अपराजिता -12

कुसुम ने अपनी मां के सामने रो गिड़गिड़ा कर बार-बार प्रार्थना की कि वह शादी के 2 दिन पहले पहुंच जाएगी लेकिन उसकी मां ने उसकी एक नहीं सुनी और उसे पकड़ कर अपने साथ ले गयी…।

जबसे कुसुम की मां ने अपने बेटे का ब्याह किया था, तब से उनकी एकमात्र हार्दिक अभिलाषा यही रह गई थी कि, अब वह कुसुम का भी ब्याह कर दें। अपने मामा घर ले जाने का एक कारण यह भी था कि वहां ब्याह में अपनी बिरादरी के लोगों के साथ मिलना जुलना होगा तो हो सकता है कोई अच्छा लड़का कुसुम के लिए भी मिल जायें… ।

अपने पिता से कुसुम के लिए अच्छा घर वर देखने की बात कहकर वह कुसुम को साथ लिए वापस लौट आई थी..
कुसुम के पिता अपनी ससुराल जाना पसंद नहीं करते थे, इसीलिए परिवार में शादी होने के बावजूद वह नहीं गए।
चंद्रभान अपने काम में इतना व्यस्त था कि वह भी नहीं जा पाया। और यह सब कुसुम की मां पहले से जानती थी इसीलिए अपने घर की नाक मायके में ना कटे बस इसीलिए उन्होंने कुसुम को अपने साथ ले लिया था।

खैर कुसुम एक शाम पहले घर आ चुकी थी और घर से बाहर निकलने के लिए तड़प रही थी..।

कुसुम के कस्बे में डॉक्टर साहब को आए लगभग 6 महीना बीत चुका था। जिनमें शुरू के 5 महीने तो कुसुम और भावना किसी ना किसी बहाने से डॉक्टर साहब के क्लीनिक पहुंचती रही, लेकिन पिछले 1 महीने से कुसुम ने डॉक्टर साहब को नहीं देखा था और उसे उनकी बहुत याद आ रही थी।

सुबह सवेरे जैसे ही भावना उसे लेने के लिए पहुंची कुसुम छत से उसे देख कर चहक उठी…

वो सीढ़ियां उतरती भागती हुई भावना के पास पहुंच गई, और भावना के गले से लग गई।
भावना भी महीने भर बाद कुसुम को देख कर खुश थी। तभी कुसुम की मां रसोई से निकलकर बाहर चली..

” अरी भावना तुम कब आईं.. आओ आओ बैठो.. !”

खुले दालान में एक तरफ सोफा लगा हुआ था, दूसरी तरफ दीवान पर कुसुम के पिता अधलेटे से अपने पैरों की मालिश करवा रहे थे! नौकर जमीन पर बैठा उनके पैरों में तेल लगा रहा था! कुसुम की भाभी अपनी 3 साल की बिटिया गिट्टू को तैयार करके धूप में धरने लायी थी..
पर गिट्टू कहीं बैठने को तैयार ना थी.. वह सारे ओसारे में इधर से उधर भागदौड़ मचा रही थी। एक नौकरानी सिर्फ गिट्टू को संभालने उसके पीछे पीछे भाग रही थी। कुसुम की भाभी ने भावना को देखा और उसके पास चली आई..

” भावना तुम्हारे लिए चाय बना दें.. ?”

भावना ब्राह्मण थी इसीलिए ठाकुरों के घर उसकी कुछ विशेष आवभगत हुआ करती थी। कुसुम की मां और भाभी भावना को बहुत सम्मान दिया करते थे, और यह बात भावना भी जानती थी..।

” नहीं भाभी घर से नाश्ता करके निकले हैं… बस अब कॉलेज निकलेंगे ! कुसुम भी तैयार हो जाए!”

“हम्म !”

कुसुम की भाभी अपना पल्ला संभालती हुई रसोई घर में घुस गई…

कुसुम की मां अपना पल्ला संभालते हुए एक बड़े से कलई के गिलास में दूध लिए भावना के पास चली आई..

” चाय नहीं पीओगी कोई बात नहीं, लो दूध पी लो। घर की गाय का है..।
यह तुम आजकल की छोरियों को पतले रहने का जाने क्या भूत सवार है? ना दूध सुहाता ना घी। एक ये कुसुम है, वहां शादी वाले घर में भी घी नहीं खाना, दूध नहीं पीना, दही नहीं खाना ! कहने लगी हमनें तो चाय भी छोड़ दी है.. !”

भावना को कुसुम के दूध दही छोड़ने का राज पता था इसलिए उसे यह सुनकर हंसी आ गई…
उसने वह गिलास पकड़ा और अपने मुंह से लगा लिया। दूध का गिलास खत्म करके उसने नीचे रखा, इतनी देर में कुसुम भी अपना दुपट्टा लिए चली आई। बालों को सलीके से रबड़ बैंड में बांधे कुसुम ने शालीनता से दुपट्टा दोनों तरफ से फैला कर ले रखा था। भावना को साथ लिए वह बाहर निकल गई…।

” अपनी फटफटिया में मत जाना, संतोस से कहो गाडी निकाल कर तुम दोनों को छोड़ आये.. !”

अपनी अम्मा का आदेश सुन कुसुम तमक कर अपने बाबूजी के सामने खड़ी हो गई..

” पापा आप देख लीजिए अम्मा की मनमानी ! हम कहे देते हैं हमें अपनी बाइक से ही कॉलेज जाना है, और हम अपनी बाइक से ही जाएंगे..!”

“अरे ठकुराइन, आप भी बिना मतलब का कलेश मचायी रहती हैं !अरे जब तक लड़की मायका में है, तभी तक तो अपना मनमर्जी कर पाएगी! कल को सासरे चली जाएगी तो फिर कहां की बाइक और कहां का क्या?
फिर तो नाक तक का घुंघट लेकर ही अपने सास के पीछे घूमेगी ना ! तो अभी कर लेने दो ना मन का !
उसी के लिए तो उसके पिछले जन्म दिन में बाइक खरीदे रहे… फिर अब चला ही लगी तो कहाँ का गजब भया?”

” आप ना कुछ ज्यादा ही छूट दे रखे हैं अपना लड़की को… ससुराल में यही रंग ढंग रखेगी ना, तो 1 दिन नहीं निभाने वाली ये लड़की.. ! कहें देते हैं आपसे !”

कुसुम की मां बड़बड़ाती हुई पूजा घर की तरफ चली गई। रसोई में कुसुम की भाभी चाय बनाते हुए अलग ही राग अलाप रही थी…।

” हमें तो राजकुमारी जी के लक्षण देखकर लगता है, यह घर से शादी वाले दिन ही भाग जाएंगी..!”

वहीं खड़ी नौकरानी ने मालकिन की बात सुनी या नहीं पता नहीं लेकिन उसने पूछ लिया..

“कुछ कहा आपने भाभी.. ?”

“हैं… नहीं.. तुमसे उस समय गोश्त साफ करके लाने कहे थे ना। अब तक काहे नहीं लाई ?
और सुनो, प्याज लहसुन अदरक को सिलबट्टा में अच्छे से पीस देना, इन को गोश्त सिलबट्टी में पिसे मसाले में ही भाता है समझी? और खड़ा मसाला अलग से निकाल कर देंगे,उसको भी भून के उसी सिलबट्टे पर पीसना….और सुनो ज्यादा हमारी बातों में कान ना दिया करो.. समझी ?”

“जी भाभी… !”

नौकरानी चुपचाप काम में लग गयी…

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