अतिथि-17

अतिथि -17

      अब तक आपने पढ़ा की डिंकी की बस मिस हो जाती है जिसके कारण माधव उसे छोड़ने के लिए कैंट तक जाता है। वहां पर अपनी कार्यशाला के पास पहुंचकर डिंकी वहां के गार्ड से बात करके आने के बाद माधव से झूठ बोल देती है कि, उसे कार्यशाला का हिस्सा बनने का मौका नहीं मिला।
   वह दोनों पास के ही एक कैफे में बैठकर चाय पीने लगते हैं। इस दौरान डिंकी माधव से उसके माता-पिता के बारे में सवाल करती है। और तब माधव अपने बचपन से जुड़ी सारी यादों को डिंकी से बताने लगता है। जहां वह बताता है कि उसकी मां की मृत्यु के बाद उसके पिता को मजबूरी में दूसरा विवाह करना पड़ा। उसकी सौतेली मां के उसके प्रति व्यवहार को वह समझ नहीं पाता और अपनी बदमाशियों के कारण अपने पिता के क्रोध का भाजन बनकर बाबा के पास बांगरमऊ चला जाता है।
    जहां उसके बाबा को एहसास होता है कि उसकी मां उससे वाकई प्यार करती है। बाबा की मृत्यु के बाद दादी माधव का हाथ उसके माता-पिता के हाथ में देकर कहती है कि वह उसे अपने साथ शहर ले जाएं।

अब आगे…

   “वह तो चाहती थी कि दादी भी हमारे साथ चली जाए। लेकिन इतने सारे खेत खलिहान, नौकर चाकर, गाय घोड़ा अपनी राजसी वसीयत को यूँ ही छोड़ कर चले जाना दादी को गंवारा न था..।
   
और शायद वो बाबा की यादों से महकते उस घर को अपने अंतिम समय में छोड़ना भी नहीं चाहती थी.।

  मैं निर्विकार भाव से उन लोगों के साथ गोरखपुर चला आया। मेरा रिजल्ट बहुत ज्यादा ही खराब आया था, और इसलिए किसी भी अच्छे स्कूल में एडमिशन मिलना बेहद मुश्किल था।
    लेकिन मां ने जैसे प्रण कर लिया था कि वह मुझे गोरखपुर के सबसे अच्छे कान्वेंट में दाखिला दिलवा कर ही रहेंगी। उन्होंने वहां के प्रिंसिपल के सामने हाथ जोड़ दिए। उनका कहना था कि अगर संभव हो तो बच्चे का एक एंट्रेंस एग्जाम ले लिया जाए।
    
     मैं यह सुनकर ही भय से कांपने लगा। मुझे लगा यह एक बार फिर मुझसे दुश्मनी निभा रही है। पहले ही रिजल्ट के कारण मेरी अच्छी खासी बेइज्जती हो रखी थी, उस पर दोबारा इम्तिहान देने की ना मेरी औकात थी और ना मेरा हिम्मत। लेकिन उनके बार-बार गिड़गिड़ाने पर प्रिंसिपल तैयार हो गई।

वह खुशी से मेरा हाथ पकड़े मुझे घर ले आईं।
घर पहुंचते ही पापा उन पर बरस पड़े।

” क्या जरूरत थी तुम्हें एंट्रेंस की फालतू फॉर्मेलिटी में पड़ने की?  हमें पता है यह लड़का कुछ नहीं कर पाएगा।”

” लेकिन हमें पता है कि माधव वहां सेलेक्ट हो जाएगा। उन्होंने हमें एक हफ्ता दिया है ना। हम आपको दिखाएंगे माधव कितने अच्छे नंबर लेकर आता है। आप हम पर विश्वास रखें…।”

उसके बाद तो कड़े मिलिट्री के कायदों के बीच मेरा वह पूरा हफ्ता झूल कर बीत गया..!
सुबह 5 बजे मुझे उठा कर हाथ मुंह धुल कर वह एक गिलास दूध और दो बिस्कुट के साथ पढ़ने बैठा देती थी। और पढ़ने क्या बैठाती थी, खुद मेरे साथ बैठ जाती थी।
   हर एक विषय को उन्होंने चुन चुन कर मुझे पढ़ाना और रटवाना शुरू किया।
    ऐसे क्या कोई पढाता होगा, जैसा उन्होंने मुझे पढ़ाया था। मानता हूं छोटी क्लास में था, लेकिन मेरे लिए वह विषय कठिन थे। पर उन्होंने इतनी बारीकी से सब कुछ सुलझा कर रख दिया कि मुझे पढ़ने में मजा आने लगा। उन्होंने पढ़ाई को बहुत मनोरंजक तरीके से मेरे सामने पेश किया था..।

वह रोज सुबह से शाम तक मुझे कोई एक विषय याद करवाती और रात में मेरा एक छोटा सा टेस्ट लेती, जिस पर अच्छे नंबर आने पर मुझे एक चॉकलेट देती। मुझे धीरे-धीरे पढ़ाई करना अच्छा लगने लगा था। और सात दिन कब बीत गए मुझे पता ही नहीं चला।

   और फिर सोमवार का दिन आ गया। जिस दिन मुझे वापस उसी स्कूल में जाना था, जहां से मुझे एक बार मेरे पुराने परीक्षा फल के कारण बैरंग लौटा दिया गया था। आत्मविश्वास लड़खड़ा तो रहा था, लेकिन मेरे साथ खड़ी वह औरत पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्कुरा रही थी। जब वह मुझे लेकर स्कूल के लिए निकलने लगी, तब एक बार पापा ने उन्हें टोका भी,

” देख लो सुलक्षणा कहीं तुम्हारा अति आत्मविश्वास तुम्हारे इस विद्यार्थी का बेड़ा गर्क ना कर दे।”

   उन्होंने इस बार कोई जवाब नहीं दिया बस चुपचाप मेरा हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गई। जाते-जाते वह हनुमान मंदिर के सामने रुकी और मुझे वहां माथा टिकवाया।

  ” सुनो माधव, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है कि आज के इम्तिहान में तुम अच्छे नंबरों से पास हो जाओगे। और प्रिंसिपल मैडम को तुम्हें यहां दाखिला देना ही पड़ेगा, लेकिन जिंदगी में यह तुम्हारा आखिरी इम्तिहान नहीं है, ये याद रखना।
    ऐसा नहीं है कि आज यहां सलेक्ट हो गए तो तुम्हें आगे कभी इम्तिहान नहीं देना होगा! बेटा एक बात याद रखना, जब हम स्कूल की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं ना उसके बाद जिंदगी हमारा असल इम्तिहान लेना शुरू करती है। यह तो कुछ भी नहीं है..।

हमारी जिंदगी का सबसे आसान वक्त वही होता है जब हम अपने माता-पिता की छत्रछाया में होते हैं। सबसे आसान पढ़ाई स्कूल की ही पढ़ाई होती है…इसके बाद सब कुछ कठिन होने लगता है माधव !

पता नहीं उस वक्त उनकी बातें समझने के लिए मेरी बुद्धि उतनी समृद्ध थी भी या नहीं, लेकिन मुझमे मेरा जो आत्मविश्वास डगमगा रहा था वो वापस स्थिर हो गया..।

मैं स्कूल पहुंचा और इम्तिहान का पेपर बहुत अच्छे से किया..
लेकिन जब तक परीक्षाफल नहीं आ जाता तब तक मेरी साँस अटकी हुई थी..।
प्रिंसिपल मैडम ने मेरा पेपर खुद अपने हाथों से चेक किया। हम बाहर एक घंटे इंतजार करते रहे और घंटे भर बाद प्रिंसिपल मैडम ने हमें अंदर बुला लिया।

      उन्होंने मेरा पेपर उनके हाथ में पकड़ा दिया और कहने लगी

   ” मैंने आज तक बहुत से पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए झगड़ा करते देखा है। आजकल ज्यादातर मांएं इस बात पर टीचर से झगड़ पड़ती है कि उनके बेटे पर उस टीचर ने हाथ कैसे उठाया।
    लेकिन अपने बच्चों की बुद्धिमता के भरोसे पर मुझसे मिन्नतें करने वाली मां मैं पहली बार देख रही हूं। आपने जब एक हफ्ते पहले मुझसे हाथ जोड़कर अपने बच्चे के एडमिशन के लिए बात की थी, तब मैं खुद भी पिघल गई थी।
    मैं भी तो एक मां हूं। मैं उस समय आपके दिल की तकलीफ समझ पा रही थी, और बस इसीलिए यह सोचा कि आपको एक मौका दे देती हूं।
    और आपने अपने उसे मौके को अपनी लगन और परिश्रम से सफलता में बदल दिया। आपको और आपके बेटे, दोनों को बहुत सारी बधाइयां। आपका बेटा वाकई आपकी ही परछाई है।”

मेरे एडमिशन फॉर्म पर साइन करके प्रिंसिपल मैडम ने मेरे हाथ में ही रख दिया। मेरी आंखें झिलमिलाने लगी थी। मैंने मुड़ कर धीरे से उनकी तरफ देखा। उनकी भी आंखें डबडबा रही थी।

    पता नहीं अंदर से क्या आवाज आई। मैं सीधे उनके पैरों पर झुक गया। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ रख दिया। उस वक्त मुझे अनुभव हुआ कि अब यह हाथ मेरे सर से कभी हटना नहीं चाहिए। हम दोनों खुशी-खुशी घर लौट आए।

पापा भी ऑफिस से मध्यांतर के बाद ही आ चुके थे। शायद उन्हें भी मेरे ऐडमिशन होने, ना होने की उत्सुकता वक्त से पहले ही घर खींच लाई थी। जैसे ही मां ने उनके हाथ में मेरे एडमिशन का फॉर्म रखा वह आश्चर्य से हम दोनों की तरफ देखने लगे।

   फिर उन्होंने तुरंत वही रख कांच के जग से गिलास में पानी डाला और मां की तरफ बढ़ा दिया।

” अब तो पानी पी लो। जानता हूं सुबह से तुमने अपने बेटे के एडमिशन के लिए निर्जला व्रत किया हुआ था।”

यह सुनते ही मैं चौंक पर उनकी तरफ देखने लगा। और वह मुझसे नज़रे चुराते हुए चुपचाप पानी पीने लगी।
मैं भाग कर रसोई में गया और उनके लिए थाली परोस कर ले आया।

” अब तो खा लीजिए।” मैंने धीरे से उनसे कहा उन्होंने मुझे अपने पास बैठा लिया।

” मुझे मां कहोगे ना, तभी खाऊंगी।”

मेरा मन उस समय दहाड़े मार कर रोने का कर रहा था। क्योंकि साल डेढ़ साल पहले मैंने मन ही मन शपथ ले ली थी कि मैं अपनी माँ के अलावा और किसी को कभी माँ नहीं कहूंगा..।

गले में घुटती अपनी रुलाई को जबरदस्ती रोक कर मैंने उनकी तरफ देखा,

” प्लीज खाना खा लीजिए मम्मी!”

उनकी आंखों से दो बूँद आंसू ढुलक कर उनके गालों पर चले आए। और उन्होंने उसे पोंछने की कोई चेष्टा नहीं की।
    उन्होंने मेरे हाथ से थाली ली और पहला ही निवाला तोड़कर मेरे मुंह में डाल दिया, उसके बाद एक कौर वह मुझे खिलाती जा रही थी और एक खुद खाती जा रही थी।
    उस दिन लगा, मेरी मां जरूर चली गई लेकिन उतनी ही जल्दी दूसरा जन्म लेकर मम्मी बनकर वापस चली आई।
   जानती हो डिंकी, उस दिन से मेरी जिंदगी बदल गई…।

  अब मैं वही करता, जो मम्मी कहती हैं। अगर मम्मी ने कह दिया कि मुझे सुबह 5 बजे उठाना है तो फिर मुझे कोई 5 बजे सुबह उठने से नहीं रोक सकता था। मैं जान चुका था कि उनका सपना था कि मैं पढ़ लिख कर एक अच्छा इंजीनियर बन जाऊं। उनके उस सपने को मैंने अपनी आंखों में बांध लिया। वह जो कपड़े देती, मैं वही पहनता। वह जो खिलाती, वह सब खाता। यहां तक की वह सब्जियां जो मैं दादी के राज में थाली में जस्ट की तस छोड़ दिया करता था, वह भी मम्मी के बनाने और परोसने पर खाने लगा।

पापा मेरे परिवर्तन पर आश्चर्यचकित थे। लेकिन मम्मी मेरे बदलाव को महसूस कर पा रही थी।

कुछ दिन बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। मुझे डर लगने लगा। अपनी किस्मत से मैं डरने लगा था डिंकी। मुझे लगा एक मां को खो चुका हूं, अब कहीं इन्हें कुछ हो गया तो मैं पागल ना हो जाऊं।
     एक शाम वह पौधों में पानी डाल रही थी कि अचानक वह डगमगाने लगी। मैं वहीं बैठा मिट्टी से बैलगाड़ी बना रहा था। मैंने जैसे ही उन्हें गिरते देखा, तुरंत जाकर उन्हें सहारा दिया। और कुर्सी पर बैठा दिया। मैं घबरा गया था, लेकिन वह मुस्कुरा रही थी।

मैं भाग कर उनके लिए पानी ले आया। कुछ देर बाद पापा आए तो मैं तुरंत पापा के पास मम्मी की शिकायत लगाने पहुंच गया कि वह अपनी क्षमता से कहीं अधिक काम करने लगी हैं, जिसके कारण उनकी तबीयत खराब रहने लगी है। और तब पापा ने मेरे बालों पर हाथ फेरते हुए मुझे अपने पास बैठा लिया और मुझे बताया कि मेरा छोटा भाई या बहन आने वाली है।
   यह सुनकर तो मानो मैं अपने आप ही में ही नहीं रहा। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। और बस कुछ दिन पूरे होते ही मम्मी ने मुझे मेरे जीवन का सबसे प्यारा तोहफा दे दिया..।

मेरा छोटा भाई इस दुनिया में चला आया..।
अब तो मेरा काम और जिम्मेदारी दोनों ही बहुत बढ़ गया था। मैं अपने छोटे भाई का भी बेहद ख्याल रखने लगा…।

दिन बीतते गए और हम दोनों भाई धीरे-धीरे बड़े होने लगे। सच कहूं तो बंटी कभी कभी मम्मी को कुछ कड़वा भी बोल जाता है, और मैं उसे समझा नहीं पाता कि वो कितना गलत कर रहा है .. ।”

“अभी बंटी क्या कर रहा है ?”

“अब तो कॉलेज पहुँच चुका है… कहने को तो मुझसे आठ साल ही छोटा है, लेकिन हरकते बिलकुल बच्चो वाली है.. !”

डिंकी मुस्कुरा उठी..

“आई एम सॉरी माधव जी ! आई होप आपने मेरी बात का बुरा नहीं माना होगा.. !”

माधव ने न में गर्दन हिला दी..

क्रमशः

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Nisha
Nisha
1 year ago

Ek ma ma hi hoti hai har rup me.ma kaisi bhi ho bas dekhne ka nazariya hi use alag banata hai.kai baar sauteli ma buri ho jati hai par hamesha aisa ho jaruri nahi.madhav ki mummy toh bahut hi achhi hain

कांति
कांति
1 year ago

छोटे से माधव के मन में जगह बनाने के लिए सुलक्षणा ने जाने कितने जतन किए अपनी मेहनत के बल पर अच्छे स्कूल में दाखिला करवाया और एक अच्छा इंसान बनाया।
माधव ने भी अपनी मां की मेहनत को सफल बनाया एक अच्छा बेटा बनकर।
लाजवाब भाग 👏👏👏👏👌👌

Upasna
Upasna
1 year ago

माधव की माँ ने अपनी ममता और समर्पण से माधव के हृदय में अपना स्थान बना ही लिया देर से ही सही पर माधव को भी उनका ममतामयी मन नजर आ ही गया और उस स्त्री ने भी तो जैसे माधव पर स्वयं को वार ही दिया ।
कभी कभी जीवन मे ऐसे निर्णायक क्षण आते हैं जो उस व्यक्ति के स्वभाव ,और चर्या में आमूल चूल परिवर्तन का कारक बन जाते हैं और जब यह परिवर्तन सकारात्मक होते हैं तब एक सुखद भविष्य की आधारशिला का कार्य करते हैं
निश्चित ही माधव के जीवन मे भी उन्नति का पट यहीं से खुला होगा ।

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

माँ…इस शब्द मे ही प्रेम भरा है,कहते हुए भी मुस्कान आ जाती चेहरे पर और जो संबल बनकर एक माँ जब साथ ख़डी होती है तो फिर हारना नामुमकिन है।
माधव की माँ का विश्वास जीत गया और इस जीत के साथ ही माधव को माँ और माँ को बेटा मिल गया।बहुत खूबसूरत भाग था आज का 👌👌👌👌।

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

सबसे पहले तो डॉक्टर साहिबा आपको धनतेरस की ढेरों शुभकामनाएं मां लक्ष्मी आप पर सदैव कृपा बनाए रखें और आपकी झोली हमेशा ही खुशियों और संपन्नता से भरी रहे आप और आपका परिवार हमेशा स्वस्थ रहे और आपकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
दूसरा यह क्या आपने सुबह-सुबह ही खूब रुला दिया मां और बेटे का ऐसा अटूट और असीम प्रेम देखकर हर किसी की आंखें भर ही आएंगे बेहद खुशी हुई माधव को देखकर कि उसने आखिरकार अपनी मां को सच्चे मन से मां मान ही लिया।🙂🙂🙂🙂🥰🥰🥰🥰

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰

जागृति
जागृति
1 year ago

Superb wonderful fantastic part

Rashmi Hasija
Rashmi Hasija
1 year ago

Ek sath ek dosti panpati si Hui si

Ashok Garg
Ashok Garg
1 year ago

Very very nice part of the story and very interesting too waiting for the next part hope its coming soon