मायानगरी -41

मायानगरी-41

   बस में चढ़ने के बाद रंगोली अपनी सीट पर जा बैठी और बगल में रख रखा बैग उठा कर गोद मे रख लिया , लेकिन उसका इशारा समझते हुए भी अभिमन्यु उसके साथ न बैठ कर ठीक उसके पीछे वाले सीट पर ही बैठ गया …
   उसी वक़्त एक उन्ही की उम्र का लड़का भी बस में चढ़ा और रंगोली की बाजू की सीट में बैठने जा रहा था कि उसकी नजर पीछे बैठे अभिमन्यु पर पड़ गई…
    सारी दुनिया के लड़कों के भी आपस में सीक्रेट कोड्स होतें हैं जो सिर्फ एक ही उम्र के लड़के ही समझ सकते हैं…
  उस लड़के ने अभिमन्यु को देखा और अभिमन्यु ने बस ना मे सिर हिलाया और वो लड़का  उसकी बात समझ कर अपना बैग उठाए आगे बढ़ गया…
  रंगोली ने चौंक कर एक बार पीछे बैठे अभिमन्यु को देखा और मुस्करा कर खिड़की से बाहर देखने लगी …
     कुछ डेढ़ दो घंटों में ही वो अपने शहर पहुंच गई  . घर के पास वाले चौक पर वो उतर गई तो उसके पीछे बस के दरवाजे तक अभिमन्यु भी चला आया …

” तुम नहीं उतरोगे ?”

अभिमन्यु ने ना में सिर हिला,  अपने बालों पर हाथ फेरते हुए वो एक बार फिर मुस्कुरा उठा…

” मेरा घर भी यहीं है …. अपने चौक पर पहुंच कर मैं भी उतर जाऊँगा और कल सुबह वापस लौट जाऊँगा..”

” ओह अच्छा !!” रंगोली के चेहरे पर भी मुस्कान खिल गई…
  और धीमे से हाथ हिला कर अपना बैग पकड़ वो अपने घर की तरह मुड़ गई….

   वो धीमे धीमे आगे बढ़ रही थी कि उसके ठीक बाजू में आकर एक स्कूटी रुकी और वह चौक कर उस तरफ देखने लगी…

” कौन था यह लड़का जिसे तू हाथ हिला कर बाय-बाय बोल रही थी…?

” मेहंदी, यार डरा दिया तूने तो..?

   “और मैडम तूने नहीं डराया हम सबको? इस रात वाली बस में आने किसने कहा था तुझे? कल सुबह नहीं आ सकती थी? जब से पता चला है मम्मी घर में इधर से उधर चक्कर काट रही है। मुझे स्कूटी लेकर दो बार चौक तक दौड़ा दिया, कि तेरी बस आई या नहीं। मैं बस तेरा ही इंतजार कर रही थी कि मैडम बस से उतरकर चल पड़ी पैदल… चल बैठ जा पीछे”

मुस्कुराकर रंगोली मेहंदी के पीछे स्कूटी पर बैठ गई और उसके कंधों पर हाथ रख कर उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया…

“तो बताया नहीं तूने कौन था वह लंबू?”

“यूनिवर्सिटी में साथ में ही है”

“डॉक्टर ही है?”

“नहीं इंजीनियर है”

“यह कैसा कपल बन गया भाई? डॉक्टर वर्सेस इंजीनियर सुना था यहां तो डॉक्टर वेड इंजीनियर हो रहा है..”

“चुप कर!! ऐसा कुछ नहीं है, उसका भी घर यहीं है शायद इसीलिए इसी बस में चला आया वह भी इत्तेफाक से..

“और इत्तेफाक से ही मेरी बहन ने बस से उतरने के बाद उसे बाय-बाय भी बोल दिया…
   उसके चेहरे की चमक देखने लायक थी तेरे बाय के बाद…”

“मेहंदी तू भी ना कुछ ज्यादा ही दिमाग लगा लेती हैं, चल घर चल फटाफट बहुत भूख लगी है…

”        इश्क़ वाला लव
      हुआ जो दर्द भी तोह
     हमको आज कुछ ज़्यादा हुआ
          इश्क़ वाला लव   ” रंगोली को चिढ़ाते हुए मेंहदी गुनगुनाने लगी…

दोनों बहने बातें करती  स्कूटी पर लहराती हुई घर की तरफ निकल गई ….अभिमन्यु बस की खिड़की से जब तक रंगोली नजर आती रही उसे देखता रहा और फिर मुस्कुरा कर उसने अपना सर सीट के पीछे टीका लिया..

*******

    गौरी के ऊपर नाराज होकर वेदांत अपनी शर्ट साफ करता हुआ फटाफट अपनी जीप में जा बैठा, उसने तुरंत अपने एक दोस्त को फोन घुमाया और एक एड्रेस बता कर एक नई कमीज मंगवा ली….
      लेकिन जीप में चढ़ने से पहले वो फोन वहीं एक तरह रख अपनी कमीज साफ़ करने लगा और फिर जीप पर सवार होकर वहां से निकल गया …
    वैसे भी लेट हो चुका था इसलिए गाड़ी को भगाते हुए पार्टी वाली जगह पर पहुंचने की कोशिश करने लगा… वहां पहुंचकर उसने वेले पार्किंग के लिए गाड़ी की चाबी वहां खड़े गार्ड को दी और फटाफट तेज कदमों से अंदर की तरफ बढ़ गया ….
   उसका एक दोस्त उस होटल के बाहर गेट पर खड़ा उसका इंतजार कर रहा था। उसके हाथ से शर्ट का पैकेट लेकर वेदांत अंदर घुसने लगा कि होटल के दरवाजे पर खड़े गार्ड ने हाथ दिखा कर उसे रोक दिया…
   वेदांत का दिमाग पहले ही खराब था उस पर कुछ ना कुछ ऐसा हो रहा था कि उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था उसने जेब से अपना इनविटेशन कार्ड निकालने के लिए हाथ डाला लेकिन उसकी पेंट की जेब में वह इनविटेशन मौजूद नहीं था..
  उसी वक्त उसे याद आया कि जब उसके पिताजी ने उसे इनविटेशन दिया था, तब उसने वह कार्ड अपनी शर्ट की जेब में डाल दिया था। उसने फटाफट शर्ट की जेब की तलाशी ली लेकिन वहां भी वो कार्ड नहीं मिला।  उसे समझ में आ गया कि रुमाल निकालते समय शायद वह कार्ड वहां गिर गया एक बार फिर उसका दिमाग गौरी पर पूरी तरह से खराब हो गया…

सब उस बेवकूफ लड़की की कारस्तानी है। ना वह मुझ से टकराती और ना मुझे यहां पहुंचने में देर होती..
मन ही मन ही यह सोचते हुए उसने उन गार्ड को अपना परिचय दिया लेकिन गार्ड के लिए सिर्फ यह बता देना कि वह नेता जी का बेटा है पर्याप्त नहीं था गार्ड्स उसका परिचय पत्र देखना चाहते थे..

” अरे यार तुम समझते क्यों नहीं हो, हम वेदांत सिंह हैं। होने वाले विधायक जी के बेटे और तुम लोग हमें ही रोक रहे हो..

   “यह सब हम आप लोगों की सुविधा के लिए करते हैं। कल को कोई भी लड़का नेताजी का, मंत्री जी का बेटा बनकर चला आएगा और बिना कार्ड दिखाए अंदर घुस जाएगा तो अंदर आप जैसे लोगों को दिक्कत होगी सर ! बस यह फॉर्मेलिटी है, आप कार्ड दिखा दीजिए और अंदर चले जाइए..

“अबे यार, हम कह रहे हैं ना कार्ड  कहीं गिर गया। क्या करें ?कार्ड नहीं है तो क्या हम अंदर नहीं जाएं?अरे अंदर हमारे बाबूजी मौजूद है..”

“तो फिर आप ऐसा कीजिए कि एक बार उन्हें कॉल करके हमसे बात करवा दीजिए..

“ओके 1 मिनट..”

  वेदांत को भी यह सही लगा कि वह फोन करके अपने बाबूजी को वही बुलवाले। वह वापस अपनी पैंट की जेब में अपना मोबाइल तलाशने लगा। लेकिन इस बार उसका मोबाइल भी गायब था। वेदांत का दिल किया वह अपना सर फोड़ ले , उसे आज तक इतनी ज्यादा खीझ कभी नहीं हुई थी…..
    वो परेशान होकर वहीं एक तरफ हट कर सीढ़ियों पर बैठ गया ….ये वीआईपी पार्टी थी जिसमें सिर्फ चुनिंदा लोगों को बुलाया गया था, इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं आया था।  अब अकेले वहां क्या करे यही सोच रहा था कि उसके कंधे के बाजू से एक हाथ उसकी तरह बढ़ा जिसकी हथेली पर उसका फोन रखा था ..
   उसने तुरंत चौंक कर देखा , बाजू में गौरी खड़ी थी …

” मैंनें देख लिया था। तुम्हारा फोन तुम वहीं छोड़ कर निकल गए थे.. मैं पीछे आवाज देती हुई भागी भी लेकिन तुमने सुना नहीं , शायद कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी में थे ..”

  फोन अपने हाथ मे लेते ही वेदांत के चेहरे पर राहत के भाव आ गए ……
  उसने मुस्करा कर गौरी को देखा और तुरंत उठ कर भागकर होटल की तरह बढ़ते हुए अपने बाबु जी को फोन लगाने लगा , उसे होटल की तरह बढ़ते देख गौरी भी बाहर की तरह बढ़ गई….
   अपने बाबुजी से बात करने के बाद अचानक उसे याद आया कि एक बार गौरी का शुक्रिया तो कर ही देना चाहिए इसलिए अपने बाबुजी के बाहर आते तक में वो वापस बाहर के गेट की तरह तेज कदमों से बढ़ गया…गौरी तेज़ कदमों से चली जा रही थी , उसे जाते देख वेदांत ने आवाज लगा दी ….

” हे डॉक्टर  सुनो,  अरे रुको तो..?

  गौरी को जैसे ही वेदांत की आवाज सुनाई पडी वो रुक गयी….

” क्या हुआ ?”

  वेदांत ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकले और उसकी ओर बढ़ा दिए ..

” ये रख लो , और हाँ थैंक्स। मेरा फोन लाकर देने के लिए ..!”

गौरी आश्चर्य से उस अड़ियल और सनकी लड़के को देख रही थी…

” मैंनें पैसों के लिए तुम्हारा फोन नहीं लौटाया !”

” हाँ जानते हैं , लेकिन ये हमारे फोन की कीमत है… सवा लाख का फोन हैं.. सेकंड हैंड भी बेचने जाती तो सत्तर पचहत्तर हज़ार तो मिल ही जाते.. पर तुमने इस फोन को बेचने की जगह ईमानदारी से इसे हमें लौटा दिया …”

” मेरी ईमानदारी की कीमत लगा रहे हो..? मानती हूं कि मैं पैसे वाली नहीं हूं,  पर खुद्दार हूं। मेरा फोन सवा लाख का भले नहीं है लेकिन काम सारे वहीं करता है जो तुम्हारा।  मानती हूं कि तुम चांदी की थाली में खाते हो और मैं स्टील मे लेकिन खाते हम दोनों ही एक सी आटे की रोटी हैं….
   तुम्हारे और मेरे जीने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी  ऑक्सीजन है, जिसकी कोई कीमत ना तुम खर्च करते हो और ना मैं…
  तो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे उन रुपयों के ना मिलने से मैं मर जाऊँगी तो अपना ये रुपया अपनी जेब में रख लो क्योंकि अभी कुछ देर पहले तुमने खुद वो सारा ड्रामा देख लिया है, जिसमें तुम्हारी जेब के ये रुपये भी तुम्हारे किसी काम नहीं आ सके…..
   अखिर तुम्हारे बाबुजी का नाम ही काम आया तो बस यही कोशिश करो की वो नाम जो तुम्हारा सरमाया है उसे खराब ना करो…”

  गौरी ने वेदांत के रुपये उसके हाथ मे  रखे और मुड़ कर तेज कदमों से आगे बढ़ गई….

वेदांत खाली-खाली आंखों से उसे जाते देखते रहा की तभी उसके बाबूजी की आवाज उसके कानों में पडी और वो तेजी से उसकी तरह बढ़ गया…और फिर उन्हीं के साथ होटल में अंदर प्रवेश कर गया ….
  अबकी बार अंदर जाते समय दोनों गार्ड्स ने उसे सलाम ठोंका और वापस उसके कानों में गौरी के शब्द गूंज गए कि उसकी पहचान सर्फ उसके बाबुजी के नाम से है…

  अंदर महफिल चमक रही थी… शहर के सारे बड़े लोग वहाँ मौजूद थे ..उसकी यूनिवर्सिटी के बड़े पदाधिकारी डीन प्रोफेसर आदि भी मौजूद थे …अंदर जाने के बाद उसके बाबुजी अपने लोगों से मिलने जुलने मे लग गए,  वो जाते जाते कह गए थे कि राजा साहब से उसे जरूर मिलना है ….
    पार्टी बहुत शानदार थी… एक तरफ एक छोटे से मंच पर गुलाबी गद्दे और तोषक सजे थे ..जिस पर कोई ग़ज़ल गायक बैठा कोई तान छेड़े हुए था… इधर से उधार घूमते वेटर ड्रिंक्स और स्टार्टर लेकर घूम रहे थे, वेदांत ने भी एक गिलास उठा लिया, तभी उसकी नजर अपने बाबूजी पर पडी,  उन्हें किसी ने आकर कुछ कहा और वो अपने माथे का पसीना पोछते उसके पीछे बढ़ गए..
ये देख कर वेदांत भी उनके पीछे बढ़ गया…
    हॉल से एक तरह एक छोटा गलियारा था उसे पार कर उसके बाबूजी एक कमरें में पहुंच गए…कमरा काफी बड़ा लग रहा था और वहां और भी कुछ लोग मौजूद थे..
  उसके बाबूजी जैसे ही अंदर दाखिल हुए कि किसी की तेज आवाज उसके कानों में पडी …

  ” आइए आइए,  आप ही का इंतजार था सिंह साहब…आप साफ साफ बतायेगा की आपको इस बार टिकट चाहिए या नहीं  ? क्यों आप लोग बार बार हमारी इज्जत उतारने पर लगे रहते हैं… यहां इस वक़्त वहीं आठ लोग मौजूद हैं, जिन्हें लेकर हम चुनाव के समय अजातशत्रु से अलग हुए थे और फिर किस्मत ने यूँ पलटी खाली की हम सब उसी के पाले मे आ गए…
  तो अब आप लोग इस बात को भी समझ क्यों नहीं लेते की अगर उसकी टीम में रहना है तो काम उसी के हिसाब से करना पड़ेगा … राजा अजातशत्रु जितना सीधा दिखता है वैसा है नहीं…
आप लोगों को क्या लगता है हमारे ससुर ठाकुर साहब को उसके मंत्री समर ने अकेले टपका लिया? अरे मूर्खों इस सब के पीछे वो शातिर अजातशत्रु ही है…पहले के ज़माने के राजा होते थे ना अपनी तरफ बोलने वालों को चुन चुन कर अपने महल की शान बनाते थे और अपने खिलाफ खड़े होने वाले का सिर कुचल दिया करते थे… बस वैसा हीं कुछ है ये भी…
और आप लोग उसी के खेमे मे आकर इस कदर ऊटपटांग हरकते कर रहे हैं कि वो वापस नाराज हो उठे …
    अजातशत्रु ने सिर्फ पंद्रह दिन का वक्त दिया है उस लड़की की मौत की गुत्थी सुलझाने को …
तो अब मैं आप सब को सिर्फ सात दिन का समय देता हूं कि जैसे भी हो उस की मौत का राज किसी तरह भी बाहर ना आने पाए। इसके लिए कमर कस लीजिए, और ध्यान रखें की किसी तरह का कोई सबूत इधर उधर ना रह जाए …

   ” पर राजा विराज सा , सबूत तो सारे हमने उसी समय गायब कर दिए थे …

” पर उसे मार डालने की जरूरत ही क्या थी जोरावर?

” राजा साहब वो हम सब का राज अजातशत्रु से बताने जाने को तैयार थी…

” तो उसके मुहँ में और रुपया ठूंस देते , तुम लोगों को ये सब इतना आसान लगता है क्या? की किसी को भी कभी भी मार दिया …

” माफ कीजिए विराज सिंह सा ..

   विराज ने उस आदमी की तरह घूर कर देखा और वो अपनी गलती समझ में आते ही माफी मांगते हुए अपनी बात सुधारने में लग गया…

” माफ कीजिए राजा विराज सा !”

” हम्म अब ठीक है …हमें ऐसी टुच्ची गलतियां पसंद नहीं आती…हम जान से तो नहीं मारते लेकिन जिंदा रहने लायक भी नहीं छोड़ते…

ये सब बाहर सुनता खड़ा वेदांत अपने आपे में नहीं था..उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसके खुद के पिता एक लड़की के कत्ल में शामिल थे….

उसका सिर चकराने लगा था , वो दोनों हाथों से अपना सिर थामे बाहर की ओर तेज कदमों से बढ़ने लगा कि सामने से आते किसी से टकरा कर गिर गया…सामने वाले ने उसके कंधे पकड़ कर उसे उठा दिया …

” ठीक हो? कोई तकलीफ लग रही है तुम्हें ? क्या मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूं…”

  वेदांत ने सामने देखा एक लंबा चौड़ा और बेहतर शानदार व्यक्तिव का स्वामी  खड़ा था , वेदांत की आंखें जैसे झपकना भूल गईं…

” जी नहीं हम ठीक हैं…आप कौन?”

” मैं राजा अजातशत्रु  हूं…!

क्रमशः

aparna


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