अतिथि-25

अतिथि -25

“अमीनाबाद चलना है या कपूरथला ?”

माधव ने डिंकी की तरफ देख कर कहा और डिंकी ने चट से अपनी पसंद बोल दी..

“कपूरथला चलिए !”

पीछे बैठी सुलोचना को ये सब पसंद तो नहीं आ रहा था, लेकिन सामने से कुछ बोल भी नहीं पा रही थी..

जाने डिंकी को क्या सूझी वो पीछे पलट कर अपनी मां से बोल पड़ी,

” मम्मी आपको पता है मंजरी दी की शादी लग गयी है..?”

“हाँ !” छोटा सा प्रतिउत्तर दे सुलोचना चुप लगा गयी और डिंकी जो उसे अचम्भित करना चाहती थी, खुद अचम्भित हो गयी..

“मतलब ?” डिंकी के मुहं से ये ही निकला..

“क्या मतलब ?”

“मतलब मम्मी, आपको कैसे पता ?”

“मंजरी की मम्मी मेरी ही तो बहन है !”

“हाँ मतलब, आपको मालूम था और आपने बताया नहीं !”

“कल ही रात में फ़ोन आया विम्मी दी का… तब उन्होंने बताया !”

डिंकी का जी किया चट से लड़के का नाम पूछ ले, लेकिन हिम्मत नहीं हुई। उन लोगो की बातो के बीच सुलोचना का फ़ोन बजने लगा..।
सुलोचना ने फ़ोन उठा लिया..
उसकी बड़ी बहन का ही फ़ोन था..।

वो भी लखनऊ पहुँच रही थी, उससे बात कर के सुलोचना ने फ़ोन रख दिया..

“क्या हुआ, किसका फ़ोन था ?” डिंकी ने पूछा..

“जिज्जी का फ़ोन था, वो भी शॉपिंग के लिए लखनऊ पहुंची हैं, मुझे क्वालिटी में बुला रही थी !”

“ओह्ह !”, एक लम्बा सा ओह्ह कह कर डिंकी चुप हो गयी लेकिन सुलक्षणा का नारी सुलभ कौतुहल जाग गया..

“हाँ तो उन्हें भी संग ले लेते हैं न !”

सुलक्षणा का प्रस्ताव सुलोचना को भी भा गया। वैसे भी वो सुलक्षणा की अगले दर्जे की रूचि और पहनावे के सामने खुद को ज़रा कम ही आंक रही थी..।

अपनी ठसकेदार बड़ी बहन के सानिध्य में कुछ तो उसे छोटा दिखा पायेगी, यही सोच वो अपने मन को बहला रही थी, लेकिन डिंकी का दिल डूबने लगा था….

“तो…. क्या पहले क्वालिटी ही चले ? वैसे भी सबको भूख लग आई होगी ?” माधव ने पूछ लिया

अबकी बार माँ बेटी में से बेटी चुप बैठी रही, माँ चहक उठी..

“हाँ वही चलते हैं !”

कुछ देर में वो लोग रेस्टोरेंट के सामने खड़े थे..
माधव गाड़ी लगा ही रहा था कि ठीक उसके बगल में स्विफ्ट डिज़ायर आकर रुकी…।
माधव ने नजर पलट कर देखा, गाड़ी के अंदर बैठी मंजरी ने हाथ हिला दिया..

गाड़ी से बाहर निकल कर मंजरी ने अपनी आँखों पर चढ़ा रखा धूप का चश्मा सर पर लगाया और सुलक्षणा की तरफ बढ़ कर उसके पैर छू लिए..।

सुलक्षणा ने अपने दोनों हाथ उसके सर पर रख उसे आशीर्वाद दिया और मंजरी की माँ से आगे बढ़ कर गले मिलने लगी… ।
स्वयं मंजरी की माँ भी अपनी भावी समधन को सामने देख चकित थी..

“अरे आप यहाँ कैसे ?”

दोनों एक से सवाल पूछती एक जैसे जवाब देती हंसी की फुलझड़ियां छोड़ रही थी कि विमला की नजर एक तरफ खड़ी सुलोचना पर पड़ी और वो लपक क़र उसके गले लग गयी..

.”तू यहाँ कैसे ?”

“पहले तू बता दी, तू यहाँ कैसे ?”

“तुझे बोला तो कि मैं क्वालिटी में मिलूंगी !”

उन दोनों बहनो की बातो के बीच सुलक्षण उन तक चली आई..

“सुलोचना जी ये मेरी पक्की सहेली और अब मेरे माधव की होने वाली सास है !”

सुलोचना के गले में कुछ अटक सा गया..

“ओह्ह तो ये है वो सहेली.. बताओ अपनी ही सगी बहन को कुछ नहीं बताया, ऐसे पता चल रहा है.. !”

    मन ही मन भुनभुनाती सुलोचना से न कुछ कहते बन रहा था न मन में रखते..।
एक तरफ तो वो विम्मो की ख़ुशी देख आश्चर्य में थी  दूसरी तरफ मन में ये बात भी उठ रही थी कि विम्मो सब जानती भी है या नहीं..?
वो माधव से जुड़ी हर बात विम्मो को बता देने को आतुर हो उठी..

“अन्दर चले ?” मंजरी ने चहक कर कहा और माधव को आँखों के इशारे देती वो अंदर चली गयी..
माधव ने डिंकी की तरफ देखा वो दोनों भी मंजरी के साथ अंदर चले गए..

सुलोचना के मन में कौतुहल भी जागा हुआ था कि आखिर ये सब हुआ कैसे? लेकिन फ़िलहाल बिना कुछ पूछे वो भी सबके साथ अंदर बढ़ गयी..

  “क्या ऑर्डर करना है ?” माधव की आँखों में झांकते हुए मंजरी ने पूछा और माधव ने विनम्रता से मेन्यू कार्ड अपनी माँ के सामने रख दिया..।

“माँ देखेंगी.. मैं तो सब खा लेता हूँ !”

माधव की माँ ने सुलोचना के सामने कार्ड रख दिया, सुलोचना एकदम से सहम गयी..

वो अपनी रसोई की मलिका थी, बिना किसी पूर्वसूचना के दस बीस लोग भी अचानक बिन बादल बरसात से टपक पड़े, तो भी वो जूझ कर मुश्किल से चालीस पैंतालीस मिनट में छप्पन भोग उन्हें जिमा सकती थी।
     लेकिन चार लोगो के सामने होटल के मेन्यू कार्ड से चुन कर ऐसा कुछ ऑर्डर करना जो सबको मुआफ़िक आये उसके लिए अतिशय कठिन वस्तु हो गयी थी..
आज तक जब अपने पति के साथ बाहर गयी कटिंग दोसा ही खाया था उसने।
     दक्षिण भारतीय भोजन के प्रति उसकी दुर्बलता से विनोद भली भांति परिचित था..।
डिंकी ने अपनी माँ के मन में चल रही उलझन समझ ली और मेन्यू लेकर सभी के लिए ऑर्डर करने का जिम्मा उठा लिया..

“आप इटेलियन ही खाएंगे ?” उसने माधव की तरफ देख कर पूछा..

“नहीं.. जो आप सभी लेंगे वही।
वैसे मम्मी को यहाँ की राजकचौरी पसंद है.. है न माँ ?”.

उन्होंने हाँ में गर्दन हिलायी और फिर डिंकी ने सभी के लिए वही ऑर्डर कर दिया..
मंजरी माधव के बगल में बैठी थी और डिंकी माधव के सामने..
माधव दोनों से बेखबर अपने मोबाइल पर कुछ देख रहा था..

“कुछ ज्यादा ही व्यस्त नहीं है आप आज ?”, मंजरी ने मीठा सा उलाहना दिया..

“एक क्लाइंट हैं उनका एक प्रोजेक्ट मेरी कृपादृष्टि के लिए बहुत दिनों से मेरी टेबल पर पड़ा ऊंघ रहा है.. बस उन्ही की फाइल देख रहा था ?”

ये शब्द डिंकी को बड़े परिचित से लगे..

” भूषण सर ?” डिंकी ने लगभग फुसफुसा कर कहा और माधव ने हामी भर दी..

तीनो महिलाएं बातो में लगी थी..।
सुलोचना अपनी बहन से नाराज़ बैठी थी …

“ऐसी भी क्या छिपाने वाली बात हो गयी जिज्जी, जो हमें न बताया?”

“बात छिपाने वाली नहीं थी सुलो।
मंजू के पापा को जानती है न.. उनका कहना था जब तक सब निश्चित न हो जाये, कहीं न कहूं। और फिर तू तो जानती है मेरा मुहं कितना बड़ा है..।
घर के नौकरो तक के सामने मैं घर का भेद नहीं रख पाती..
आजकल रिश्ते पल में बनते टूटते हैं बस इसीलिए !”

“बातचीत के लिए यहीं आये थे तुम लोग, तो हमारे ही घर सब कर लेते ? “

सुलोचना के मन की पीर थम ही नहीं रही थी। वो अब तक इस बात को पचा नहीं पायी थी की उसकी बहन ने अपनी बेटी की शादी तय कर दी और उसे सूचित तक नहीं किया..

“यहाँ इनका सर्विस क्वार्टर तो मौजूद है, फिर यहाँ इन्हे एक अर्दली और खानसामा मिला हुआ है, सो सोचा यहीँ सब देखना दिखाना कर लिया जाए..।
और मेरी लाड़ली बहना, एकदम से तुम्हारे घर पहुँच जाती तो तुझ पर भी तो बर्डन बढ़ जाता न !”

“हाँ बस औपचारिकता वाला ही तो रिश्ता रह गया है न हमारा ? भूल मत जाना सगी बहने हैं हम.. !”

“जानती हूँ मेरी सगी बहन !” सुलोचना के गलबहियां डाल विम्मी झूल सी गयी..

वो कितना भी सुलोचना को बातों में घुमा ले, लेकिन वास्तविकता यही थी कि मंजरी के आलेप प्रलेप युक्त चटक चेहरे के सामने डिंकी का प्रसाधनविहीन सलोना मुखड़ा षोडश चंद्रिका सा दमकता था..।

मंजरी स्मार्ट थी, बातें करने में चतुर थी, आजकल के समय के अनुसार उसकी वस्त्रसज्जा वाक्पटुता उसे प्रदर्शनीय और आकर्षक ज़रूर बनाती थी, लेकिन डिंकी के कमनीय कोमल चेहरे के सामने मंजरी का लम्बोतरा चेहरा रुखा सूखा सा लगने लगता था..।

इसी से उसकी माँ, अपनी सगी छोटी बहन के घर पर भी देखने दिखाने की औपचारिकता नहीं निभाना चाहती थी।
लेकिन माताओं के इन परपंचो से दूर मंजरी और डिंकी के बीच ऐसी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी..।

मंजरी के अब तक के मित्रों में कोई भी माधव सा सुदर्शन सभ्य व्यक्ति उसने न देखा था, इसलिए वो बुरी तरह माधव पर रीझि हुई थी और डिंकी का मसला ही अलग था..
वो खुद कब माधव के व्यक्तित्व की प्रशंसिका बन बैठी उसे ही मालून न चला..।
उस पर सुलोचना का माधव के प्रति तिरस्कृत भाव उसे माधव के प्रति थोड़ा और संवेदनशील बना गया…

दोनों ही लड़कियाँ मन ही मन उस पर मोहित हुई चली जा रही थी, जिसके मन में क्या चल रहा ये उन दोनों को ही नहीं पता था..।

मोबाइल पर अपना काम निपटा कर वो हलके से मुस्कुरा उठा और उसके गाल पर पड़ता वो मनोहारी गड्ढा उन दोनों को गहरे रसातल में खींच ले गया..

उसी वक्त माधव का फ़ोन बजने लगा..
माधव के ऑफिस से उसके ऊपर काम करने वाले किसी सीनियर का कॉल था..

“माधव तुमने भूषण रॉय के कागज़ निरस्त कर दिए ?”

“जी !”

“लेकिन क्यों ?” इस सीनियर अधिकारी की मुट्ठी यथेष्ट गर्म कर ही भूषण रॉय अपने कागज़ो के कच्चेपन को उस गर्माहट में सेंक कर पक्का कर लेना चाहता था। जिस कमी को आधार बना कर माधव ने उसका टेंडर निरस्त कर दिया था..

“आपसे बाद में बात करता हूँ सर, यहाँ नेटवर्क की कमी है.. !” कह कर माधव ने फ़ोन रख दिया..
उसके दिमाग में इस वक्त कौन सा शैतानी ख्याल उत्पात मचा रहा था ये वही सिरफिरा जानता था..।

क्रमशः

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कांति
कांति
2 months ago

दोनों बहनों के मन में बस माधव पर माधव के मन में जाने कौन पर सुनेगा तो वो अपनी बस मां की आगे जाने क्या होगा।
सुलोचना की विम्मी दी इतनी छुपी रुस्तम निकलेगी कौन जान सकता था।

Nisha
Nisha
1 year ago

👌👌👌👌👌👌

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Nice move madhav. Awesome pyari lekhika ji.

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

सच में बहुत बुरा लगता है जब कोई अपना ही खुद से बातें छुपाने लगता है हम तो उसके लिए की जान से लगे रहते हैं अपने सगे भाई बहनों से इस तरह की अपेक्षा रखता कोई बड़ी बात नहीं है कि वह जितना पारदर्शी हम उनके साथ हैं उतने ही हमारे साथ रहे हैं पर कभी-कभी हमारे खुद के भाई-बहन भी हमारी मनोदशा नहीं समझ पाते।
हम बहुत सीधा और साधारण सा जीवन चाहते हैं इसमें अगर हम अपने भाई-बहन को प्रेम करते हैं तो बदले में इस प्रेम की कामना भी करते हैं इस जीवन में फिर बचा ही क्या है अगर सगे भाई बहन ही एक दूसरे से बातें छुपाने लगे एक दूसरे को नीचा दिखाने लगे या एक दूसरे से दूरी बनाकर रहे क्योंकि इस पूरी दुनिया में अगर हमारा साथ कोई देता है तो वह सिर्फ सगे भाई बहन और मां-बाप ही होते हैं वरना पूरे दुनिया में सिर्फ स्वार्थी लोगों की भरमार है पर अब लगता है जैसे कि खून के संबंध भी पानी की तरह पतले होते जा रहे हैं।
सुलोचना को उसकी बहन विमी का झूठ बोलना, यह बातें छुपाना बिल्कुल नहीं अच्छा लगा यह बात उसकी शक्ल देखकर ही पता चल रहा है

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

हाय सुलोचना कितनी भोली है और उसकी विम्बो दीदी उसकी उल्टी बेहद चालाक लोमड़ी,।सुलोचना के नाक के नीचे से रिश्ता चुरा लें गई और उसको कानो कान खबर भी ना होने दे अब कुढ़ती रहे सिलोचना..।
आगे देखते है किस मोड़ पर आती है इन तीनो की ज़िन्दगी..।
लाजबाब भाग 👌👌👌👌👌🙏।

Jyoti
Jyoti
1 year ago

Very nyc part 👌

जागृति
जागृति
1 year ago

लाजवाब 👌 कहानी

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

सच अपर्णा जी आपकी कहानियों में मुझे शिवानी जी की झलक मिलती है जैसे गहराई से वो पात्रों का वर्णन करते थे ऐसा लगने लगता है जैसे वो सामने ही हैं और हम उनको जानते हो।ठीक वैसा ही आपकी कहानियों में भी होता है।हर एक व्यक्ति का वर्णन ऐसा ही होता है आपकी कहानियों में भी।

ROOPSAGAR
ROOPSAGAR
1 year ago

👌👌👌👌