
मायानगरी-42
वेदांत राजा अजातशत्रु को अपने सामने देखकर खुद पर काबू रख पाने में असमर्थ होकर वापस लड़खड़ाने लगा, और राजा साहब ने उसे कंधों से पकड़ कर सीधा खड़ा कर दिया….
” जब पचती नहीं तो इतना पिया भी नहीं करते बच्चे…” राजा साहब ने इशारे से किसी को बुलाया और वेदांत की तरफ देख कर इशारा किया और आगे बढ़ गए वेदांत अपलक उन्हें जाते हुए देखता रहा…
अभी-अभी उसने अंदर अपने पिता के साथ साथ विराज सा के बारे में भी मालूम चला था और वहीं से उसने सब कुछ राजा अजातशत्रु के बारे में सुना था और उनके बारे में सुनने के साथ ही उसे उनके दर्शन भी हो गए। लेकिन राजा साहब के चेहरे में कुछ तो था जिसके प्रभाव से वेदांत को ऐसा लगने लगा कि उस कमरे में जो चल रहा था और राजा अजातशत्रु के बारे में जो भी कहा जा रहा था वह सब झूठ था और उस कमरे में बैठे सारे लोग झूठे और मक्कार थे जो बेईमानी से राजा अजातशत्रु की ओट में माया नगरी में गलत काम कर रहे थे…
… माया नगरी मेडिकल कॉलेज में जिस लड़की की मौत हुई थी उसके बारे में वैसे तो वेदांत कुछ भी नहीं जानता था लेकिन उस समय जो अफवाहें उड़ी थी उससे उसे यही मालूम चला था कि उस लड़की का कॉलेज के बाहर किसी बिजनेसमैन के साथ अफेयर था और जिस में शायद वह लड़की प्रेग्नेंट हो गई थी…
और इन्हीं सब उलझनों से बचने के लिए उस लड़की ने फांसी लगा ली थी लेकिन यहां इस कमरे में तो कुछ और ही चल रहा था। यहां सुनने में पता चला था कि उस लड़की ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसकी हत्या की गई थी। यह तो बहुत बड़ा राज था और इसका खुलना वाकई जरूरी था …लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इस राज के खुलासे में उसके पिता की गद्दी भी चली जाए…. क्योंकि अगर उसके पिता भी इस सब में जिम्मेदार हैं तो जैसे ही राज खुलेगा उसके पिता भी सलाखों के अंदर होंगे और अगर वह जेल के अंदर चले गए तो क्या वेदांत और क्या भुवन और क्या वेदांत के दोनों बड़े भाई किसी का भी कोई अस्तित्व फिर कहां रह जाएगा…
… हैरान-परेशान वेदांत डगमगाते कदमों से वहां से बाहर निकल गया….
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वेदांत का फोन वापस देने के बाद गौरी अपनी स्कूटी पर हॉस्टल की तरफ जा रही थी कि उसका फोन बजने लगा, गाड़ी एक तरफ खड़े कर उसने फोन निकाला… फोन मृत्युंजय का था..
” कहां पर हो गौरी ?
“सर मैं तो यूनिवर्सिटी से बाहर आई हुई थी!”
” ओके !मैं दरअसल आज ही निकलने वाला हूं…काउंसलिंग के लिए। रात 10 बजे ट्रेन है मेरी।
तो यही सोच रहा था कि आज हम साथ में डिनर कर लेते…”
गौरी फोन को पकड़े पकड़े ही मुस्कुराने लगी..
” ओके सर आ जाइए, मैं तो यूनिवर्सिटी से बाहर ही हूं।”
” तो तुम किस जगह पर हो, मुझे अपना लोकेशन भेज दो। आस पास जो भी ठीक-ठाक रेस्टोरेंट होगा वहां चलते हैं..”
गौरी ने इधर-उधर ध्यान से देखा उसे पास में ही एक चाइनीस रेस्टोरेंट दिख गया…
” यहां पास में “याना” है मैं वहीं बैठकर आपका इंतजार करती हूं…”
“ओके मैं बस 10 मिनट में पहुंचता हूं..”
कुछ देर बाद ही मृत्युंजय और गौरी उस रेस्टोरेंट में साथ बैठे खाना खा रहे थे…
गौरी चुप चाप बैठी थी और मृत्युंजय उसे ही देख रहा था …….
” यहां किस काम से आई थी..?
” वेदांत का फोन वहां हॉस्पिटल के बाहर छूट गया था , वो बहुत हड़बड़ी में निकल गया… बस उसका फोन ही देने आयी थी…
” उसके लिए तुम्हें आने की क्या जरूरत थी ..? उसके किसी गुंडे को दे देती ?”
” अरे हाँ! ऐसा तो मैंनें सोचा ही नहीं ….
” सोचा करो गौरी ! और खास कर इन गुंडे किस्म के लोगों से जितना दूर रहो उतना अच्छा है …ये बदतमीज लड़का मुझे कभी सहीं नहीं लगता …
“आप सही कह रहे हैं सर..”
“अपने बाप का नाम लेकर पूरी यूनिवर्सिटी को डराता फिरता है। जबकि किसी को ना इसके नाम से कोई फर्क पड़ता है ना इसके बाप से लेकिन फिर भी अपनी ही शान में घूमता रहता है। और इस के वह अजीबो गरीब दोस्त वह तो मुझे वेदांत से भी गए बीते लगते हैं…. खुद का कोई जमीर ही नहीं है , जो वेदांत ने कह दिया वह चुपचाप मान लिया। उसके पैसों की ताकत है सब…
“आप ठीक कह रहे हैं सर!! मैंने शायद कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी कर दी मुझे नहीं आना चाहिए था….”
” खैर इतना टेंशन मत लो अभी यह बताओ कि तुम्हारी दवाइयां अब पूरी तरह से बंद है ना?
“हां सर आपने मना की थी ना तब से दवाई नहीं ले रही हूं..”
“वेरी गुड और अब तुम्हें नींद भी बराबर आती है ना..”
“नींद भी आती है, हालांकि बाकी लोगों से तो कम ही है मेरी नींद, फिर भी 5 से 6 घंटे कोशिश करती हूं सो ही लूँ..”
“हां! दिमाग को संतुलित रखने के लिए नींद बहुत जरूरी है और हम जैसों के लिए खास कर , जो दिमाग का ज्यादा काम करते हैं। उन्हें कम से कम 7 से 8 घंटे तो सोना ही चाहिए । इतनी नींद पॉसिबल तो नहीं है, लेकिन कोशिश करना काम से काम 6 घंटे की पूरी नींद ले सको.”
“आप वापस कब तक आएंगे सर..?”
” 10 दिन तो लग ही जाएगा मुझे गौरी… काउंसिलिंग के बाद अपने घर चला जाऊंगा। यहां ड्यूटी के चक्कर में छुट्टी नहीं मिल पाती थी। अभी काउंसलिंग के लिए मिली है, तो घर जाकर मां से मिलकर आऊंगा बहुत दिन हो गए उन से भी मुलाकात नहीं हुई..”
“मेरी तरफ से उन्हें प्रणाम दीजिएगा..”
“बिल्कुल!! तुम कहोगी तो तुम्हारी बात ही करवा दूंगा, मेरी मां टिपिकल फिल्मी मां है, अगर मैंने फोन पर तुम से उनकी बात करवाई तो वह ख्याली पुलाव पकाना शुरू कर देंगे..”
अपनी बात पूरी कर मृत्युंजय जोरो से हंसने लगा … बातें करते खाते-पीते दोनों का समय बीत चला …
ट्रेन का समय होते देख मृत्युंजय और गौरी दोनों वहां से निकल गए..
“आपको स्टेशन तक ड्रॉप कर दूँ सर?”
“नहीं गौरी ! तुम्हें यूनिवर्सिटी पहुंचने में देर हो जाएगी… बल्कि देर हो ही चुकी है ! अगर मेरी ट्रेन का टाइम नहीं हुआ रहता तो मैं तुम्हें यूनिवर्सिटी छोड़कर फिर निकलता “
“आप घबराइए मत मैं स्कूटी अच्छे से चला लेती हूं..!”
मृत्युंजय मुस्कुरा कर रह गया उसकी कैब आ चुकी थी गौरी को एक बार देखने के बाद वह अपनी कैब में बैठ गया….
दरवाजे के पास बैठे मृत्युंजय ने गौरी को निकलने को कहा..
“अब तुम जाओ गौरी, और यूनिवर्सिटी पहुंचते ही मुझे एक मैसेज कर देना। क्योंकि हो सकता है ट्रेन में मेरा फोन रेंज से बाहर चला जाए, तो हो सकता है फोन ना लगे इसलिए मैसेज जरूर छोड़ देना..”
गौरी के सिर पर एक बार हाथ रख मृत्युंजय मुस्करा उठा …” अपना ध्यान रखना!”
“आप भी अपना ध्यान रखिएगा सर, और पहुंचने के बाद आप भी मुझे कॉल कर लीजिएगा..”
“मैं कल सुबह कॉल करता हूं अब तुम जाओ..”
गौरी ने मुस्कुराकर एक बार मृत्युंजय को देखा और अपनी स्कूटी यूनिवर्सिटी की तरफ आगे बढ़ा ली…..
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हॉस्टल में झनक कुछ परेशान सी लग रही थी….. प्राची बाल्कनी के अंदर की तरह खिड़की के पास लगे उसके काउच पर बैठी थी उसके हाथ में एक मोटी सी किताब थी और दूसरा हाथ में मार्कर पेन लिए वह पढ़ाई कर रही थी…
झनक हैरान-परेशान कमरे में इधर से उधर चक्कर लगाती हुई किसी को अब तक 2 बार फोन कर चुकी थी, लेकिन उसका फोन सामने वाले ने उठाया नहीं था और इसीलिए वह और भी ज्यादा परेशान हो रही थी..
प्राची ने उसे एक बार देखा और वापस अपनी किताब में डूब गई….
झनक परेशान सी प्राची के सामने आकर बैठ गई…
प्राची ने सर उठा कर एक बार उसे देखा और वापस अपनी किताब में डूब गई। झनक अपना पहलू बदलती वहीं बैठी रही, अखिर प्राची से नहीं देखा गया उसने झनक की तरफ देखा..
” क्या हुआ ? कुछ परेशान लग रही हो?”
झनक ने प्राची को देखा और कुछ कहने ही जा रहीं थी कि उसका फोन बजने लगा…
” हेलो, हां मैडम मेरी सारी तैयारी है…?
” ठीक है तुम्हें कल रात में निकलना होगा। हमारी गाड़ी तुम्हें पिक कर लेगी..”
” लेकिन मैडम मुझे पहले आप लोगों ने नहीं बताया था। मेरी फाइनल एग्जाम की भी डेट है और मैं इस चक्कर में अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रही..”
” पागल लड़की, तुम्हें प्रैक्टिकल्स में पूरे मार्क्स मिलेंगे। और थ्योरी में भी मैं पूरी कोशिश करूंगी कि तुम्हें अच्छे मार्क्स मिल ही जाए..”
“मैं पास तो हो जाऊंगी ना..”
“तुम्हारे दिमाग पर हम लोगों को इतना भरोसा है, और तुम्हें खुद को तुम्हारे दिमाग पर भरोसा नहीं है। बेवकूफ लड़की! तुम टॉप करने वाली हो, तुम्हारा दिमाग इतना तेज है झनक कि तुम खुद नहीं जानती। तुम अपने दिमाग के भरोसे यहां पढ़ने वाले अपने आने वाले पांच सालों में लाखों करोड़ों की संपत्ति की मालकिन बनने वाली हो। समझी..? तो ऐसे बेवकूफाना सवाल अब मत करना..”
“ओके ! मैम बस वही टेंशन थी, कि मेरे फाइनल एग्जाम कैसे जाएंगे..”
“वैसे भी तुम इतनी शार्प हो, कि तुम्हें सिर्फ किताबों को एक बार खोलकर देखने की जरूरत होती है …और फिर साल भर से तुमने अपनी किताबे ना खोली हों, ऐसा तो पॉसिबल ही नहीं है…
कल शाम सात बजे तुम्हें गाड़ी लेने आ जाएगी, उसके बाद तुम उस गाड़ी में बैठ कर निकल जाना..”
“लेकिन मुझे जाना कहां होगा? मेरा मतलब है एग्जामिनेशन सेंटर कहां है?”
“एग्जाम तो परसों है। तो सेंटर भी तुम्हें परसों ही पता चलेगा। कल तुम्हें एक होटल में लेकर आया जाएगा, जहां पर मैं तुम्हें मिल जाऊंगी। इससे ज्यादा बातें हम फोन पर डिस्कस नहीं कर सकते… फोन पर बात करना सुरक्षित नहीं है..”
“ओके ठीक है मैम! मैं अपनी पूरी तैयारी रखूंगी…”
“अब जाओ थोड़ा बहुत कुछ पढ़ लो, वैसे मुझे पता है कि तुम्हारी हंड्रेड परसेंट तैयारी है…. ऑल द बेस्ट!”
“थैंक्स मैम..”
फोन पर बात करने के बाद अब झनक के चेहरे पर थोड़ी राहत के भाव थे। वह मुस्कुराती हुई अपनी स्टडी टेबल की तरफ मुड़ गई। उसने किताब खोली और पढ़ने लगी … उसका ध्यान इस बात पर नहीं गया था कि प्राची उसे ही देख रही थी। प्राची भी धीमे कदमों से उठकर कमरे के अंदर चली आई, और झनक के पास खड़ी हो गई..
” मुझे नहीं पता झनक कि तुम किन मामलों में उलझ रही हो, लेकिन याद रखना जिंदगी से बढ़कर पैसे नहीं होते…..”
” सॉरी मैम, लेकिन यह बात आप मुझसे कह रही हैं जिसे खुद अपनी जिंदगी से कोई प्यार नहीं है..”
” मेरी और मेरी जिंदगी के बारे में तुम जानती ही कितना हो? “
” किसी का भी जीने का सलीका अगर बदल जाता है, इसका मतलब यही है ना कि उसने अपनी जिंदगी से हार मान ली …जिंदगी सभी की कीमती है, ये और बात है कि ये बात हम दुसरों को समझाते जरूर है पर अपने मामले में हम अक्सर ये बात भूल जाते हैं…”
“तुम सही कह रही हो शायद !! जो खुद ही अपने आप में उलझा हो वो किसी और को क्या सलाह देगा … दुनिया का यही तो अजीब फलसफा है, अगर आप स्वस्थ नहीं है तो आप किसी बीमार को सलाह देने की भी हैसियत नहीं रखते..”
” सॉरी प्राची मैम!! मेरा वह मतलब नहीं था। मैं आपकी बात समझती हूं, लेकिन मैं शायद खुद अपनी उलझन में परेशान हूं। मुझे माफ कर दीजिएगा। लेकिन बात यह है कि दुनिया को ऐसा लगता है कि मैं एक सफल पेरेंट्स की बेटी हूं ..मेरे घर पर बहुत कुछ है ।मैं संपन्न हूं, मुझे रुपए पैसों की जरूरत नहीं पर ऐसा है नहीं…
आप तो जानती हैं मेरे पेरेंट्स डॉक्टर हैं। कुछ साल पहले तक दोनों ही प्राइवेट हॉस्पिटल में जॉब में थे… मैं यह नहीं कहूंगी कि, दोनों में से किसी की भी सैलरी कम थी । दोनों अच्छा कमा रहे थे, लेकिन अच्छा कमाने वालों का एक उतना ही अच्छा लाइफस्टाइल भी तो हो जाता है ना। बस उसी लाइफस्टाइल को मेंटेन करने में काफी पैसे बह जाते थे। उसके बाद जब मैं इलेवंथ स्टैंडर्ड में आई, तब पापा ने एक बहुत कठोर निर्णय लिया, उन्होंने जॉब छोड़ने की सोची, उन्होंने यह सोचा कि उन्हें अपना खुद का हॉस्पिटल खोल लेना चाहिए।
उन्होंने इतने सालों में शायद अपना अस्पताल खोलने लायक पैसे भी जोड़ रखे थे, और इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा निर्णय ले लिया। पर दुर्भाग्य की बात यह थी कि जिस हॉस्पिटल में पापा ने नौकरी करना छोड़ा था, मम्मी उसी हॉस्पिटल में काम किया करती थी।
हॉस्पिटल मैनेजमेंट पापा के इस निर्णय से बहुत नाखुश था, उन्होंने पापा को बहुत रोकने की कोशिश की। तरह तरह के प्रलोभन दिये ,लेकिन पापा रुकने को तैयार नहीं थे। और तब उन लोगों ने एक पेशेंट के साथ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का झूठा आरोप लगाकर पापा को नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
मतलब पापा जिस तारीख पर नौकरी छोड़ने वाले थे, उसके ठीक दो दिन पहले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। जबकि उन्होंने अपना हर काम हमेशा कायदे में रहकर किया था, पूरी इमानदारी से पंद्रह साल नौकरी की थी।
और उसके बाद उन्हें अपनी इमानदारी का यह सिला मिला। उन्होंने बकायदा हॉस्पिटल मैनेजमेंट को तीन महीने पहले अपनी नौकरी छोड़ने का नोटिस दिया था। मैनेजमेंट के हेड डॉ साकिब से उन्होंने गुडविल में आकर यह भी बता दिया था कि वह अपना खुद का हॉस्पिटल खोलने जा रहे हैं, और शायद यही पापा से चूक हो गई। खैर हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने इतने बड़े-बड़े इल्ज़ाम लगा दिए कि कोर्ट कचहरी का चक्कर हो गया।
पेशेंट का तो ऐसा होता है मैम कि वह सच कहूं तो किसी के सगे नहीं होते। जब तक आप उन्हें देख रहे हैं, सलाह दे रहे हैं आप उनके लिए भगवान के समान है। अगर आप से एक भी चूक हुई तो वह आप को जान से मारने से भी नहीं चुकेंगे और जब हॉस्पिटल मैनेजमेंट खुद एक डॉक्टर के खिलाफ खड़ा हो गया है तो हॉस्पिटल में भर्ती या फिर रोज के आने वाले मरीज भी उस डॉक्टर के खिलाफ हो जाते हैं।
एक तरह से पूरा का पूरा अस्पताल मेरे पापा के खिलाफ खड़ा हो गया। मम्मी और मैं बहुत अकेले पड़ गए थे। और उसी समय मेरा सिलेक्शन मेडिकल में हुआ। काउंसलिंग के लिए भी मुझे मेरे चाचा के साथ जाना पड़ा। क्योंकि पापा केस में उलझे हुए थे और ऐसे समय में मम्मी उन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहती थी। काउंसलिंग के वक्त माया नगरी यूनिवर्सिटी ने खुद मुझे अप्रोच किया क्योंकि मैं उनकी गुड बुक में थी..
हमारे वाले दिन की काउंसलिंग में पहुंचे बच्चों में मैं टॉप पर थी। मुझे एम्स मिलने की पूरी संभावना थी। लेकिन जब मायानगरी ने मुझे यह कहकर अप्रोच किया कि मुझे स्कॉलरशिप के साथ पढ़ने मिलेगा, तो मैंने यह भी नहीं सोचा कि यह यूनिवर्सिटी ज्यादा पुरानी नहीं है। या इसका अभी उतना नाम नहीं है। मैंने बस स्कॉलरशिप के लालच में मायानगरी ज्वाइन कर लिया । क्योंकि मैं अपने घर की हालत जानती थी…. मै यह नहीं कह रही कि हम गरीब हो गए थे, लेकिन मैं यह भी समझती थी कि इतने बड़े हॉस्पिटल के खिलाफ खड़े होने के लिए पापा को ढेर सारे पैसों की जरूरत होगी। और हुआ भी वही , अब तक तीन से चार हियरिंग हुई है और उसमें पापा के लाखों बह चुके हैं।
हॉस्पिटल मैनेजमेंट अगर सिर्फ पापा के खिलाफ केस करता तो भी एक बार सोचा जा सकता था…. लेकिन उन्होंने पापा के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के साथ ही मम्मी को भी जॉब से हटा दिया। उनका कहना था कि यह दोनों हस्बैंड वाइफ मिलकर अस्पताल में अनैतिकता फैला रहे हैं। और अनैतिकता किसे कह रहे थे पता है आपको?
मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के लाए हुए प्रपोजल्स को। आप जानती हैं एमआर ढेर सारे प्रपोजल लेकर आते हैं, उनकी यह दवाई बिकवा दो उनका लाखों का नफा करवाओ, बदले में वह ऐसी देंगे बदले में वह एलईडी घर पर लगवा देंगे। बदले में वह आपको आईफोन गिफ्ट करेंगे।
लेकिन जब विपत्ति सर पर पड़ती है तो चारों तरफ से पड़ती है ।
वही एमआर जो कभी पापा के केबिन के बाहर हाथ बांधे खड़े अपना अपनी बारी आने का इंतजार करते थे और पापा सबसे पहले सारे मरीजों को निपटाने के बाद अंत में एमआर को बुलाते थे। आज वही एम आर पापा को अपना इंतजार करवा रहे थे। पापा ने गवाहों के तौर पर कुछ एमआर लोगों से मिलना तय किया था, कि उन लोगों से मिलकर ही कम से कम उनसे सच्चाई उगलवाई जाए और जब पापा एक बहुत फेमस फार्मेसी के एम आर से मिलने गए तो मैं भी उनके साथ ही थी और उस वक्त उस ने पापा को घंटों अपने केबिन के बाहर इंतजार करवाया।
मैंने खिड़की पर से झांक के देखा कि शायद वह किन्ही मीटिंग में बिजी होगा, लेकिन वह आराम से अंदर अपनी कुर्सी में बैठे टेबल पर टांगे फैलाए लंच करता टीवी पर कोई शो देख रहा था ।
आप सोचिए मैम मुझे कैसा लगा होगा ? मैंने अपने पापा को कभी किसी के सामने झुकता नहीं देखा… लेकिन उस समय मैंने महसूस किया कि पापा बहुत टूट गए हैं…
हमारे पूरे परिवार का सहारा था। हमारे सारे रिश्तेदार हमारे साथ थे। लेकिन सब बारी-बारी से पापा को यही समझा रहे थे, कि पापा को इतने बड़े अस्पताल के खिलाफ नहीं खड़ा होना चाहिए था। लेकिन मेरे पापा अडिग थे और अब तक है। आज भी उन्होंने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी,।
मम्मी पापा आज भी अस्पताल के मैनेजमेंट के खिलाफ लड़ रहे हैं । शुक्र है केस लग गया वरना अगर केस नहीं लगा होता तो वह अस्पताल मैनेजमेंट सीधे सीसीआईएम से कंप्लेंट कर के पापा और मम्मी की डिग्री ही कैंसिल करवा देता। और उस हाल में मम्मी पापा कुछ भी नहीं कर पाते। सब कुछ भगवान के भरोसे है ना।
अब मैंने भी ज्यादा कुछ सोचना छोड़ दिया है, जो भी होगा अच्छा ही होगा। लेकिन यह तो है कि मैं जल्द से जल्द डॉक्टर बन के उस हॉस्पिटल को भी दिखा दूंगी…”
प्राची ने आगे बढ़कर झनक को अपने गले से लगा लिया…
“आई एम सो सॉरी झनक!! मुझे नहीं पता था कि तुम्हारी जिंदगी में भी इतनी सारी मुश्किलें हैं। मुझे माफ करो और मैं दुआ करती हूं कि तुम एक दिन इतनी बड़ी डॉक्टर बनो कि उस अस्पताल को रास्ते पर ले आओ और उस अस्पताल के ठीक सामने अपना खुद का एक बड़ा सा अस्पताल खड़ा करो..”
“थैंक्यू मैम !! लेकिन मेरा तो यह सपना है, कि मैं इतनी अच्छी डॉक्टर बन सकूं कि उस हॉस्पिटल मे किसी तरह मुझे काम मिल जाए.. और वहां काम करते करते वहां की हेड बन जाऊं और उसके बाद वहां के मैनेजमेंट को दुरुस्त करके उस हॉस्पिटल को सुधार कर रख दूँ…”
“हां!! चलो यह भी सही है… चलो यार बातें करते हुए बहुत देर हो गई। आज दोपहर में भी मैं खाना खाना भूल गई थी… कुछ खा लेते हैं। नीचे चल के मैस का टाइम भी हो गया है…”
प्राची और झनक अपने कमरे से निकले ही थे कि प्राची के मोबाइल पर अधिराज का मैसेज आ गया…
” डिनर ऐट चाट का ठेला..?”
प्राची के चेहरे पर मुस्कान चली आई, उसने झनक के सामने मैसेज खोल कर रख दिया …झनक भी मुस्कुराने लगी..
“आप जाइए मैम, मैं नीचे जा रही डिनर करने..”
“नो! तुम मेरे साथ चल रही हो डिनर करने.. मेरी बुलेट पर तुम और मैं हम दोनों लड़कियां। और अधिराज अपनी बाइक पर आ जाएगा…”
” ओके डन!”
दोनों हंसते खिलखिलाते मैस की तरफ जाने की जगह बाहर की तरफ निकल गई….
क्रमशः ;
aparna..
