
अतिथि -16
जब एक पुरुष अपनी पत्नी को खोने के बाद दूसरा विवाह करता है, तब उसके अंदर भी एक हलचल सी रहती है..।
ढेर सारे अलग अलग तरह के विचार दिल दिमाग पर कब्ज़ा जमाये रहते हैँ..।
पता नहीं ये मेरी गृहस्थी के साथ तारतम्य बिठा पायेगी या नहीं ? मेरे बच्चे को अपना सा प्यार दे पायेगी या नहीं ? इस घर को, और यहाँ के लोगो को अपना पायेगी या नहीं..?
इसी सब के साथ एक अपराधबोध भी हावी रहता है, कि पहली पत्नी के जाने के बाद सिर्फ उसकी यादों के साथ गुजारा करने की जगह, दूसरी शादी रचा लेने का..
समाज के चार लोगो से नजर मिलाने में भी संकोच सा होता है, क्यूंकि यही लोग सामने भले ही आपके साथ सहानुभूति जताये, लेकिन सच तो यही है कि पीठ पीछे शत सहस्त्र कंठों से आपका यशोगान करेंगे कि देखा साल भर हुआ नहीं कि दूजा ब्याह रचा लिया..।
पापा इन्ही सब उलझनों से जूझ रहे थे। उनके पास इतना अवकाश ही नहीं था कि मेरे मन में चल रही उलझनों को समझ सके..।
मेरी और मम्मी के बीच चल रही परेशानियों को समझने के लिए भी उनके पास उस वक्त उतना धैर्य नहीं था..।
अपनी नयी नवेली पत्नी को वो अपनी गृहस्थी की बारहखड़ी समझाते या अपने बालक की बढ़ रही उद्दंड़ताओं का सिरा पकड़ कर उसे संभालते..।
इन्ही सब में उलझे पड़े पापा ने सबसे सीधा और सरल समाधान निकाला, मुझे मम्मी से दूर भेज देने का..।
मम्मी ने उन्हें रोकना चाहा, वो बार बार उनके सामने गिड़गिड़ाती रही, लेकिन पापा के सर पर उस वक्त भूत सवार हो चुका था।
वो मेरे दो जोड़ी कपड़ो और स्कूल के बस्ते के साथ मुझे बाबा के घर पटक आये..।”
“अच्छा तो इसलिए आप अपने बाबा के घर पर रहने लगे थे ?” डिंकी उत्सुकता से माधव की सारी बातें सुन रही थी..
“बांगरमऊ में मेरा नया जीवन शुरू हुआ..!
दादी के दिन रात, घर में काम करने वाली महरी और महाराजिन के साथ झींकते हुए गुजरती और बाबा आंगन में लेटे-लेटे अपना हुक्का गुङगुङाते रहते।
बाबा के पास दिन में एक बार खेतों को देखने वाला लड़का किट्टू आया करता था। वही खेतों का पूरा हिसाब किताब देखा करता था। और दिन में एक बार आकर कितने मजदूर लगे, कितने किसानों ने काम किया, इस सबका लेखा-जोखा बाबा को पकड़ कर चला जाता था।
बाबा उस पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, ऐसा नहीं था।
बीच-बीच में बाबा भी मुझे साथ लिए खेत खलिहान घूमने चले जाया करते थे। मुझे बांगरमऊ में रहना अच्छा लगने लगा था। आसपास के कुछ लड़कों से दोस्ती भी हो गई थी। वहां के सबसे अच्छे स्कूल में पापा ने मेरा दाखिला करवा दिया था। स्कूल के दाखिले के समय मम्मी भी उनके साथ आई थी। लेकिन बांगरमऊ में मम्मी का रंग ढंग जरा बदला हुआ सा था।
यहां पर वह घर की बहू थी, इसी से उनका हाथ भर का घूंघट कभी सरकता नहीं था। बाबा के सामने वह कम ही आती थी। लेकिन दादी के साथ सारा वक्त रसोई में कुछ ना कुछ बनाने में लगी रहती थी। मेरे एडमिशन के वक्त वह आई थी, तब पूरे दो दिन वहां रुकी थी, और उन दो दिनों में दादी से पूछ पूछ कर उन्होंने मेरी पसंद की सारी चीज बनाकर मुझे खिला दी थी।
हालांकि जब पहली बार वह मेरी थाली परोस कर लाईं तो मैंने उन्हें देखकर मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया था। उन्होंने बड़े प्यार से मालपुआ मेरे मुंह में रखने की कोशिश की और मैंने उनका हाथ झटक दिया। मेरा उनके ऊपर का गुस्सा कम नहीं हुआ था।
मैं भी अजब नादान था, गुस्सा मुझे पापा पर होना चाहिए था, लेकिन उनका गुस्सा मैं मम्मी पर निकाल रहा था।
हां पापा से जरूर गले लग कर में रो पड़ा था। शायद मैं उन्हें छोड़कर रहना नहीं चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ मैं उन्हें यह भी दिखा देना चाहता था कि मैं उनके बिना, बाबा और दादी के पास कितना खुश हूं।
बालक मन वाकई अजीब होता है। छिन छिन रूप बदलता है। मम्मी उन दो दिनों में मुझसे अपने फासले कम करने की पूरी कोशिश करती रही, लेकिन मैंने उन्हें अपने कंधे पर हाथ तक रखना नहीं दिया।
इस बीच में मम्मी ने दादी से भी कई बार कहा कि मुझे उनके साथ शहर भेज दे। लेकिन दादी की उस घर में कुछ नहीं चलती थी। बाबा और पापा के सामने घर की औरतें कम ही बोला करती थी।
वैसे मेरे पापा काफी सुलझे हुए और गंभीर व्यक्ति थे। समाज में भी उनका खासा नाम था। पर अपने ही घर के, अपने ही बेटे के, मन में पल रही गंठ को सुलझाने में वह असमर्थ और असफल सिद्ध हुए थे।
मेरा एडमिशन करा कर वह दोनों वापस लौट गये। मम्मी के घूंघट के कारण मुझे उनके आंसू नजर नहीं आए, लेकिन जाते समय उनकी भीगी हुई सी आवाज और उनका थरथराता हाथ अपने सिर पर महसूस करके कुछ देर के लिए मैं बिल्कुल पत्थर हो गया था। उन्होंने भीगी-भीगी सी आवाज में जब मेरे सर पर हाथ रखकर “खूब मन लगाकर पढ़ना माधव! तुमसे बहुत उम्मीदें हैं।”
यह बात कही तो अंदर से मैं कांप सा गया था। जोर से नाक सुङक कर वह रुमाल से अपने चेहरे को पोंछती हुई वहां से चली गई थी।
” राम राम! लक्ष्मी मिली है हमें! पहली बहू भी लक्ष्मी थी और दूसरी भी सुगणा निकली।”
दादी ने अपने दोनों हाथ ऊपर आसमान की तरफ देखकर जोड़ दिए थे और अपने आंचल से अपने आंसू पोंछती हुई रसोई में घुस गई।
दादी भी दुखी हो गयी थी, बहुत दुखी।
लेकिन महराजिन को पकौड़ों के लिए पालक के एक एक पत्ते साफ़ करने की ताकीद भुला कर पत्ते के टुकड़े देख दादी का दुःख कपूर सा उड़ गया और वो वापस उस पर बरस पड़ी..
मेरी समझ से बाहर था कि मैं अंदर से दुखी था या खुश…
दुख ही थोड़ा ज्यादा था। पहला तो स्कूल में एडमिशन हो गया था, जिससे मेरे स्वतंत्रता बाधित होने वाली थी। और दूसरा मम्मी का जाते-जाते मेरे सिर पर रखा कांपता हाथ मुझे जैसे अंदर तक छू गया था। वह पहली बार था जब मुझे उन पर थोड़ा सा तरस आया था। लेकिन फिर मैं अपने मनमौजी स्वभाव के साथ बांगरमऊ में अपनी सत्ता स्थापित करने में लग गया था।
पूरा साल बड़े मजे से गुजरा, पढ़ाई लिखाई से मैं कोसों दूर था। स्कूल से शिक्षक घर पर फोन भी करते तो फोन सुनने वाला मैं ही था। पेरेंट्स टीचर मीटिंग में बाबा और दादी कभी नहीं जाते थे। पापा के पास भी इतना वक्त नहीं होता था कि ऑफिस से छुट्टी लेकर मेरी पेरेंट्स टीचर मीटिंग अटेंड करने आए। लेकिन अर्धवार्षिक परीक्षा के बाद जब मम्मी ने दादी से मेरा परीक्षा फल पूछा और दादी ने यूं ही उचटती सी आवाज में कहा कि एक दो विषयों को छोड़कर बाकी सब में मैं फेल हो गया हूं, मम्मी अगली बस पकड़ कर बांगरमऊ चली आई। पापा उनके साथ नहीं आए थे। उस वक्त मम्मी ने पहली बार बाबा के सामने मुंह खोलकर बात की थी। वह इस बात पर अड गई थी कि माधव अगर बांगरमऊ में रहा तो पढ़ लिख नहीं पायेगा इसे मैं अपने साथ लेकर जाऊंगी।
लेकिन उस वक्त दरवाजे के पीछे दादी से चिपक कर खड़ा मैं मम्मी में अपनी दुश्मन को देख रहा था। मुझे लग रहा था कि मुझसे दुश्मनी निभाने का यह कोई मौका छोड़ता नहीं चाहती है। मेरी आराम तलब जिंदगी में विघ्न डालने के लिए ही यहां चली आई है। और मैं रोते-रोते इस बात पर अङ गया कि मैं बाबा और दादी को छोड़कर नहीं जाऊंगा।
मैंने ऐसी जिद पकड़ी के रात में मुझे बुखार चढ़ गया। मेरी खराब तबियत और मेरी जिद देखकर फिर बाबा ने मुझे वापस नहीं भेजने का निर्णय ले लिया। और मम्मी जैसी आई थी, वैसे ही वापस लौट गई।
लेकिन इस बार भी जाने के पहले वह मेरे पास आकर मेरे सिरहाने बैठकर मेरे बालों को धीरे-धीरे सहलाते हुए वह मुझे शिक्षा का और शहर के स्कूल का महत्व समझाती रही। उन्होंने मुझे बहुत ढेर सारी बातें समझाई।
मैंने चेहरा उनकी तरफ से फेर रखा था। खिड़की से बाहर अमराई में इधर से उधर डोलती गौरैया को और उसके खेल को देखने में ही मैं व्यस्त था। बाबा कमरे के दरवाजे के बाहर खड़े हम मां बेटे की जोड़ी को देख रहे थे।
माँ तो उस वक्त मुझे समझा बुझा कर चली गई। मेरे पल्ले भले कुछ न पड़ा हो, लेकिन बाबा सब समझ गए थे।
उन्होंने दादी के कान में भी मंत्र फूंक दिया। उन्होंने दादी को स्पष्ट कर दिया.. – “सरसती अगर हमें कुछ हो गया तो तुम एक बात याद रखो माधव को यहां गांव में अपने पास कतई ना रखना। इसे सुलक्षणा के पास गोरखपुर भेज देना। हमें बहू पर पूरा विश्वास है, वह इस बच्चे को आदमी बना देगी!”
” शुभ शुभ बोलिए कैसी बातें कर रहे हैं आप? आपसे पहले हम ही जाएंगे, हम जानते हैं!”
“चलो मान लिया तुम ही जाओगी.. लेकिन अब ये बात स्पष्ट हो गयी है कि इस साल के बाद लड़के को गोरखपुर भेजना होगा ! तभी ये सही मायनो में इंसान बन पायेगा !”
बाबा की ये बात छिप कर मैंने भी सुन ली थी..।
पता नहीं क्यों, लेकिन उस दिन से मम्मी के लिए मन में जो नाराजगी थी, वह जरा धीमी पड़ गई थी। ऐसा लगा अगर बाबा उन पर विश्वास कर रहे हैं, तो इसका मतलब उनमें कोई बात तो होगी।
इसके साथ ही मैंने अपने साथ उनके स्वभाव का भी आंकलन करना शुरू किया।
आज तक कभी ऐसा तो हुआ नहीं था कि उन्होंने मुझे किसी भी तरह का कोई कष्ट दिया हो। अपने पेट से पहले मेरा पेट भरती। मुझे जो चीज पसंद होती थी, घर पर वही बनती थी। मेरे दूध मलाई मक्खन में उन्होंने कभी कोताही नहीं की।
जाने फिर भी क्यों, मैं उन्हें अपना दुश्मन मान बैठा था।
दिन गुजरने लगे थे और कुछ समय बाद बाबा नहीं रहे। बाबा के जाने का बहुत दुख था, लेकिन इसी के साथ मुझे इस बात का भी दुख सताने लगा था कि अब मेरी आजादी के दिन खत्म होने वाले हैं। पापा और मम्मी सब कुछ करके जब लौटने लगे, तब दादी ने हीं मेरा हाथ मेरे पापा के हाथ में दे दिया था। और हाथ जोड़ दिए थे।
” तुम्हारा लड़का तुम ही संभालो केदार। यहां तो इसके दिल दिमाग पर शैतान छाया रहता है। रात दिन गांव में मटरगश्ती करता फिरता है। हम अकेले इस की देखभाल नहीं कर पाएंगे।”
मैं जानता था दादी इतने कठोर शब्दों में दादाजी की छुपी हुई इच्छा को पूरा कर रही है। अगर प्यार मोहब्बत से कहती तो शायद पापा मुझे साथ नहीं ले जाते।
दादी का इतना कहना भर था, और मम्मी ने खुशी से मेरा हाथ थाम लिया। वह फटाफट अंदर गई और पल भर में ही मेरा सारा सामान समेट कर ले आई।
वह तो चाहती थी कि दादी भी हमारे साथ चली जाए। लेकिन इतने सारे खेत खलिहान, नौकर चाकर, गाय घोड़ा अपनी राजसी वसीयत को यूँ ही छोड़ कर चले जाना दादी को गंवारा न था..।
और शायद वो बाबा की यादों से महकते उस घर को अपने अंतिम समय में छोड़ना भी नहीं चाहती थी…
क्रमशः

Behtrin part 👌👌👌👌👌
माधव के लिए बाबा ने बेहतरीन फैसला किया और सालभर बाद सुलक्षणा के पास भेजने का फैसला लिया आखिरकार नई बहू ने सास ससुर के साथ साथ नन्हें माधव के मन में भी जगह बना ली।
ममत्व से भरा मां का मन आखिरकार जीत गया और नन्हें माधव को लिए वो निकल पड़ी।
शानदार भाग 👏👏👏👏
Very nice
कई दिनों से पढ़ नहीं सकी थी ….आज पढ़ रही तो देखा कि माधव के मन की गुत्थी खुली हुई पड़ी है ।
स्त्री के मन मे अगर ममत्व है तो फिर क्या ही अपना बच्चा और क्या ही पराया ,विमाता होकर भी माँ का प्रेम दे सकती है वो।
एक पौधे को पनपने के लिए जहां खाद पानी चाहिए तो वहीं कुछ कड़ी धूप भी चाहिए ,मानव के लिए वही कड़ी धूप की जरूरी है जो शायद उसकी मां की छत्र छाया में ही मिलेगी उसे ।
mam atithi ka part Ane me bahut late lag raha hai, please jaldi part dijiye, story bahut achi ja rahi hai but late part aane se story bhuli si lagne lagti h
बहुत खूबसूरत,लाजवाब भाग 👌👌👌👌👌👌👌❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️💐💐💐💐💐💐💐🧿🧿⭐⭐⭐⭐⭐
Bhut achi story h aap regular basis par part de to aacha hai 👌👌👌👍👌
Nice part
Madav ki jindgi banane me unki maa ka pura pura haath hai
ये सच है दोनो मे से कोई एक पहले जायेगा
पर जो रह जाता है वो हर एक छोटी से छोटी चीज मे भी उनकी याद ढूंढता है