
अतिथि -19
अब तक आपने पढ़ा, माधव के माता पिता लखनऊ आते हैं, और शाम के वक्त डिंकी के माता पिता से मिलने भी पहुँच जाते हैं। हालाँकि उनके आगमन का सुन कर सुलोचना सुबह से ही उनके स्वागत की तैयारियॉं में जुटी होती है, लेकिन वो लोग खाने के समय के बाद वहाँ पहुंचते हैं..
अब आगे..
सुलोचना उठ कर पानी लेने अंदर चली गयी, जाते जाते वो डिंकी के कमरे में घुस गयी..।
डिंकी गहरी नींद सोई पड़ी थी, उसने धीमी आवाज़ में उसे जगाना शुरू कर दिया..
डिंकी एक अंगड़ाई लेकर उठ बैठी..
” क्या हुआ मम्मी ? क्या आफत आ गयी ?”
“आफत नहीं, केदार भाई साहब आये हैं, चल मुहँ हाथ धोकर बाहर आ जाना !”
उसे जगा कर वो रसोई में चली गयी, डिंकी भी उसके पीछे रसोई में चली आई..
सुलोचना ने एक दिन पहले ही काफी सारा सूखा नाश्ता मंगवा लिया था। अपनी सबसे सुंदर क्रॉकरी में सब कुछ सजा कर वो बाहर जाने लगी, उसने डिंकी को पानी की ट्रे पकड़ा दी..
“ये आपकी बेटी है ?” सुलक्षणा ने डिंकी की तरफ देख कर पूछा और सुलोचना ने डिंकी को पैर छूने का इशारा कर दिया.. डिंकी आगे बढ़ी लेकिन उन दोनों ने ही उसे रोक दिया..
‘”नहीं नहीं.. हमारे यहाँ बेटियाँ पैर नहीं छूती, तुम बैठो बेटा !”
डिंकी को अपने साथ वाली कुर्सी पर बैठा कर सुलक्षणा उससे उसके कैरियर और पढाई के बारे में पूछताछ करने लगी..
डिंकी भी मद्धम आवाज़ में जवाब देने लगी..
उन दोनों को बातें करते देख सुलोचना के दिल में ठंडक सी पड़ गयी..।
केदार और विनोद अपनी राजनैतिक परिचर्चाओं में व्यस्त थे..
सुलोचना के मन में एक फ़ांस ज़रूर चुभ रही थी कि आज माधव अपने माता पिता के साथ नहीं आया था.. लेकिन फिर लगा हो सकता है किसी काम में व्यस्त हो…।
वो जब पानी लेने गयी थी तभी उसने कढ़ाही चढ़ा कर पकौड़े तलना शुरू कर दिया था, बीच बीच में जाकर वो उन्हें अलट पलट कर सेंकती जा रही थी.. चाय भी चढ़ा ही चुकी थी..
अबकी बार में वो चाय के साथ गर्मागर्म प्याज की पकौडियाँ भी ले आयी..
“अरे आपने इतना कुछ कब बना लिया ? मुझे तो लगा मैं आपसे बात ही करती रह गयी !” सुलक्षणा की बात पर सुलोचना मुस्कुरा कर रह गयी…
उसने नाश्ता और चाय उन लोगो की तरफ बढ़ा दिया..
“मैंने तो सुबह के खाने की पूरी तैयारी रखी थी, लेकिन आप लोगों से कहना भूल गयी थी !” सुलोचना ने धीरे से कहा और केदार उसकी तरफ देखने लगा..
“अरे भाभी के हाथ का खाना मिस हो गया। वैसे आप खाना वाकई बहुत स्वादिष्ट बनाती है।
आज ज़रा एक जगह ज़रूरी काम से जाना पड़ गया.. असल में हमारा आज लखनऊ आने का उद्देश्य ही वही था.. !”
“क्या उद्देश्य था भाई !”
विनोद ने एक गर्मागर्म पकौड़ा मुहं में ठूंस कर पूछ लिया.
“दरअसल माधव के लिए एक रिश्ता आया था.. लड़की वाले बहुत दिनों से पीछे पड़े थे, इसलिए आज समय निकाल कर चले आये !”
छन से कुछ गिरा और सुलोचना अपने चेहरे के भाव छिपाती रसोई में चली गयी..
डिंकी के चेहरे का भी रंग बदल गया.. लेकिन वो कहीं जा नहीं पायी, चुपचाप बैठी रही !
विनोद अलबत्ता अब भी गर्मागर्म पकौड़े बिना सही से फूंके ही उदरस्थ करता जा रहा था..
तीखे और गर्म पकौड़े मुहं जला रहे थे, और वो गर्म चाय पीता उस जलन को और बढ़ा कर स्वाद महसूस कर रहा था।
वैसे भी उसके मन में कभी भी डिंकी और माधव का रिश्ता फिट नहीं बैठा..
वो अपने और केदार की पाक साफ़ दोस्ती के बीच किसी तरह के औपचारिक रिश्ते को देख ही नहीं पाता था, लेकिन सुलोचना का दिल बुरी तरह से टूट गया था..।
दिल तो डिंकी का भी टूटा था, लेकिन वो मजबूत बनी वहीँ बैठी थी…..
सुलक्षणा धीमे से उठी और रसोई में चली आई…
“आप यहाँ फिर किन कामो में व्यस्त हो गयी..? मैं तो आप ही से मिलने आई थी!”
“नहीं कुछ नहीं बस ज़रा रसोई साफ़ कर रही थी.. आप चल कर चाय लीजिये न !”
“चाय तो मैं पी चुकी, बहुत अच्छी बनी थी !”
सुलक्षणा बिना किसी अपराध के भी उस वक्त सुलोचना को अपराधिनी नजर आने लगी थी..। उसके दिल दिमाग में भूचाल उठा था, लेकिन अफ़सोस की बात थी कि वो खुद को व्यक्त नहीं कर पा रही थी..
उसने मटकी से एक गिलास पानी भरा और गटागट पी गयी। यूँ लगा अंदर मची उथल पुथल को एक विराम सा मिल गया हो..।
“आइये बाहर ही बैठते हैं !” सुलोचना बाहर की तरफ निकलने लगी। सुलक्षणा ने रसोई में ढके रखें बड़े बड़े भगोने देख कर समझ लिया था की खाने का तगङा आयोजन किया गया था।
“आपने तो लगता है काफी कुछ बना लिया था ?”
“नहीं नहीं.. खाना तो साधारण ही था !”
थोड़ी देर पहले मिश्रा परिवार पर जान लुटाने को आतुर सुलोचना अब कंधे पर हाथ भी धरने नहीं देना चाहती थी।
हालाँकि ये बात वहाँ मौजूद डिंकी के अलावा किसी को समझ नहीं आई!
डिंकी जानती थी उसकी माँ को माधव कितना पसंद था। कहीं न कहीं उसके खुद के दिल में खिलने वाला चाहत का फूल उसकी माँ की इच्छा के कारण ही फल फूल पाया था..।
लेकिन आज अचानक सब सूखने लगा था..
एक बार फिर केदार सुलोचना से मुखातिब हो बोल पड़ा..
“लड़की की माँ और ये एक साथ स्कूल में पढ़ी हैं.. इनके मायके में पड़ोस में ही उनका भी घर है। दोनों सहेलियां बचपन से कुछ ज्यादा ही पक्की सहेलियां थी, फिर दोनों स्कूल के बाद कॉलेज पहुंची और पढ़ाई के बाद दोनों की ही अलग-अलग जगह शादी हो गई। इत्तेफाक से वह शादी के बाद लखनऊ चली आई, और यह गोरखपुर चली गई। लेकिन इस सब के बावजूद दोनों की दोस्ती बनी हुई थी। इन दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि यह लोग हमेशा यह बात किया करते थे कि हम अपने बच्चों की शादी एक दूसरे से करेंगे।
और फिर उनकी बेटी जब कॉलेज पहुंच गई, तब उन्हीं की तरफ से पहली बार प्रस्ताव आया। हमें किस बात का एतराज हो सकता था? देखा जाए तो लड़का लड़की देखने दिखाने की औपचारिकता भर बाकी है, वरना तो यह रिश्ता हमारे बच्चों की पैदाइश के पहले तय हो चुका था!”
“बहुत बढ़िया.. लड़की के पिता क्या करते हैं ?” विनोद पूछ बैठा..
“यही सिंचाई विभाग में काम करते हैं, अच्छी कमाई है! खुद का घर है, दो ही लड़कियाँ हैं.. बड़ी लड़की का ब्याह हो चुका है, ये छोटी है !”
“क्या करती है ?” सुलोचना से रहा नहीं गया, उसने पूछ ही लिया..
“आर्ट्स में ग्रेडुएशन कर चुकी है, सिलाई बुनाई सब कर लेती है, बस पढ़ने में जरा कम रूचि है..!”
“खाना वाना तो अच्छा ही बनाती होगी ?” सुलोचना को रहाई नहीं पड़ रही थी..
“अब आजकल इन बातों को कौन देखता है बहन जी..
हमारा ज़माना था, जब खाना बनाना सिलाई कढ़ाई जैसी बातें पूछी जाती थी! अब तो लड़की घर परिवार क्या अपने पति के साथ ही निभा ले, वही बड़ी बात है.. !
और फिर हमारा माधव भी तो सामान्य कहाँ…?”
सुलोचना की बात पूरी हो पाती, उसके पहले ही केदार ने उसे टोक दिया..
“हाँ हाँ सही कह रही हो… वो मैं कह रहा था, अब हमें निकलना चाहिए !”
इन लोगों की बातों के बीच डिंकी कब उठ कर अपने कमरे में चली गई, किसी को नहीं पता लगा था। चिंटू पहले ही नीचे खेलने जा चुका था, अब वहां सिर्फ वही चार लोग मौजूद थे।
केदार ने सुलक्षणा को टोक दिया लेकिन सुलोचना का ध्यान इस बात पर चला गया था। उससे रहा नहीं गया, और उसने पास बैठी सुलक्षणा की तरफ देखकर सवाल कर ही लिया…
“माधव के बारे में क्या कह रही थी आप?”
सुलक्षणा ने एक नजर सुलोचना को देखा और उसके बाद अपने पति को देखने लगी।
उसने बगल में बैठी सुलोचना की तरफ देखा और कहना शुरू कर दिया..
” बहन जी अब आप लोगों से कैसा छुपाना? आप लोग तो हमारे पारिवारिक मित्र हैं। विनोद भाई साहब और यह एक ही गांव के रहे हुए हैं, संग खेले कूदे पले बड़े हैं। ऐसे में आप लोगों से कोई पर्दादारी नहीं है।
हमारा बेटा माधव सामान्य नहीं है। उसे कुछ मानसिक व्याधि है। हम अगर किसी और के सामने यह बात बताते हैं तो लोग उसे पागल मान लेते हैं। जबकि सच्चाई यह नहीं है। माधव पागल नहीं है। बिल्कुल भी नहीं।
लेकिन थोड़ा सा मानसिक रूप से अस्थिर है। बचपन में एक बार वह अपने बाबा के साथ मेला घूमने गया था। उस वक्त हवाई झूले में से नीचे झांकते समय उसका संतुलन बिगड़ा और वह नीचे गिर पड़ा। भगवान ने उसकी जान बख़्श दी, यही बहुत बड़ी बात थी। लेकिन उसके दिमाग में ऐसी गंभीर चोट लगी कि उसका असर अब तक बना हुआ है…।”
“क्या? इसका मतलब माधव पागल..?”
“नहीं नहीं पागल नहीं है वह।
पागल नहीं है मेरा बेटा। कम से कम आप लोग तो इस बात को समझिए। उसके दिमाग में जरा सी कुछ दिक्कत है। वह अपने आप बैठे-बैठे कहानियां बनाने लगता है। उसके दादाजी के साथ वह बहुत कम समय बिता पाया, लेकिन सबको बताता है कि वह उनके साथ रहकर बचपन में पढ़ाई किया करता था। उनकी पान की डिबिया से सुपारियों की कतरन चुराया करता था। और भी न जाने क्या-क्या बातें बताता है। जबकि वह कभी बांगरमऊ में रहा ही नहीं…।”
सुलक्षणा माधव के बारे में और भी बातें बताती रही, सुलोचना आंखें फाडे सब कुछ सुनती रही। लेकिन उस कमरे के ठीक बाहर दरवाजे पर का पर्दा हाथ में पकड़े खड़ी डिंकी के चेहरे का रंग सफेद हो गया था। वह अपनी जगह पर जैसे जम गई थी।
तो क्या आज तक माधव ने उसे जितनी भी बातें बताई थी, वह सब उसकी खुद की बनाई हुई थी?
तो क्या माधव एक सामान्य लड़का नहीं था ?लेकिन देखने सुनने बोलने चालने में तो वह बहुत सामान्य नजर आता था।
क्या थी माधव के जीवन के असली सच्चाई? डिंकी की आंखों से मोटे-मोटे आंसू गिरने लगे, और तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी। उसने देखा माधव का कॉल आ रहा था। उसने धीरे से फोन काट दिया….
क्रमशः

अभी प्यार की कली खिल भी नही पाई थी की इतना बड़ा धमाका माधव के रिश्ते की बात होने लगी। मां, और बेटी के दिल में जैसे मरोड़ सा हो गया।
माधव की बीमारी ये क्या नया खुलासा 😳
Kya madhav ka kaha sara jhooth tha ya uski mummy waisi nahi hai jaisa usne bataya hai 😮😮😮
Nyc part 👌
Very beautiful
वाकई में आज कुछ छत्र से टूट गया ..न जी न केवल रिश्ता नहीं भले ही रिश्ता न जुड़ा हो लेकिन मन तो एक रिश्ते की कल्पनाएं करने ही लगे थे उनके
इंसान तब बहुत आहत होता है जब उसे पता चलता है कि वह ठगा गया है ,प्रेम में छला जाना बहुत तकलीफदेह होता है ।
सुलोचना अपनी बेटी के भविष्य की सोचकर माधव पर अपना प्रेम लुटा रही थी तो वहीं dinki माधव की बातों में सरबस विभोर भावुक मन से डूबती चली जा रही थी …अब जब लग रहा कि वह सब मात्र एक छलावा था कोई मनगढ़ंत सी परिकल्पनाएं जिनमे वह डूबकर भावुक हो रही थी जबकि अनजाने में उसकी खुद की भावनाओ से खेल गया माधव
कैसे संभालेगी dinki अब खुद को
अगर मैं होती उसकी जगह तो मुझे विरक्ति हो जाती तो क्या अब dinki भी माधव से अपना सम्पर्क काट देगी..?
😯😯😯😯ये क्या था 😯अरे यार डॉक्टरनी क्या गज़ब लिखती हो यार आप,मेरा तो मुँह खुल गया 😯तो क्या ये जो कुछ भी माधव ने डिंकी को बताया था वो सब सच नहीं है 🤔।
देखते है आगे और क्या क्या धमाके होते है 😊खूबसूरत भाग 👌👌👌👌।
ये क्या 😲
माधव तो बिल्कुल सामान्य लग रहा है
डिंकी के लिए यह बात किसी झटके से कम नहीं है माधव ने अभी तो अपने जीवन की कहानी डिंकी को सुनाई थी तो क्या वो मनगढ़ंत है या सच्चाई कुछ और है
Ye to gajab ka dhamaka ho gaya ab tak Dinki ko, Madav ne khud se kahaniyaan bana kar sunai hai lagta hai.
Ohh ,ye to kahani ka Rukh hi badal diya…
Nice ji