अतिथि-51

अतिथि -51

   तो इस तरह से वो अतिथि जो हमारे साथ 10-12 एपिसोड तक टिकने वाला था, वो अर्ध शतक लगने के बाद शान से खड़ा मुस्कुरा रहा है..
हमेशा सोचती हूँ कहानी जल्दी समेटूंगी, लेकिन मेरी बाकी कहानियों की तरह ही इसमें भी हो गया.. पहले तो सिर्फ एक ही कथा सोची थी डिंकी और माधव की, लेकिन साथ में एक सब प्लॉट खुद ब खुद जुड़ गया.. तो अब वो कथा भी आगे साथ साथ बढ़ेगी..
  अब तक आप समझ ही गए होंगे कि वो दूसरा प्लॉट कौन सा है ? और किस पर लिखा जा रहा है..।
  आपको इस भाग के अंत में टिप्पणी में उस दूसरे प्लॉट के नायक नायिका का नाम लिखना है !
  
    आइये चलते हैं कहानी की तरफ..

****

      थाने में सलाखों के पीछे खड़ी योगिता की आँखों से आंसू बह रहे थे..
ये आंसू दुःख के थे या पश्चाताप के, ये वो खुद नहीं जानती थी…।
यहाँ आने के बाद पुलिस वाली से उसे मालूम चल गया था कि उसका नाम भूषण ने लिया है। भूषण ने एक-एक कर अपनी सारी जालसाजी हम पुलिस वालों के सामने कबूल कर ली है, यह सुनकर योगिता सोचने पर मजबूर हो गई कि अगर भूषण पकड़ा गया था तो अपनी गलतियां कबूल करना तो फिर भी सही था, लेकिन उसका नाम लेने की क्या जरूरत थी? क्या उसका नाम लिए बिना भूषण का काम नहीं चल सकता था..।

वैसे तो उसने भूषण की ऐसी कोई भी सहायता नहीं की थी।
    जो थोड़ी बहुत मदद की थी, उसके बदले में भी भूषण ने उसे लाभ का कोई हिस्सा नहीं दिया था। वह तो भूषण के प्यार में अंधी होकर उसकी मदद कर रही थी। लेकिन पैसे तो भूषण ही बना रहा था।
     अपने लैविश से बुटीक को खड़ा करने के लिए भूषण लगा हुआ था। बल्कि कई बार बातों बातों में दोनों के बीच इस मसले को लेकर विवाद भी हो चुका था। एक बार तो भूषण ने साफ-साफ योगिता से कह दिया था कि अपने नए बुटीक में वह योगिता को कोई जगह नहीं देगा।

   जबकि योगिता यह सोचती आई थी कि भूषण के बुटीक की सर्वेसर्वा वही होगी। उस वक्त तो योगिता ने उस बात को मजाक में उड़ा दिया था, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे भूषण सच ही कह रहा था। वह वाकई अपना बुटीक खुलने के बाद योगिता को पूछता भी नहीं।

      वैसे भी अभी कुछ दिनों से योगिता ऑफिस में काम करने वाली ललिता और भूषण की आँख मिचौली से भी परेशान थी..।
उसने दो तीन बार दोनों को रंगे हाथो पकड़ा भी था। लेकिन भूषण बातें बनाने में बड़ा तेज़ था..।
  
     हर बार कुछ झूठी कसमें, कुछ रंगीन वादे उसकी गलतियों पर पर्दा डाल जाते और सब कुछ जानते समझते हुए भी वो चुप रह जाती..।
जब जब वो भूषण पर हावी होने का प्रयास करती वो उसे “तुम मेरी बीवी नहीं हो और न बीवी बनने का प्रयास करो।” कह कर चुप करा दिया करता था..।
और बस उसी समय वो खुद को ठगा सा महसूस करने लगती थी..।

  विवाहेतर संबंधो की परिणति अक्सर ये ही होती है..
औरत जब किसी से जुड़ती है तो पहले अपना मन दान करती है, उसके बाद तन अर्पित करती है। लेकिन पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है..।
  इस तरह के संबंधो में लिप्त पुरुष कभी मन से किसी औरत से नहीं जुड़ सकते, वो अपना काम निकल जाने पर भावनाओ में डूब कर स्वयं को प्रेम में नष्ट कर लेने की जगह इस तरह के संबंधो से अलग हो जाते हैं..।

   ठीक ऐसा ही भूषण और योगिता के साथ था..।
योगिता भूषण पर भी अपना एकाधिकार मानने लगी थी। वो भूषण के साथ जुड़ कर अपने बाकी संबंधो को भूल बैठी थी।
   अगर समाज का भय नहीं होता, तो शायद वो घर छोड़ कर भूषण के पास सदा के लिए चली आती, लेकिन सबसे पहली बात तो भूषण खुद इसके लिए तैयार नहीं होता…।

आज विपत्ति के समय एक एक कर भूषण की चालाकियां, उसका व्यवहार, सब कुछ योगिता के सामने पानी की तरह साफ़ होता जा  रहा था..।

वो सोचती बैठी आंसू बहा रही थी..
अब उसका क्या होगा ? इस सब के बाद उसका भविष्य क्या होगा ? क्या वो यहाँ से बाहर निकल पायेगी या उसे जेल जाना पड़ जायेगा !

     इस सब में एक बात तो हुई कि उसके पति को उसके और भूषण के सबंधो की भनक लग ही गयी ..

तो क्या इसके बाद अब दीपक उसे बचाने के लिए कोई भी प्रयास करेगा..?
लगता तो नहीं कि वो कभी भी उसे यहाँ से छुड़ाना चाहेगा..
उसकी फूल सी बेटी का क्या होगा, उसके बिना ?
आज उसे रह रह कर शैली का मासूम चेहरा याद आ रहा था, सच उसने कितना गलत किया था शैली के साथ..।

शैली के जन्मदिन को वो पहले कितना धूमधाम से मनाया करती थी। लेकिन उसके पिछले जन्मदिन पर भूषण ने बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया था। इसलिए ऑफिस मीटिंग का बहाना कर वो अपनी बेटी के जन्मदिन को भी मना नहीं पायी थी…।

   शैली के कुछ दोस्तों को साथ ले दीपक अकेले ही वाटर पार्क ले गए थे..
रात में वो थक कर चूर होकर लौटी, तब भी बाप बेटी उसके साथ केक काटने का इंतज़ार कर रहे थे। उसने बस केक कटवाने की औपचारिकता निभाई और अपने कमरे में घुस गयी थी..।
लानत है उस पर !

कितने उत्साह से अगली सुबह शैली उसके पास बैठ कर अपनी और अपने दोस्तों की तस्वीरें उसे दिखाना चाहती थी, लेकिन उन तस्वीरों को देखने तक की फुरसत नहीं थी उसके पास…।

सुबह जल्दी जल्दी नाश्ते के दो चार उलटे सीधे कौर डाल कर उसे ऑफिस भागना था। क्यूंकि असल में जिस मीटिंग का बहाना कर के वो पिछला पूरा दिन भूषण के साथ गुज़ार कर आयी थी, वो मीटिंग और प्रेसेंटेशन तो आज होना था। और उसे सबसे पहले पहुँच कर सबकुछ तैयार करना था..।

उस वक्त भी उसे जल्दबाजी में खाते देख दीपक ने उसकी गर्म चाय को कप से तश्तरी में उलट दिया था। जिससे वो उसे पी सके..।
               शैली उसकी पानी की बोतल भर लायी थी, और पानी की बोतल पर्स में रखने तक में शैली उसकी सैंडल्स ले आयी थी..।

कृतग्यता से उसका माथा चूम वो घर से आनन फानन में निकल गयी थी। वो इतनी जल्दबाजी में थी कि दरवाजे पर हाथ हिलाते खड़े पति पर उसका ध्यान ही नहीं गया था !
  और ऐसी कोई एक आध घटना तो थी नहीं..।
पिछले दो सालों से लगभग हर दिन ऐसा ही बीत रहा था..।
वो बिना बात के दीपक से लड़ बैठती थी..।
पिछली बार अपनी शादी की सालगिरह भूल कर वो शाम को ऑफिस की पार्टी में शामिल होने तैयार हो रही थी, और तब दीपक ने उसे पीछे से आकर प्यार से बाहों में भर लिया था, और वो चीख कर एक झटके में उससे यूँ अलग हो गयी थी, जैसे बिजली की नंगी तार छू गयी हो उसे..।

आज ये सब सोच सोच कर उसका दिल मुहं को आ रहा था.. वो अपने स्वार्थ में किस कदर अंधी हो चुकी थी कि, उसे अपने आसपास के किसी से कोई लेना देना तक नहीं रह गया था..।

अपने अनैतिक संबंधों में वो इस कदर डूब गयी कि भूषण के अलावा उसे कुछ भी दिखना सुनना ही बंद हो गया था..

दिन भर अपनी सोच में डूबी योगिता को ध्यान भी नहीं रहा कि कब दोपहर ढलने लगी थी..
उसके लिए लायी खाने की थाली भी वैसी की वैसी वापस हो गयी थी..।
उसके गले से पानी की एक बून्द नीचे नहीं उतरी थी..
वो अभी जाने कब तक यूँ ही बैठी रहती कि उसके कानो में एक चिरपरिचित स्वर गूंज गया..।

आंसू से धुंधली आँखों को पोंछ कर उसने बाहर देखने का प्रयास किया, सामने दीपक किसी वकील, अनुराधा और माधव के साथ खड़े थे !

****

    अगले दिन शॉपिंग पर जाना तय हुआ था..
डिंकी सुबह ही उठ कर तैयार होने लगी थी, उसे मालूम था उसकी सास समय की बड़ी पाबंद है। उन्हें मिनट भर की भी देरी बर्दाश्त नहीं, और उसलिए उसने फटाफट तैयार होने के बाद अपनी माँ को भी थोड़ा जल्दी काम निपटा लेने की हिदायत दे दी..।

लेकिन सोमवार की सुबह, किस दुनिया में रहने वाली औरतों का काम जल्दी सिमट पाता है..?

एक तो दो दिन की छुट्टी के बाद का ऑफिस किसी पुरुष को मुआफ़िक नहीं होता, इसलिए उन्हें सुबह बिस्तर से ठेल कर उठाने से लेकर उन्हें बाथरूम में धकियाने तक का जिम्मा औरत का ही होता है..।
उसके बाद उनका नाश्ता टिफिन, पानी बोतल, कपड़े मोज़े, साफ़ पॉलिश किये जूते से लेकर रुमाल तक निकाल कर रखना होता है..
इस सब से जरा फुरसत नहीं हो पाती कि बेटे की स्कूल वैन हॉर्न बजा बजा कर उसका कलेजा चाक करने चली आती..।

चिंटू भी अपने बाप की प्रतिलिपि ही था.. न जल्दी सोना न जागना..
बाथरूम में नहाने भेजने के लिए भी लड़के की मिन्नतें करनी पड़ती…।
उसके बाद जो गिरते पड़ते तैयार होता, कभी उसकी टाई गुम जाती तो कभी अलमारी में रखा एक मोजा मुहं चिढ़ाता..।
किसी दिन उसे समय से तैयार कर लो, तब उसकी कमीज की टूटी हुई बटन उसकी हंसी उड़ाने लगती..
इन सब से निपट कर उसे एक कप सुकून वाली चाय भी दस बजे के पहले नसीब नहीं हो पाती थी..।

ऐसे में दस बजे डिंकी के साथ मॉल पहुँच जाना कम से कम सुलोचना के लिए तो असम्भव ही था..।

सुलोचना इधर से उधर काम निपटा रही थी, डिंकी ने उसका हाथ पकड़ लिया..

“आप रेडी हो जाइये, ये काम मैं कर लेती हूँ !”

आज बेटी का ऐसे अपनेपन से काम उसके हाथ से ले लेना अचानक से उसी की बेटी को उसके लिए परायी कर गया।

ससुराल जाने वाली है तो कितनी समझदार हो गयी.. माँ जल्दी तैयार हो सके इसलिए उसका काम भी छीन लिया…।
वाह रे ये बेटियाँ.. कितना भी प्यार से पाल पोस लो, एक दिन परायी हो ही जानी है..।

“क्या सोचने लगी मम्मी.. जाओ न तैयार हो जाओ !”

डिंकी फटाफट काम निपटाने की कोशिश कर रही थी, कि उसका फ़ोन बजने लगा..।
फ़ोन माधव का था। उसने डिंकी को बताया कि योगिता को पुलिस पकड़ कर ले गयी है, और उसका पति उन दोनों से मिलना चाहता है..।
डिंकी ने हामी भरी और अपनी माँ से इजाजत लेकर माधव से मिलने निकल गयी..।

क्रमशः

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Umita kushwaha
Umita kushwaha
9 months ago

आपकी रचना में हमेशा ही मुझे एक सीख मिली है कि कभी भी कोई गलत काम फलता नहीं है जीवन में🙏🙏🙏
योगिता ने जो कुछ भी किया सारी बातें आज उसे धीरे-धीरे याद आ रही है जो बेरुखी उसने अपने पति और अपनी इकलौती बेटी के साथ दिखाई है आज वह सारी बातें उसके समझ में आ गई है कि वह कितनी गलत थी पर रहते हैं ना जब तक ठोकर नहीं लगती जब तक इंसान सुधरता भी नहीं है इसलिए योग्यता को इस ठोकर की बहुत जरूरत थी मुझे नहीं लगता कि उसकी सोच सही है दीपक एक बेहद खूबसूरत सीरत का इंसान है वह दिखने में भले ही औसत हो पर उसकी मां बेहद साफ है और इसी लिए वह अपने परिवार को बिखरने नहीं देगा😟😟😟
यह बात भी बिल्कुल सही कही है आपने की सोमवार की सुबह हम औरतों का काम जल्दी निपट ही नहीं सकता क्योंकि इतवार की छुट्टी हम लोगों के लिए सोमवार की सुबह ज्यादा काम बढ़ा कर रख देती है और फिर दोपहर आते-आते तक ही हम लोगों को सुकून से बैठना नसीब होता है भले ही डिकी ने अपनी मां को मदद के लिए हाथ से बोला हो पर वह एक मां है और वह सब जानती है🙂🙂🙂

कशिश शर्मा
कशिश शर्मा
9 months ago

मुझे लगता है कि योगिता और दीपक ही आपकी साइड स्टोरी के नायक नायिका हैं।

Vandana attri
Vandana attri
9 months ago

So beautiful story

Nisha
Nisha
9 months ago

👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌

ManjeetKaur
ManjeetKaur
9 months ago

Superb awesome 〽️ part 👌👌👌👌👌👌👌

Gouri sarwa
Gouri sarwa
9 months ago

Ye to bahot km h, yogita ko to or pachtawa hona chahiye….., hamesha dipak ko dutkara h, 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐

Manu Verma
Manu Verma
10 months ago

अब तो योगिता को सब याद आ रहा..रह रहकर अपनी बेटी और पति का प्यार याद आ रहा और दूसरी तरफ भूषण ने उसे कैसे इस्तेमाल किया वो भी पर पलड़ा तो पति और बेटी के प्यार से भारी हुआ ना.. पर अब कर भी क्या सकती है अपनी गलतियों पर पछतावा करने के अलावा।
एक तरफ दीपक उसे बचाने के लिए थाने आ गया और दूसरा उसका भूषण उसे फंसा गया यही तो फर्क है नाजायज और जायज रिश्ते में। अब देखते है दीपक, डिंकी और माधव के कहने पर पुलिस क्या निर्णय लेती है।
अगली मुलाक़ात कैसी होगी दोनों समधनों की 🤔इंतजार रहेगा अगले भाग का 🙏🏻।
बेहतरीन भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

Arjun singh chouhan
Arjun singh chouhan
10 months ago

Superb 👌👌

Mukesh Duhan
Mukesh Duhan
10 months ago

Nice

Rashmi
Rashmi
10 months ago

Yogita or deepak se juda hai is kahani ka dusra plot