
पोंचो -4
पोंचो को घर लाये तीन महीने बीत चुके थे, और अब वो पहले से कहीं अधिक स्वस्थ नजर आने लगा था..
वो दोनों कई बार इस बात पर विचार कर चुके थे कि एक बार डॉक्टर से पोंचो की जाँच करवा ली जाए, लेकिन फिर मन का डर उन्हें ऐसा करने से रोक देता.. कहीं डॉक्टर ने फिर कोई नयी भविष्वाणी कर दी तो ?
पोंचो आज नहीं तो कल उन्हें छोड़ जायेगा, ये वो दोनों जानते थे। लेकिन डॉक्टर ने कहीं तिथि मुहूर्त सब तय कर के बता दिया तो उनके लिए बहुत कठिनाई पैदा हो जाएगी..।
बस यही सोच कर वो दोनों डॉक्टर के पास नहीं गए..
ऐसा नहीं था कि वही दोनों पोंचो के जीवन में भगवान बन कर आये थे, बल्कि वो भी उनके नीरस जीवन में इंद्रधनुष बन कर उभरा था..।
शादी को कई साल बीत चुके थे.. शुरू से दोनों अपने कैरियर को लेकर महत्वाकांक्षी थे।
ये शादी का वही शुरआती दौर था, जब स्वर्णिम दिन और रजतमयी राते भी उन विश्वामित्रों की तपस्या भंग नहीं कर पायी थी..।
दोनों ही मध्यमवर्गीय थे, पैसे जोड़ तोड़ कर बचत से घर चलाना बचपन से देखा था, इसलिए हाड़तोड़ मेहनत कर के पढाई की थी। जिससे अमेरिका में बैठ कर दोनों हाथो से कमाई कर सके..।
और अब जब मौका मिला तो दोनों ये मौका क्यों जाने देते..?
वो भी सोचती थी आखिर उसके माता पिता ने भी तो उसकी पढाई लिखाई पर इतना खर्चा किया है, फिर वो क्यों अपनी बुद्धिमत्ता को रुमाली रोटी और मखनी पनीर की ग्रेवी बनाने में उपयोग करे..।
ये तो वैसे भी बन ही जायेगा।
हद से ज्यादा काम ने दोनों के तनाव को भी बढ़ा दिया था।
रात रात भर जाग कर क्लाइंट मीटिंग लेना, सुबह पीपीटी बनाना, दोपहर खा पीकर दस मिनट की झपकी लेकर वापस मीटिंग्स में जुट जाना..।
अस्तव्यस्त दिनचर्या और मानसिक अशांति ने धीरे धीरे तीस की उम्र में ही शरीर पर अपने हस्ताक्षर उच्च रक्तचाप और तनाव के रूप में करने शुरू कर दिए थे..।
ऐसा नहीं था कि वो दोनों परिवार नहीं बढ़ाना चाहते थे, लेकिन उस काम के लिए वक्त नहीं मिल पा रहा था जिसे बड़े बूढ़े काम का काम तक नहीं मानते थे।
लड़की की सास अक्सर उसे ताना दे देती..
“बच्चे भी कोई प्लान करने की चीज है? ये तो जब भगवान की मर्जी होती टप से हो जाते..।”
“तो लगता है मम्मी जी भगवान ही हमसे नाराज़ बैठे हैँ, वरना टप से बच्चे भेजने के हमने तो उन्हें कई हज़ार मौके दिए थे..।”
जलता हुआ सा जवाब सास के मुहं पर मार कर खुद उसी जवाब की तपन में झुलसती वो फिर अपने बहते आंसू लिए अंदर चली गयी थी..।
ये आखिरी मौका था जब उसकी सास ने उसे टोका था, फिर उन्होंने इस मामले में चुप्पी साध ली थी..।
पहले तो वो दोनों डॉक्टर के पास अपना चेकअप भी करवा आए थे। लेकिन दोनों ही पूरी तरह से स्वस्थ थे, इसलिए अब डॉक्टर के पास भी जाने का सवाल नहीं उठता था।
शुरू शुरू में डॉक्टर के बताए एहतियात को दोनों ने पूरी निष्ठा से निभाया, लेकिन फिर धीरे-धीरे इन सारी प्रक्रियाओं से उदासीन होते चले गए थे।
इधर दो-तीन सालों से उन्होंने बच्चे के बारे में सोचना पूरी तरह से बंद कर दिया था। लेकिन अब पोंचो के आने के बाद उनका जीवन जैसे 360 डिग्री पर घूम गया था।
जिस दिन वह लोग पोंचो को लेकर आए थे, उससे अब तक में उसमें काफी सुधार आ गया था। अब तो वह उन दोनों के साथ टहलने भी जाने लगा था। शाम को दोनों में से कोई एक पारी बांधकर पोंचो को बाहर टहलाने जरूर ले जाता था। दोनों ने कहीं पढ़ा था कि प्रकृति के जीव को अपने जैसे लोगों से मिलने जुलने की जरूरत होती है। वह दोनों इस बात को समझते थे। उन्हें भी तो वीकेंड्स पर दोस्तों के साथ चिल करने की जरूरत महसूस होती थी, तो फिर पोंचो भी तो अपनी बिरादरी की बिल्लियों को देखना चाहता होगा।
पोंचो भी अब मस्त मगन होकर उन दोनों के साथ टहला करता था। उनके साथ चलते समय उसकी गर्दन जरा अकड़ी रहती थी। रास्ते पर चलती बाकी बिल्लियों को देखकर वह उपेक्षा से मुंह फेर लेता था। कोई बिल्ली उसे आवाज देकर उसका अभिवादन करना चाहे, तब भी वह बड़े लटके झटके देकर दूसरी तरफ देखने लगता था, और उसे इस बात में बेहद खुशी मिलती थी।
उसे पता था कि उस कॉलोनी की बिल्लियां उसकी किस्मत पर रश्क करती हैं। और वह इस बात पर गर्व से चौड़ा हो जाता था।
समय बीतता गया, और धीरे-धीरे पूरे 6 महीने बीत गए। इन छह महीनों के दौरान ना ही कभी पोंचो की तबीयत बिगड़ी और ना ही कभी वह सुस्त पड़ा।
उन दोनों को लगा कि शायद डॉक्टर ने गलत जांच कर दी थी। पोंचो को वैसी कोई तकलीफ ही नहीं जैसा डॉक्टर ने उन्हें बताया था। इस बीच उस शॉप ओनर का भी एक दो बार पोंचो का हाल-चाल पूछने के लिए फोन आ गया था। वह भी इस बात से आश्चर्य में डूब गया था कि जिसके जीवन की सिर्फ 3 महीने की गणना करके डॉक्टर ने उसे भेजा था, वह पूरे 6 महीने जी चुका था..।
यह वाकई बहुत खुशी की बात थी। बावजूद वह दोनों अब भी पूरी तरह से निश्चिंत नहीं हो पाए थे।
पोंचो को लेकर अब भी वह काफी गंभीर थे। उसे ऐसा कोई भी आहार नहीं दिया जाता जो उसकी सेहत के लिए नुकसानदायक हो। उसे अब भी वह दोनों पलकों पर बैठा कर रखते थे। समय धीरे-धीरे गुजरता जा रहा था, और उस हर एक गुजरते पल के साथ पोंचो और उन दोनों का संबंध प्रगाढ़ से प्रगाढ़तम होता जा रहा था…।
देखते ही देखते पूरा साल बीत गया, और वह दिन वापस आ गया जिस दिन वह दोनों पोंचो को पहली बार अपने घर लेकर आए थे। उस तारीख को उन दोनों ने पोंचो के जन्मदिन के रूप में मनाने की सोची। इत्तेफाक से उस दिन शनिवार था। उनकी छुट्टी थी, और उन लोगों ने घर पर एक छोटी सी पार्टी का अरेंजमेंट किया।
अपने कुछ खास दोस्तों को उन दोनों ने घर पर बुला लिया। उन दोस्तों से यह भी आग्रह किया कि वह अपने पेट्स को भी अपने साथ लाएं। सारे पेट्स के लिए अलग खाने की व्यवस्था की गई थी…।
पूरे घर को खूबसूरत रेशमी फीतों और बलून से सजाकर उन दोनों ने ढेर सारा खाना भी बना लिया। पोंचो को अब उन दोनों की सारी बातें पूरी तरह समझ में आने लगी थी। वह समझ गया था कि आज उसका पहला जन्मदिन मनाया जा रहा है। वह भी बिल्कुल किसी राजकुमार की तरह अपनी कुर्सी पर बैठा, घर की सारी तैयारी को देख रहा था।
बीच-बीच में वह उन दोनों की मदद के लिए कुछ सामान इधर से उधर उठाकर उन्हें दे दिया करता था। और वह जब ऐसा करता, तब वह दोनों उसे गोद में उठाकर चूम लिया करते थे।
इस प्यार से निहाल हुआ पोंचो अपनी किस्मत पर खुद ही इठला जाता था…।
लेकिन किस्मत का लिखा कभी खुद को झुठलाया पाया था ?
अगला हिस्सा कल..

Nyc part
Bahut badhiya ❤
Ek bahut khubsurat aur emotional story with sad and happy ending…very beautiful 👌🏻
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Beautiful 😍😍😍
Amazing part. Nice part di. Wish u happy diwali and bhaidooj
Bahot accha lag raha tha ki chalo poncho ko kuch nahi huva…par aap ne bich me “lekin….” Likh diya…..ab dar lag raha he….ki kahi kuch galat na ho jaye
Very beautiful and interesting part
Sab Kitna Acha chal raha hai, but aapki last line ne fir Dara dita
आगे का कुछ कुछ दिखाई दे रहा , खैर जो भी हो जो समय उसने उन दोनों को दिया वो एक तोहफा ही था ।
सुंदर लेखन ।