अतिथि-49

अतिथि -49

   ये सब कुछ हुए दो चार दिन बीत चुके थे, लेकिन डिंकी अब भी अपने कमरे से नहीं निकली थी। उसके दिल पर छायी थकान शरीर की थकान से कहीं ज़्यादा उबाऊ थी..।

उसे कुछ भी अच्छा ही नहीं लग रहा था.. इतना सब जो घटा था, उसके बाद उसने अब तक अपनी बॉस रूबी मैडम से भी कोई बात नहीं की थी !
  उसे आश्चर्य इसी बात पर था कि कैसे भूषण और योगिता ने मिल कर उसे फंसाने की इतनी लम्बी चौड़ी साजिश रच दी थी, और अनजाने ही सही उसकी मंजरी दी भी इस सब का हिस्सा बन गयी थी..।

इतनी सारी कटु स्मृतियों के बीच रह रह कर एक चेहरा  मुस्कुरा कर उसके आंसूओं पर मुस्कान की चादर बिछाने में सफल होता जा रहा था, और वो था माधव !

उसे माधव से मिलने की उत्कट अभिलाषा थी, लेकिन अपनी माँ के ख़िलाफ़ जाकर वो ये भी नहीं कर सकती थी…!
उसकी माँ आयी और उसके लिए चाय रख कर वापस चली गयी..।

पिछले कुछ दिनों से यही हो रहा था। संकोच की एक महीन चादर माँ बेटी ने अपने मध्य खीँच ली थी, जिसे दोनों में से कोई हटाना नहीं चाहता था.. या शायद हटा नहीं पा रहा था..

सुलोचना का सोचना था अगर ये चादर हटी तो डिंकी खुलकर माधव के बारे में उस कह उठेगी और उस समय उसकी बात को काटना या माधव के लिए अपनी असमर्थता दिखाना सुलोचना के लिए मुश्किल हो जाएगा।
      इसलिए वह अपनी तरफ से डिंकी से किसी तरह की कोई पूछताछ नहीं कर रही थी। डिंकी का भी यही हाल था।
    उसके मन में रह-रह के यही बात आ रही थी कि कैसे वह बेशर्मी से अपने और माधव के बारे में अपनी माँ या पिता से बात करे।
    वह चाहती थी, उन दोनों में से कोई भी उससे पूछ ले और वह चुपके से हामी भर दे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था।
     चार दिन बीत चुके थे, और अब तक माधव का भी कोई फोन नहीं आया था..।

डिंकी अपने पलंग पर बैठी खिड़की से बाहर देखती हुई चाय पी रही थी, कि तभी उसका फोन बजने लगा। उसने देखा फोन माधव का था।
उसने धीरे से फोन उठा लिया, उसके हेलो बोलते ही उधर से माधव की भी धीमी सी आवाज सुनाई पड़ी। डिंकी को ऐसा लगा जैसे उसके कानों में किसी ने बाल्टी भरकर अमृत उड़ेल दिया हो।

“कैसी हो ?”

“हम्म ठीक ! आप कैसे हैं ?”

“मैं भी ठीक हूँ.. डिंकी… !”

एक गहरी ख़ामोशी खिंच गयी.. डिंकी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा, पता नहीं क्या बोलने वाला है माधव?
  अगर अपने प्रेम का इजहार ही कर बैठा, तो वो क्या जवाब देगी? क्या पलट कर प्रतिउत्तर में कह पायेगी कि वो भी उससे बहुत प्रेम करती है ?

“सुन रही हो ?”

“हम्म… !”

“पापा अंकल से मिलना चाहते हैं ! कब मिल सकते हैं ?”

डिंकी एकदम से कुछ कह नहीं पायी.. एक सर्द सी हवा जैसे उसके भीतर उतरती चली गयी

“ये तो पापा ही बता पाएंगे !”

“हम्म तो उनसे ही बात करवा दो.. !”

डिंकी संकोच से सिमट गयी, बड़े धीमे से वो अपने कमरे से निकल कर अपने पिता तक पहुँच पायी..

“पापा.. बात कर लीजिये !”

उसने अपने पिता की तरफ फ़ोन बढ़ा दिया..
उसके पिता और माधव की बातचीत के दौरान उसके पिता के चेहरे का उल्लास और ख़ुशी देख डिंकी भी आश्वस्त हो गयी।
उसकी पलट कर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं थी..
वो अपना फ़ोन लेकर लौटने लगी कि उसके पिता ने घोषणा सी कर दी..

“अरे सुनती हो.. केदार का फ़ोन था।
उसने कल हम सब को लंच के लिए बुलाया है..। उनका कहना है डिंकी और माधव के रिश्ते की बात कर लेते हैं !”

“कहाँ बुलाया है ?” रसोई से हाथ पोंछती सुलोचना बाहर चली आयी..

“कोई अच्छा सा फेमस रेस्टोरेंट है ‘गजीबो’ वहीँ बुलाया है !”

“हम्म अपने घर भी बुलाया ना गया !”

“अरे अब तुम बाल की खाल ना निकालो.. भाभी जी को लगा होगा घर में मिलने पर संकोच हो सकता है, इससे अच्छा होटल में मिल ले..।
अब इस बात पर तुम हायतौबा ना मचाना। कल एक बजे मिलने को कहा है.. कल इतवार भी है, तो चले चलेंगे !”

डिंकी के मन में शहनाई सी बजने लगी..
वो अपने कमरे में खिड़की पर खड़ी बाहर के रस्ते की आवाजाही देखती खड़ी थी कि तभी उसकी नजर पेड़ के नीचे खड़ी उस आकृति पर अटक कर रह गयी..

माधव !! यहाँ क्या कर रहे हैं ?

वो तुरंत अपनी बालकनी का दरवाज़ा खोल बाहर निकल आयी, कांपती आँखों से उसने देखा.. माधव ही था..
उसकी तरफ अपलक निहारता, उसकी हर भूल को सुधारता, उसके सोचने से पहले ही उसके दिल की बात को समझता माधव..

उसका अपना माधव !!

डिंकी का मन किया नीचे भाग कर चली जाए लेकिन वो ऐसा कर नहीं पायी..।

पता नहीं इधर कुछ घटनाओं के बाद से उसके अंदर एक जबरदस्त संकोच भर गया था..
वो माधव को ऊपर बुलाना चाहती थी, लेकिन फिर उसे लगा उसकी माँ जाने क्या सोच बैठे..?
वो अभी उसे हाथ दिखाने वाली थी कि उसका दरवाज़ा खुला, वो पीछे पलटी, उसके सामने गरिमा खड़ी थी..।

गरिमा को बैठने बोल वो वापस पलटी, लेकिन तब तक माधव वहाँ से जा चुका था..।
वो इधर उधर उसे ढूंढने लगी, लेकिन माधव कहीं नजर नहीं आया..।
वो अंदर चली आयी..

****

अगले दिन वो लोग एक बजे के कुछ पहले ही उस रेस्टोरेंट में पहुँच गए..।
  वहाँ अलग से फैमिली केबिन बने हुए थे, उन्ही में से एक केबिन माधव ने बुक कर रखा था।  
वहीँ बैठे वो लोग माधव के परिवार का इंतज़ार करने लगे..।

वह लोग नियत समय से कुछ पहले ही पहुँच चुके थे..
वैसे भी जब किसी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए किसी का इंतज़ार करो, तब समय का एक एक पल अपनी लम्बाई चौड़ाई बढ़ा कर घंटो में तब्दील हो जाता है..। ऐसा ही कुछ उनके साथ था..।

वैसे तो विनोद और केदार अच्छे दोस्त थे, बावजूद जब से उनके परिवारों के बीच बातचीत बढ़ने लगी थी, उन दोनों के बीच भी पहले जैसी बात नहीं रह गयी थी..।

वो तीनो चुपचाप बैठे थे। लेकिन चिंटू कभी अपनी टांगों को हिला हिला कर कुर्सी पर मार के आवाज निकाल रहा था, तो कभी टेबल को तबला बनाकर बजा रहा था।
    उसकी इन हरकतों से सुलोचना को खीझ सी हो रही थी।

” तू चुप बैठेगा या तुझे यहां से उठकर बाहर फेंक दूं?”

” मम्मी भूख लग रही है, मेरे लिए कुछ मंगा दो ना!”

कुछ यहाँ समय से पहुँचने की हड़बड़ी, कुछ उन लोगो से मिलने की घबराहट में आज सुलोचना से नाश्ता तक नहीं बन सका था! बाकियों का तो ठीक लेकिन चिंटू से ये अनशन सहन नहीं हो रहा था!
  उसका भूखा चेहरा देख सुलोचना को अपने लाड़ले पर तरस आ गया !

“मेरा छौना ! उन लोगों को आ जाने दे बेटा! ऐसे अच्छा थोड़ी लगेगा कि वह आए और तू खाता हुआ मिले। सब एक साथ बातचीत करते हुए खाएंगे, तभी तो अच्छा लगेगा ना?”

कोई और वक्त होता तो डिंकी कूद कर अब तक चिंटू के लिए कुछ ना कुछ आर्डर कर उसे खिला चुकी होती, लेकिन आज वह खुद अपने माता-पिता की परेशानी समझ रही थी।
     इतने बड़े रेस्टोरेंट में शायद वह दोनों पहली बार ही आए थे। वह खुद परेशानी से इधर से उधर चक्कर काटती हुई माधव का इंतजार कर रही थी।

   एक दो बार उसने खिड़की से बाहर झांक भी लिया। वह बाहर झांक ही रही थी कि विनोद बोल पड़ा।

” वह लोग आ जाएंगे डिंकी, परेशान होने की बात नहीं है। बाहर ट्रैफिक भी होगा ना!”

डिंकी एकदम से सकुचा गई। वापस आकर वह चिंटू के बगल में बैठ गई। उसने मेनू कार्ड उठाया और वहां रखें रिंगिंग बेल को दबा दिया। एक वेटर उनका आर्डर लेने के लिए उपस्थित था। उसने मेनू कार्ड में से देखकर चिंटू की पसंदीदा डिशा ऑर्डर कर दी..।

“यह क्या कर रही है डिंकी, उन लोगों को आ जाने दे, उसके बाद ऑर्डर करना।”

” मम्मी आर्डर करते ही तुरंत तो डिश नहीं आ जाएगी ना! डिश के बन कर आते तक में वह लोग भी आ जाएंगे, और फिर चिंटू तो बच्चा है, उसे खा लेने दीजिए ।”

अपने जज्बात संभालती हुई डिंकी दूसरी तरफ देखने लगी, लेकिन सच तो यह था कि माधव के परिवार का इस तरह से देर करना उसे भी नहीं अच्छा लग रहा था।

लगभग आधे-पौन घंटे बाद माधव उनका अभिवादन करता अंदर दाखिल हुआ! उसके पीछे ही उसके माता पिता भी चले आए।
       माधव के हाथ में दो-तीन बड़े-बड़े लिफाफे थे। उसकी मां ने भी कुछ बड़े बैग्स हाथ में थाम रखे थे।

” सॉरी अंकल! सॉरी आंटी! हमें जरा देर हो गई..।”

विनोद तो मुस्कुरा कर रह गया, लेकिन सुलोचना के मन की कड़वाहट और घबराहट जहर बनकर बाहर निकल आई।

” कोई बात नहीं, अब हमें आदत डाल लेनी चाहिए, इंतजार करने की।”

माधव की मां ने सुलोचना की तरफ देखा। अब तक विनोद और सुलोचना उनके स्वागत के लिए अपनी जगह पर खड़े हो गए थे।
    विनोद और केदार तो हाथ मिलाकर गले लग गए, लेकिन सुलोचना के बढे हुए हाथ को सुलक्षणा ने सिरे  से नकार दिया और अपने हाथ जोड़कर कुर्सी पर बैठ गई।
      डिंकी ने माधव की मां और पिता की तरफ देखकर हाथ जोड़ लिए।
   माधव की मां बोल पड़ी

“कायदे से तो तुम्हें पैर छूने चाहिए, पर चलो ठीक है, हाथ जोड़ने पर भी हम आशीर्वाद दे ही देंगे।”

माधव की मां के तीखे तेवर कहीं से कम नहीं हो रहे थे..।
और उनके कड़वे स्वभाव की भरपाई के लिए माधव और उसके पिता विनम्रता से दोहरे तिहरे होते जा रहे थे..।

माधव की मां ने अपने साथ लाए हुए पैकेट डिंकी की तरफ बढ़ा दिए और वापस सुलोचना की तरफ देखकर कहने लगी।

” वह क्या है ना कि आप लोगों से पहली बार मिलने आ रहे थे। हां मिल तो हम पहले भी चुके हैं, लेकिन अब क्योंकि हमारे बच्चों का रिश्ता होने वाला है, इसलिए कुछ औपचारिकतायें तो जरूरी है। आखिर बेटे के ससुराल वालों से हम मिलने आ रहे थे, तो खाली हाथ कैसे चले आते?
    यह कुछ फल मिठाइयां और कपड़े हैं, बस यही सब खरीदारी में हमें वक्त लग गया।”

सुलोचना का मन जाने कैसा तो हो गया। उसने तो सोचा भी नहीं था कि उसे भी यह सब करना चाहिए था। उसे लगा था आज माधव और डिंकी के रिश्ते की बातचीत की पहली सीढ़ी है, और बस साथ खाना खाते हुए सब कुछ तय करना है। अगर उसे थोड़ा भी  अंदेशा होता तो वह भी इन तीनों के लिए कपड़े तो ले ही आती।
        संकोच से उसने हाथ जोड़ लिए।

” माफ कीजिएगा, हम तो बिना किसी तैयारी के चले आए। मुझे तो लगा था कि आज सिर्फ बातचीत होगी।”

” हां हां बातचीत ही बस होगी, कुछ तय नहीं हुआ जा रहा। लेकिन फिर भी ऐसे खाली हाथ आना हमें अच्छा नहीं लगता।
   हम तो अपने नौकर के भी बच्चे को जब पहली बार देखने गए थे, तब भी उन सबके लिए खिलौने कपड़े मिठाइयां वगैरह लेकर गए थे। फिर आप तो हमारे होने वाले रिश्तेदार है ना!”

सुलक्षणा की यह बात सुलोचना के हृदय को बींध  गई…

लेकिन इन दोनों औरतो की दिलजली बातों से इतर एक प्रेमी जोड़ा आँखों ही आँखों में खोया अपनी ही बातों में लगा था..

क्रमशः





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Umita kushwaha
Umita kushwaha
9 months ago

सुलक्षणा की बातों से साफ हो गया है कि वह सुलोचना और उसके परिवार को पसंद नहीं करती है और ना ही वह डिकी को अपनी बहू के तौर पर स्वीकार करना चाहती है इसलिए ऐसी जली कटी बेहूदा बातें कर कर उनकी जान जला रही थी 😞😞😞😔😔😔
इस हिसाब से तो सुलोचना का भी मन नहीं होगा अपनी बेटी बयान vyahne का पर मजबूरी है क्या करें माधव और डिंपी के पिता तो बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं खुश तो सुलोचना भी हो जाती अगर सुलक्षणा का व्यवहार इतना सर्द नहीं होता उन लोगों के लिए 😞😞
ab बातें धीरे-धीरे समझ में आ रही है कि क्यों सुलक्षणा ने वह झूठी बातें कही थी सुलोचना से कि वह उनका बेटा पागल है मुझे नहीं लगता कि माधव में कोई कमी है और यह बात रिंकी तो समझ गई है पर सुलोचना को समझने में शायद समय लग जाएगा अब देखते हैं आगे क्या होता है🙄🙄🙄🙄
कुछ समय से तबीयत ठीक नहीं थी तो रचना भी नहीं पढ़ पा रही थी और रचना pad के अगर समीक्षा ना दो तो मन ही नहीं होता है फिर इसीलिए पूरी तरीके से ठीक होकर ही मैं रचना को पढ़ने का मन बनाया 🙂🙂
भाग बेहद अच्छा था और उत्सुकता बनी हुई है कि आगे क्या होगा जो भी हो पर डिंपी और माधव का दिल नहीं दुखना चाहिए ऐसी आपसे गुजारिश है डॉक्टर साहिबा इतनी खूबसूरत भाग के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अगले भाग के लिए हमेशा ही इंतजार रहता है🙏🙏🙏🙂🙂🙂🙂🙂

Nisha
Nisha
10 months ago

Aisa lagta hai ki madhav ki ma chahti hi nahi hai ki madhav aur dinki ka rista jude isliye baat baat pe tane de rahi hai aur pahle bhi madhav ki dimagi bimari ke bare me unhone hi afwaah failayi thi.aakhir kya mil jayega aise karke unhe 😤😤😤😤😤

Manu Verma
Manu Verma
10 months ago

सुलोचना के मन का डर और सुलक्षणा के ऐसे घमंड से भरे शब्द कहीं इन औरतों के शीतयुद्ध में ये प्रेमी जोड़े की बलि ना लग जाए। सुलक्षणा मुझे बेटा मूवी की अरुणा ईरानी सी लगती है, बेटा अंधभक्त माँ का और माँ आस्तीन का सांप।
देखते है आगे क्या होता है 😊लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻।

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
10 months ago

Bahut badhiya

Rashmi
Rashmi
10 months ago

Ye sulakshna apne paise ka rob dikha rahi hai jhuti makkar.. aisi aurtein hi sauteli maayon ka naam kharab kerti hain

Kanchan Choudhary
Kanchan Choudhary
10 months ago

Ye Madav ki maa apna dikhava start jar di ab dekhe shadi me kya kya archan dalti hai

Jagriti
Jagriti
10 months ago

सुलक्षणा का नाम गलत रख दिया है पता नहीं ऐसा लगता है कि यह शादी होने भी वाली है कि नहीं
बेहतरीन भाग 👌👌👌👌

Raniya Memon
Raniya Memon
10 months ago

Sulochna ki esi bate kuch acchi nahi lag rahi

Samiksha
Samiksha
10 months ago

Lovely

Ritu Jain
Ritu Jain
10 months ago

Very nice part ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️