
जीवनसाथी -3 भाग -128
जीवन में कई बार अजब विकट परिस्थितियां पैदा हो जाती है लेकिन वो किस कारण पैदा हुई, उनके पैदा होने का उद्देश्य क्या है और उन परिस्थितियों से कैसे निपटा जा सकता है, ये सभी सवाल कई बार निरुत्तरित रह जाते हैं..
इन जटिल विषम परिस्थितियों के आगे अवश पड़ा इंसान फिर खुद को भाग्य के भरोसे छोड़ देता है … ।
ऐसा ही कुछ महल के लोगों के साथ हो रहा था..
राजनीति के काले कीचड़ में उतरे राजा अजातशत्रु भले ही अपने श्वेत वसन पर समय समय पर पड़ने वाले कलुषित कुटील छींटों को अपनी बुद्धि बल से परिमार्जित कर दिया करते थे, लेकिन समय का बदलाव इस बार राजनीति के ऊंट को किस करवट बैठायेगा, ये अच्छे अच्छे चाणक्यों की सोच से परे था..
और वहीँ चिंता राजा साहब को खाये जा रही थी !
राजा अजातशत्रु की छवि कितनी ही सुघड़ सुंदर क्यों न हो, सिर्फ एक व्यक्ति से पूरी पार्टी नहीं बनती.. उनकी पार्टी में शतरंज के खेल की तरह घोड़े हाथी ऊंट पैदल सभी सवार मौजूद थे..।
इनमें से कुछ जरूर राजा साहब के नाम का मान रखने को घर आती लक्ष्मी को ठुकरा कर भी स्थितप्रज्ञ रहने की कोशिश में लगे रहते, लेकिन कुछ एक इस दलदली पंक में खुद पर संयम खो कर फिसल फिसल जा रहे थे..।
और उनकी ये फिसलन उन्हें किस गहरी घाटी में ले जाकर समूल नाश करने वाली थी, ये उन्हें भले न मालूम हो समर को सब मालूम था..।
बस इसीलिए वो चारों तरफ से आने वाली इन विपत्तियों के लिए राजा साहब के चारों ओर एक अभेद्य दुर्ग सा बनाए खड़ा था..
न उसका तन विचलित होता था न मन। लेकिन आजकल राजा साहब के मन में एक दुर्बलता घर करती चली जा रही थी…
विपक्षियों ने जिस तरह से उनकी पार्टी के कद्दावर नेताओ को कभी ज़र कभी जोरू का चुग्गा फेंक फेंक कर चुन बिन कर निकाल अपनी तरफ कर लिया था, उससे एकबारगी वो स्वयं भी हतोत्साहित हो गए थे..।
इन चालबाजियों को जानते हुए भी न वो स्वयं को बदल सकते थे, और न ही सामने वालों को, उनके किये के लिए सजा दे सकते थे..।
उनका विशाल हृदय इन कुटिल कपटियों को भी उनकी हर कुटिलता के लिए सहज ही माफ़ करता आया था..।
लेकिन जब से उनके पास एक अनाम चिट्ठी पहुंची थी तबसे वो भी जरा शंकित हो उठे थे।
पत्र क्या था खुले तौर पर राजा अजातशत्रु को चेतावनी थी कि अगर समय रहते उन्होंने अपनी बढ़ती ख्याति और व्यापार को समेट ना लिया, तो उनके वंश का समूह नाश कर दिया जाएगा।
पत्र में न कहीं भेजने वाले का नाम था, ना पता, ना कोई नंबर…।
हालांकि ऐसी कोरी धमकियों से राजा अजातशत्रु डरने वालों में से नहीं थे। लेकिन इधर कुछ समय से जाने क्यों शौर्य को लेकर उनका जी घबराने लगा था।
एक तो वह लड़का अपने अजीबो गरीब स्वभाव के कारण वैसे भी उनके लिए एक पहेली बनता जा रहा था।
आज तक कभी शौर्य ने सामने बैठकर अपने पिता से ढंग से दो बातें तक नहीं की थी। जहां राजा साहब का दिल हर किसी पर ममता लुटाने को तैयार रहता था, हर किसी को सहज ही क्षमादान दे दिया करता था, वही शौर्य कभी सामने वाले की गलती को भूल नहीं पाता था। और मौका पड़ने पर वह बदला जरूर ले लेता था।
हालांकि छोटी-मोटी बातों पर उसका कभी ध्यान भी नहीं जाता था।
राजा अजातशत्रु जन्म से ही राजसी होने के बावजूद रूपयों के महत्व को समझते थे, उन्होंने कभी पैसा पानी की तरह नहीं बहाया, लेकिन शौर्य के लिए रुपए कौड़ियों के मोल थे। वह यूं ही किसी को भी राह चलते हजारों रुपए दे दिया करता था। हां एक चीज़ दोनों में समानता थी, दोनों के ही दिल में गरीबों और लाचारों के लिए अपूर्व दया थी।
वैसे देखा जाए तो बहुत से मामलों में शौर्य राजा अजातशत्रु की प्रतिलिपि सा था। लेकिन शायद अपूर्व मामा के संरक्षण ने उसके रास्ते को जरा गोल घुमा दिया था।
बांसुरी के अथक प्रयासों के बावजूद राजा साहब और उनके बेटे के बीच की दूरी घटने की जगह बढ़ती ही जा रही थी।
शौर्य जब से लंदन गया था, तब से अपने पिता से उसने एक बार भी बात नहीं की थी। हां नियम से अपनी मां को जरूर रोज शाम में फोन लगा लिया करता था, लेकिन इधर कुछ दिनों से उसका वह नियम भी टूट सा गया था।
राजा साहब उस धमकी भरे पत्र को पढ़कर विचार मग्न थे कि प्रेम ने उस पत्र को लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े करने चाहे, लेकिन समर ने उसे अपने हाथ में ले लिया।
वह उस पत्र की जांच करवाना चाहता था। और इसलिए उसने लैब में भेज दिया। हालांकि इन सारी जांचों से सच्चाई कितनी पता चलेगी यह तो वक्त ही जानता था लेकिन इस पत्र ने राजा साहब के दिमाग पर असर जरूर डाल दिया था…
वह अपने मन की अशांति की छूत अपनी पत्नी को नहीं देना चाहते थे, इसीलिए इस पत्र के बारे में उन्होंने बांसुरी से कोई जिक्र नहीं किया…।
इधर बांसुरी की परेशानी का अलग ही कारण था। शौर्य नित्य शाम के वक्त उसे फोन किया करता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका फोन आना बंद हो गया था। बांसुरी के दिल पर क्या बीत रही थी वह खुद किसी को नहीं समझा सकती थी।
क्योंकि उसे इस बात का ज्यादा बुरा लग रहा था कि शौर्य उसके फोन पर भी उससे बात करने के लिए नहीं आ रहा था। बस विक्रम से बात करके उसका हाल-चाल लेकर ही बांसुरी को संतोष करना पड़ रहा था। बांसुरी ने राजा साहब के सामने लंदन जाने का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन अपने राजनीतिक मसलों में उलझे राजा साहब ने असमर्थता जता दी।
बांसुरी उनकी व्यस्तता समझती थी, वह अकेले जाने के लिए भी तैयार थी।
लेकिन यही तो राज परिवार का हिस्सा होने का दुष्प्रभाव था कि उसे महल में हर किसी से लंदन जाने के पहले इजाजत लेनी थी। वह अपनी जेठानी को बहुत मानती थी। रूपा से इजाजत लेने गई तो रूपा ने पहले ही उसे टोक दिया।
रूपा अगले दिन ही राजमहल के कुल गुरु के पास हर्ष की शादी का शुभ लग्न निकलवाने जा रहे थी, और इसमें वह बांसुरी को भी अपने साथ लेकर जाना चाहती थी।
बांसुरी का मन इस वक्त कहीं नहीं लग रहा था। उसके दिल दिमाग पर सिर्फ शौर्य का व्यवहार छाया हुआ था। लेकिन वह अपनी जेठानी को मना भी नहीं कर सकती थी।
वह युवराज और रूपा के साथ कुलगुरु के आश्रम चली गई।
कुलगुरू उन्ही लोगो का इंतज़ार कर रहे थे, उन्होंने मीठी और हर्ष की कुंडली देखकर शुभ लग्न शुभ तिथि ठीक 15 दिन बाद की स्थिर कर दी….!
” इतनी जल्दी सब कैसे हो पाएगा?” रूप का चिंतातुर स्वर वहां बैठे युवराज और बांसुरी को भी मलिन कर गया
” राज परिवार के लिए कौन सी बड़ी बात है पुत्री !आजकल तो साधारण परिवारों में भी दस दिन बाद का मुहूर्त देख कर निकाल लिया जाता है! आजकल तो सब कुछ करने के लिए मैनेजर रख लिए जाते हैं! वेडिंग प्लानर को सारा सब सौंप कर घर वाले तो बस त्यौहार की तरह शादियों को मनाते हैं, फिर तुम इतनी चिंतित क्यों हो ..!”
” जी कुल गुरु!” रूपा के मन में खुशियाँ छायी थी! लेकिन साथ ही मन में ये भी चल रहा था कि इतनी सब तैयारी होगी कैसे?
वहाँ से गुरुदेव को प्रणाम कर वहाँ की प्रसादी लेकर वो तीनो आश्रम से निकल गए..।
बांसुरी के दिल में ठंडक सी पड़ गयी थी.. ।
वह विचारने लगी, अब हर्ष की शादी में आएगा तब अच्छे से इसकी खबर लूंगी..।
मानती हूं कि उसे हमेशा काम करने के लिए प्रेरित करती रहती थी। लेकिन इसका यह मतलब थोड़े न है कि काम में ऐसे डूब जाया जाए, अपनी मां को ही समय ना दे।
अब देखती हूं यहां से कैसे भाग कर जाएगा? हर्ष की शादी में शौर्य ना आए, ऐसा तो संभव ही नहीं था। इसलिए बांसुरी जो सोच रही थी, वैसा ही कुछ रूपा के मन में भी चल रहा था।
युवराज फोन पर राजा को कुलगुरु से हुई सारी बातचीत बता रहा था ..।
रूपा ने अपने मायके फ़ोन लगा लिया और बांसुरी ने निरमा को..
निरमा पन्द्रह दिन बाद की तारीख सुन चौंक गयी..
“हे भगवान, इतनी जल्दी सब कुछ कैसे होगा बंसी ?”
“हो जायेगा, सब हो जायेगा तू टेंशन मत ले !”
“कैसे न लूँ.. लड़की की माँ हूँ आखिर.. ऊपर से राजमहल में रिश्ता, मेरा तो सोचा सोच कर जी डूब रहा !”
“तू तो ऐसे बोल रही जैसे प्रेम भैया कोई साधारण इंसान हो..। इसी राजमहल का एक अहम हिस्सा हैं वो..।
उन्हें भी सब कुछ मालूम है। इसलिए तू ज्यादा परेशान मत हो.. सब कुछ समय पर हो जायेगा। चल अभी रखती हूँ, यहां से दो तीन घंटे में घर पहुँच जायेंगे हम लोग.. ।
उसके बाद कल सुबह तुम्हारे घर आकर रूपा भाभी साहब और मैं मुहूर्त विचार पर बातचीत कर लेंगे ! ठीक है ?”
“हम्म ठीक है !”
तीनो अपनी बातो में लगे थे, ड्राइवर बड़ी सावधानी से गाड़ी चला रहा था।
लेकिन कुल गुरु का आश्रम पहाड़ी के दूसरी तरफ था। वहां से पहाड़ी पर चढ़कर घाटी उतरना पड़ता था। ढेर सारे अंधे मोड़ थे। और अंधेरा घिरने लगा था।
वह लोग कुलगुरु से मिलकर जल्दी निकलना चाहते थे।
लेकिन कुलगुरु ने उन्हें बड़े स्नेह से भोजन के लिए रोक लिया, और इसी में बड़ी अबेर हो गई। उन लोगों को निकलते निकलते शाम हो चुकी थी।
वह लोग उजाले उजाले ही पहाड़ी का रास्ता पार कर लेना चाहते थे। लेकिन वह हो नहीं सका।
सावधानी से चलाने के बावजूद एक अंधे मोड़ पर सामने से आते दस चक्का वाहन से अपनी गाड़ी को बचाने के प्रयास में बाहरी मोड पर गाड़ी को मोङते हुए ड्राइवर से गाड़ी संभली नहीं, और घाटी के रास्ते से जरा नीचे की तरफ उतर कर कच्चे कीचड़ भरे मार्ग पर तेजी से फिसलती चली गयी…
क्रमशः

अच्छा हुआ 15 दिन के बाद की तारीख निकल आई है और एक मां होने के नाते निर्माण की चिंता जायज है कि वह कैसे अपनी पुत्री के विवाह की इतनी सारी तैयारियां 15 दिन में कर पाएगी दूसरी बात मीठी उसकी इकलौती पुत्री है तो एक मां के ढेर सारे अरमान होते हैं कि अपने बच्चों की शादी में वह क्या-क्या नहीं कर लेगी पर इतना सब कुछ होने के बाद चिंता करना जरूरी नहीं है आजकल तो साधारण परिवारों में भी इतनी जल्दी शादियां निकल आती है और वह निपटा भी लेते हैं फिर यह लोग तो राशि परिवारों से है उनके लिए तो सच में वेडिंग प्लानर से लेकर सभी तरह के मैनेजर्स होते हैं जो उनके घर के कार्यों को आसानी से निपटा देते हैं और परिवार को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ती।
अंत में यह क्या गजब दिखा दिया आपने लेखिका जी डॉक्टर साहिबा आप कभी-कभी हम लोगों की सांस ऊपर नीचे कर देती हैं अपनी कलम से।
कुछ गजब ना हो अब अंत में वरना सारी खुशियों पर ही आंच आ जानी है
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Very nyc part 👌
😩 अरे ये क्या हो गया।
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰
Wow superb episode
Oh no ye kya Ho gya
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Ye kya Antonio hyi,He Iswar sub sahi ho,kisi ko koi chot na lagya,kichar honay ki wajah se sabhi safe ho,Shadi vivah me koi archan na aaya,waisaya Baraya logo ki samasya bhi bahut Bari hoti hai,lekin ye to Dr Aperna Mam ke uper Sara mamla hai ,kya likhayngi,Waiting for the next part eagerly,
Nice ji
Just too good