अपराजिता -12

अपनी बाइक पर भावना को बैठा कर कुसुम कुमारी कॉलेज की जगह सरकारी अस्पताल की तरफ मुड़ गई! आज महीने भर बाद उन्हें अपने डॉक्टर साहब के दर्शन करने का मौका मिल रहा था।
इधर इंद्रभान सिंह के घर पर महीना भर पहले ही उनके बड़े बेटे अखंड का आना हुआ था…

अखंड के आने के दूसरे दिन ही अखंड की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई थी।
उसके सीने में रह-रहकर दर्द उठा रहा था और इसीलिए बड़े ठाकुर परेशान हो गए थे। उन्होंने शहर से बड़ा डॉक्टर बुलवाया और अखंड की जांच पड़ताल करवाने लगे, लेकिन मसला गाँव देहात का था..।

अखंड की दादी और उसकी मां रट लगाए बैठे थे कि उनके सुंदर सुकुमार से लड़के को किसी की नजर लग गई है। और इसलिए उसकी नजर उतरवाने अखंड को साथ ले बड़े ठाकुर और उनकी पत्नी कहीं दूर के गांव में किसी बाबा जी के पास झाड़-फूंक करवाने चले गए थे। वहीं उन लोगों को 10 – 12 दिन लग गए।
इन दस -बारह दिनों में अखंड की तबीयत में अपने आप भी थोड़ा बहुत सुधार हो गया था।
और बाकी लोगों को लगा कि झाड़-फूंक करने से उसकी अला बला उतर गई है। और इसीलिए उसे लेकर वापस आ गये।

इसके कुछ दिन बाद तक अखंड घर पर आराम करता स्वास्थ्य लाभ लेता रहा। इसी सब में पूरा महीना बीत गया। और कुसुम कुमारी की तस्वीर की तरफ से ठाकुर परिवार का ध्यान फ़िलहाल उचट गया…।

इधर पंडित भोलाराम अपनी ही दुविधा में त्रस्त थे। उनके संबंध दोनों ही परिवारों से बहुत अच्छे थे, लेकिन उन्होंने कुसुम कुमारी के परिवार से पूछे बिना इंद्रभान जी के घर पर कुसुम की तस्वीर दे दी थी।
हालांकि वह कुसुम की तस्वीर वहां दिखाने के इरादे से लेकर नहीं गए थे, उन्हें तो भावना का रिश्ता देखना था..।

खैर उस दिन हड़बड़ी में जो भी हुआ हो, लेकिन अब पंडित भोलाराम को अपनी भूल सुधारनी थी। और इसके लिए उन्हें सबसे पहले कुसुम के पिता से मिलना था। और बस यही सोचकर वह ठाकुर चंद्रभान के घर पहुंच गए…।

जिस वक्त पंडित भोलाराम चंद्रभान के घर प्रवेश कर रहे थे, उसके थोड़ी देर पहले ही कुसुम भावना के साथ घर से निकलकर कॉलेज के लिए चली गई थी! पंडित भोलाराम ने घर में प्रवेश किया और उन्हें देखते ही ठाकुर साहब सीधे होकर बैठ गए…

पंडित जी का इस घर में भी मान सम्मान था… उन्हें देखते ही चंद्रभान के पिता ने अपनी श्रीमती जी को पुकार लिया…

“चंद्रा की अम्मा कहाँ हो.. ये देखो पंडित जी पधारे हैं !”

पंडित जी को प्रणाम कर कुसुम के पिता बैठ गए.. और कुसुम की माँ अपना आंचल संभालती बाहर चली आई..

“पाय लागी पंडित जी… और सब कुसल मंगल ?”

“ख़ूब खुसी रहो बड़ी ठकुराइन, मांग सिंदूर सदा विराजे, पूतों वाली हो.. !”

“विराजिए पंडित जी.. आज बड़े दिन के बाद सुध ली है हमारी !”

“आया रहा ठकुराइन बीच में… आप पीहर रहीं उस बखत !”

“हाँ बड़े भैया की बिटिया का ब्याह रहा.. !”

“बहुत बढ़िया… राजी खुसी हो गया सब ?”

“जी पंडित जी.. आपका आशीर्वाद था.. अब हमारी कुसुम के लिए भी कुछ बताएं !”

“बस ठकुराइन.. उसी काज से आये हैं.. ! मानौर के परिहारों का नाम सुना है ना !”

परिहारों का नाम सुनते ही ठाकुर साहब और सतर्क होकर बैठ गए…..

“हाँ.. सुना तो है.. !”

“जान पहचान है ?”

“हाँ मिलना हुआ है, किसी बरादरी के सम्मेलन में.. वैसे चंद्रा से उनकी ज्यादा मुलाकात हुई है.. !”

“बड़े ऊँचे ठाकुर है.. ख़ूब रुआब वाले हैं.. दो भाई है साथ ही सारा परिवार रहता है.. आज तक दोनों बहुओं के बर्तन कभी नहीं खटके हैं.. इतना मेल मिलाप है की किसका बच्चा कौन है बाहर का आदमी जान नहीं सकता..
बड़े इंद्रभान के दो लड़के हैं.. अखंड और यज्ञ.. दोनों बहुतै सुंदर लड़के हैं.. बिल्कुल आंखें जुड़ा जायें ऐसे..
हमारी बिटिया के लिए बढ़िया घर और वर रहेगा.. !”

ठाकुर साहब सोच में पड़ गए…

“हम्म… वो लोग तैयार हो जायेंगे ?”

“आपके घर के रिश्ते के लिए मना करने की किसकी औकात है ठाकुर साहब !”

ठाकुर साहब मुस्कुरा उठे..
ठकुराइन को पंडित जी की बात बड़ी पसंद आ रहीं थी.. वो रसोई से एक तश्तरी में मिठाई और कांसे के गिलास में दूध लें आई…
पंडित जी दूध देख कर प्रसन्न हो गए..

“ठकुराइन, बिटिया का कोई फोटो हो तो… !”

“हाँ है ना पंडित जी… ऐ सुजाता… सुनो कुसुम की एक तस्वीर ला दो ज़रा.. !”

अपनी साड़ी और पल्ला संभालती बहु सीढ़ियां चढ़ ऊपर चली गयी और कुसुम की एक तस्वीर लाकर पंडित जी के सामने रख दी… !”

पंडित जी ने तस्वीर उठायी और उनके चेहरे पर चमक चली आई…


इधर रेशम के दो दिन शादी ब्याह में पंख लगा कर उड़ गए..
बारात वाले दिन अथर्व ने उसे सुबह ही बता दिया था कि उसके हॉस्पिटल में इंस्पेक्शन होना है, इसलिए आज सारा दिन व्यस्त रहेगा..
फिर भी शाम से रेशम अथर्व का रास्ता देख रहीं थी..

लेकिन देर रात तक भी अथर्व अपने अस्पताल से निकल कर नहीं आ पाया..।
उसके माता पिता आये थे.. उन्होंने रेशम को ले जाने के लिए इशारे से पूछा भी लेकिन शादी के बाद की पहली बिदाई ऐसे कैसे कर दें कह कर रेशम की माँ ने एक दिन के लिए और रेशम को रोक लिया…

अगले दिन बहु की मुहँ दिखाई और बाकी कामों से फुरसत पाकर रेशम और उसकी माँ घर चले आये और कुछ देर आराम कर उसकी माँ उसके जाने की तैयारियों में लग गयी..
मानव भी ऑफ़िस से आ गया था..

मानव के आते ही रेशम उठी और उसके लिए पानी का गिलास ले आई..

“ये क्या हो गया भई… आज रेशु मेरे लिए पानी ला रहीं.. !”

“हाँ फिर ? भाई को पानी नहीं दे सकती मैं..?”

” कमाल है, इसके पहले तो कभी अपने भाई के लिए कुछ नहीं सोचा ! हमेशा मुझे गालियां देती रही है ! लुच्चा, टुच्चा और जाने क्या-क्या ?
आज तक तो तेरे हर काम मैं ही करता आया हूं! आज क्या हो गया तुझे ?”

रेशम ने पानी का गिलास वापस छीन लिया..

“तू मेरी सेवा लायक है ही नहीं नालायक !”

“अरे अरे.. दे वापस.. !”

मानव ने वापस पानी का ग्लास छीन लिया..

“अबे इतनी इमोशनल क्यूँ हो रहीं.. ? ऐसा क्या बोल दिया मैंने जो तुझे रोना आ गया..?”

रेशम को खुद समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्यों इतनी भावुक हुई जा रही थी। असल में उसे लेने के लिए रात में उसका देवर आरव आने वाला था, और बस इसीलिए वह अपने भाई की थोड़ी स्पेशल केयर करना चाहती थी..।
मानव भी इस बात को समझता था,, लेकिन अगर वह भावुकता भरी बातें करता तो रेशम और रोने लगती बस इसीलिए वह उसकी हरकतों को नजरअंदाज करते हुए मजाक में उड़ा रहा था।
लेकिन रेशम भावुक हो ही गई और मानव ने गिलास एक तरफ रख कर उसे अपनी बाहों में समेट लिया…

” पगली! ससुराल जाने के नाम पर तुझे रोने की क्या जरूरत है ?
बल्कि देखना अगली बार जब तू आएगी ना और वापस लौटेगी तो तेरे ससुराल वाले रोएंगे। मुझे पूरा विश्वास है मेरी बहन के ऊपर, और यह जो भोलेपन और सीधे पन का मास्क तूने चढ़ा रखा है ना,यह महीना बीतते बीतते तेरे चेहरे से गायब हो जाएगा।
और तब तेरे ससुराल वाले बिल्कुल इसी ढंग से रोएंगे तू देख लेना…।”

मानव उसके बालों पर हाथ फेरते उसे वापस छेड़ने लगा और वो अपनी मुट्ठी से धीरे-धीरे उसके सीने पर मारते हुए हंसने लगी..

दोनों भाई बहनों का प्यार देखकर रसोई के दरवाजे पर खड़ी उनकी मां भी भावुक हो गई। अपने आंचल से अपने आंसू पोछ वह नाश्ते की ट्रे पकड़ कर बाहर चली आई..

” आओ तुम दोनों कुछ खा लो..!”

नाश्ता देखकर रेशम की आंखें फट गई..

4 2 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted