आँखे बंद की और अपने प्रभु का स्मरण करने लगा..
हे प्रभु हे महादेव क्या होने वाला है ? ये मुझे इन तीनो ही हथेलियों में काल क्यों नजर आ रहा है और वो भी आने वाले पलों में ही..
अब क्या करूँ ? कैसे बचूं ?
अगर इन तीनो की हस्तरेखा की सही गणना कर पा रहा हूँ तो इसका मतलब ये तीनो ही लोग अगले घंटे भर बाद ही इस धरती से कूच कर जायेंगे.. तो क्या ये फ्लाइट नहीं बचेगी ?
अपने विचारों के समंदर में गोते लगाते जादौन के चेहरे के पल पल बदलते रंग देख स्वरूप भी चिंतित होने लगा था..
जैसे ही फ्लाइट अपनी ऊंचाई पर पहुँच कर रफ़्तार पकड़ गयी, स्वरूप अपनी जगह से उठ कर तुरन्त जादौन तक पहुँच गया..
“सर क्या हुआ ? तबियत तो ठीक है न ?”
जादौन अपनी जगह से उठे और वॉशरूम की तरफ बढ़ गए, उनके पीछे ही स्वरूप भी बढ़ा और उसी समय फ्लाइट में अनाउंसमेंट शुरू हो गयी..
“किन्ही टेक्निकल कारणों से फ्लाइट की इमरजेंसी लेंडिंग करवानी पड़ रही है, कृपया सभी पैसेंजर अपना धैर्य बनाये रखें !”
इसके बाद एक ज़ोर का झटका लगा और उस उतरते हुए विमान के एक हिस्से में ज़ोर से एक ब्लास्ट हुआ और आग का गोला फैलता चला गया…
जादौन ने उस आग को अपनी आँखों से अपनी तरफ़ आते देखा और अपनी आँखे मूंद ली…
लगभग आठ साढ़े आठ घंटे बाद जादौन ने आँखे खोली.. वो अस्पताल में अपने बेड पर थे, उन्होंने इधर उधर देखा..
वहाँ खड़ी नर्स उस तक चली आई..
“बधाई हो सर… आप उस भयंकर एक्सीडेंट में ज़िंदा बचने वाले दूसरे इंसान हैं.. !”
“पहला कौन ?”
उस नर्स ने उस दूसरे बेड की तरफ इशारा कर दिया..
एक बार फिर अलंकार जादौन की भविष्यवाणी सत्य साबित हुई थी..
उस दूसरे बेड पर अपने जीवन से थकी हारी लता रानी आंखे मूंदे चैन की नींद सोई पड़ी थी..
…..

Dr Sahiba aapki rachnaen hamesha hi romanchit kar jaati Hain per is wali Rachna main to romanch ki sari haden paar kar di kyunki ismein aapane Satya ghatna se prerit bhi likha hua hai to kya Aisa ho sakta hai ki kisi Ko pahle se hi andaza hua Ho ki Aisa kuchh hone wala hai।
माना कभी-कभी हमारी छठी इंद्री हमें यह बताती है कि आगे कुछ बुरा होने वाला है और कभी-कभी हमें भांप जाता है की कहीं तो कुछ घटित होने वाला ही है पर इतनी सटीक भविष्यवाणी भी कोई कर सकता है क्या।
इस रचना के लिए तो मुझे फाइव स्टार रेटिंग बहुत कम लगी है आपकी इस रचना ने सच में किसी थ्रिलर मिस्ट्री मुवी जैसा ही रोमांच भर दिया था मन में।
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Wow matlab is baar bhi unki bhawisay vani sahi sabit ho gyi.bura laga sare marne walon ke liye par yahi bhagya tha unka jise koi nahi badal sakta tha.super story mam 😘😘😘😘👌👌👌👌👌👌👌
👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏👏
Nice Happ new year to you and your family writer ji आपकी सारी कहानियां बहुत ही शानदार हैं ये कहानी थोड़ी सी सच्ची मतलब एस्ट्रोलॉजर सच में है कौन है भई ऐसे हमको एड्रेस दे दीजिए 🙏😊
Adbhut
Dhamakedar….. Story ❤️
Happy New year aparna ji, dhadkane rukwa di aaj to aapne,
Happy new year dr sahiba,aapne bilkul dra hi diya,thodi si saty hai to puri kya hai janne ka man ho rha hai
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