अतिथि-5

अतिथि -5

   सुबह सुलोचना पांच बजे से नहा कर मंदिर में दिया लगा कर काम में जुट गयी थी.. नाश्ते के लिए उसने इडली की तैयारी की थी, फटाफट इडली चढ़ा कर वो चिंटू को उठा लायी..।

आधी नींद में आँखे मीचते चिंटू का स्कूल जाने का कतई मन नहीं था, वैसे उसका कभी मन होता भी नहीं था, सुबह की नींद उसे बहुत प्यारी थी..।
सुलोचना इसी कोशिश में थी कि अतिथियों के जागने के पहले उसका बाहरी कमरा व्यवस्थित हो जाए, और अधिकतर काम निपट जाएँ..।
चिंटू को बाथरूम में पटक कर वो उसकी यूनिफार्म में इस्त्री करने लगी..
तभी रोज़ की आदत से मजबूर विनोद ने हांक लगा दी..
“चाय मिलेगी ?”

“हाँ मिलेगा न कद्दू ! अरे मेहमान घर पर है ज़रा तो लिहाज करिये। अब जब केदार भाई साहब उठेंगे, तभी एक साथ आप दोनों के लिए बना दूंगी। अभी गैस खाली नहीं है, एक तरफ इडली चढ़ी है दूसरी तरफ साम्भर !
   कितनी बार बोल चुकी हूँ तीन बर्नर वाला चूल्हा ला दो, पर नहीं। यही शादी में मिला टेढ़ा चूल्हा मुझे चलाना पड़ेगा अनंत काल तक !”..

विनोद को समझ आ गया कि सुलोचना फ़िलहाल परफॉर्मेंस प्रेशर में है, इसलिए चुप लगा गया।

अब तक चिंटू भी नहा कर निकल आया था..

“जाइये फटाफट आप भी नहा लीजिये, जिससे वो दोनों उठे तो बाथरूम खाली मिले, और सुनिए नहा कर वाइपर मार दीजियेगा !”

“छह बजे है यार, अभी से कौन नहाता है ? और फिर प्रेशर भी नहीं बन रहा बिना चाय के !”

अब तक में सुलोचना चिंटू का टिफिन बॉक्स और पानी की बोतल बाहर ले आयी.. फटाफट चिंटू के बैग में डाल कर वो अंदर चली गयी..
अब की बार एक हाथ में चिंटू का दूध का गिलास और दूसरे में विनोद की चाय लिए आयी और विनोद के हाथ में पकड़ा कर चिंटू के पास चली गयी..

विनोद ने अपनी पत्नी को देख आँखों से भीना सा आभार जता दिया..।

हल्की सी मुस्कान से उस आभार को हवा में उड़ा कर सुलोचना एक बार फिर हवा में सवार रसोई में घुस गयी.. अबकी बार हाथ में एक केला लिए चली आयी, फटाफट छील कर चिंटू के मुहं में ठूंस कर वो वापस लौट गयी..

चिंटू की बस के वक्त विनोद उसे छोड़ने निकल रहा था कि डिंकी के कमरे से केदार बाहर निकल आया..

“कहाँ चल दिए सुबह सुबह ?”

“चिंटू को बस में बैठा आऊँ !”

“चलो मैं भी चलता हूँ !”

“भाई साहब आपके लिए चाय ले आऊँ ?”

“ये चिंटू को बस में बैठा कर आते है, तब तक दोनों दोस्तों के लिए बना लीजिये !”

“जी !”  उन तीनो के निकलते ही वो वापस रसोई में चली गयी..

आज इसी सब भागम-भाग में चिंटू को लाड़ लड़ाना तो भूल ही गयी..।
रोज़ सुबह का भले ही एक सा रूटीन था, और अब तो चिंटू बडी क्लास में भी पहुँच गया था, फिर भी वो अपने छौने को चूम चाट कर ही स्कूल भेजती थी..।

रसोई में इडली की अगली खेप चढ़ा रही थी कि बाहर वाले कमरे से कुछ आवाज आने लगी..
वो बाहर चली आयी..
माधव बाथरूम की तरफ बढ़ रहा था..

“कुछ चाहिए बेटा ?”

उसने बस न में गर्दन हिलायी और कंधे पर टाँग रखें टॉवेल को मजबूती से पकडे बाथरूम में घुस गया…

लड़का बहुत शांत है! अच्छा है डिंकी को संभाल लेगा.. ! वो मुस्कुरा उठी..

अपने समय पर नाश्ता कर के केदार और माधव निकल गए..।
जाते जाते केदार कह गए कि खाने की तैयारी बिलकुल न करे, क्यूंकि इंटरव्यू में लगने वाले वक्त का कोई अंदाज़ा नहीं। वो लोग वहीँ से अगली बस पकड़ कर वापस निकल जायेंगे !

उनके निकलने के बाद विनोद भी अपने ऑफिस निकल गया।
रात के तले हुए बैंगन और आलू गोभी बच गयी थी..
चावलों में आलू गोभी मिला कर पुलाव सा बना लेगी यही सोच कर अपनी चाय लेकर सुलोचना सुकून से अपनी खिड़की पर बैठ कर गाने सुनने लगी…

दो नैना और एक कहानी
थोड़ा-सा बादल, थोड़ा-सा पानी
और एक कहानी

छोटी सी दो, झीलों में वो, बहती रहती है
कोई सुने या ना सुने, कहती रहती है
कुछ लिख के और कुछ ज़ुबानी
थोड़ा सा बादल…

गाना ख़त्म नहीं हुआ था और दरवाज़े पर दस्तक होने लगी.. सुलोचना ने घड़ी देखी और दरवाज़ा खोल दिया..

“ये वक्त है महारानी जी के घर आने का, दस बज गए..।
केदार चाचा चार बार पूछ गए, डिंकी नहीं आयी अब तक ?”

“हटो मम्मी, मुझे बाथरूम जाना है !”

सुलोचना की बात हवा में उड़ा कर वो सीधा बाथरूम में घुस गयी..

“अब सीधे नहा कर निकलना !” सुलोचना ने पुकार कर कहा, लेकिन सुनने के लिए लड़की मौजूद ही कहाँ थी..

कुछ देर बाद ही अपने गीले बालों को झटक कर सुखाती डिंकी सोफे पर बैठी अपने मोबाइल पर कुछ देख रही थी..
सुलोचना उसके लिए भी नाश्ता ले आयी..

“चाय पीयेगी ?”
.
“उन्हुँ.. मैं कहाँ चाय पीती हूँ ?”

“कभी कभी माँ के साथ एक आध कप पी लेने में कोई नुकसान तो नहीं है !”

“अरे मम्मी, पसंद ही नहीं मुझे आपकी चाय कॉफी.. बल्कि मुझे दूध दे दो हॉर्लिक्स वाला !”

“हम्म अच्छी आदत है तू हॉर्लिक्स पीती है, पर कभी कभी बस चाय..  ” सुलोचना बोलते बोलते चली गयी

फटाफट दो चार उलटे सीधे कौर डाल कर डिंकी उठ गयी..

“मैं निकल रही कॉलेज.. गम्मो आ गयी है लेने !”

“अरे ले, ये पीकर तो जा !”

“अब आकर पिऊँगी मम्मी !”

“ख़राब हो जायेगा तब तक !”

डिंकी ने हार्लिक्स के कप को अपनी माँ के मुहं से लगाया और खिलखिला कर बाहर निकल गयी..

“चाय से ज्यादा आपकी हड्डियों को दूध की जरूरत है अम्मी जान.. अपना ख्याल रखा करे.. ये मैंने आप के लिए ही मंगवाया था !”

पलक झपकते डिंकी सीढ़ियों पर थी और उसे टोकने के लिए खुलती ज़बान हल्की सी मुस्कान में बदल गयी..

“पागल लड़की !”

***

दोपहर अपने वक्त पर चिंटू चला आया और उसके साथ ही डिंकी का फ़ोन भी कि उसे आने में वक्त लगेगा..

शाम ढलते ढलते विनोद भी आ गया.. अपनी और विनोद की चाय लिए सुलोचना बाहर चली आयी..

“केदार भाई साहब लौट गए क्या ?”

“अरे हाँ मैं भूल कैसे गया ? केदार का फ़ोन आया था.. माधव का सेलेक्शन हो गया है.. उसे अगले हफ्ते से यहीं ज्वाइन करना है ! कह रहा था आसपास कोई किराये का घर देख रखने को..
मैंने कहा भी यही रह जायेगा..”

“पगला गए है क्या ? हमारे घर में चूहा बिल्ली तक को रखने की जगह नहीं है.. और फिर जवान लड़की घर में है.. आपको तो दुनियादारी की समझ ही नहीं है !”

“अरे पूरी बात तो सुन लो… उसने मना कर दिया..।
कहने लगा माधव मानेगा नहीं.. इसलिए अलग कमरे का ही इंतज़ाम देख लेना..
उसका कोई परिचित, दोस्त कोई भी नहीं है यहाँ !”

“हम्म वैसे लड़का तो सीधा है ! सुनिए वो गुप्ता जी है न कमिटी वाले, उनके यहाँ शायद एक कमरा खाली है !”

“वो जो पीछे वाली गली में रहते है !”

“हाँ !”.

“ठीक है बात कर लूंगा.. लाओ यार कुछ खिलाओ भी, आज तो बहुत भूख लग रही है !”

“खाना ही परोस देती हूँ.. आपका पसंदीदा बैगन का भरता बनाया है !”

“डिंकी कहाँ है ? दिख नहीं रही ?”

“फ़ोन आया था उसका, कह रही थी कुछ प्रोजेक्ट करना है, देर से आएगी.. गरिमा के घर पर है तीनो लड़कियाँ !”

“अच्छा.. फिर रहने दो.. उसके आने के बाद ही खाएंगे !”

“ठीक है ! बेसन की पापड़ी ले आती हूँ, विम्मो दी ने भेजी थी, वो रखी है न!”

“मैं पूछना भूल गया था, कब है विम्मो की बेटी की शादी ?”

“अभी शादी लगी कहाँ है ? लड़का ढूंढ़ रही है बेचारी !”

“कहाँ की बेचारी, तुम्हारी बहन को कोई लड़का मुआफ़िक ही नहीं लगता तो कोई क्या करे? किसी का परिवार बड़ा है तो किसी का घर छोटा, कहीं लड़के की दो बहने कुंवारी बैठी तो कही लड़के के दादा दादी भी साथ ही रहते.. हजार तो नखरे है उनके !”
.
“नखरे करने वाली किस्मत भी तो पायी है! कहाँ जीजा जी कोयला फैक्ट्री में थे और कहाँ विम्मो से शादी के अगले साल ही पीसीएस निकाल गए..
अब तो सचिवालय पहुँच गए है.. नहीं नहीं में लाख रुपया तो महीने का बन ही जाता होगा !”

“इससे कहीं ज्यादा मिलता होगा, और ऊपरी जो कमाते वो अलग ! फिर भी कंजूस बहुत है तुम्हारी बहन !”
.
“अच्छा, पिछली दफा जीजा जी आये तो आधा किलो पिन्नी और ये पापड़ी ले आये थे!
और क्या अपना मकान तुम्हारे नाम कर दे, तीन साड़ियां भेजी थी मेरी बहन ने !”

“अच्छा बाबा, मान गए तुम्हारे जीजाजी जैसा दिलदार कोई नहीं.. अब खुश ! वैसे पपड़ी बनी भी मजेदार है !”

विनोद ने स्वाद लेते हुए कहा और सुलोचना के चेहरे पर उभर आया तनाव छू मंतर हो गया..


***

इधर केदार और माधव वापसी की बस में बैठ चुके थे..
माधव खिड़की की तरफ बैठा था,ठंडी हवा के झोंके जैसे गालों को सहला कर थपकी सी दे रहे थे, उसकी ऑंखें मूँद गयी..
जाने कितनी रातो से उसे चैन की नींद नहीं आयी थी..
हर वक्त सहमा सा रहता, पता नहीं सरकारी नौकरी मिलेगी या नहीं ? डरावने सपने आने लगे थे उसे.. लेकिन आज सब अच्छा सा लग रहा था.. शुरुवाती सैलरी ज्यादा न भी हो तो भी दो साल के प्रोबेशन पीरियड के बाद अच्छी मोटी तनख्वाह उसके हाथ आनी थी..

सुबह भी तो सहमा सा था, जब पापा के साथ विनोद अंकल के घर से निकला था।

उनकी सोसाइटी के गेट के बाहर पहुँचते ही जाने कैसे उसकी नजर उस गली की तरफ अनचाहे ही मुड़ गयी जहाँ कल डिंकी गयी थी..
मन में उसके ऐसा कोई विचार नहीं था कि डिंकी की झलक मिल जाये, फिर भी उसकी मर्जी के बिना ही उसकी गर्दन घूम गयी थी..
हमारे शरीर की हर हरकत हमारे मन के अनुरूप हो, ये ज़रूरी तो नहीं..

“नमस्ते चाचा जी !” एक छनछनाती सी आवाज़ कानो में पड़ी और वो सामने देखने लगा..

रात के ही कपड़ो में डिंकी अपनी सहेली के साथ उन लोगो के सामने खड़ी थी..

“खूब खुश रहो बेटा.. यहाँ कहाँ से टपक पड़ी तुम ?” केदार ने लाड़ से पूछा

“वो वहाँ गणपति मंदिर है, हम दोनों सुबह सुबह वहाँ तक टहलने जाते है ! बस वही से लौट रहे है !”

“अरे वाह.. सुबह सुबह पूजा पाठ !”

“नहीं चाचा जी, अभी तो नहायी भी नहीं हूँ.. बस मंदिर में बाहर से ही गणपति बप्पा को हाय हैलो कर के चली आती हूँ !” उसने मुस्कुरा कर कहा और अपने हाथ में पकड़े हुए लाल जासवन के फूल को माधव की तरफ बढ़ा दिया..

“ये साथ रखिये, गणेश सब अच्छा करेंगे !”

मुस्कुरा कर डिंकी ने हाथ बढ़ाया और एक बार फिर बिना मन मर्जी के ही माधव ने हाथ बढ़ा कर वो फूल ले लिया..
फूल की डंठल पर दूब भी थी..।

हलके से झुक कर माधव ने आभार जताया और “चले पापा” कह कर आगे निकल गया..
डिंकी एक तरफ को सरक गयी, और केदार और माधव आगे बढ़ गए..
केदार ने जाते हुए हाथ हिला दिया..

डिंकी सुषमा से विदा लेकर अपने घर की तरफ बढ़ गयी..

क्रमशः  9295

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
10 months ago

अच्छा भाग! बड़ी सारी जानकारी और माधव का मन भी आया है, dinki की छाप पड़ गई माधव पर..💐

Nisha
Nisha
1 year ago

Ganesh ji ne toh madhav ka kaam kar diya.dinnki ka diya puja ka phool lucky raha

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Nice.

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

अरे वाह
मतलब माधव अपना luck साथ लेकर गया था फिर तो सिलेक्शन होना ही था
एक बेटी का होना हर घर के लिये जरूरी है कुछ ना कहके भी वो सबका ध्यान रखती है

Jagruti
Jagruti
1 year ago

बहुत सुंदर कहानी ।

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

Upasna
Upasna
1 year ago

कद्दू…!!! सिर दर्द के बाद भी मुस्कान चली आयी चेहरे पर ,एक मध्यम वर्गीय परिवार का पूरा खांचा उकेर दिया है आपने , वही सुबह की भागम भाग ,एक गृहस्थन का परफ़ेक्ट होने का प्रेशर , माँ का बच्चजों को लाड़ और पति पत्नी की वही आम सी बात चीत में होती खींचातानी ….
Dinki के दिये फूल और दूब के संग गणेश जी का आशीर्वाद लेकर गए माधव का काम तो बन गया अब देखिए क्या होता है आगे

जागृति
जागृति
1 year ago

सुंदर भाग

Shanu singla
Shanu singla
1 year ago

💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫

कांति
कांति
1 year ago

भले ही नर्वस था माधव पर डिंकी के दिए हुए गणपति के फूल और दूब ने कमाल कर दिया। बधाई हो आखिरकार केदार जी का सपना सच हुआ बेटे को सरकारी नौकरी मिल गई।
सफल गृहिणी की तरह अतिथि की आव भगत सुलोचना ने खूब अच्छी तरह से की और मन की मुराद भी पूरी हुई सरकारी नौकरी तो लग गई। अब माधव और डिंकी की कहानी जाने कब बढ़ेगी।