
अतिथि -18
शाम ढलने लगी थी, अपनी बातों में गुम डिंकी और माधव को समय का पता ही नहीं चला..
पहले डिंकी ने ही समय की तरफ ध्यान दिलाया..
“बहुत देर हो गयी, अब हमें घर के लिए निकलना चहिये !”
माधव ने हामी भरी और अपनी जगह पर खड़ा हो गया..
दोनों घर की तरफ बढ़ गए..
रास्ते में एक जगह डिंकी ने माधव से गाडी रोकने की गुज़ारिश की और माधव ने गाडी रोक दी..
उसने देखा, ये कोई मंदिर था, उसने सवालिया नज़रों से डिंकी की तरफ देखा..
“ये मनकामेश्वर मंदिर है..ये एक हज़ार साल पुराना मंदिर है। कहते हैँ लक्ष्मण जी ने इसी मंदिर में शिव जी की आराधना की थी..
यहाँ की मानता है कि यहाँ जो मांगो वो पूरा हो जाता है !”
पूजा की थाली लिए डिंकी मंदिर के अंदर चली गयी..
गोमती के तट पर बसा मंदिर एक अलग ही छटा बिखेर रहा था..
डिंकी आँख बंद किये, हाथ जोड़े मूर्ति के सामने खड़ी थी। उसके होंठ बहुत धीमी आवाज में कुछ बुदबुदा रहे थे, और माधव उसे ही अपलक देख रहा था..।
कितनी भोली सी प्यारी सी थी वो…
बिलकुल जैसे कोई अधखिला सा महकता फूल हो, लेकिन बदकिस्मती से ये फूल इसकी किस्मत में नहीं था..।
डिंकी ने आंखे खोली और उसकी नजर खुद को घूरते खड़े माधव से टकरा गयी…
डिंकी ने इशारे में क्या हुआ पूछा और माधन ने न में गर्दन हिला दी..
वहाँ से दोनों आगे बढ़ गए..
“आप भी घर चलिए न !”, डिंकी ने माधव से भी ऊपर चलने को कहा लेकिन माधव ने इस प्रस्ताव को नकार दिया..
“नहीं बहुत देर हो गयी है, अब मैं भी घर जाऊंगा !”
डिंकी ने हाथ हिलाया और ऊपर चली गयी… आज के दिन की सुखद स्मृतियों को ह्रदय में संजोये वो अपने घर की तरफ मुड़ गया…
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“इतवार की सुबह पूरे घर की छुट्टी होती है, लेकिन गृहिणी की इस दिन डबल शिफ्ट लग जाती है !” स्वतः बड़बड़ाते हुए सुलोचना रसोई में काम भी करती जा रही थी….
“मम्मी एक कप चाय मिलेगी ?” उसी समय डिंकी रसोई के दरवाजे पर आ खड़ी हुई..
“पिछले इतवार तो बड़ी जल्दी उठ गयी थी, आज देखो जरा वक्त, महारानी जी के उठने का !”
“हाँ तो पिछले इतवार मेरी कार्यशाला जो थी, अब आज की छुट्टी तो एन्जॉय करुँगी ही न !”
“कोई ज़रूरत नहीं एन्जॉय विन्जोय करने की.. आज मेहमान घर आ रहे..।
नहा कर बढ़िया सा सूट पहन लेना ! और हो सके तो मेरी कुछ मदद करवा देना !”
बोलने को बोल तो गयी, लेकिन सुलोचना जानती थी ये बात उतनी ही महत्वहीन थी जितना बंदर के सामने केले देकर उसे खाने से रोकना..
“मेहमान ? आज कौन आ रहा ? एक छुट्टी मिलती है वो भी बर्बाद !” डिंकी तुनक गयी..
“केदार अंकल आ रहे हैँ अपनी पत्नी के साथ !”
केदार अंकल नाम सुन कर डिंकी ज़रा धीमी पड़ गयी..
वो दोनों क्यों आ रहे ? डिंकी के मन में ये सवाल घूमने लगा, लेकिन उसने अपने चेहरे के पल पल बदलते रंगो को अपनी माँ से छिपाये रखा, चाय का कप पकडे वो अपने कमरे में चली गयी..
वहाँ पहुँचते ही उसने तुरंत माधव को मेसेज भेज दिया…
“आज आपके पेरेंट्स हमारे यहाँ खाने पर आ रहे हैँ ?”
मेसेज भेजते ही उसे अपनी भूल का एहसास हुआ.. माधव के पेरेंट्स आ तो रहे लेकिन हो सकता है, उन्हें न मालूम हो कि उसकी माँ ने खाने का सरंजाम जुटा रखा है..
“नहीं खाने पर तो नहीं, लेकिन आज उनका प्लान है तुम्हारे घर आने का !” जब तक में डिंकी मेसेज डिलीट करने की सोच पाती माधव का मेसेज आ गया..
डिंकी ने अपने माथे पर हाथ मार लिया..
फिर से हड़बड़ में गड़बड़ कर दी…
वो सोच ही रही थी कि कुछ लिखूं, तभी माधव का मेसेज आ गया..
“अगर तुम्हे किसी कार्यशाला में जाना है, तो बेहिचक निकल जाओ.. किसी फॉर्मेलिटी की ज़रूरत नहीं है !
मम्मी यहाँ आ रही तो पापा ने प्लान कर लिया कि अंकल आंटी से मिल भी लिया जायेगा !”
“नहीं नहीं.. मेरी कोई कार्यशाला नहीं है.. आज तो पूरा दिन घर पर ही हूँ !”
“हम्म !” एक छोटा सा हम्म कर के माधव ने फिर कुछ नहीं लिखा, डिंकी भी नहीं लिख पायी..
वो उठ कर वापस रसोई में पहुँच गयी..
“मम्मी बेसन कहाँ रखा है ?”
सुलोचना की तिर्यक दृष्टी डिंकी पर पड़ी..
“मैं अभी पकौड़े बनाने के मूड में नहीं हूँ.. देख नहीं रही कितना काम फैला पड़ा है.. !”
“पकौड़े बनाने नहीं बोल रही.. आप बताओ तो सही.. !” डिंकी एक एक अलमारी खोलती सब कुछ उथल पुथल किये दे रही थी..
उसे बेसन दिख गया.. अब वो दही पूछने लगी..
“दही कहाँ रखा है ?” सुलोचना ने उसे घूर कर देखा,
“मेरा मेन्यू तैयार हो चुका है डिंकी, मैं आज प्याज की कचौरियां बना रही हूँ, उसके साथ कढ़ी किसी हाल में नहीं बनेगी.. !”
अब तक में डिंकी ने फ्रिज खोल कर दही ढूंढ़ निकाला था..
एक छोटी कटोरी में बेसन के साथ और भी कुछ चीजे मिला कर वो जाने लगी..
“आप कहाँ चल दी नूरजहां ?”
“अपने शाही हमाम में अम्मी जान, आज संडे है तो सोचा ज़रा उबटन कर लिया जाए !”
“चलो पहली बार कुछ ढंग का सोचा.. केदार अंकल आएंगे तो जरा तमीजदार कपड़ों में निकलना बाहर.. ये नहीं कि जगह जगह से चिरी फटी जींस में निकल आई !”
चिढ़ाने वाला मुहं बना कर डिंकी फुदक कर बाहर निकल गयी..
वो खुद भी माधव की माँ को देखने के लिए उत्सुक थी..
जिन्होंने किसी और की संतान को इतना प्रेम दिया वो औरत कैसी होगी..
श्रद्धा से डिंकी का सर उनके सामने नतमस्तक हो गया.. दिल ही दिल में एक उमंग सी जागने लगी !
वो नहाने घुस गयी..
सुबह का सारा वक्त बीत गया.. दोपहर हो आई !
चिंटू के पेट में चूहे कूदने लगे..
“मम्मी खाना दो न !”
सुलोचना ने एक उचटती सी नजर घड़ी पर डाली, दो बजने को आये थे, और अब तक अतिथियों का अता पता न था…
वो उठी और उसने चिंटू का खाना परोस दिया, उसे ढंग से समझा भी दिया कि अगर मेहमान इसी बीच चले आये तो दरवाजा खुलने से पहले वो अपनी थाली लेकर अपने कमरे में खिसक जायेगा !
डिंकी को भी खाने को पूछा लिया लेकिन डिंकी अभी खाने को तैयार नहीं थी !
“सुनिए, आपका भी परोस दूँ क्या ?”
“अरे नहीं यार! अच्छा लगेगा क्या कि खा पीकर उनका खाने पर इंतज़ार करूँ ! कुछ ऐसे ही चटर पटर दे दो.. तब तक पेट की क्षुधा यूँ ही शांत कर ली जाए !”
“आपके चटर पटर से तो आप दो रोटी खा लो बेहतर है ! आपके और आपके लाड़ले के चक्कर में कुछ बचने ही कहाँ पाता है !” भुनभुनाती हुई सुलोचना चकली का डब्बा उठा लायी…
बीतते बीतते दोपहर बीत गयी..
डिंकी तो अपने कमरे में गाने सुनती सुनती सो गयी थी…
मन तो आज सुलोचना का भी बहुत था कि दोपहर में एक झपकी ले लेगी, लेकिन इस इंतज़ार ने उसे सोने की मुहलत भी न दी..।
चिंटू का कोई स्वेटर उसने पिछले साल शुरू किया था आज वही लेकर बैठ गयी..
शुरू की दो चार सलाइयों में बड़ी कोफ़्त सी हुई, लेकिन फिर इस उधेड़बुन में उसका मन लग गया..
बैठे बैठे चार हाथ की बुनाई उसने निपटा ली, पिछला पल्ला पूरा ही तैयार हो गया था।
अभी वो उसे उलट पलट कर देख रही थी कि दरवाज़े की घंटी बज गयी..
सोफे पर पसरे पति को उसने झिंझोड़ कर उठाया..
“सुनिए उठिये भी.. लगता है वो लोग आ गए.. !”
विनोद ने अंगड़ाई लेकर अपनी आँखों पर चश्मा चढ़ाया और घड़ी पर नजर डाली, शाम के साढ़े पांच बज रहे थे..
“ये कोई टाइम है आने का.. वो भी लंच पे ?” विनोद ने अपनी पत्नी को प्रभावित करने के उद्देश्य से ऐसा कहते हुए उसे देखा..
“जाकर पहले दरवाज़ा खोलिये, आपने कौन सा उन्हें खाने का न्योता दे डाला था, वो तो केदार भाई साहब ने बस मिलने आ रहे हैँ, यही कहा था न! खाना तो मैंने खुद ने बना डाला !”
फटाफट वहाँ बिखरा पड़ा सामान समेटती सुलोचना सब लेकर अंदर की तरफ भागी..।
अपने कमरे की आलमारी में सब सारा पटक कर आईने के सामने खड़े होकर उसने अपने बाल सँवारे, होंठो पर हलकी सी लिपस्टिक चढ़ाई और मुस्कुराती हुई बाहर चली आई..
अब तक केदार भाई साहब सपत्नीक अंदर आ चुके थे..
कोटा डोरिया की हलकी भूरी सुनहरी जरी की साड़ी में अपने घने बालों का मोटा सा जूड़ा बनाये माथे पर कुंकु का बड़ा सा टीका लगाए केदार भाई साहब की पत्नी का व्यक्तित्व उनके नाम के ही अनुरूप चमक रहा था..।
चेहरा सौंदर्य प्रसाधन विहीन होने पर भी नो मेकअप लुक वाला आभास दे रहा था..।
उनका इतना सादा रूप होगा, इसकी सुलोचना ने कल्पना भी नहीं की थी.. उस औरत ने अपने चेहरे पर बिंदी के अलावा शायद कुछ नहीं लगाया था..
आजकल जहाँ दस ग्यारह साल की बच्चियां लिपस्टिक पोतना शुरू कर देती हैँ, वहाँ एक पैंतालीस छयालीस साल की औरत का लिपस्टिक न लगाना सुलोचना को आश्चर्य में डूबा गया.. !
वो दोनों हाथ जोड़ कर उन लोगो के सामने बैठने ही वाली थी कि सुलक्षणा ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया..
“हमारे माधव के लिए आप सब ने बहुत किया है.. माधव अक्सर आप सब की बातें बताया करता है !”
अपनी गहरी सी आवाज़ में अपनी बात कह कर वो वापस अपनी जगह जा बैठी..
सुलोचना मुस्कुरा कर सबके लिए पानी लेने चली गयी..
क्रमशः

👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌🥰🥰🥰
एक पूरा दिन साथ में गुजार लेने के बाद दोनों सुंदर स्मृति लिए अपने घर चल दिए।
माधव की मां का घर आना सुनकर ही dinki मिलने के लिए मचल उठी जाने कैसी है वो मां जिसने नन्हें माधव को अपने प्यार और ममत्व से जीत लिया।
लंच धरा का धरा रह गया शायद अब डीनर का प्लान बन जाएं।
Very beautiful
कहाँ कहाँ से लाती हो उपमाएं खोजकर …मद्दम मुस्कान आ ही जाती है पढ़कर फिर चाहे वो बन्दर को केले देने का उदाहरण हो या फिर तिर्यक दृष्टि …मजा आ गया पढ़कर ।
एक मध्यमवर्गीय परिवार का इससे ज्यादा सजीव रेखांकन क्या ही होगा …अतिथि का अनुमानित तौर पर भोज पर आमंत्रण की अब आये हैं तो खाकर ही जायेंगे तिस पर यह इंतजार और तमाम तामझाम के बाद भी एन ववत पर किसी अव्यवस्था के फैलाव का डर और इंतजाम….
स्वेटर भी लगे हाथ बन ही गया । माधव की मां से मिलनने के लिए dinki ही नहीं पाठक वर्ग भी प्रतीक्षित है , आखिर माधव की दृष्टि से देखी जाने वाली वह ममतामयी स्त्री आखिर है कैसी
बस वो झल्ली कोई कमाल न दिखाए अपना बाकी सब सुलोचना जी सेट कर लेंगीं
पिछले भाग मे माधव ने अपनी माँ के बारे मे इतनी अच्छी बातें बताई थी तो ये लड़का इतना उलझा सा क्यों है,क्यों उसने पहले ही सोच लिया डिंकी उसके नसीब मे नहीं है,ऐसा क्या है जो माधव छुपा रहा..🤔।
आज तो डिंकी के मन मे लड्डू फूटा… क्या बात है बेसन का उबटन भी लग रहा चेहरे पर,सासु माँ को जचनी चाहिए लड़की 😊।
बहुत खूबसूरत भाग 👌👌👌👌🙏।
Nice part
Bahut sundar
Very nice n good n Shandaar and Jaberdast n Fantastic n Fabulous part
Nice part 👌👌👌👌👌👌👌
माधव तो पता नहीं है कि पहले ही सोच कर बैठा है कि यह प्यारी सी लड़की उसके नसीब में नहीं 😞😞😞😞😞😞है कहीं ऐसा तो नहीं शायद इसके पीछे कोई बात हो आज डिंकी भी बेहद उत्साहित है माधव की मां को देखने के लिए और इसी उत्साह में वह बेचारी सो भी गई और लंच का समय भी निकल भी गया 😒😒😒😒😒पर मानव की मां को देखकर सच में बेहद खुशी हुई आकर उन्होंने जहां सुलोचना को प्रभावित किया वहीं अब डिंकी का रिएक्शन तो देखना रह ही गया कि वह माधव की मां को देखकर कैसा रिएक्शन देती है ।🙄🙄🙄🙄🙄
और इस प्यारे भाग को देने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहिबा🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻