मायानगरी -2 भाग -11

मायानगरी-2 भाग -11

   पार्टी कार्यालय में आज गज़ब की भीड़ भाड़ थी.. टिकट आबंटन होना था..पार्टी के किस कार्यकर्ता के भाग्य का सूरज उदित होगा और किसका अस्त इस बात का फैसला लिया जाना था..!

सबरवाल जी पार्टी के गणमान्य लोगो के सत्कार में लगे हुए थे..
वेदांत भी इधर से उधर भागता फिर रहा था..
भुवन की व्यस्तता की कोई सीमा न थी..!
वो उस दफ्तर का वो चिराग से निकला जिन्न था, जिसके बिना उस दफ्तर की कल्पना भी असम्भव थी…।

किस महामहीम को बिना दूध की चाय के साथ लौकी की तरकारी का पथ्य सुपाच्य है, और कौन मुर्गे की बोटी के साथ ही खाना खाता है, ये सब उसके जिव्हाग्र पर था..।

कार्यालय के पीछे की रसोई में वो रसोइये को सब कुछ समझाता सुबह से वहीँ डेरा डाले बैठा था..
उसे किसी पर रत्ती भर भरोसा नहीं था।
    जहाँ उन पर से पल भर के लिए भी आंखे हटी, हरामखोर घी के कनस्तर के कनस्तर पार कर जाते थे..।

वेदांत सुबह से भुवन को खोज रहा था, घर में उसे न पाकर वो भी बिना कुछ खाये ही फिर भुवन के आराध्य के मंदिर पहुँच गया था, लेकिन जब बड़ा हनुमान जी के मंदिर में भी भुवन नहीं मिला तब वेदांत सीधा पार्टी कार्यालय ही पहुंच गया।

और वहाँ इधर से उधर चकरघिन्नी सा घूमता भुवन उसे मिल गया था..।

वेदांत कभी कभी भुवन को देख चकित रह जाता था.. कैसा था ये लड़का, न कभी किसी से कोई अपेक्षा और न उपेक्षा…

अगर कोई कर्मचारी उसकी आज्ञा न माने तब भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो खुद उस काम को हाथ में ले लेता और कर के छोड़ता…
घर भर में कोई ऐसा नहीं था जो किसी न किसी काम के लिए भुवन पर निर्भर न हो।
उसके खुद के पिता उससे और सुकान्त से ज्यादा भुवन पर विश्वास करते थे..
घर की तिजोरी की चाबी भले वो खुद सहेज रखते थे लेकिन समय समय पर उनकी तिजोरी खोलने सहेजने का एकमात्र करता धरता भुवन ही था…

उसके पिता की तिजोरी की चाबी हो या ऑफिस के कागजात हो सब कुछ भुवन के हाथ ही था..।

उनके इतने भरोसे के कारण ही सिर्फ घर वालो ही नहीं बल्कि पार्टी दफ्तर के कार्यकर्ताओ के दिमाग में बैठा हुआ था कि सबरवाल जी का उत्तराधिकारी उनका बेटा नही भतीजा भुवन ही होगा..।

लेकिन सबरवाल जी के दिमाग में क्या चल रहा था, ये तो बस वो ही जानते थे !

निर्धारित समय पर पहुंचना कभी भी राजनीतिज्ञों का शगल नहीं रहा, फिर भी समय के घंटे डेढ़ घंटे पीछे ये लोग आने लगे.. उनके आते ही वहाँ के रण समर के बादल छंट गए..
अब तक भागते दौड़ते लोग एकदम से अपनी अपनी जगह स्थिर हो गए…
हर वस्तु पर जैसे जादूगर ने अपनी छड़ी फेर कर उसे यथास्थान रोक दिया था !

उन लोगों के आते ही वहाँ का मुख्य काम काज शुरू हो गया…
मुख्य दफ्तर के कमरे के अंदर सभी बड़े लोग इकट्ठा हुए और कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया…
वेदांत के साथ साथ भुवन को भी अंदर नहीं लिया गया था, ये बात बाहर खड़े लोगो के लिए भी आश्चर्य की बात थी..

वेदांत के लिए तो नहीं, लेकिन भुवन के लिए सभी को ये लगा था कि विधायक जी उसे ज़रूर अंदर लेंगे। लेकिन वो भी बाकी कार्यकर्ताओ की तरह बाहर ही खड़ा था। हालाँकि इस बात से भुवन के चेहरे पर शिकन भी नहीं थी..
वो बाहर से समय समय पर चाय नाश्ता पानी अंदर भिजवा रहा था..

उसी समय उन सबको विस्मित करते हुए वही पूर्व मंत्री जी वहाँ चले आये, जिन पर कुछ दिन पहले दूसरी पार्टी के साथ हाथ मिलाने का आरोप लग चुका था..।

ये वहीँ मंत्री जी थे जिनका कार्यकाल उनके आचरण और चरित्र जितना ही कलुषित था।
इनके किसी प्रतिद्वंदी ने इनका अश्लील एमएमएस बना कर लीक कर दिया था, जिसके बाद इन मंत्री जी की सारी कुंडली, भुवन निकलवा कर अपने ताऊजी के हाथ में रख चुका था…

इस बात के बाद वेदांत आश्वस्त था कि इन मंत्री जी के कार्यकाल पर अब पूर्ण विराम लग जायेगा और उनकी सीट भुवन के नाम हो जाएगी…
सबरवाल जी ने भी इस बात के बाद उन मंत्री महोदय को आड़े हाथो लिया था, लेकिन उस सबके बावजूद आज टिकट आबंटन वाले दिन उनका चेहरा वहाँ नजर आना शुभ संकेत नहीं दे रहा था..।

“ये यहाँ क्या कर रहे हैं ?” वेदांत ने भुवन से पूछ ही लिया..

“ताऊ जी ने कुछ विचार कर के ही इन्हे बुलाया होगा ! टेंशन मत लो वेद !”

“टेंशन नहीं है भुवन भाई, बस हमे ये आदमी सही नहीं लगता !”

“हम्म.. देखते हैं क्या होता है.. कुछ देर में पता चल ही जायेगा !
हो सकता है ताऊजी इसके कारनामे बाकी सबको भी बताना चाहते हो !”

“काश ऐसा ही हो.. ऐसा ही होना चाहिए !”

एक के बाद एक चाय कॉफी के दौर आगे जाकर भोजन पर रुके..
भोजन के बाद एक बार फिर कमरा पहले की तरह बंद हो गया…।
कमरे के अंदर कौन सी गूढ़ गंभीर चर्चा में सब रत थे, बाहर किसी को खबर नहीं थी..

कुछ देर बाद एक आध कार्यकर्त्ता को अंदर बुला लिया गया, लेकिन भुवन को नहीं बुलाया गया..।

रात दस बजे के करीब कमरे का दरवाज़ा खुला और बाहर मौजूद सभी लोगो को अंदर बुला लिया गया…
एक एक कर पार्टी प्रमुख ने टिकट दिए जाने वाले प्रत्याशियों का नाम पुकारना शुरू कर दिया…
आखिरी एक नाम की पर्ची बची थी..

वेदांत के मोबाइल पर गौरी का फ़ोन आने लगा और वो फ़ोन उठाये बाहर निकल गया..।
बाहर कॉरिडोर में बात करते हुए वेदांत इधर से उधर टहल रहा था कि उसकी नजर खिड़की पर चली गयी..

खुली हुई खिड़की से अंदर का नजारा साफ़ साफ़ नजर आ रहा था..

वेदांत को वहाँ से अपने पिता साफ़ साफ नजर आ रहे थे.. ।
  उसने देखा की वो किसी को कुछ इशारा कर रहे हैं..
और बस कुछ ही पलों में वही मंत्री जी वहाँ मौजूद पार्टी प्रमुख के पैरों में लोट गए..

वहाँ इतने सारे लोगों के बीच उनका इस तरह का व्यवहार प्रशंसनीय तो कहीं से नहीं था…।
उल्टा उनका नाम ख़राब ही होना था। लेकिन वो व्यक्ति अपना नाम और वजूद सब भूल कर पार्टी प्रमुख के पैरो पर लोट लगा रहा था..

“मेरा चुनाव में खड़े होने का ये आखिरी ही मौका है हजूर.. मेरी उमर हो चुकी है, अब अगर इस बार टिकट नहीं मिला तो पांच साल बाद हम जिन्दा भी रहेंगे या नहीं ये भी कह पाना मुश्किल है..।
हजूर पूरी जिंदगी पार्टी की गुलामी की है, हमने हमेशा नमक का फ़र्ज़ अदा किया है…।”

“वो सब तो ठीक है, लेकिन ये अभी अभी जो काण्ड आपने किया था उसका क्या किया जाए ? उसके कारण आपके साथ साथ पार्टी की छवि भी तो ख़राब हुई है.  !”

“हज़ूर वो तो विरोधी पार्टी का रचा षड्यंत्र था जिसमे हम उलझ कर रह गए.. जाँच में हमें क्लीन चिट दे दी गयी है चाहे तो आप बिधायक जी से पूछ लीजिये !”

अब तक तटस्थ भाव से सब कुछ सुनते बैठे सबरवाल ने हामी भर दी..

“ये सही बोल रहे हैं, इनको ज़बरदस्ती फंसाया गया था.. पार्टी के अनुभवी कार्य कुशल कद्दावर नेता के रूप में उनकी छवि रही है, जिसे मलिन करने का भरसक प्रयत्न किया गया है..।
आप तो जानते हैं आजकल लोग खुद आगे नहीं बढ़ पाते तो दूसरे को पीछे खींचने का प्रयास करने लगते हैं..।”

“इसका मतलब आप इनके समर्थन में हैं ?” पार्टी प्रमुख  ने सबरवाल जी से सवाल कर दिया..

“बात समर्थन या असमर्थन की नहीं है, लेकिन ये पुराने समय से पार्टी से जुड़े हैं और इन्होने हमेशा पार्टी हित के लिए काम किया है.. !”

खिड़की के ठीक बाहर खड़ा वेदांत ये सब कुछ साफ़ साफ़ देख और सुन पा रहा था..।
         हालाँकि उस वृहद कक्ष में इस वक्त भुवन के साथ बाक़ी लोग भी मौजूद थे, लेकिन ये सारी चर्चायें जिस हिस्से में चल रही थी, वहाँ की बातें बाकी कार्यकर्ताओ तक पहुँच नहीं पा रही थी..।

वेदांत को अपने पिता की इन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था…कुछ पलों के लिए वो विस्फारित नेत्रों से उन्हें देखता रह गया..
उसके पिता ये किस टुच्चे लीचङ इंसान की पैरवी कर रहे थे?

एक नंबर के धूर्त और कपटी इस आदमी को अगर उसने स्वयं अपनी आँखों से उस रात विरोधी पार्टी के लोगो के साथ सुर में सुर मिला कर बोटी तोड़ते और जाम खटकाते न देखा होता तो शायद आज इसके बगुला भगत स्वरूप पर खुद भी विश्वास कर लेता..।

    लेकिन जिसके अश्लील एमएमएस से लेकर उस दिन विरोधियों के साथ की बातचीत को भी रिकॉर्ड कर वो और भुवन बाबूजी को दिखा चुके थे, और इसके बावजूद वो उसी राक्षस का साथ देने को आतुर हुए जा रहे थे, ये बात वेदांत के अपच का कारण बनती जा रही थी..।

दूसरी तरफ से गौरी वेदांत की स्थिति परिस्थिति जाने बिना अपनी बात किये जा रही थी, आखिर झल्ला कर वेदांत ने फ़ोन काट दिया..
उसका दिल दिमाग इस वक्त उसका साथ नहीं दे रहा था..
वो तेज़ी से भागते हुए कमरे के अंदर जाने के लिए बढ़ गया..

वृत्ताकर उस कमरे के बाहर के गलियारे की सुदीर्घ परिधि पार करने में फिर उसे वाकई विलम्ब हो गया।

उसके कमरे में अंदर प्रवेश करते तक में टिकट का अंतिम दावेदार भी प्रस्तुत कर दिया गया था..।
और ये अंतिम दावेदार भुवन नहीं था।

भुवन के स्थान पर उन्ही मंत्री जी के नाम पर टिकट आबंटित कर दिया गया था।

भुवन से ज्यादा उसके अनुयायी इस बात पर भड़क उठे थे, लेकिन भुवन का एक इशारा ही उन्हें रोके रहने के लिए काफी था..
लेकिन वेदांत को वहाँ रोकना कठिन था..
वो गुस्से में कुछ बोलने आगे बढ़ ही रहा था कि भुवन ने उसकी बांह पकड़ ली..

“रुक जाओ वेद.. !”

“नहीं भुवन भाई.. आज बाबूजी ने वाकई अन्याय किया है ! और उन्हें इसका भुगतान करना ही होगा !”

“अगर ताऊजी ने ऐसा फैसला लिया है तो इसके पीछे उनका कोई विशेष कारण होगा !”

“एक पाखंडी को दुबारा टिकट देने के पीछे क्या प्रयोजन हो सकता है भला ? ये आपके साथ सरासर अन्याय है !”

“अभी शांत हो जाओ, जो भी कहना है घर जाकर बोलना , यहाँ सब के सामने कोई सीन क्रिएट नहीं करना है !”

और फिर भुवन ने वेदांत को रोक लिया, लेकिन गुस्से में जलता वेदांत वहाँ से सीधा घर निकल गया..
बुरा तो भुवन को भी बहुत लग रहा था, लेकिन वो निराला ही था.. उसे अपना दुःख किसी को दिखाना गवारा न था..
वो भी वहाँ का काम निपटने के बाद चुपचाप निकल गया…
वो कहाँ गया, कब लौटेगा, किसी को कुछ मालूम नहीं था…

रात ढलने के साथ ही घर में भुवन के नाम की पुकार मची लेकिन भुवन घर में होता तब तो मिलता …
खाने की मेज पर सबका इकट्ठा होना उस घर का सदियों से चला आ रहा नियम था। जिसे भुवन ने आज तक नहीं तोडा था, लेकिन आज वो वहाँ भी उपस्थित नहीं हुआ..

“पृथ्वीराज… कहाँ मर गयी !”

“यहीं है रसोई में.. आप कितना भी चाहे हम इत्ती आसानी से मरने वाले नहीं हैं !”

“जानती हूँ बड़ी सख्त जान है तू… छोटी से पूछ कर बता कि भुवन कहाँ है ? खाने की मेज पर सबसे पहले आने वाला लड़का आज अब तक नदारद है..।
ऐसे कैसे हो सकता है ? कहीं तूने ही तो नहीं भेज दिया कुछ लाने लिवाने ?”

“दिन भर के थके हारे लड़के को हम काहे भूखे प्यासे दौड़ा देंगे.. लेकिन एक बात है अम्मा जी !”

“क्या हुआ ?”

“हम सुने हैं आज टिकट आबंटन था और भुवन की जगह उसी पाखंडी दुरात्मा के नाम की टिकट काट आये हैं आपके बेटे !”

“क्या बात कर रही है ?”

“सच कह रहे हैं, जब से वेदांत ने बताया, हमारा जी कैसा तो हो रहा..।
भुवन की अम्मा का रो रोकर बुरा हाल है,कमरे से ही नहीं निकली वो शाम से !
हम भुवन को फ़ोन लगा लगा कर थक गए उसका फ़ोन ऑन ही नहीं हो रहा !”

“हे भगवान ये क्या अनर्थ हो गया.. इस बार तो ये लड़का पूरी तरह से चुनाव लड़ने तैयार बैठा था.. ये बहुत गलत कर दिया इसने !”

दादी अपनी आंखे पोंछती और भी चार बातें सुनाती उसके पहले वहाँ सबरवाल जी पहुँच गए..वो आकर अपनी कुर्सी पर बैठे कि उनका फ़ोन बजने लगा..
कुछ दो चार बातें करते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया..
फ़ोन रखते हुए वो सुकान्त की तरफ देखते हुए खड़े हो गए..

“सुकान्त गाडी निकलवाओ तुरंत,  नहर के पार किसी लड़के की पानी में तैरती लाश मिली है, हमे पुलिस ने वहीँ बुलवाया है.. लड़के के पास से पार्टी कार्यालय का झंडा बरामद हुआ है ! वेदांत तुम भी चलो..

वो अपनी बात पूरी कर पाते उसके पहले वेदांत भागता हुआ घर से बाहर निकल गया !

क्रमशः 

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Aparna Roy
Aparna Roy
8 months ago

Mujhe MayaNagari 1 season padna h kaise padu please reply

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Ye kya hua 😨😨😨😨

Nisha
Nisha
1 year ago

Ye bhuwan nahi ho sakta.wo itna kamzor kabhi nahi tha.galti toh bahut badi hui hai.bhuwan itna kabil hai ki wo rajniti chhodkar kahin bhi safal ho sakta hai.hey mahadev uski raksha karna 🙏🙏

Neha
Neha
1 year ago

M bss yhi chahti hu ki yrr bhuvan k sath pehle hi bhot bhedbhav hota h use or tang na kre m nhi chahti ye bhla manus aage Jake villain bne
Hope so aap aisa kuch nhi hone dengi🙃🙃

Vaishali Garg
Vaishali Garg
1 year ago

Politics is very bad. However Bhuvan is not a person like that. Suraj ko badal kitna bhi apne peeche chupa lein uski toh ek din apne prachand tej ke saath Uday hona hi hai. Bhuwan bhi aisa hi hai. Very amazing part 👏

Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
1 year ago

Rajneeti ka daldal …bhuvan itna kamjor nahi he.. very interesting story 😍 bahut hi behtrin part… lajwab story 😍 awesome part… eagerly waiting for new part

Siddharth Singh
Siddharth Singh
1 year ago

कहानी मे ट्विस्ट…

Ritu Jain
Ritu Jain
1 year ago

Suspense dii. Yeh jo kuch hua bahut galat hua pata nahi bhuvan ki kabiliyat uske tauji ko dikhai nhi deti ya woh dekhna nhi chahte. Waise jo body mili hai bhuvan ki nahi hai kyuki woh itna kayar nahi hai. Very nice part

Manjeet Kaur
Manjeet Kaur
1 year ago

Nice part 👌👌👌👌👌👌👌

जितेन्द्र कुमार वैश्य Jitendra Kumar Vaish
जितेन्द्र कुमार वैश्य Jitendra Kumar Vaish
1 year ago

बहुत ही सस्पेंस भरा भाग 👌👌👌👌