
अतिथि -61
चारु रसोई में चाय चढ़ा रही थी कि तभी दरवाज़े पर किसी ने घंटी बजा दी..।
चारु ने रसोई से ही झांक कर देखा, उसके पिता चुपचाप बैठे अपने बही खातों का हिसाब कर रहे थे। वह खुद हाथ पोंछ कर दरवाजा खोलने बाहर निकल आई।
दरवाजा खोला तो सामने खड़ी अपनी मां को देखकर कुछ देर के लिए वह निशब्द रह गई। उसने दरवाजा पकड़कर एक तरफ खोल दिया और खुद एक तरफ खड़ी हो गई..।
योगिता भरी भरी आंखों से अपनी बेटी को देख रही थी। बिना कुछ बोले वह चुपचाप अंदर चली आई। अंदर जाकर कुछ देर के लिए वह उस कुर्सी के सामने खड़ी रही, जहां दीपक बैठकर अपना काम निपटा रहा था। चारू भी आकर एक तरफ खड़ी हो गई, लेकिन तीनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।
दीपक को आभास हो गया था कि सामने योगिता खड़ी है, लेकिन उसने आंख उठाकर देखा भी नहीं।
अपमान से योगिता का मुहँ काला पङ गया।
उस के तन बदन में आग लग गई..।
लेकिन उसके पास और कोई उपाय भी नहीं था। इन दोनों को छोड़कर जाती भी तो कहां जाती?
गयी तो थी,अपना व्यक्तित्व ढूंढने, लेकिन इतने बड़े संसार में एक अकेली औरत का कोई ठिकाना भी कहाँ हैं.. ?
हालाँकि जाते समय भी उसके मन में यही था कि दीपक उसे आवाज़ देकर बुला लेगा..।
या फिर उसे ढूंढने चला आयेगा, लेकिन उसकी सोच अधूरी रह गयी..।
उसे लेने कोई नहीं आया और उसे खुद अपने पैंरो वापस लौटना पड़ा..
वो कुछ देर चुपचाप यूँ ही खड़ी रही..
“आप चाय पियेंगी ?”
चारु का सवाल थप्पड़ सा उसके कानो पर पड़ा..।
वो न में सर हिलाना चाहती थी, लेकिन ट्रे की तरफ देख कर उसने चाय का प्याला उठा लिया !
इस वक्त उसे वाकई एक अदद चाय की बेहद ज़रूरत थी..
सुबह से सोचते सोचते उसकी कनपटी पर हथौड़े चलने लगे थे ! उसे अब ध्यान आ रहा था कि सुबह से उसने कुछ खाया पिया नहीं था !
चाय का प्याला पकडे हुए वो एक किनारे की कुर्सी पर बैठ गयी…
ये उसका अपना घर था, जिसे उसने बहुत मन से सजाया था। लेकिन आज इस घर का कोना कोना उसे किसी अजनबी की तरह घूर रहा था..।
उसकी खुद की बेटी मेहमानों की तरह उसे चाय के लिए पूछ गयी थी..
उसका पति उसकी तरफ आँख उठा कर देखने की जहमत नहीं उठा रहा था..
आखिर वो करे भी तो क्या ?
उसने चाय की एक घूंट भरी और फिर कुछ सोचते सोचते पूरी चाय पी गयी..।
अपना प्याला रसोई की सिंक में रख कर वो रसोई से निकली और अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी..
कमरे में जाकर उसने दरवाज़ा बंद कर लिया !
दरवाज़ा उसने ज़रा तेज़ी से ही बंद किया था, उसे लगा शायद अब कोई घबरा कर दरवाजे तक चला आएगा.
वो कुछ देर दरवाज़े से टिक कर साँस रोके खड़ी रही..
“पापा… मम्मी ने कमरे का दरवाज़ा लगा लिया है !”
चारु ने अपनी आंखे अपने पापा पर टिका दी !”
“वो खुद को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती बेटा.. तुम निश्चिन्त रहो ! अगर उसे खुद के साथ कुछ गलत करना होता तो वो घर वापस नहीं लौटती…।
अभी भी वो यही चाह रही कि हम दरवाज़े को खडका कर खुलवा दे, और उसकी झूठी आन बनी रह जाये। कि वो खुद से मजबूर होकर घर नहीं लौटी बल्कि हमारे कारण लौटी है.. !
वो तुम्हारी माँ है, तुम्हे इस वक्त उसके पास होना चाहिए बेटा ! जाओ और दरवाजे के बाहर से उसे पुकार लो..
मेरी बीवी न सही तुम्हारे लिए तो वो एक अच्छी माँ है !”
चारु कुछ देर चुप बैठी रही..
“नहीं पापा.. उन्हें थोड़ा और वक्त देना होगा ! मैं अगर उनके पास चली गयी तो उन्हें अब भी अपनी गलती नजर नहीं आएगी !”
चारु की आंखे भीग गयी, और वो अपने पिता के पैरो के पास ज़मीन पर बैठ कर उसके घुटनो में अपना सर टिकाये बैठी रही..
दीपक धीरे धीरे उसके बालों में हाथ फेरता रहा..
दरवाज़े से चिपक कर खड़ी योगिता को जब ऐसे ही दस मिनट बीत गए, तब वो समझ गयी कि उसके पीछे फ़िलहाल कोई नहीं आने वाला… वो अपने कपड़े लिए बाथरूम में घुस गयी..
मल मल कर उसने स्नान किया, और बाहर चली आयी.. !
अब उसे थोड़ा हल्का महसूस हो रहा था..
कभी कभी पानी के छींटे, स्नान या एक कप चाय भी बड़ी से बड़ी परेशानियों में मलहम का काम कर जाते हैं..।
योगिता अब खुद को तरोताज़ा अनुभव कर रही थी..
उसने कपड़े बदले, बालों को झटक कर सुखाया और नीचे चली आयी..
नीचे दीपक और उसकी बेटी बैठ कर टीवी देख रहे थे..
दीपक सोफे पर बैठा था और उसके ठीक सामने ज़मीन पर चारु बैठी थी.. दीपक उसके बालों में तेल लगा रहा था।
उन दोनों पर एक नजर डाल योगिता रसोई में घुस गयी..।
शाम ढल चुकी थी, पर रसोई में कुछ भी नहीं बना था..।
ऊंट जैसी हो गयी है लड़की, लेकिन खाना बनाना नहीं आया इसे..।
खुद से ही बातें करती योगिता रसोई की सफाई और खाना बनाने में लग गयी।
उसने फटाफट परवल साफ़ किये और छौंक लगा दी, इसके बाद आटा लगाने लगी..
घंटे भर में उसका सारा खाना बन गया था।
उसने थाली परोसी और बाहर ले आयी..
चारु के सामने बिछे टेबल पर उसने उन दोनों की थालियां परोस दी..।
उसे लगा, ये दोनों लोग उसका बनाया खाना शायद ही खाएंगे..
शायद उसे इन दोनों की चिरौरी करनी होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ..।
थालियां लगते ही दीपक उठ कर चला गया..
योगिता देखती रह गयी कि अब क्या करे, लेकिन वो हाथ धोकर वापस आया और थाली हाथ में लेकर खाना शुरू कर दिया !
चारु ने भी थाली उठा ली.. योगिता के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आई..।
वो दीपक को थाली में कुछ ढूंढते देख तेज़ी से रसोई में गयी और मिर्च का अचार लिए बाहर चली आयी।
उसे मालूम था दीपक को ये अचार बहुत पसंद है, लेकिन अक्सर वो उसे ये अचार तभी दिया करती थी, जब उसे अपनी कोई बात मनवानी होती थी..।
लेकिन आज उसे कोई बात नहीं मनवानी थी..
बस आज उसे दीपक की ख़ुशी चाहिए थी.. सच्ची ख़ुशी !
उसने अचार का चम्मच जैसे ही दीपक की तरफ बढ़ाया, दीपक ने हाथ बढ़ा कर मना कर दिया..
“अरे क्यों, ये अचार तो आपको बहुत पसंद है न ?”
“अभी नहीं चाहिए !” दीपक ने साफ मना कर दिया, लेकिन योगिता ने तब भी लाड़ लड़ाते हुए अचार परोस ही दिया..
दीपक चुपचाप खाता रहा !
उसका खाना ख़त्म हो गया, लेकिन उसने अचार को हाथ भी नहीं लगाया..
“बेटा, तुम्हारी मम्मी को भी खाना खिला दो !”
दीपक ने चारु से कहा और उठ कर हाथ धोने चला गया..
योगिता ने मुस्कुरा कर दीपक की थाली उठा ली और अंदर चली गयी..
अपनी थाली में उसके छोड़े अचार को परोस क़र वो अपना खाना लिए बाहर चली आयी..
चारु अब भी खा रही थी।
योगिता उसी के साथ बैठ गयी..
“क्या चल रहा है चारु.. बहुत दिन से तुमसे कॉलेज की कोई बात ही नहीं हुई ?”
चारु ने आंखे फाड़ कर अपनी माँ की तरफ देखा
“आप बहुत दिन बाद लौटी हैं क्या ? ऐसे सवाल क्यों कर रही हैं ?”
चारु का रुखा जवाब योगिता को खट से लगा, लेकिन बेटी तो उसी की थी। उसी की सी जबान बोलना सीख गयी थी, सो अब क्या किया जा सकता था !
योगिता मन मसोस कर खाने लगी..
उसे भूख तो बहुत तेज़ लग रही थी, लेकिन खाया कुछ भी नहीं जा रहा था..
बड़ी मुश्किल से उसने एक रोटी जैसे तैसे ख़त्म की, और अपनी थाली रसोई में रख आयी !
दीपक टहलने के लिए बाहर निकल गया था..।
और कोई दिन होता तो वह योगिता को जरूर बुलाता। दीपक की खाना खाने के बाद टहलने की आदत थी, वह अक्सर टहलते हुए पास वाली पान की दुकान तक जाया करता था, और अपने और योगिता के लिए पान लेकर आया करता था।
हर रात जाने के पहले नियम से वह योगिता से भी चलने को कहा करता था, बहुत बार योगिता उसके साथ चली जाया करती थी, लेकिन कई बार वह दीपक को यूं ही अकेले भेज कर भूषण से गप्पे मारने में लग जाती थी।
आज आदत के मुताबिक दीपक ने योगिता को आवाज नहीं लगाई, और अकेला ही चला गया। यह सारी बातें योगिता को चुभ तो रही थी, लेकिन वह कुछ भी नहीं कर सकती थी।
वह वापस आकर अपनी बेटी के बगल में बैठ गई। सामने रखे रिमोट से उसने चैनल बदलना शुरू कर दिया।
” अच्छा बताओ तो क्या देखोगी तुम?”
उसने चहक कर चारू से सवाल कर दिया। चारू ने उस वक्त कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा।
” बताओ तो सही, अच्छा तुम्हारी फेवरेट कार्टून मूवी लगा दूं?”
चारू को अभी अपनी मां की किसी बात का जवाब देने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन उसकी मां लगातार चैनल बदलते हुए उसका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी।
आखिर थक कर चारू अपनी जगह पर खड़ी हो गई।
” आपको जो देखना है, देखिए। लेकिन मुझे कुछ भी देखने के लिए फोर्स मत कीजिए।”
” मैं तुम्हें फोर्स नहीं कर रही बेटा। मैं तो वही देखना चाहती हूं, जो तुम देखोगी। हम दोनों साथ बैठकर टीवी देखें, तो?”
” तो बिल्कुल अच्छा नहीं होगा। आज से पहले आपको कभी इस बात की जरूरत महसूस नहीं हुई, कि आप मेरे साथ बैठकर टीवी देखें।
इसलिए तो आपको पता भी नहीं कि मैं टीवी पर क्या देखना पसंद करती हूं? मां मुझे टीवी पर कार्टून देखें सालों बीत गए।
अब मैं के ड्रामा और सी ड्रामा देखा करती हूं। मैं जानती हूं उनके बारे में आपको कुछ भी नहीं पता। प्लीज माइंड योर ओन बिजनेस।
जबरदस्ती मेरी अच्छी मां बनने की एक्टिंग मत कीजिए, मुझे और ज्यादा खराब लग रहा है।”
इतना कहकर चारू उठी और सीढ़ियां चढ़कर अपने कमरे में चली गई। योगिता तड़प कर रह गई। उसकी बेटी उसे जवाब दे देकर उसकी भूल पर हर पल उसे सजा दे रही थी, और उसका पति उससे अबोला कर के उसे सजा दे रहा था..।
अपने गले में उमड़ती रुलाई को ज़ब्त कर वो अपने कमरे में गयी और बिस्तर पर लेट गयी..
फ़िलहाल उसे उसका ये कमरा ही सबसे ज़्यादा अपना लग रहा था !
अपने बिस्तर पर लेट कर उसे यूँ लगा जैसे वो अपनी माँ की गोद में वापस लौट आयी है..
एक बार फिर वो अपने विचारो में गुम होने चली गयी…
क्रमशः

Madam bich me itna Jada aid kyon aaraha h adhe se jada story to ad me padh hi nahi parahi pls usko kaise hatana hbataiye
Ab galti ki hai toh saza toh bhigatni hi hogi na
Mam app ese kya krte ho itna gap dete ho story me ki ham thak jate wait krte krte ar apka ede bich bich me gyab hona puri story ka mja khrb kr deta he
Yogita घर में तो माफी मांगने आने वाली थी तो पहले माफी मांगनी चाहिए थी वही नहीं मांगी। व्यवहार भी ऐसा नहीं है कि जैसे उसे गलती का पछतावा हो रहा हो। अब भी उम्मीद कर रही है कि उसका मन मनुहार करें बाप बेटी। पता नहीं कुछ बदल रही है या नाटक ही है अभी भी देखते हैं
Badhiya bhag 👌🏻👌🏻
Nyc part 👌
योगिता को अभी भी पूरी तरीके से अकल नहीं लगी है कोई छोटी गलती करके नहीं आई है वह जो इतनी जल्दी माफी की उम्मीद लगा कर बैठी है अगर उसके घर में उसे घुसने ही दिया है तो बहुत बड़ी बात है क्योंकि अगर कोई और व्यक्ति होता तो वह घर की दहलीज भी नहीं लगने देता योग्यता जैसी औरत को पर दीपक ऐसा नहीं है और योग्यता को भी इतनी जल्दी उम्मीद नहीं लगानी चाहिए बड़ी से बड़ी चोट को भी भरने में समय लगता है और अभी योग्यता को बहुत मेहनत करनी होगी पहले जैसा मान सम्मान और जगह प्राप्त करने में
Yogita ko apni galti par puri tarah pachtava nahi hai aur chah rahi hai Deepak aur charu pahle jaise behave kare.
Nice part 👌👌👌
Nice ji